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अन्तर्मन की सामर्थ्य

इब्रानियों 10:22

परिचय :- जॉन बनियन ने पिलग्रिम्स प्रोग्रेस नामक एक बहुत प्रमुख पुस्तक लिखी है । इस पुस्तक में पिलग्रिम नामक एक व्यक्ति की यात्रा का वर्णन है । जब वह इस संसार में यात्रा करता है तो उसकी पीठ पर एक बोझ लदा हुआ होता है । जैसे-जैसे जीवन में वह आगे बढ़ता है, जैसे-जैसे वह इस यात्रा में अग्रसर होता है, उसकी पीठ पर लदा हुआ बोझ और भारी होता जाता है । वह झुकता जाता है और बहुत कठिनाई से, बड़े परिश्रम से, अपने पसीने को बहाते हुए यात्रा करता है । कभी वह तराई में से होकर जाता है । कभी पहाड़ों पर से होकर जाता है, कभी नदियों को पार करता है और कभी तूफानों से होकर गुज़रता है । जॉन बनियन की इस पुस्तक के नायक के समान जीवन की सड़क पर हम भी यात्रा करते हैं । जब इस जीवन में हम ग़ुज़रते हैं, तो हमारे हृदयों में अपराध भावना का जो बोझ है, वह बढ़ता जाता है । इंग्लिश में इसे गिल्ट फीलिंग कहा जाता है । हमारे जीवन में यह गिल्ट फीलिंग आती है और फिर धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। जीवन की समस्याओं और मजबूरियों का सामना करते हुए हम आगे बढ़ते हैं । मजबूरियों में दबते हैं । संसार से समझौता करते हैं । अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए झूठ बोलते हैं । वायदों को तोड़ते हैं । प्रतिज्ञाओं को पूरा कर नहीं पाते । वचन देते हैं पर निभा नहीं पाते । धीरे-धीरे अपराध की भावना का यह बोझ बढ़ता जाता है । इस बोझ को अपने अन्तरात्मा में महसूस करते हुए हम खुद को ठगते हैं । हम संकोच और सामाजिक बन्धनों के कारण उस अपराधी भावना के बोझ को हल्का नहीं कर पाते ।

कभी हमें अहसास होता है कि वास्तव में हम बहुत अच्छे पिता न बन सके। जिस प्रकार से हमें अपने बच्चों का लालन-पालन करना था, जितना समय देना था, वह नहीं कर सके । हमें ऐसा अहसास होता है कि हम बहुत अच्छे पति नहीं बन सकेया बहुत अच्छी पत्नी नहीं बन सके । जैसा व्यवहार एक-दूसरे के प्रति हमारा होना चाहिए, वह है नहीं । कभी ऐसा लगता है कि सम्बन्धों में दरार पड़ गई है । ऐसा लगता है जैसे एक समझौते के तहत हम जी रहे हैं । हमारी अपनी-अपनी ज़िन्दगियां हैं । हमारे सोचने और समझने का तरीका फ्रर्क-फ्रर्क है । हमारा कार्यक्षेत्र फ्रर्क-फ्रर्क है। हमारी योग्यता फ्रर्क-फ्रर्क है । जो संवाद होना चाहिए वह हो नहीं पाता । इसीलिए हम बहुत अच्छे पति और बहुत अच्छी पत्नी बन नहीं पाए । अक्सर ऐसा लगता है कि हमने अपने प्रिय लोगों से अपना सम्बन्ध तोड़ लिया है । छोटी-छोटी बातों के बड़े-बड़े मुद्दे बना लिए हैं । उन मुद्दों को अहम बनाकर हमने ऐसे शब्द कहे जिससे हमारे सम्बन्धों में दरार आ गई। जो प्रेम था उसमें गांठ पड़ गई । जो आदर और सम्मान की भावना थी वह कुछ कमज़ोर हो गई । वह टूट गई । फिर हम पछताते हैं कि काश! हमने वे शब्द न कहे होते । काश ! हमने ऐसा व्यवहार नहीं किया होता।

हम एक अच्छे मित्र नहीं बन पाए । हमारा मित्र तो अच्छा है, सब बातों को सहता है, सब बातों को सुनता है, साथ देता है परन्तु जैसी मित्रता हमें निभानी चाहिए, शायद अपनी ज़िम्मेदारियों के कारण निभा नहीं पाए । जिसने हमारे साथ अच्छा किया, शायद उसके साथ हमने बुरा किया । जिसका हमें साथ देना था उसका हमने साथ छोड़ दिया, और जिसका साथ छोड़ना था उसका हमने साथ दिया। शायद कभी हमने पैसों का दुरुपयोग किया । जो पैसे किसी काम के लिए ख़र्च करने थे उन्हें कहीं और ख़र्च कर दिया । झूठी रसीदें हमने बनाइंर् ।

हमारी जीवन प्रणाली और हमारे देश का जो वातावरण है, जिन मजबूरियों से हम ग़ुज़रते हैं उनसे होकर हमने संसार से समझौता किया । अपने अधिकारी को खुश करने के लिए, अपने मित्र को खुश करने करने के लिए, अपने ऑफिस की मर्यादा को पूरा करने के लिए अपनी नैतिकता को छोड़ दिया ।

यदि हम शिक्षक हैं तो लगता है कि कभी हमने किसी के नम्बर बढ़ा दिए और हृदय के द्वेष के कारण कभी किसी को जितने नम्बर देने थे, उसके कुछ नम्बर कम कर दिए । उसके बाद इस अपराधी भावना का बोझ बढ़ता जाता है । हमारे जीवन में कुछ अन्धकार के पाप होते हैं जिनको केवल हम जानते हैं और परमेश्वर जानता है । बचपन की ग़लतियां होती हैं, किशोर अवस्था के पाप होते हैं, जवानी के पाप होते हैं जिनका हम ज़िक्र नहीं कर सकते, जिन्हें हम किसी के साथ बांट नहीं सकते। अतीत के जो पाप हैं वे काले धब्बों के समान हमारी आत्मा में बने हुए हैं । हम अपनी पत्नी को उनके विषय में बता नहीं सकते, हम अपने पति से उनकी चर्चा नहीं कर सकते । वे काले धब्बे हैं जो हमारे जीवन में, हमारे अतीत के अन्धकार से भरे हुए हैं । उन अतीत के पापों का बोझ हम ढोते रहते हैं ।

हम कलीसिया में आते हैं और सोचते हैं कि अब समय आ गया है कि हम विश्वास करें और पश्चात्ताप करें और प्रभु यीशु मसीह के नाम का बपतिस्मा लें । तब हम बपतिस्मा लेते हैं । माता-पिता खुश होते हैं । हम सफेद कपड़े पहनते हैं । बपतिस्मा के बाद प्रभु भोज में शामिल होते हैं । प्रभु यीशु मसीह के सामने अपने जीवन को समर्पित करते हैं । उसके बाद बहुत समय नहीं बीतता और हम पाते हैं कि फिर से उन्हीं पापों में लग गए । तब हमें चिन्ता होती है कि बपतिस्मा के बाद भी तो हमने वही पाप किए हैं । बपतिस्मा के बाद भी तो हमने वचनों को तोड़ा है। बपतिस्मा के बाद भी तो हमने प्रभु यीशु मसीह की आज्ञाओं का उल्लघंन किया है। बपतिस्मा के बाद भी तो हमने बहुत गम्भीर पाप किए हैं । हमने जान-बूझकर भी बहुत से ग़लत काम किए हैं । एक बार फिर उस अपराधी भावना का बोझ हम अपने जीवन में और अपनी आत्मा में ढोने लगते हैं ।

समय तो बीत जाता है परन्तु इन पापों का बोझ हमारे दिल और हमारी आत्मा में बना रहता है । उसे हम किसी के साथ बांट नहीं सकते । ऊपर से तो हम बहुत अच्छे दिखाई देते हैं, अच्छे वस्त्र हम पहनते हैं, अच्छी तनख्वाह हमें मिलती है, हमारा अच्छा व्यवहार होता है, समाज में आदर होता है परन्तु भीतर से आत्मा में लगे हुए एक कोढ़ के समान और कैंसर के समान इस अपराधी भावना से ग्रसित होकर हम इसका बोझ ढोते रहते हैं । हम कभी-कभी सोचते हैं कि मरने के बाद हमारा क्या होगा? हमारी आत्मा का क्या होगा? क्या हम अनन्त जीवन में प्रवेश कर पाएंगे? इसकी चिन्ता हमें बनी रहती है । जब किसी का फ्यूनरल होता है और हम वहां जाते हैं तो हमें लगता है कि एक दिन आने वाला है जब इसी प्रकार का डिब्बा हमारे लिए भी तैयार किया जाएगा । इसी प्रकार से कीलें ठोंक दी जाएंगी । इसी प्रकार से हमें दफना दिया जाएगा । फिर मिट्टी देकर लोग अपने-अपने घरों को वापिस लौट जाएंगे। जैसे-जैसे मिट्टी सूखेगी, हमारा स्मरण भी सूख जाएगा । हमारे न रहने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा । और तब हमें चिन्ता होती है कि क्या होगा? हमारा विवेक भीतर से उदास होता है और मृतक सा हो जाता है । आइए परमेश्वर के वचन में इस सम्बन्ध में जो बातें कही गइंर् हैं उन्हें हम देखें ।

बाइबिल हमें बताती है कि विवेक चार प्रकार का होता है । हमारा अर्न्तमन चार प्रकार का होता है।

1. कमज़ोर और निर्बल विवेक :- पहले प्रकार का विवेक जो होता है उसमें हम लोग जिस बात से हमें अपराधी भावना से ग्रसित नहीं होना चाहिए उसी बात पर अपराधी भावना से ग्रसित हो जाते हैं । बाइबिल में इसे कमज़ोर और निर्बल विवेक कहा गया है । जिस बात में हमें वास्तव में अपने आपको अपराधी और दोषी नहीं ठहराना चाहिए उसमें हम पाते हैं कि हम स्वयं को अपराधी और दोषी ठहरा रहे हैं।

1 कुरिन्थियों 8:7-8 में लिखा है - ``परन्तु सब को यह ज्ञान नहीं; परन्तु कितने तो अब तक मूरत को कुछ समझने के कारण मूरतों के सामने बलि की हुई को कुछ वस्तु समझ कर खाते हैं, और उनका विवेक निर्बल होकर अशुद्ध होता है । भोजन हमें परमेश्वर के निकट नहीं पहुंचाता, यदि हम न खाएं, तो हमारी कुछ हानि नहीं, और यदि खाएं, तो कुछ लाभ नहीं'' ।

पौलुस प्रेरित उनको यह बात लिखता है जो यह सोचते थे कि मूरतों के सामने चढ़ाया हुआ सामान हमें खाना चाहिए या नहीं खाना चाहिए । पौलुस उनसे कहता है कि मूरतों के सामने चढ़ाया हुआ भोजन या मूरतों के सामने बलिदान किए हुए पशु का मांस खा लेते हो, यदि उसका भोजन ग्रहण कर लेते हो तो इससे तुम में अपराधी भावना आना नहीं चाहिए । क्योंकि जो मूरत है वह तो मात्र पत्थर की बनी हुई है और जब मूरत कुछ नहीं है तो उसके सामने जो भोज्य पदार्थ है; वह भी कुछ नहीं है । इसलिए वास्तव में तुम्हें मूरत के सामने चढ़े हुए भोजन को अपराधी भावना के साथ ग्रहण नहीं करना चाहिए ।

1 कुरिन्थियों 8:4 में पौलुस लिखता है - ``सो मूरतों के साम्हने बलि की हुई वस्तुओं के खाने के विषय में - हम जानते हैं, कि मूरत जगत में कोई वस्तु नहीं, और एक को छोड़ और कोई परमेश्वर नहीं''। जब मूरत मात्र पत्थर ही है तो उसके सामने चढ़ाया हुए भोजन का कोई अर्थ नहीं होता ।

कभी-कभी हमारे जीवन में ऐसा होता है कि जिस बात में हमें अपराध भावना महसूस नहीं करना चाहिए, जिस बात में हमें इस भावना का शिकार नहीं होना चाहिए उसी बात में हम अपराध भावना का शिकार हो जाते हैं । यदि हम ग़लत बात में अपने प्रिय का साथ नहीं देते हैं तो हमें लगता है कि वह हमसे नाराज़ हो गया और हम अपराधी भावना का शिकार हो जाते हैं । यदि हम अपने अधिकारी का ग़लत काम में साथ नहीं देते हैं और सोचते हैं कि अब हम अपने अधिकारी के क्रोध का शिकार होंगे और तब हम में एक अपराधी भावना आ जाती है, जो कि वास्तव में नहीं आना चाहिए । यदि हमने अपना घर कभी गन्दा छोड़ दिया और कुछ अतिथि आ गए तो अपराध भावना से हम ग्रसित हो जाते हैं ।

मेंरे साथ ऐसा अक्सर होता था कि ऑफिस में बहुत से ऐसे काम होते थे जिनकी मैं रात में लिस्ट बना लेता था और सोचता था कि सुबह ऑफिस पहुंचकर इन कामों को आज निपटाना है । परन्तु ऑफिस पहुंचते ही पता चलता था कि बाहर से कुछ अतिथि आए हैं, कोई पासबान मुझसे मिलने आ गए हैं और फिर उनके साथ कई घण्टे बीत जाते थे । तब अक्सर मैं अपराधी भावना से ग्रसित हो जाता था क्योंकि मैं सोचता था जो काम मुझे आज करना था वह नहीं किया, मेंरे समय का दुरुपयोग हो गया । जो समय परमेश्वर ने मुझे दिया है उसे मैंने बर्बाद कर दिया ।

पहले प्रकार के विवेक के बारे में बाइबिल में बताया गया है और वह है; कमज़ोर विवेक । जिन बातों के कारण वास्तव में हमें अपराधी भावना से ग्रसित नहीं होना है; हम हो जाते हैं ।

2. कठोर विवेक :- जो कठोर विवेक है उसका अर्थ यह है कि जिस बात में वास्तव में हमें अपने आपको दोषी ठहराना चाहिए, हम उसमें अपने आपको दोषी नहीं ठहराते । क्योंकि हमारा जो विवेक है वह कठोर हो गया है ।

चोरी करते-करते चोर के लिए चोरी करना उसकी एक आदत बन जाती है । फिर एक ऐसा समय आता है जब वह चोरी करने को ग़लत नहीं समझता । व्यभिचार करने वाले के लिए व्यभिचार करना एक आदत बन जाती है । एक समय आता है जबकि वह सोचता है कि व्यभिचार करना ग़लत नहीं है क्योंकि यह तो एक शारीरिक अभिलाषा है । शरीर के कुछ कैमिकल्स हैं जिनका रिएक्शन होता है और हमें किसी बात की अनुभूति होती है । शरीर की कोई प्यास जागती है और उसको हम पूरा कर लेते हैं । झूठ बोलने वाले व्यक्ति के साथ भी ऐसा ही होता है । झूठ बोलना इतना सामान्य हो जाता है, दिनचर्या का अंग बन जाता है कि हम सोचते ही नहीं कि झूठ बोलना कितना भंयकर पाप है । जो एक दिन हमें नरक के गर्त में डाल देगा । झूठ बोलने और झूठे बहाने बनाने की हमारी आदत सी हो जाती है ।

1 तीमुथियुस 4:2 में लिखा है - ``यह उन झूठे मनुष्यों के कपट के कारण होगा, जिनका विवेक मानो जलते हुए लोहे से दागा गया है''।

उनका विवेक मानो जलते हुए लोहे से दाग दिया गया है, इस कारण अब उन पर किसी बात का असर नहीं होता । अब उनका विवेक कठोर हो गया है । पुराने नियम में उत्पत्ति और निर्गमन की पुस्तक में बहुत सी जगह हम मिस्र के राजा फिरौन के विषय में पाते हैं । उसका हृदय कठोर हो गया और उसने इस्राएलियों को जाने नहीं दिया । उसने उनके लिए समस्याएं पैदा कीं । उसने सोचा कि वह कोई ग़लत काम नहीं कर रहा ।

ऐसी-ऐसी बातें देखने और सुनने को मिलती हैं जिन्हें आज संसार में फैशन बना लिया गया है । जो बातें कल बुरी मानी जाती थीं, जो बातें कल अनैतिक मानी जाती थीं, जिन बातों की मान्यता समाज नहीं देता था; आज वे बातें फैशन बन गई हैं । हम टेलिविज़न पर ऐसे कार्यक्रम देखते हैं जहां पर ग़लत प्रकार की नैतिकता का आकर्षक ढंग से प्रस्तुतिकरण किया जा रहा है ।

टेलिविज़न पर मैं एक कार्यक्रम देख रहा था । उसमें एक डॉक्टर का इंटरव्यू आ रहा था जो कि दक्षिण भारत में रहता था । उस डॉक्टर ने अपने जिले में पांच सालों के अंदर पांच हज़ार गर्भपात किए थे । वह बता रहा था कि कितने कठिन-कठिन गर्भपात उसने किए हैं। किस प्रकार से छह, सात और आठ माह तक के गर्भ को उसने निकाला है । जो व्यक्ति उसका इन्टरव्यू ले रहा था, उसने कहा कि डॉक्टर साहब आप को इस बात का अहसास नहीं होता कि आपने पांच हज़ार बच्चों की हत्या की है । क्या आप को यह नहीं लगता कि आपने इतने बच्चों के प्राण लिए हैं । उस डॉक्टर ने कहा, आप क्या बात करते हैं। मैं तो सोचता हूं कि मैंने देश की बहुत बड़ी सेवा की है । इस जिले में पांच साल में पांच हज़ार गर्भपात किए हैं । मैंने इस जिले में जनसंख्या नियंत्रण का एक बड़ा भारी कार्य किया है । मुझे तो सम्मानित किया जाना चाहिए, मुझे तो अवार्ड मिलना चाहिए क्योंकि मैंने तो देश की सेवा की है ।

वह एक ऐसा व्यक्ति है जिसका मन, जिसका विवेक मर गया है या कठोर हो गया है । जिस बात में उसे अपने आपको दोषी ठहराना चाहिए, वह खुद को दोषी नहीं परन्तु घमण्डी ठहराता है । घमण्ड से वह ये बातें कहता है और अपनी पीठ ठोंकता है ।

हमारा विवेक परमेश्वर का दिया हुआ वरदान है, जो हमें बताता है कि कौन सी बातें ठीक हैं और कौन सी बातें ग़लत हैं । अपने विवेक को जीवित रखने के लिए हमें परमेश्वर के वचन का नियमित अध्ययन करना चाहिए । तब हमें पता चलेगा कि वे कौन सी बातें हैं जो परमेश्वर की दृष्टि में उचित हैं और कौन सी बातें हैं जो अनुचित हैं । वे कौन सी बातें हैं जिनकी अनुमति परमेश्वर देता है और वे कौन सी बातें हैं जिनकी अनुमति परमेश्वर नहीं देता ।

भजन संहिता 119:11 में लिखा है - ``मैं ने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है, कि तेरे विरुद्ध पाप न करूं'' ।

जब हम अपने विवेक को निरन्तर परमेश्वर के वचन के द्वारा शुद्ध करेंगे, उसको मज़बूत करेंगे तो वह हमारा सही दिशा निर्देशक बन जाएगा । हम परमेश्वर के वचन के अनुसार आगे बढ़ सकेंगे । वास्तव में विवेक हमारा दिशा निर्देशक नहीं है परन्तु परमेश्वर का वचन है जो दिशा निर्देशक का कार्य करता है । हमारा जागृत विवेक इसे हमारे भीतर संचालित करता है ।

3. सच्चा विवेक :- यह वह विवेक है जो व्यक्ति को जिसे बात में दोषी ठहराना चाहिए, उसे दोषी ठहराता है ।

इब्रानियों 10:22 में लिखा है - ``तो आओ; हम सच्चे मन, और पूरे विश्वास के साथ, और विवेक का दोष दूर करने के लिये हृदय पर झिड़काव लेकर, और देह को शुद्ध जल से धुलवाकर परमेश्वर के समीप जाएं''।

यह एक ऐसा विवेक है जिसमें कोई दोष नहीं है । यह दोषरहित विवेक, सच्चा विवेक है । यह हमें उस बात में दोषी ठहराता है जिसमें हमें दोषी ठहरना चाहिए । यदि कोई डाकू है या कोई व्यभिचारी है तो यह ज़रूरी है कि वह अपने आपको व्यभिचारी समझे । वह अपने आपको दोषी समझे । उसको इस बात का अहसास हो कि उसने ग़लत काम किया है । यही सच्चा विवेक है जो हमें कायल करता है कि हम इस बात का अहसास करें कि हमने पाप किया है । परमेश्वर की आज्ञा तथा उसकी व्यवस्था का उल्लंघन किया है । हम नरक के दण्ड के योग्य हैं । जब तक हम अपने आप को दोषी महसूस नहीं करेंगे, हम पश्चात्ताप भी नहीं करेंगे । जब तक हम अपने आपको दोषी महसूस नहीं करेंगे, हमें प्रभु यीशु मसीह की आवश्यकता का अहसास भी नहीं होगा । इस कारण से यह अच्छी बात है कि हम मान लें कि हमने परमेश्वर की आज्ञाओं को तोड़ा है, हमने पाप किया है, हमने सच्चाई को ठुकराया है । जब यह अहसास होगा तब हम पश्चात्ताप करेंगे । तब हमें एक उद्धारकर्त्ता की आवश्यकता होगी ।

रोमियों 3:10-12 में लिखा है - ``कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं । कोई समझदार नहीं; कोई परमेश्वर का खोजनेवाला नहीं । सब भटक गए हैं, सब के सब निक्कमे बन गए, कोई भलाई करने वाला नहीं, एक भी नहीं'' ।

रोमियों 3:23 - ``इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं'' ।

आपको ऐसे लोग मिलेंगे जो स्वयं की दृष्टि में खुद को धर्मी समझते हैं । वास्तव में ऐसे लोग कभी धर्मी नहीं हो सकते । ऐसे लोगों को बचाया जाना बड़ा कठिन है।

4. शुद्ध विवेक :- इसके विषय में 1 पतरस 3:16 में लिखा है - ``और विवेक भी शुद्ध रखो, इसलिये कि जिन बातों के विषय में तुम्हारी बदनामी होती है, उन के विषय में वे जो तुम्हारे मसीही अच्छे चालचलन का अपमान करते हैं लज्जित हों''।

पतरस लिखता है कि अपने विवेक को शुद्ध रखो ।

विवेक को दो प्रकार से शुद्ध रखा जा सकता है । सर्वप्रथम यह है कि जिसने पाप न किया हो, उसका विवेक शुद्ध होगा । इस संसार के इतिहास में और इस संसार के अन्त तक केवल एक ही ऐसा व्यक्ति रहा है जिसने कभी कोई पाप नहीं किया। वह व्यक्ति है; प्रभु यीशु मसीह । हम यह नहीं कह सकते कि हमने अपने जीवन में कभी कोई पाप नहीं किया और इसलिए हमारा विवेक शुद्ध है ।

शुद्ध विवेक को पाने के लिए एक और दूसरा रास्ता है, जो पापों की क्षमा का रास्ता है । जब हमारे पाप क्षमा किए गए हों, जब हमने प्रभु यीशु मसीह को अपने उद्धारकर्त्ता के रूप में जाना हो, उसे अपने हृदय में स्थान दिया हो, जब हमने प्रभु यीशु मसीह को अपने जीवन का केन्द्र, उद्देश्य तथा अपने जीवन का आदर्श बनाया हो; तब हमारे पाप क्षमा किए जाएंगे । तब ही हमारा विवेक शुद्ध हो सकेगा । तब हम अपने शुद्ध विवेक के साथ अपराध भावना से मुक्त होकर जी सकेंगे।

शुद्ध विवेक देने के लिए हम जानते हैं कि परमेश्वर ने प्रयास किया । परमेश्वर ने आदम और हव्वा को बनाया परन्तु उन्होंने उसकी आज्ञा का उल्लंघन किया । उसकी व्यवस्था को तोड़ा और पाप किया । तब परमेश्वर ने आदम और हव्वा को दण्ड दिया, उन्हें श्राप दिया । जबकि वे पत्तियों के वस्त्र पहने हुए थे, छाल के वस्त्र पहने हुए थे; परमेश्वर ने एक जानवर को मारा और उसके चमड़े से उनके लिए वस्त्र बनाए । परमेश्वर द्वारा चमड़े से आदम और हव्वा के लिए वस्त्र बनाना इस बात का प्रतीक था कि तुमने पाप किया है और तुम्हारे पाप की क़ीमत किसी के बलिदान से पूरी होगी । पाप को ढांपने के लिए किसी को बलिदान होना पड़ेगा । फिर भविष्यवक्ताओं के द्वारा भविष्यवाणियां की गईं कि एक उद्धारकर्त्ता आने वाला है जो सताया जाएगा, जो तोड़ा जाएगा, जो बलिदान हो जाएगा, जो हमारे लिए एक नई डाली के रूप में फूटेगा। तब परमेश्वर ने वाचा बांधी । परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था के द्वारा, अपनी वाचा के द्वारा, भविष्यवक्ताओं के द्वारा, प्रभु यीशु मसीह को एक उद्धारकर्त्ता के रूप में इस संसार में भेजने का संकेत दिया । अपने ठहराए गए समय पर उसने प्रभु यीशु मसीह को इस संसार में भेज दिया ।

परमेश्वर ने मेरे और आपके लिए ऐसी व्यवस्था की है । इसके लिए बड़े स्पष्ट संकेत दिए हैं, निर्देश दिए हैं कि हमें अपराध की भावना को लेकर जीना नहीं है । हमें अपराध की भावना को ढोना नहीं है वरन् हमें स्वतंत्रता से जीना है ।

इसके संदर्भ में परमेश्वर की चार प्रतिज्ञाएं हैं ।

परमेश्वर की पहली प्रतिज्ञा है कि वह हमारे अपराधों को तब पूरी तरह दूर करता है, जब हम उसे स्वीकार करते हैं, जब हम प्रभु यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्त्ता मानते हैं ।

भजन संहिता 103:12 में लिखा है - ``उदयाचल अस्ताचल से जितनी दूर है, उस ने हमारे अपराधों को हम से उतनी ही दूर कर दिया है'' । उदयाचल और अस्ताचल जो कभी मिल नहीं सकता, परमेश्वर ने हमारे जीवनों से हमारे अपराधों को उतनी ही दूर कर दिया है ।

इस सन्दर्भ में दूसरी प्रतिज्ञा यह है कि परमेश्वर हमारे पापों को पूरी तरह से साफ करता है । वह सम्पूर्णता से हमारे पापों को साफ करता है ।

यशायाह 1:18 में लिखा है - ``तुम्हारे पाप चाहे लाल रंग के हों, तौभी वे हिम के नाइंर् उजले हो जाएंगे; और चाहे अर्गवानी रंग के हों, तौभी वे ऊन के समान श्वेत हो जाएंगे'' । कोई दाग-धब्बा नहीं बचा । परमेश्वर सम्पूर्णता से अपना काम हमारे जीवन में करता है ।

इस सन्दर्भ में तीसरी प्रतिज्ञा यह है कि परमेश्वर हमारे पापों को भूल जाता है। परमेश्वर भूल जाए यह बात कुछ समझ में नहीं आती। शायद ऐसा कहना ज़्यादा ठीक होगा कि परमेश्वर हमारे पापों का स्मरण तक नहीं करता ।

यशायाह 43:25 में लिखा है - ``मैं वही हूं जो अपने नाम के निमित्त तेरे अपराधों को मिटा देता हूं और तेरे पापों को स्मरण न करूंगा'' । कभी तेरे पापों की बात नहीं होगी । कभी तेरे पापों का स्मरण भी नहीं करूंगा। यह परमेश्वर की प्रतिज्ञा है कि वह हमारे सारे पाप मिटा देता है और कभी उनको स्मरण भी नहीं करता है।

इस सन्दर्भ में चौथी प्रतिज्ञा और परमेश्वर के वचन में सबसे प्रभावशाली बात यह है कि परमेश्वर हमारे पापों को समुद्र की गहराई में दफ्रन कर देता है ।

मीका 7:18-19 में लिखा है - ``तेरे समान ऐसा परमेश्वर कहां है जो अधर्म को क्षमा करे और अपने निज भाग के बचे हुओं के अपराध को ढांप दे ? वह अपने क्रोध को सदा बनाए नहीं रहता, क्योंकि वह करुणा से प्रीति रखता है । वह फिर हम पर दया करेगा, और हमारे अधर्म के कामों को लताड़ डालेगा । तू उनके सब पापों को गहिरे समुद्र में डाल देगा'' । परमेश्वर हमारे अपराधों को गहरे समुद्र में डाल देता है।

रोमियों 8:1 में लिखा है - ``सो अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं'' । जब हम प्रभु यीशु मसीह को स्वीकार करते हैं तो परमेश्वर वास्तव में हमको पाप करने का लायसेन्स नहीं दे देता। परन्तु परमेश्वर हम पर अनुग्रह करता है । वह हमारे पापों को मिटाता है, हमारे पापों को बिसराता है, हमारे पापों को हम से दूर कर देता है, हमारे पापों को समुद्र की गहराई में दफ्रना देता है ।

कलकत्ता का ब्रिज जब बनाया जा रहा था तो उसे बनाने के लिए एक बहुत बड़े कॉन्ट्रेक्टर को उसका कॉन्ट्रेक्ट दिया गया । बहुत से लोग उसको बनाने में लग गए । वह ब्रिज बहुत बड़ा, बहुत लम्बा और बहुत ऊंचा था इस कारण बहुत से मज़दूर जो काम करते थे वहां से गिर जाते थे और उनकी मृत्यु हो जाती थी । तब उस कॉन्ट्रेक्टर ने एक बहुत मोटी रस्सी की बड़ी भारी जाली बनवाई और उस ब्रिज के निर्माण स्थल के नीचे लगा दी । तब लोग निडरता और निर्भीकता से अपना काम करने लगे । उसके बाद लोग नीचे तो गिरे परन्तु उस जाली के कारण उनका जीवन बच गया । इसी प्रकार जब हम प्रभु यीशु मसीह को स्वीकार करते हैं तो वह अपने अनुग्रह की नेट, अपने अनुग्रह की जाली हमारे जीवनों में बिछा देता है; हम गिरते तो हैं परन्तु वह हमें सम्भालता है और हमारी आत्मा का नाश नहीं होने देता।

सबसे बड़ा दान जो परमेश्वर हम पापियों को देता है, वह है अनन्त जीवन का दान । इसका वर्णन यूहन्ना 3:16-18 में किया गया है - ``क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए । परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा, कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए । जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका; इसलिये कि उस ने परमेश्वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्वास नहीं किया'' । यूहन्ना 5:24 में लिखा है - ``मैं तुम से सच सच कहता हूं, जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजने वाले की प्रतीति करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु के पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है'' । यदि हमने प्रभु यीशु मसीह को स्वीकार किया है । यदि हम उसकी शिक्षाओं पर चलते हैं । यदि हमने उसके नाम का बपतिस्मा लिया है । यदि वह हमारे जीवन का आधार है । यदि वह हमारे जीवन का उद्देश्य और केन्द्र है तो हम पर कोई दण्ड की आज्ञा नहीं । हम बड़े शुद्ध मन के साथ, बड़े शुद्ध विवेक के साथ, बड़ी उन्मुक्तता का, आनन्द का, शान्ति का जीवन जी सकते हैं और इस अपराध की भावना से मुक्त होकर अपने जीवन में आगे बढ़ सकते हैं । हमें पापों की गुलामी में फंसे नहीं रहना है । हमें अपने अतीत के पापों का बोझ नहीं ढोना है । हमने अपने जीवन में जो ग़लत काम किए हैं उनको साथ लेकर नहीं चलना है । क्योंकि अब जो मसीह में है वह नई सृष्टि है । पुरानी बातें जाती रहीं, देखो वे सब नई हो गईं ।

शैतान एक काम इस संसार में करता है वह यह कि उद्धार के विषय में हमारे मन में शंका पैदा कर देता है । अक्सर हमें ऐसा लगता है कि वास्तव में हमारा उद्धार हुआ है कि नहीं ? हमें लगने लगता है कि हमारे पापों की क्षमा मिली कि नहीं ? हमें मुक्ति मिली कि नहीं ? हम मृत्यु के बाद स्वर्ग जाएंगे कि नहीं ? हमें अनन्त जीवन मिलेगा कि नहीं ? हमें भरमाने का यह काम शैतान का है । परन्तु परमेश्वर का वचन स्पष्ट है, उसके निर्देश बड़े साफ और बड़े सीधे हैं, जो हमें बताते हैं कि हमें इस अपराधी भावना के बोझ में नहीं जीना है । इससे मुक्त होकर हम आगे बढ़ें। निश्चितता से, हल्के मन से हम आगे बढ़ें और परमेश्वर की निकटता में अपने जीवन में बढ़ते जाएं ।

निष्कर्ष :- परमेश्वर हम पर अपना अनुग्रह करता है । वह हमें एक उद्धारकर्त्ता देता है । परमेश्वर अपने पुत्र को हमारे लिए बलिदान करता है । वह हमारे पापों को उतनी दूर करता है जितना पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण है। परमेश्वर हमारे पापों को स्मरण भी नहीं करता । परमेश्वर हमारे पापों से हमें पूरी तरह से शुद्ध करता है । मुक्त करता है, उजला बनाता है । वह हमारे पापों को समुद्र की गहराई में दफ्रन कर देता है ।

अत: प्रभु यीशु मसीह में हमें आनन्द का जीवन जीना है । प्रभु यीशु मसीह में हमें शान्ति का जीवन जीना है । प्रभु यीशु मसीह में हमें एक ऐसा जीवन जीना है जिसमें कोई बोझ नहीं, जिसमें कोई अपराधी भावना नहीं; जिसमें शुद्ध विवेक है। जब हमारा जीवन इस प्रकार का होगा तो हम बड़ी उन्मुक्तता के साथ, परमेश्वर की निकटता में चल सकेंगे । उसकी गवाही हमारे जीवनों से होगी और निरन्तर अपने जीवन में उसकी योजना को पूरा कर सकेंगे ।

परमेश्वर आपको आशीष दे ।