अक्सर ऐसा होता है कि जब किसी बात को हम बार-बार सुनते हैं तो फिर धीरे-धीरे उस बात का वज़न हमारी नज़रों में घट जाता है। बचपन से हमने सण्डे स्कूल में प्रभु यीशु मसीह के इस कथन को सुना है - बालकों को मेरे पास आने दो, उन्हें मना मत करो, क्योंकि स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है। इस वाक्य को हमने इतनी बार सुना है कि अक्सर इस वाक्य की गम्भीरता की ओर हम ध्यान नहीं देते। मैं माता-पिताओ, शिक्षक-शिक्षिकाओं का इस वाक्य के पहले भाग पर ध्यान ले जाना चाहता हूं, जहां प्रभु यीशु कहते हैं, बालकों को मेरे पास आने दो।
पूरे मन से धन्यवादजब कोई हमारी मदद करता है, तो उसके प्रति हमारे हृदय में एक धन्यवाद की भावना होती है। किसी ने कहा है - जो धन्यवाद की भावना है वह बाकी सद्भावनाओं की जननी होती है। इसलिये ज़रूरी है कि हमारे हृदय में एक-दूसरे के प्रति धन्यवाद हो। परमेश्वर ने किसी दुर्घटना से हमें बचाया, हमको चंगाई दी, परमेश्वर ने कोई बड़ा उपकार हमारे जीवन में किया। हमारे किसी प्रिय का या इस संसार में किसी व्यक्ति का कोई सहयोग हमें मिला, तो हम धन्यवाद कह कर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर देते हैं। हम अक्सर कहते हैं उन्होंने हमारी बहुत मदद की और हमने भी जाकर धन्यवाद दे दिया।
तृप्ति - बहुत से परिवारों में यह देखा जाता है कि किसी भी मूलभूत आवश्यकता की घटी नहीं है। भरा पूरा परिवार है परन्तु केवल अतृप्त लालसाओं को पूरा करने की तीव्र इच्छा, कुछ और पाने की चाहत परिवारों में तनावपूर्ण वातावरण निर्मित कर देती है। इतना ही नहीं यही अतृप्ति ऐसे परिवारों में विश्वासघात, अलगाव, बिखराव अथवा बर्बादी का भी कारण बनती है। आखि़र वे कौन से कारण हैं जिनके द्वारा शैतान परिवारों में विषाद उत्पन्न कर रहा है? और किन कारणों के आधार पर हमें अपने परिवारों का मूल्यांकन करना है? यही इस लेख का उद्देश्य है।