मत्ती 6:14-15; इफिसियों 4:31-32 परिचय :- जीवन में अक्सर जो बात जितनी आवश्यक होती है उतनी ही कठिन होती है । ऐसी ही एक कठिन बात है; क्षमा । क्षमा किसी भी सम्बन्ध को स्थायित्व देने के लिए आवश्यक है । पति या फिर पत्नी, या फिर मित्र या वह व्यक्ति जिसके साथ पारिवारिक सम्बन्ध हों इनके साथ के सम्बन्धों में क्षमा आवश्यक है । जिस सम्बन्ध में क्षमा नहीं है वह सम्बन्ध स्थायी हो नहीं सकता । हम मनुष्य हैं । हम इस संसार में से होकर जब गुज़रते हैं तो लगभग प्रतिदिन हमको चोट लगती है या हम चोट लगाते हैं; जाने या अन्जाने में । ये चोटें ऐसी होती हैं, जो दिखाई नहीं देतीं, जो पीड़ादायक होती हैं । क्यों ? क्योंकि मनुष्य मात्र शरीर नहीं वरन आत्मा भी है । उसके हृदय में भावनाएं भी हैं । जब भावनाओं पर चोट लगती है तो बहुत पीड़ा होती है । बहुत बार हमें अपनों के हाथों से ऐसी चोटें लगती हैं, जिनका ज़िक्र हम नहीं कर सकते। इन चोटों को हम शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते । हमें सबसे ज़्यादा चोटें अपने परिवार के लोगों से ही मिलती हैं । उनसे मिलती हैं जिन पर हम सबसे ज़्यादा विश्वास करते हैं, जो हमारे अपने होते हैं । जब ये चोटें लगती हैं तो फिर सम्बन्धों में दरार आ जाती है । परन्तु जीवन में आगे बढ़ने के लिए और सम्बन्धों को बनाए रखने के लिए क्षमा आवश्यक है । शान्ति का जीवन जीने के लिए भी क्षमा आवश्यक है। अगर हम क्षमा नहीं करेंगे तो उस चोट का दर्द बना रहेगा और शान्ति से जीवन जीना कठिन हो जाएगा । क्षमा ज़रूरी है एकता के लिए भी, चाहे वह परिवार की एकता हो या फिर समाज की । परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी होने के लिए भी क्षमा ज़रूरी है । परन्तु सबसे प्रमुख बात जिसकी वजह से क्षमा ज़रूरी है वह लूका 6:14-15 में पायी जाती है । वहां पर प्रभु यीशु कहते हैं ``यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा करोगे तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा और यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा न करोगे तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा न करेगा''। यदि हमें परमेश्वर की क्षमा न मिले तो हम उद्धार से वंचित हो जाएंगे । हमारी आत्मा का उद्धार कैसे होगा ? हमको अनन्त जीवन कैसे मिलेगा ? कौन है ऐसा जिसे परमेश्वर की क्षमा की आवश्यकता नहीं है ? हम में से हर एक को परमेश्वर की क्षमा की आवश्यकता है । परमेश्वर हर एक से प्रेम करता है । वह हर एक को अपने पास बुलाता और बार-बार अवसर देता है । वह नहीं चाहता कि किसी का विनाश हो । वह नहीं चाहता कि हम नरक की आग में जलते रहें । इसीलिए वचन में लिखा है कि परमेश्वर ने इस संसार से इतना प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो । चाहे कोई हत्यारा हो । चाहे कोई वेश्या हो । चाहे कैसे भी घृणित पाप हमने किए हों, परमेश्वर हमको अवसर देता है कि हम क्षमा करें । यह बात तो आवश्यक है कि हम क्षमा करें परन्तु उसका क्या अर्थ है ? जो व्यक्ति जितना आपके निकट होता है, उसको उतना ही अधिक क्षमा करना होता है । पति-पत्नी को हर दिन एक दूसरे को क्षमा करना होता है । बच्चों को क्षमा करके आगे बढ़ना होता है क्योंकि उनके लिए आवश्यक है कि मां-बाप उन्हें क्षमा करें। परन्तु जब हम कहते हैं कि मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया तो इस बात का क्या अर्थ है? 1. क्षमा का अर्थ है कि मैं अब उस अतीत की बात पर ध्यान नहीं दूंगा:- यानि जिस बात के लिए तुम्हें क्षमा कर दिया, उस बात पर मैं अपने ध्यान को केन्द्रित नहीं करूंगा । ऐसा नहीं है कि अब वह बात हमारे मन में नहीं आएगी। मनुष्य होने के नाते जिस ने हमें चोट पहुंचाई है उसको हम बार-बार याद करते हैं। बार-बार हम उस पर विचार करते हैं । परन्तु मसीही होने के नाते जो बात हमको समझना है वह यह कि क्षमा एक भावना की बात नहीं है । यह निर्णय की बात है। यह दिल की बात नहीं बल्कि दिमाग की बात है । जो कुछ तुमने मेरे विरोध में किया, उससे बढ़ कर मेरे जीवन में परमेश्वर है । परमेश्वर की आज्ञा मानते हुए मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया। यशायाह 43:25 में लिखा है- ``मैं वही हूं जो अपने नाम के निमित्त तेरे अपराधों को मिटा देता हूं और तेरे पापों को स्मरण न करूंगा''। परमेश्वर यहां पर कह रहा है कि मैं तेरे अतीत पर ध्यान नहीं दूंगा । हो सकता है लोग याद कराएं, मित्र याद कराएं परन्तु परमेश्वर कहता है, मैं वही हूं जो अपने नाम के निमित्त तेरे अपराधों को मिटा देता हूं और तेरे पापों को स्मरण न करूंगा । यिर्मयाह 31:34 में लिखा है - ``और तब उन्हें फिर एक दूसरे से यह न कहना पड़ेगा कि यहोवा को जानो, क्योंकि, यहोवा की यह वाणी है कि छोटे से लेकर बड़े तक, सब के सब मेरा ज्ञान रखेंगे; क्योंकि मैं उनका अधर्म क्षमा करूंगा, और उनका पाप फिर स्मरण न करूंगा''। परमेश्वर की याददाश्त कम नहीं हो गई कि वह हमारे पापों को स्मरण न कर सके । परन्तु वह कहता है कि मैं उनको मिटा दूंगा । उनको क्षमा कर दूंगा, और उनके पापों को फिर कभी स्मरण न करूंगा । यदि हम कहते हैं कि मैंने तुमको क्षमा कर दिया तो उन बातों पर हमको ध्यान बार-बार नहीं लगाना है । जो बीत गया सो बीत गया । मानव होने के नाते उस बात की याद भले ही बनी रहे, वह टीस बनी रहे परन्तु अब उस बात पर ध्यान नहीं देना है । 2. मैं उस बात को तुम्हारे विरोध में कभी नहीं दोहराऊंगा :- अक्सर हम कह तो देते हैं कि मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया । परन्तु जब कभी बात आती है तो कह उठते हैं, अरे ! उसने मेरे साथ तो बड़ा धोखा किया । कई बार जब पति-पत्नी में बात होती है तो उनके बीच भी पुरानी बातें उभर कर आ जाती हैं । परन्तु यदि हमने क्षमा कर दिया है, तो फिर उस घटना को, उस व्यक्ति के विरोध में नहीं दोहराना है । मीका 7:19 में लिखा है ``वह फिर हम पर दया करेगा, और हमारे अधर्म के कामों को लताड़ डालेगा। तू उनके सब पापों को गहिरे समुद्र में डाल देगा''। दुनिया का सबसे गहरा समुद्री स्थान गवॉम देश के दक्षिण पूर्व में प्रशान्त महासागर में है । उसकी गहराई 36201 फीट है । अमेरिका की सबसे ऊंची बिल्डिंग सीयर्स टॉवर जैसी 100 इमारतें भी उसमें डूब सकती हैं । यहां पर परमेश्वर कह रहा है कि मैं तुम्हारे पापों को गहरे समुद्र में डाल दूंगा। इसका अर्थ यह है कि उन्हें फिर कोई ढूंढ न सकेगा, उन्हें निकाला न जा सकेगा। रोमियों के छठे अध्याय में बपतिस्मा की बात है । जब प्रभु यीशु मसीह ने हमारे पापों को क्षमा किया तो उसके साथ बपतिस्मा में मानो हम दफनाए गए । हमारा पुराना मनुष्यत्व पानी की क़ब्र में दफना दिया गया । जिसको दफना दिया गया है अगर उसे निकालेंगे तो उसमें से बदबू ही आएगी, सड़ांध ही आएगी, उससे कुछ नहीं मिलेगा । भजन संहिता 103:12 में लिखा है ``उदयाचल अस्ताचल से जितनी दूर है, उस ने हमारे अपराधों को हम से उतनी ही दूर कर दिया है'' । उदयाचल अर्थात् जहां से सूर्य उदय होता है । अस्ताचल अर्थात् जहां पर सूर्य अस्त होता है । सूर्य पूर्व से उदय होता है और पश्चिम में अस्त होता है । कोई पूर्व से पश्चिम की दूरी नाप सकता है ? कोई उसकी सीमा बता सकता है ? पूर्व दिशा का कहां समापन है यह कोई बता सकता है? पश्चिम दिशा का कहां प्रारम्भ है यह कोई बता सकता है ? नहीं । उदयाचल से अस्ताचल जितनी दूर है उसने हमारे पापों को हमसे उतने ही दूर कर दिया, कोई सीमा नहीं है । मेरे प्रियो ! जब हम कहते हैं कि मैंने तुम्हें माफ किया तो हमें यह स्वीकार करना है कि जैसे परमेश्वर ने हमें क्षमा किया वैसे ही हमें भी करना है । हमें यह कहना है कि मैं इस बात को तुम्हारे विरोध में कभी नहीं दोहराऊंगा । 3. मैं उक्त विषय की चर्चा फिर कभी किसी से नहीं करूंगा :- कुलुस्सियों 2:13:14 में लिखा है ``और उस ने तुम्हें भी, जो अपने अपराधों, और अपने शरीर की खतनारहित दशा में मुर्दा थे, उसके साथ जिलाया, और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया। और विधियों का वह लेख जो हमारे नाम पर, और हमारे विरोध में था मिटा डाला; और उस को क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया है''। यहां पर एक शब्द आया है कि परमेश्वर ने मिटा दिया । ग्रीक भाषा में इसके लिए शब्द है `एक्सेल्फयू' जिसका अर्थ होता है इतना शुद्ध जिसमें कोई भी चिन्ह, दाग या धब्बा नहीं । उसने क्षमा किया है । उसने लेखा मिटा दिया है । उसने हटा दिया है । और उसने क्रूस पर उसे कीलों से जड़ दिया है । वह बात वहां समाप्त हो गई। जब परमेश्वर ने हमको इस प्रकार से क्षमा किया है तो हम भी जब क्षमा करें तो इस बात में अडिग रहें कि उस बात की चर्चा व्यक्ति के विरोध में कभी किसी से नहीं करेंगे। सिर्फ्र इतना ही पर्याप्त नहीं कि जिसे क्षमा किया उससे नहीं करेंगे वरन किसी से कभी भी इस बात की चर्चा नहीं करेंगे । मैं छोटा था तो मेरे पापा जब अमेरिका से लौटे तो मैजिक स्लेट लाए । अब तो यह सामान्य सी बात हो गई है । परन्तु उस समय बड़े आश्चर्य की बात होती थी। उसमें कुछ भी बना दो, कुछ भी लिख दो और उसके बाद पेज को तख्ती से खींच दो तो सब साफ हो जाता था । परमेश्वर ने ऐसा ही किया है । बल्कि इससे भी बढ़कर किया है । उसने हमारे अपराधों को दफन कर दिया । मिटा दिया । कीलों से जड़ कर क्रूस पर सामने से हटा दिया है । अत: जब हम क्षमा करें तो यह प्रतिज्ञा भी करें कि इस बात की चर्चा फिर किसी से कभी नहीं करेंगे । 4. यह विषय हमारे भविष्य के सम्बन्धों को प्रभावित नहीं करेगा:- इसका अर्थ यह है कि जो घटना घटी उसका विषय अब हमारे भविष्य के सम्बन्धों को प्रभावित नहीं करेगा । मेरे प्रियो, यह बात आसान नहीं है । परन्तु यही अर्थ है क्षमा करने का । हमारे भविष्य के सम्बन्धों में इस विषय को अब अवरोध नहीं बनने दिया जाएगा । मीका 7:18-19 लिखा है ``तेरे समान ऐसा परमेश्वर कहां है जो अधर्म को क्षमा करे और अपने निज भाग के बचे हुओं के अपराध को ढांप दे ? वह अपने क्रोध को सदा बनाए नहीं रहता, क्योंकि वह करुणा से प्रीति रखता है । वह फिर हम पर दया करेगा, और हमारे अधर्म के कामों को लताड़ डालेगा। तू उनके सब पापों को गहिरे समुद्र में डाल देगा''। किसी ने कहा है कि जब हम झगड़ते हैं तो हम पशुओं की तरह व्यवहार करते हैं । जब हम बदला लेते हैं तो हम मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हैं । परन्तु जब हम क्षमा करते हैं तो हम परमेश्वर की तरह व्यवहार करते हैं । कितनी बार हमारा व्यवहार पशुवत हो जाता है । कितनी बार मनुष्यों के समान हो जाता है । परन्तु परमेश्वर हमको अवसर देता है कि जब हम क्षमा करते हैं तो हमारा व्यवहार परमेश्वर के समान हो जाता है । हम प्रभु यीशु मसीह के सच्चे अनुयायी हो जाते हैं । प्रभु यीशु मसीह ने उन लोगों के लिए जिन्होंने उसे क्रूस पर लटका दिया था, प्रार्थना की कि हे पिता इन्हें क्षमा कर क्योंकि यह नहीं जानते कि ये क्या करते हैं । पुनरुत्थान के बाद हम पाते हैं कि चेले प्रचार करते हैं और पिन्तेकुस्त के दिन 3000 से अधिक लोग कलीसिया में मिलाए जाते हैं । उनका बपतिस्मा होता है । जिन्हें परमेश्वर सम्पूर्ण क्षमा देता है । ये कौन लोग हैं ? यह तो उसी क्षेत्र की बात है । सिर्फ्र पांच किलोमीटर दूर की बात है । ये वही लोग रहे होंगे जिन्होंने कहा होगा कि बरअब्बा को हमारे लिए छोड़ दो और इसे क्रूस पर चढ़ाओ । ये वे लोग होंगे जिन्होंने उसे काठ के क्रूस पर ठोंका होगा । ये वे लोग होंगे जिन्होंने उसके मुंह पर थूका होगा। ये वे लोग होंगे जिन्होंने उसकी पसली में भाला घोंपा होगा । ये वे लोग होंगे जिन्होंने उसके कपड़े उतारे होंगे । ये वे लोग थे जिनके लिए प्रभु यीशु ने प्रार्थना की कि हे पिता इन्हें क्षमा कर क्योंकि यह नहीं जानते कि ये क्या करते हैं । पिन्तेकुस्त के दिन 3000 से अधिक ऐसे लोगों को परमेश्वर क्षमा कर देता है और वे अनन्त जीवन पाते हैं । इन लोगों के द्वारा कलीसिया की स्थापना होती है । निष्कर्ष :- मेरे प्रियो, जब हम कहते हैं कि मैं तुम्हें क्षमा करता हूं तो हमें इन चार बातों को ध्यान में रखना है । हम सिर्फ्र क्षमा के शब्द ही न कहें बल्कि सम्पूर्ण हृदय से क्षमा करें और कहें कि, 1. मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि जो बीत गया सो बीत गया । उस पर मैं ध्यान नहीं दूंगा, उन बातों की ओर मैं अपना ध्यान केन्द्रित नहीं करूंगा। 2. इस बात को मैं तुम्हारे विरोध में कभी नहीं दोहराऊंगा । 3. मैं इस विषय की चर्चा किसी के सामने नहीं करूंगा । 4. जो हुआ वह हमारे भविष्य को कभी प्रभावित नहीं करेगा । इन सब बातों का समापन और निष्कर्ष परमेश्वर के इस निर्देश में है, ``सब प्रकार की कड़वाहट और प्रकोप और क्रोध, और कलह, और निन्दा सब बैरभाव समेत तुम से दूर की जाए । और एक दूसरे पर कृपाल और करुणामय हो, और जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो''। परमेश्वर हम सभी को आशीष दे ।