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लेख

कांच का दर्पण

कांच से हम सब कुछ साफ-साफ आर-पार देख सकते हैं परन्तु दर्पण के पार हम कुछ भी नहीं देख सकते हैं।

कांच जैसी स्थिति उन लोगों की होती है जो प्रभु यीशु मसीह को अपना उद्धारकत्र्ता-मुक्तिदाता स्वीकार करते हैं और उसकी शिक्षाओं पर विश्वासयोग्यता से आगे बढ़ते हैं। उन्हें सब कुछ आर-पार साफ-साफ दिखाई देता है। वे मसीह के बिना पाप-बुराई-अधर्मों में लिप्त अपने जीवन के अन्धकारमय पहलू को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। वे वर्तमान में मसीह में अपने उन्मुक्त धार्मिकता के जीवन को तथा उसके प्रेम, दया, क्षमा, सामर्थ्य, उपकार व अनुग्रह को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। साथ ही वे भविष्य में स्वर्ग में उसके साथ सिद्ध अनन्त जीवन को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं।

दर्पण जैसी स्थिति उन लोगों की होती है जिन्हें केवल यह संसार व सांसारिकता ही दिखाई देती है। उन्हें परमेश्वर व उसके अनेक उपकार नहीं दिखाई देते हैं। उन्हें इस संसार के पार उसका न्याय व दण्ड दिखाई नहीं देता है। एक मसीही व उसके परिवार की स्थिति कांच के समान है या दर्पण के समान, इसे किन बातों के आधार पर जान सकते हैं?

1. परमेश्वर की पहली आज्ञा की अवमानना:- परमेश्वर की पहली आज्ञा है कि परमेश्वर तेरा ईश्वर मैं हूं, तू मुझे छोड़ और दूसरे को ईश्वर करके न मानना (निर्गमन 20ः3)।

हमको लगता है कि हम मसीही मसीह को ही तो ईश्वर को मान रहे हैं परन्तु हमको देखना है कि हमने स्वयं को सम्पूर्णता से उसके आधीन किया है या नहीं? हम उसकी महिमा, गवाही व सेवकाई के लिए समर्पित हैं या नहीं? हमारे जीवन से उसके कार्यों व राज्य का विस्तार हो रहा है या नहीं? हम उसकी देह की पवित्रता, एकता व दृढ़ता के लिए अपने स्वार्थ, अहं, हठ व अन्य दुर्भावनाओं का त्याग करने को तैयार रहते हैं या नहीं? यदि नहीं तो वास्तव में मुंह से तो हम “हे प्रभु- हे प्रभु, Praise the Lord ! हालेलूय्याह!” कर रहे हैं परन्तु हमारे जीवनों में उसका प्रभुत्व होने के बदले हमारी दुर्भावनाओं का, हमारी इच्छा, हमारी महिमा व हमारे स्वार्थों का ही वर्चस्व है। इसलिए प्रभु यीशु ने कहा - “प्रत्येक जो मुझ से, हे प्रभु ! हे प्रभु ! कहता है, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है, वही प्रवेश करेगा। उस दिन बहुत लोग मुझ से कहेंगे, हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हमने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की और तेरे नाम से दुष्ट आत्माओं को नहीं निकाला और तेरे नाम से बहुत से आश्चर्यकर्म नहीं किए? तब मैं उनसे स्पष्ट कहूंगा, मैंने तुम को कभी नहीं जाना; हे कुकर्मियों मुझ से दूर हटो” (मत्ती 7ः20-23)।

जब हमारी ये कमज़ोरियां हमारे जीवनों में ईश्वर का स्थान ले लेती हैं तो फिर ये ईश्वर हमसे हमारे परिवार, कार्य, चरित्र, योग्यताओं, सम्बन्धों व आत्माओं तक का चढ़ावा मांगती हैं और हमारा उन पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता है। इस घातक व त्रासदीपूर्ण स्थिति से स्वयं व परिवार की रक्षा हेतु अपरिहार्य है कि हम परमेश्वर को ईश्वर करके मानें तथा उसकी आधीनता में अपने जीवन व परिवार को आगे बढ़ाएं। यह बुनियादी बात है।

2. परमेश्वर की सर्वप्रमुख आज्ञा की अवहेलना:-परमेश्वर की सर्वप्रमुख आज्ञा है कि तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे हृदय और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि से प्रेम कर (मत्ती 22ः37)।

इस आज्ञा की अवहेलना कर जब हम अपने शरीर और इस संसार से पूरे दिल, दिमाग व शक्ति से प्रेम करते हैं तो फिर ये शरीर और संसार हमारे जीवनों व परिवारों में ईश्वर के स्थान को प्रतिस्थापित कर देते हैं। रोमियों 8ः6 से 8 में बहुत स्पष्टता से लिखा हुआ है कि “शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है; क्योंकि शारीरिक मन तो परमेश्वर से शत्रुता करता है, वह न तो परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है, और न ही हो सकता है। जो शारीरिक हैं, वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते”।

जब हमारे शरीर, सांसारिकता व भौतिकवाद ही हमारा नियंत्रण और संचालन करते हैं तथा इन्हीं पर हमारा ध्यान, समय व ऊर्जा केन्द्रित होती है तब इन तथाकथित ईश्वरों के आगे हम अपनी अच्छाई, खराई, चरित्र व विश्वासयोग्यता की बलि चढ़ा देते हैं (फिलिप्पियों 3ः18-19; रोमियों 8ः6-9; 1 यूहन्ना 2ः15-17; याकूब 4ः4)। साथ ही हमारे परिवार व आत्मा भी बर्बादी की दिशा में अग्रसर होते हैं।

परमेश्वर से सच्चे दिल से प्यार किसी विशिष्ट स्थान व समय तक ही सीमित नहीं रहता है। यह दिल का प्यार हर स्थान, हर समय, हर परिस्थिति में सम्पूर्ण जीवन शैली द्वारा प्रगट होता है। यदि नहीं तो फिर शराब की एक-एक घूंट के द्वारा,

सिगरेट व नशे के एक-एक कश के द्वारा,

सम्बन्धों के हर एक विश्वासघात के द्वारा,

हर एक वर्जित वस्तु को अपने घर-परिवार में लाने के द्वारा,

अविश्वासी को जीवनसाथी के रूप में अपनाने के द्वारा,

मुंह से हर एक झूठ व अपशब्द के द्वारा;

कलीसिया से सम्बन्ध तोड़ने के द्वारा,

आराधना में अकारण अनुपस्थिति के द्वारा,

हम यही प्रगट करते हैं कि ये सब परमेश्वर हमको तुझसे अधिक प्रिय हैं। हम तेरे बिना रह सकते हैं पर इनके बिना हम नहीं रह सकते हैं।

3. परमेश्वर के वचन की अवमानना:- कभी- कभी धार्मिक कट्टरपन के कारण भी हमारी स्थिति दर्पण के समान हो जाती है। शाऊल के समान हमारे अपने सोच-विचार, समझ, परम्पराएं, धर्म सिद्धान्त, नियम, रीति-रिवाज, प्रार्थनाएं, उपवास, पारिवारिक पृष्टभूमि का घमण्ड आदि बातें भी हमारे जीवनों में ईश्वर का स्थान ले लेती हैं (प्रेरितों के काम 26ः5; फिलिप्पियों 3ः4-6)। इस धार्मिक कट्टरपन के कारण हमारी आत्मिक आंखें अन्धी हो जाती हैं और इनके पार हम न ही ईश्वर को देख पाते हैं और न ही अपने पड़ोसियों को (मत्ती 22ः38)।

बाइबिल में वर्णन है कि प्रभु यीशु मसीह ने शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता की कटु शब्दों में आलोचना की। उनके सामने वचन, मार्ग, सत्य, जीवन, उद्धार व ईश्वर सशरीर उपस्थित था (कुलुस्सियों 1ः9)। परन्तु अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण वे उसे पहचानने में असमर्थ थे।

उनकी आंखों के सामने भविष्यवक्ताओं की सभी भविष्यवाणियां प्रभु यीशु मसीह में पूर्ण हो रही थीं। वह उनके अविश्वास को अपने अनेक आश्चर्यकर्मों के द्वारा प्रमाण दे देकर दूर करना चाह रहा था। जन्म के अन्धों को वह आंखें दे रहा था (यूहन्ना 9ः32-33)। मुर्दों को वह जिला रहा था (मत्ती 9ः18-25; लूका 7ः11-15; यूहन्ना 11ः43-44)। सब लोगों में चर्चा थी कि ऐसे आश्चर्यकर्म केवल ईश्वर ही कर सकता है (यूहन्ना 9ः33) परन्तु फिर भी वे उसे ईश्वर व अपने जीवन का प्रभु मानने में असमर्थ रहे (यूहन्ना 11ः47-48; 12ः42-43)।

जब हमारे जीवनों में अपनी धार्मिकता का घमण्ड होता है तब भी वचन की अवमानना होती है। ऐसी स्थिति में भी हमें प्रभु यीशु मसीह की आधीनता स्वीकार्य नहीं होती है और न ही हम अपने पड़ोसी से ही सच्चा प्यार कर पाते हैं।

आवश्यक है कि हम अपने जीवन व परिवार का गम्भीरतापूर्वक पुर्नमूल्यांकन करें। देखें कि किन-किन बातों की कलई हमारे कांच पर चढ़ चुकी है। उस कलई को हम समय रहते सम्पूर्णता से दूर करें ताकि हम शुद्ध कांच से सब कुछ आर-पार स्पष्टता से देख सकें।

डाॅ. श्रीमती इन्दु लाल