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जीवन का उद्देश्य

लूका 10:-1-12

परिचय :- सन् 1998 में इन्टरनेशनल सोशियोलॉजिकल सर्वे सोसायटी ने लगभग 5000 लोगों से एक प्रश्न पूछा । वह प्रश्न बड़ा सरल, साधारण और सामान्य सा था । वह प्रश्न था कि आप अपने जीवन में वास्तव में क्या कर रहे हैं ? इन 5000 लोगों में जो ग्यारह प्रमुख उत्तर मिले उनमें से कुछ इस प्रकार थे : कुछ लोगों ने कहा हम रोटी कमा रहे हैं । किसी ने कहा हम सुख से जी रहे हैं । किसी ने कहा हम समय काटने का प्रयास कर रहे हैं । किसी ने कहा हम नौकरी ढूंढ रहे हैं । किसी ने कहा हम नौकरी कर रहे हैं और पैसे कमा रहे हैं । किसी ने जवाब दिया पेट पाल रहे हैं, बच्चों को पाल रहे हैं । किसी ने कहा सुख-सुविधा और सम्पन्नता से भरा हुआ जीवन जीने का प्रयास कर रहे हैं । किसी ने कहा बहुत बड़ा नाम कमाना चाह रहे हैं। किसी ने कहा हम बहुत धनी और प्रसिद्ध होना चाहते हैं और किसी ने कहा हमें संसार के बहुत से देशों की यात्रा करना है ।

ये सारे उत्तर अपनी परिस्थिति में ठीक हो सकते हैं, न्यायपूर्ण और तर्कसंगत हो सकते हैं । परन्तु यदि यही प्रश्न मैं आपसे करूं कि परमेश्वर ने आपको इस संसार में किसलिए भेजा है । आप और मैं इस संसार में वास्तव में क्या कर रहे हैं ? यदि आपसे कहा जाए कि एक वाक्य में इसका जवाब दीजिए तो आपका उत्तर क्या होगा? यदि हम परमेश्वर के वचन और मसीही जीवन और मसीही इतिहास में देखें तो पाते हैं कि परमेश्वर ने हमें इस संसार में एक निश्चित योजना के तहत भेजा है। हमारा उद्देश्य है कि हम परिवर्तन लाएं। हमें परमेश्वर ने परिवर्तन लाने के लिए भेजा है । इसके लिए परमेश्वर ने हमें योग्यताएं दी हैं, समय दिया है । उसने अवसर दिए हैं कि हम परिवर्तन लाएं ।

किसी ने मदर टेरेसा और अब्राहम लिंकन के विषय में कहा कि जो वर्ष उन्हें दिये गए थे उनमें भी 12 माह होते थे । जो माह उनके पास थे उनमें भी 30 दिन होते थे । उन दिनों में भी 24 घंटे होते थे और उन घंटों में भी 60 मिनिट होते थे। वे ही वर्ष तुम्हारे पास भी हैं । वे ही माह तुम्हारे पास भी हैं । वही दिन और वही घंटे और वही पल तुम्हारे और मेरे पास भी हैं । फिर वे मदर टेरेसा और अब्राहम लिंकन क्यों थे ? और मैं, मैं क्यों हूं ? और तुम, तुम क्यों हो ? जो बात है वह यह कि वे जानते थे कि उन्हें इस संसार में परिवर्तन लाने के लिये भेजा गया है । निरन्तर इस बात का अहसास उनके जीवन में, उनकी अन्तरात्मा में बना रहता था ।

दो तरह के लोग होते हैं । दो तरह से लोग जीवन जीते हैं । एक तरह के लोग वे होते हैं जिनका अपना कोई चिन्तन नहीं होता । जिनकी अपनी कोई राह नहीं होती। जो परिस्थितियों के अनुसार जीते हैं । जो लोगों के अनुसार जीते हैं । जो परम्पराओं के अनुसार जीते हैं । जो दबावों के अनुसार जीते हैं ।

मेरे पिता बताते थे कि जब वे पहली बार अमेरिका गये तो समुद्री जहाज़ से यात्रा करके गये थे । जहाज में पेप्सी और कोकोकोला पीने के बाद जब बोतलें खाली हो जाती थीं तो लोग उन खाली बोतलों में अपने नाम की चिट लिखकर डाल देते थे । वे उन बोतलों को कॉर्क से बन्द कर देते थे और उन्हें समुद्र में फेंक देते थे। वे सोचते थे कि शायद किसी दिन किसी समुद्र तट पर घूमते हुए हमें हमारे नाम की बोतल मिलेगी या किसी और को हमारे नाम की बोतल मिलेगी । वे बोतलें ऐसी होती थीं कि जहां थपेड़े ले जाते थे वहां चली जाती थीं। किसी कटी हुई पतंग की तरह, जहां हवा के थपेड़े ले गये पतंग चली गई । कुछ लोग समुद्र में फेंकी गई उन बोतलों की तरह होते हैं कि जहां समुद्र की लहरें ले गइंर् वहां चले गये । जहां हवा का बहाव ले गया वहां कटी हुई पतंग की तरह चले गये ।

परन्तु हम जो प्रभु यीशु मसीह के पीछे चलने वाले लोग हैं हमें ऐसा नहीं होना चाहिये। परिस्थितियों का शिकार हम सभी होते हैं । त्रासदियों का शिकार हम सभी होते हैं । लोगों से प्रभावित हम सभी होते हैं परन्तु हमारी अपनी राह होना चाहिए। हमारा अपना उद्देश्य होना चाहिए क्योंकि प्रभु यीशु मसीह ने वह राह, वह उद्देश्य, वह मंज़िल, वे स्पष्ट निर्देश हमको दिये हैं ।

लूका 10:17-20 में एक घटना का वर्णन है । लिखा है, प्रभु यीशु मसीह ने 70 चेलों को नियुक्त किया और उनके लिये एक योजना बनाई कि दो-दो की जोड़ी में उनको विभिन्न स्थानों में जाना है । कौन सा सामान साथ नहीं ले जाना है और जाकर क्या करना है इस विषय में बड़े स्पष्ट आदेश दिये । नौवीं आयत में लिखा है कि यीशु ने उनसे कहा - वहां के बीमारों को चंगा करो और उनसे कहो कि परमेश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ पहुंचा है । उसके बाद उसने कहा कि जो तुम्हारी सुनता है, वह मेरी सुनता है । जो तुम्हें तुच्छ जानता है, वह मुझे तुच्छ जानता है। और जो मुझे तुच्छ जानता है वह मेरे भेजने वाले को तुच्छ जानता है ।

इन लोगों को प्रभु यीशु मसीह ने भेजा और न सिर्फ्र इन लोगों को भेजा बल्कि दोबारा चेले भेजे गए और तिबारा चेले भेजे गए । प्रभु यीशु मसीह मृतकों में से जीवित हुए और अन्तिम आज्ञा दी जिसको हम महानतम आदेश कहते हैं । यह आज्ञा मत्ती 28:18-20 में मिलती है। वहां लिखा है - ``जाओ और जाकर सारे जगत के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। और उन्हें वे सारी बातें मानना सिखाओ जो मैंने तुम्हें सिखाई हैं। और देखो जगत के अन्त तक मैं तुम्हारे साथ हूं ।''

लूका रचित सुसमाचार के 10 वें अध्याय में आप पाएंगे कि इन चेलों की सेवकाई का परिणाम क्या हुआ? 17 वीं आयत में लिखा है कि वे सत्तर आनन्द से फिर आकर कहने लगे कि हे प्रभु तेरे नाम से दुष्ट आत्मा भी हमने निकालीं । वे हमारे वश में हैं । तब उसने उनसे कहा कि मैं शैतान को बिजली की नाइंर् स्वर्ग से गिरा हुआ देख रहा था।

यीशु ने चेलों को एक निश्चित योजना बताई । एक कार्यक्रम दिया। एक रास्ता बताया और बताया कि उन्हें क्या करना है । यदि लोग उन्हें स्वीकार करें तो क्या करना है । यदि लोग उनका तिरस्कार करें तो क्या करना है । तब वे आनन्द से लौटकर आए । उस योजना को पूरा करके आए । प्रभु यीशु मसीह उनसे कहता है कि मैंने आकाश से शैतान को बिजली की नाइंर् गिरते देखा है । तुम्हारे प्रयासों से मैंने देखा कि किस प्रकार शैतान आकाश से नीचे गिर गया । उनके जीवनों में यह परिणाम मिला ।

जब इन्हीं चेलों को प्रभु यीशु मसीह ने भेजा कि सारे संसार में जाओ तो प्रेरितों के काम नामक पुस्तक में लिखा हुआ है कि उन्होंने सारे जगत को उल्टा-पुल्टा कर दिया । सारे जगत को परिवर्तित करने का प्रयास उन्होंने किया । लोगों की मान्यताओं, उनकी प्राथमिकताओं, मानसिकताओं, उनके मूल्यों, उनकी राहों और उनके चिन्तन को उल्टा-पुल्टा कर दिया । सारे संसार में वे एक क्रान्ति लेकर आए।

इसलिए प्रभु यीशु मसीह जब आज हमसे बातचीत करते हैं तो कहते हैं कि तुम जगत की ज्योति हो; थोड़ी सी ज्योति बहुत से अन्धकार को मिटा देती है । तुम पृथ्वी का नमक हो; नमक थोड़ा सा होता है और वह बहुत से भोजन को प्रभावित कर देता है । वह भोजन से स्वयं प्रभावित नहीं होता पर भोजन को प्रभावित कर देता है । थोड़े से नमक के समान तुम थोड़े से चुने हुए लोग हो परन्तु तुमको यह काम करना है । वास्तव में क्या हम इस बात को समझते हैं कि परमेश्वर ने हमको इस जीवन में परिवर्तन लाने के लिए भेजा है ?

हम कैसे परिवर्तन ला सकते हैं? इस सम्बन्ध में हम पांच बातें देखेंगे।

1. यदि परिवर्तन लाना है तो हमें मालूम होना चाहिए कि हमारा उद्देश्य क्या है :- हमें मालूम होना चाहिए कि हमारा दर्शन क्या है । इस संसार में आने के अपने उद्देश्य को क्या आप एक वाक्य में व्यक्त कर सकते हैं ? हो सकता है कि कोई मसीही शिक्षक हो जो कहे कि मेरा उद्देश्य यह है कि मैं बहुत से बच्चों के जीवनों में, अपने छात्रों के जीवनों में, अपनी छाप छोड़कर जाऊं । उनके बीच में अपने जीवन, अपने परिश्रम, अपने व्यवहार से, प्रभु यीशु मसीह की छाप छोड़कर जाऊं । हो सकता है कि कोई मसीही चिकित्सक कहे कि मेरा उद्देश्य यह है कि अपने जीवन से, अपनी सेवा से, प्रभु यीशु मसीह की शारीरिक और आत्मिक चंगाई की गवाही निरन्तर देता रहूं। मेरे और आपके जीवन का क्या उद्देश्य है? क्या हम जानते हैं? क्या हम उस उद्देश्य को एक वाक्य में प्रगट कर सकते हैं? यदि नहीं कर सकते तो वास्तव में हम जानते ही नहीं कि हमारा क्या उद्देश्य है? किस उद्देश्य से परमेश्वर ने हमें भेजा है? इसलिए नीतिवचन में लिखा हुआ है कि जहां उद्देश्य नहीं होता, जहां दर्शन नहीं होता वहां लोग निरंकुश हो जाते हैं । अंग्र्रेज़ी के एक अनुवाद में लिखा हुआ है कि जहां दर्शन नहीं होता; वहां के लोग पीड़ित हो जाते हैं, बर्बाद हो जाते हैं । प्रभु यीशु मसीह अपने जीवन के उद्देश्य के बारे में स्वयं कहते हैं जिसे हम यूहन्ना 3:16-17 में पाते हैं । यह बड़ा स्पष्ट उद्देश्य है जहां प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपने एकलौते पुत्र को भेज दिया ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए । उसके आगे प्रभु यीशु मसीह ने कहा कि परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिए नहीं भेजा कि जगत को दण्ड की आज्ञा दे परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए । प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि मैं इस संसार में आया हूं कि लोगों को उद्धार मिले, पापों की क्षमा मिले। यह मेरा उद्देश्य है । परमेश्वर ने इस जगत का उद्धार करने के लिए मुझे भेजा है ।

जो पर्वतारोही होते हैं, जो बड़े-बड़े पहाड़ों पर चढ़ते हैं उनको यदि देखें तो हम उनके जीवन और उनकी एकाग्रता से सीख सकते हैं । पर्वतारोही का एक उद्देश्य होता है कि उसे उस चोटी तक पहुंचना है, उस निशाने तक पहुंचना है । उसका पूरा प्रयास उस उद्देश्य तक पहुंचने का होता है । यदि इस संसार में परिवर्तन लाना चाहते हैं तो हमें देखना होगा कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है।

2. इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए हमें मालूम होना चाहिए कि हमारे जीवन के मूल्य क्या हैं, हमारे जीवन के सिद्धान्त क्या हैं, हमारे जीवन की बुनियाद क्या है ? :- हमें देखना है कि हमारे जीवन की राह कौन सी है, जिस पर हम चल रहे हैं ? किसी ने कहा है कि जो कुछ आपके पीछे है, जो अतीत है, जो परिस्थितियां और जो लोग सामने हैं; उससे बढ़कर प्रमुख यह बात है कि आप में क्या है ।

प्रभु यीशु मसीह ने हमको बताया है कि इस संसार में अपने उद्देश्यों को किस प्रकार से पूरा करना है । हमें इस संसार से भिन्न होकर उन्हें पूरा करना है। प्रभु यीशु मसीह के जीवन की राह पर चलकर पूरा करना है । इसीलिए प्रभु यीशु मसीह ने जब पहला उपदेश दिया तो उन्होंने उन बातों को बताया कि जीवन में क्या मूल्य होना चाहिए । उसने कहा - धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं । धन्य हैं जो शोक करते हैं। इस प्रकार से प्रभु यीशु मसीह ने यह बताया कि हमारे जीवनों में इस उद्देश्य को हम किस प्रकार से पूरा कर सकते हैं ।

परन्तु समस्या तब होती है जब हमारे जीवन में हमारी कथनी और करनी में टकराव होता है । जब हम कहते तो हैं कि हम मसीह के पीछे चल रहे हैं परन्तु हमारा कार्य, हमारा प्रयास और हमारा परिश्रम विपरीत दिशा में होता है । जब जीवन में यह टकराव होता है तो हम कहलाते तो मसीह के हैं, पर कार्य शैतान के होते हैं । चिन्तन नकारात्मक होता है । हृदय में बुरी बातें होती हैं । आलोचना होती है । बुराइयां होती हैं । परन्तु इससे सिर्फ्र हमारा विनाश होगा । इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हमारा उद्देश्य और हमारा रास्ता इस उद्देश्य की सीध में हो ।

जब चीन की स्थापना हुई तो चीन देश के लोग चाहते थे कि हमारा देश बहुत सुरक्षित रहे । शत्रुओं से हम बचकर रहें और हमारा देश संसार में सबसे सुरक्षित हो। इसके लिए उन्होंने एक दीवार बनाई जो सैकड़ों मील लम्बी थी । ताकि उस दीवार से देश की सुरक्षा की जा सके । इसे चीन की दीवार कहा जाता है । यह विश्व के सात महान आश्चर्यों में से एक है । इस दीवार के बीच-बीच में लोहे के दरवाज़े बनाए गए । चीन की यह दीवार 30 फीट ऊंची, 18 फीट चौड़ी और 1500 मील या 2400 किलोमीटर लम्बी है । यह 30 फीट ऊं ची इसलिए है कि कोई चढ़ न सके। 18 फीट चौड़ी इसलिए है कि कोई उसे तोड़ न सके। यह इतनी मज़बूत दीवार है कि कोई धमाका भी कर दे तो आसानी से टूट न सके और यह 2400 किलोमीटर लम्बी इसलिए है कि कोई किनारे से घूमकर न आ सके । परन्तु जब यह दीवार बनाई गई तो उसके बनाए जाने के पहले 100 वर्षों के अन्दर ही दुश्मन उस दीवार से तीन बार अन्दर आ गया । क्यों? क्योंकि चीन की दीवार में जो दरवाजे0 बनाए गए थे और वहां जो पहरेदार बिठाए गए थे उन्होंने बहुत सा रुपया ले लिया। उन्होंने रिश्वत ले ली और तब दुश्मन लोग अन्दर घुस आए । दीवार तो मज़बूत बना दी परन्तु पहरेदारों के चरित्र तो खोखले हैं । पहरेदारों के चरित्रों में तो कुछ ठोसपन है नहीं। देश मज़बूत दीवार से नहीं बनता । देश मज़बूत बनता है अपने सिद्धान्तों से, अपने नैतिक मूल्यों से । अक्सर हमारे साथ भी यही होता है । प्रभु यीशु मसीह की दीवार तो बहुत मज़बूत है, बहुत पक्की है, परन्तु हमारे चरित्र कमज़ोर हैं । हम समझौतावादी हैं । हमारे चरित्रों में प्रभु यीशु मसीह की सशक्तता दिखाई नहीं देती ।

महात्मा गांधी प्रभु यीशु मसीह से बहुत प्रभावित थे । एक समय था जबकि उन्होंने बड़ी गम्भीरता से इस बारे में चिन्तन किया कि वे प्रभु यीशु मसीह के पीछे चलें । जब किसी पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप प्रभु यीशु मसीह के पीछे क्यों नहीं चलते तो उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को देखकर जो अपने आपको मसीही कहते हैं। महात्मा गांधी ने प्रभु यीशु मसीह को स्वीकार कर लिया होता तो आज हमारे देश में मसीहियत की स्थिति कुछ और होती । बात यह है कि दीवार तो मज़बूत है परन्तु चरित्र खोखले हैं । दीवार तो बहुत ऊंची है परन्तु मूल्य बहुत ओछे हैं । दीवार तो बहुत मोटी है परन्तु हमारी नैतिकता बहुत कमज़ोर है । प्रभु यीशु मसीह के गुणों के आधार पर चलकर ही हम उस उद्देश्य तक पहुंच सकते हैं ।

3. हमें परिवर्तन लाना है तो हमको अपनी योग्यताओं को पहचानना है :- दुनिया में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिसको परमेश्वर ने योग्यता नहीं दी। चाहे वह व्यक्ति धार्मिक हो, चाहे अधर्मी हो, चाहे भ्रष्टाचारी हो । चाहे ज्ञानवान हो, चाहे मूर्ख हो । चाहे अनपढ़ हो, चाहे कैसा भी हो । दुनिया के हर व्यक्ति को परमेश्वर ने एक योजना के तहत भेजा है और उस योजना को पूरा करने के लिए खाली हाथ नहीं भेजा । परमेश्वर ने उसको कुछ योग्यताएं दी हैं । इसीलिए पौलुस प्रेरित एक बहुत प्रमुख बात कहता है । वह कहता है कि यह धन मिट्टी के बर्तनों में रखा है । परमेश्वर ने इस धन को मिट्टी के बर्तन में रख दिया है । प्रशंसा मिट्टी के बर्तन की नहीं होना चाहिए बल्कि जिसने धन दिया है, उसकी होना चाहिए, जो धन का मालिक है उसकी प्रशंसा और उसकी महिमा होना चाहिए ।

अक्सर हम भी जो मिट्टी के बर्तन हैं, हम अपनी महिमा और प्रशंसा करते हैं और यह शायद मूर्ति पूजा से ज़्यादा कोई बड़ी बात नहीं । अगर हमारी आकांक्षा यह है कि हमें महिमा मिले, परन्तु जिसने यह धन दिया है, जिसने यह योग्यता दी है, जिसका वह मालिक है, जिसको हमें एक दिन लेखा देना है; यदि उसको महिमा नहीं देंगे; तो शायद हम में और एक मूर्तिपूजक में कोई अन्तर नहीं होगा । परन्तु जो प्रमुख बात है वह यह कि हमें उन योग्यताओं को पहचानना है ।

कुछ समय पहले मेरे एक मित्र रे मरफी अमेरिका से आए । वे अस्पताल के बच्चों के लिए छोटी-छोटी खूबसूरत क्विल्ट्स लाए थे, जो बहुत कोमल थीं। जो बहुत मेहनत से हाथ से सिली गइंर् थीं । उन पर घंटों काम किया गया था । उन्होंने कहा कि हमारी कलीसिया में बहुत सी विधवाएं हैं, बहुत सी गरीब महिलाएं हैं और उनकी उम्र काफी हो चुकी है, जो 70 वर्ष से भी ऊपर हैं । वे हफ्ते में तीन दिन आती हैं और घंटों बैठकर क्विल्ट्स बनाती हैं, सिलती रहती हैं । उन्हें इन क्विल्ट्स को बनाने में, छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़ने में हफ्तों लग जाते हैं । उसके बाद वे उन्हें बनाकर भेजती हैं। क्यों ? क्योंकि उस स्थिति में उनके परिश्रम से किसी बच्चे को थोड़ी सी गरमाहट मिलेगी, किसी बच्चे के जीवन में कुछ परिवर्तन आएगा। परिवर्तन लाना है, इसीलिए परमेश्वर ने हमें भेजा है ।

पिछले 100 वर्षों में दुनिया के सबसे बड़े पेन्टिंग कॉम्पटीशन विंग्सर एण्ड न्यूटल मिलेनियम आर्ट कॉम्पटीशन का आयोजन किया गया । इसमें दुनिया के 200 देशों के 22000 चित्रकारों ने भाग लिया था । इसमें प्रथम पुरस्कार जिस व्यक्ति को मिला, उसका नाम रामोन था । रामोन इक्वेडोर में अमेज़न नदी के कछारों में एक कबीले में पैदा हुआ था । वह उस स्थान पर पैदा हुआ था, जहां इतने घने जंगल हैं कि सूरज की किरणें नीचे तक कभी नहीं आ पातीं और इसीलिए वहां दलदल हैं । लोग पेड़ों के ऊपर घर बनाकर रहते हैं ।

रामोन अनपढ़ था । वह पेड़ों की डालों की पतली-पतली टहनियों को लेता था, उनको नुकीला बनाता था और पेड़ों के ऊ पर खोद-खोदकर आर्ट बनाता था । उसको पेन्टिंग के बारे में कुछ नहीं मालूम था और उसने कभी कलर्स का इस्तेमाल नहीं किया था । 1993 में विक्लिफ बाइबिल ट्रांसलेटर्स, जो कि एक मसीही मिशनरी संस्था है, उसके श्री और श्रीमती जॉनसन वहां पहुंचे । उन्होंने रामोन को यीशु मसीह के बारे में बताया । उससे कहा कि यीशु मसीह को पहचानो । अपना जीवन प्रभु यीशु मसीह को दो । अपनी आत्मा का उद्धार करो। अपने पापों की क्षमा प्राप्त करो । अपनी योग्यताओं को पहचानो और इस दुनिया में अन्तर लाओ । रामोन ने प्रभु यीशु मसीह को अपना जीवन दिया ।

जब इन मिशनरीज़ ने उसकी कला को देखा, उसके प्रयास को देखा तो कुछ ऑयल पेन्ट्स लाकर रामोन को दिए और वह ऑयल पेन्टिंग करने लगा । इस प्रतियोगिता में भाग लेने के तीन वर्ष पहले रामोन ने पहली पेन्टिंग बनाई । जब सैकड़ों देशों के लोग वहां पर उपस्थित थे और पहले ईनाम की घोषणा हुई तो एक कबीले के साधारण से गांव के रहने वाले अनपढ़ रामोन की चित्रकला को 22000 लोगों में से प्रथम स्थान मिला । खचाखच भरा हॉल तालियों से गड़गड़ा गया और तालियों की गूंज हॉल में गूंज उठी । तब रामोन स्टेज पर गया और उसने जो कुछ कहा, वह इतिहास में शिलालेख बन गया । रामोन ने कहा - ``मुझको आदर मत दो । मेरे लिए ताली मत बजाओ क्योंकि मुझको तो यह दान प्रभु यीशु मसीह ने दिया है । मैं तो मिट्टी का बर्तन हूं । एक दिन यह बर्तन टूट जाएगा और मिट्टी में मिल जाएगा। महिमा करो उस परमेश्वर की, आदर करो उसका, प्रशंसा करो उसकी, उसकी ख्याति में तालियां बजाओ । मेरे लिए तालियां मत बजाओ ।'' रामोन की वह पेन्टिंग जिसका नाम अनन्त अमेज़न है, जो कि वास्तव में प्रभु यीशु मसीह के अनन्त जीवन और जीवन के जल को प्रकाशित करती है; वह पेन्टिंग यूनाईटेड नेशन्स आर्गनाइज़ेशन के हेडक्वार्टर न्यूयार्क में आज भी लगी हुई है ।

हमें अपने तोड़ों को पहचानना है कि किस प्रकार से हम अपने जीवन के द्वारा प्रभु यीशु मसीह के लिए कुछ अन्तर ला सकते हैं ।

4. हमें यदि परिवर्तन लाना है तो यह पहचानना होगा कि परमेश्वर की हमारे जीवन में क्या योजना है :- हमारा क्या उद्देश्य है? हमें कैसे वहां पहुंचना है ? हमको कौन सी योग्यताएं, कौन से तोड़े दिये हैं ? और हमको कैसे वहां पहुंचना है।

हम पाते हैं प्रभु यीशु मसीह के जीवन की योजना बहुत स्पष्ट थी। यदि आप लूका 4:18 को देखें तो पाएंगे कि प्रभु यीशु मसीह नासरत में पहुंचकर स्वयं कहते हैं कि प्रभु का आत्मा मुझ में है, इसलिए कि उसने कंगालों को सुसमाचार सुनाने के लिये मेरा अभिषेक किया है और मुझे इसलिए भेजा है कि बन्धुओं को छुटकारे का और अन्धों को दृष्टि पाने का सुसमाचार प्रचार करूं और कुचले हुओं को छुड़ाऊं। उसके बाद हम पाते हैं कि ये सब बातें पूरी होती हैं ।

यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला अपने चेलों को प्रभु यीशु मसीह के पास एक प्रश्न के साथ भेजता है । वे आकर उससे पूछते हैं कि क्या तू ही मसीहा है या हम और किसी की बाट जोहें । प्रभु यीशु मसीह उससे कहता है, यह वर्णन लूका 7:22 में पाया जाता है - ``और उस ने उन से कहा जो कुछ तुमने देखा है और सुना है जाकर यूहन्ना से कह दो कि अन्धे देखते हैं, लंगड़े चलते-फिरते हैं, कोढ़ी शुद्ध किये जाते हैं, बहरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाये जाते हैं और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है''। मेरे जीवन की जो योजना है, जिसके लिए परमेश्वर ने मुझे भेजा है, वह मैं जानता हूं और उसको पूरा कर रहा हूं । उसके परिणाम तुम देख सकते हो । परमेश्वर की हमारे लिए कौन सी योजना है और उसे कैसे हम पूरा करेंगे ? यदि हमारा स्वयं परिवर्तन नहीं हुआ तो हम दूसरों का परिवर्तन कर नहीं सकते । हम स्वयं परिवर्तित नहीं हैं तो परिवर्तन हम ला नहीं सकते । जहां हम गए नहीं हैं वहां हम दूसरों को कैसे पहुंचा सकते हैं ? जिस अनुभव को हमने प्राप्त किया नहीं है, हम दूसरों को कैसे उस अनुभव के बारे में सच्चाई से बताएंगे । इसलिए आवश्यक है कि हमारे हृदय में वास्तव में प्रभु यीशु मसीह का कार्य हो । हमारे जीवन में परिवर्तन हो । हमारे हृदय में प्रभु यीशु मसीह का वास हो । उसकी शोभा हो । उसके गुणों को हम आत्मसात करें तब ही हम वहां पहुंच सकेंगे ।

5. यदि परिवर्तन लाना है, तो कुछ पाने के लिए कुछ देना होगा:- परमेश्वर की योजना के उद्देश्य को प्राप्त करना है तो कुछ खोना होगा ।

सैकड़ों वर्ष पुरानी बात है । उन दिनों संसार में गुलामों का क्रय-विक्रय सबसे बड़ा व्यापार बन चुका था । यूरोप उसका केन्द्र था । यूरोप में गुलाम अफ्रीकी देशों से लाए जाते थे। गरीब देशों से लाए जाते थे । समुद्री जहाज़ आते-जाते थे और उनमें सोने-चांदी का आयात-निर्यात नहीं होता था बल्कि लोगों को खरीदकर लाया जाता था । यहां सबसे बड़ी मंडी थी जहां लोगों को बेचा जाता था । सारे संसार की आर्थिक व्यवस्था इस गुलामों के लेन-देन से प्रभावित होती थी । संसार का सबसे अधिक पैसा इसी व्यवस्था में लगा हुआ था । तब इंग्लैंण्ड में जॉन वेस्ली नाम का प्रचारक हुआ । उसकी कलीसिया में एक व्यक्ति था जिसका जीवन जॉन वेस्ली के सन्देशों से परिवर्तित हुआ । इस व्यक्ति का नाम विल्वर था । विल्वर ने प्रभु यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्त्ता स्वीकार कर लिया । वह इंग्लैण्ड की संसद का सदस्य बना । पचास वर्षों तक विल्वर संसद का सदस्य रहा और उन पचास वर्षों में उसने गुलामी की प्रथा को बन्द कराने के लिये अपनी आवाज़ उठाई, आन्दोलन किया, लोगों से याचना की, संसद में प्रस्ताव रखा परन्तु वह असफल रहा । उसके बाद विल्वर की मृत्यु हो गई और ऐसा लगा कि सब कुछ समाप्त हो गया । परन्तु विल्वर को दफनाए जाने के एक सप्ताह बाद इंग्लैण्ड की संसद का सत्र बैठा । उस सत्र संसद में जो पहला प्रस्ताव पारित हुआ वह यह कि विल्वर के जीवन और उसके जीवन के मूल्यों को आदर देते हुए आज से इंग्लैण्ड से इस गुलामी की प्रथा को समाप्त किया जाता है। एक मसीही व्यक्ति, जिसने प्रभु यीशु मसीह को जाना था, स्वीकार किया था; उसके कारण सारा संसार प्रभावित हो गया । गुलामी की प्रथा समाप्त हो गई ।

निष्कर्ष :- एडमंड बर्क ने कहा है कि बुराई की जीत तभी होती है जब अच्छे लोग ख़ामोश हो जाते हैं । प्रभु यीशु मसीह इस संसार में आया, उसने परिवर्तन किया लोगों का, परिस्थितियों का । आज संसार के 60% लोग इस प्रभु यीशु मसीह के पीछे चल रहे हैं, जिनको प्रभु यीशु मसीह ने परिवर्तित किया है ।

जावेद अख्तर ने अपनी कविताओं की पुस्तक ``तरकश'' में लिखा है :

अपनी ज़िन्दगी में तुमने क्या किया ?

किसी से सच्चे दिल से प्यार किया ?

किसी दोस्त को नेक सलाह दी ?

किसी दुश्मन के बेटे को मुहब्बत की नज़र से देखा ?

जहां अन्धेरा था वहां रोशनी की किरण ले गए ?

जितनी देर तक जिए, इस जीने का क्या मतलब था ?

यीशु आज आपको बुला रहा है । हमें परिवर्तित करने के लिए; और हमसे लोगों के जीवनों में परिवर्तन लाने के लिए । क्या आप अपने उद्देश्य को पहचान कर उसकी चुनौती स्वीकार करेंगे ?

परमेश्वर आपको आशीष दे ।