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सम्पादकीय

ज़िन्दगी के चित्र में परमेश्वर

पिछले वर्ष जून माह के अन्तिम सप्ताह में मुझे अमेरिका के एक प्रमुख बाइबिल काॅलेज के प्रिंसिपल का पत्र मिला। पत्र बहुत विचलित करने वाला था, उन्होंने लिखा था कि बीती रात एक दुखद दुर्घटना हुई। बाइबिल काॅलेज में प्रथम वर्ष का एक छात्र जो बहुत ही प्रतिभावान था और गम्भीरता से परमेश्वर की सेवा में लगा हुआ था, तीन अन्य इन्टर्न्स के साथ यात्रा कर रहा था कि अचानक से उनकी कार एक बड़े ट्रक से टकरा गई। उन लोगों की कोई ग़लती नहीं थी, सारी लापरवाही ट्रक ड्राइवर की थी जिसकी वजह से यह भीषण दुर्घटना हुई। दुर्घटना में उस जवान बेटे की मृत्यु हो गई और बाकी तीनों जवान भी गम्भीर रूप से घायल हो गए।

उस प्रिंसिपल ने मुझे लिखा कि मुझे समझ नहीं आता कि इस बात के लिए कैसे अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर करूं। उन्होंने कहा कि मेरे लिए बहुत कठिन समय था जब मुझे उस युवा के माता-पिता को उसकी मृत्यु की सूचना देनी पड़ी। यदि लम्बी बीमारी के बाद किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए तो बात कुछ भिन्न होती है क्योंकि परिवार के लोगों का हृदय उस बात के लिए तैयार हो जाता है। परन्तु अचानक से घटने वाली ऐसी त्रासदियां जब होती हैं तो हम और आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि माता-पिता के हृदय में, भाई-बहिनों, मित्रों, सम्बन्धियों के हृदय में कितनी पीड़ा होगी!

परन्तु उन्होंने एक बात और लिखी कि हमें उनकी नाईं शोक नहीं करना है, जिन्हें कोई आशा नहीं। तब मेरे ज़हन में एक बात आई कि ज़िन्दगी के किसी भी चित्र में से यदि परमेश्वर को हटा दें तो सारा चित्र अन्धकारमय है। सारा चित्र नकारात्मक है, निराशा से भरा है। परन्तु यदि उस चित्र में परमेश्वर को रखें तो उस चित्र में हमेशा आशा है, सार्थकता है, ऐसी आशा है जो समाप्त नहीं होती। कितनी बार जब हमारी ज़िन्दगियों में कठिन समय आते हैं, जब हमें निर्णय करना होते हैं, जब समस्याएं आती हैं, जब हम सारी घटनाओं पर विचार करते हैं और भयभीत हो जाते हैं तो उसका कारण यह है कि हम उस चित्र से परमेश्वर को हटा देते हैं। ज़िन्दगी का कितना भी उजियाला भरा चित्र हो, यदि उस चित्र में परमेश्वर नहीं है तो कोई आशा नहीं है। तेज़ रोशनियां हैं, धूम-धड़ाका है, तेज़ी से बजता हुआ संगीत है, सब प्रकार का आनन्द है परन्तु यदि उस आनन्द में, उस चित्र में, उस सम्पन्नता की स्थिति में परमेश्वर नहीं है तो कोई आशा नहीं है।

बाइबिल उस धनी किसान के बारे में वर्णन करती है जिसके खेत में बहुत उपज हुई और वह सोचने लगा कि मैं बहुत सफल हूं। मुझे खेती का काम बहुत अच्छी तरह से आता है। अगले साल मेरी और अधिक उपज होगी, इसलिए मैं अभी से और गोदाम बना लेता हूं। मैं अपने जीवन में आनन्दित रहूंगा और अपने प्राण से कहूंगा, खा, पी और चैन से रह। तब परमेश्वर उस से कहता है, हे मूर्ख! आज ही रात तेरा प्राण तुझसे ले लिया जावेगा। तो फिर उसका क्या होगा, जो कुछ तू सोच रहा है! कैसा भी दृश्य हो अगर उस दृश्य में से हम परमेश्वर को हटा देते हैं तो यह बहुत त्रासदीपूर्ण बात होगी।

इसी एक छोटे से विचार को आपके सामने रखना चाहता हूं कि हमारी स्वयं की ज़िन्दगी में, हमारे परिवारों में, मित्रों के साथ, कलीसियाओं में, हमारी संस्थाओं में, हमारे बच्चों के साथ जब हमारी बातचीत हो तो हमेशा ध्यान रखें कि उस चित्र में परमेश्वर का स्थान सर्वोपरि है कि नहीं। अगर उस चित्र में परमेश्वर है तो चाहे कितनी निराशा क्यों न हो, कितना भी अन्धकार क्यों न हो हमें फिर भी सम्बल मिलता है। हमें सार्थकता नज़र आती है, हमें आशा नज़र आती है। यहां तक कि किसी मसीही युवा की त्रासदीपूर्ण मृत्यु की बात ही क्यों न हो।

2020 में आपके जीवन के चित्र में परमेश्वर का स्थान सर्वोपरि रहे इसी प्रार्थना के साथ,

अजय लाल