मत्तीय 16:13-18 परिचय :- मत्ती रचित सुसमाचार 16:13-18 में उस घटना का वर्णन है जब प्रभु यीशु मसीह अपने चेलों से बातें कर रहा था । उसने उनसे पूछा कि लोग उसके विषय में क्या कहते हैं ? चेलों ने जवाब दिया कि कितने तो यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला कहते हैं । कितने तो एलिय्याह कहते हैं । कितने तो यिर्मयाह और कितने भविष्यवक्ताओं में से एक कहते हैं । तब प्रभु यीशु मसीह ने उनसे पूछा कि तुम मुझे क्या कहते हो ? पतरस ने कहा कि तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है । पतरस का जवाब सुनकर प्रभु यीशु मसीह आनन्दित हो गया । उसने कहा कि, पतरस यह बात तुझ पर मांस और लहू ने नहीं परन्तु परमेश्वर ने प्रगट की है । तेरे विश्वास की इस बुनियाद पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊंगा और अधोलोक के फाटक भी उस पर प्रबल न होंगे । कलीसिया एक ऐसी संस्था है जिसको स्वयं प्रभु यीशु मसीह ने बनाया । यह एक ऐसी संस्था है जिसका अस्तित्व पिछले 2000 वर्षों से इस संसार में है । यह सबसे अधिक तेज़ी से बढ़ती जा रही है। एक पुस्तक मैंने पढ़ी जिसमें लिखा हुआ था कि आज सम्पूर्ण विश्व के 217 देशों में 2500 कलीसियाएं प्रतिदिन स्थापित की जा रही हैं। प्रारम्भ से ही जितना सताव कलीसिया ने सहा है, जितनी आलोचना कलीसिया की हुई है, जितनी हत्याएं कलीसिया के अगुवों की हुई हैं; दुनिया में और कहीं नहीं हुइंर् । पिछले दिनों एक मिशनरी कन्वेन्शन में मुझे बोलने का अवसर मिला । उसमें लगभग 70 देशों के लोग आए थे । मेरा विषय था आज के संसार में मसीहियों पर जो सताव आ रहा है उसके सम्बन्ध में हमारी क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए ? उसको रोकने में हमारी क्या भूमिका हो सकती है ? इस विषय पर मुझे चर्चा करनी थी । जब मैंने अध्ययन प्रारम्भ किया तो मुझे पता चला कि मसीहियों पर आज जितना सताव हो रहा है शायद हमको उसकी पूरी जानकारी ही नहीं है । एक समूह से मेरी चर्चा हुई जो इन्डोनेशिया की यात्रा करके तीन माह बाद लौटा था। उन्होंने बताया कि सिर्फ्र 1997 में ही इन्डोनेशिया में 300 से अधिक कलीसिया भवनों को जला दिया गया। हज़ारों मसीहियों को प्रताड़ित किया गया । हज़ारों मसीहियों को मृत्यु के घाट उतार दिया गया । इन्डोनेशिया में कलीसिया की आराधना के दौरान अक्सर सैनिक आकर चारों तरफ से भवन को घेर लेते हैं । अनेक बार ऐसा हुआ है कि वे भवन में आग लगा देते हैं । यदि किसी ने भागने की कोशिश की तो उसे गोलियों से भून देते हैं । यह आज के संदर्भ की बात है । पिछले दिनों ऐसा लगता था कि मानो चीन में आराधना करने की स्वीकृति दे दी गई है । मसीही लोग अब कुछ आसानी से आराधना कर पा रहे हैं । परन्तु यदि चीन के इतिहास को देखें तो हम पाएंगे कि चीन में कलीसिया भयंकर सताव से गुज़री है और आज भी वहां मसीहियों पर जिस प्रकार का सताव आ रहा है शायद विगत वर्षो में कभी नहीं आया । चीन में चालीस लाख मसीही हैं । वे तहखानों में छिपकर सुबह 3 बजे से उठकर आराधना करते हैं । पहरा देने वाले सिपाही गश्त लगाते समय यह ढूंढ़ते हैं कि ये मसीही कहां छुपकर आराधना कर रहे हैं । यदि वे मिल जाते हैं तो उन्हें गोलियों से भून दिया जाता है । अमेरिका में एक न्यूज़ चैनल एबीसी मैं देख रहा था । उस चैनल पर चीन से एक रिपोर्ट आ रही थी । उसमें उन्होंने बताया कि चीन में 2000 से अधिक पासबानों को क़ैद में डाल दिया गया है । जब उनके परिवार के लोग उनसे मिलने गए तो अधिकांश पासबान और कलीसिया के अधिकांश अगुवे जेल में मौजूद नहीं थे । उनको बहुत ढूंढ़ा गया परन्तु उनका कहीं पता नहीं चला । चीन में ऐसे लोग जो मसीही अगुवाई में हैं, उन्हें बन्दी बना लिया गया है और उनको राजनैतिक बन्दी माना जा रहा है । प्रतिदिन ऐसे सैकड़ों मसीही अगुवों को मौत के घाट उतारा जा रहा है । रिपोर्ट में यह भी दिखाया गया कि इन मसीही अगुवों को बन्दी बनाकर एक बहुत तीखी दवाई दी जाती है, जिसके प्रभाव से व्यक्ति बेहोश हो जाता है । उसे इसी बेहोशी की हालत में ले जाया जाता है और उसके सिर पर रिवाल्वर रखकर गोली मार दी जाती है । सिर्फ्र इतना ही नहीं परन्तु उसके मरने के तुरन्त बाद उसके शरीर के अंगों, खासकर किडनी, को निकाल कर बाज़ार में बेच दिया जाता है । यूगाण्डा के अलावा लगभग 32 और देशों में प्रतिदिन मसीहियों की हत्या की जा रही है । एक पत्रिका के सर्वेक्षण के मुताबिक पिछले 5 वर्षो से 1 लाख 60 हजार मसीहियों को प्रतिवर्ष मौत के घाट उतार दिया जा रहा है । यह हिटलर के ज़माने की बात नहीं है बल्कि आज की बात है । आज सारे संसार में मसीहियों पर घोर सताव आ रहा है । परन्तु इस सताव के बावजूद भी कलीसिया बढ़ती जा रही है । मज़बूत होती जा रही है । कभी-कभी कलीसिया हमारे लिए बहुत सामान्य सी बात हो जाती है । परन्तु यदि आप से कोई पूछे कि कलीसिया क्यों अहम् है ? कलीसिया क्यों महत्वपूर्ण है ? कलीसिया क्यों प्रमुखतम है ? कलीसिया क्यों इस संसार में अद्वितीय है ? तो आपका क्या जवाब होगा ? परमेश्वर के वचन से इस सवाल के चार उत्तर हो सकते हैं । 1. कलीसिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कलीसिया ही एक ऐसा स्थान है जहां पर निरन्तर जीवन के अहम् मुद्दों की व्याख्या की जाती है :- संसार में केवल कलीसिया ही वह स्थान है जहां जीवन से जुड़े अहम् मुद्दों की निरन्तर व्याख्या की जाती है । जीवन क्या है ? मृत्यु क्या है ? हम कौन हैं ? हम यहां किसलिए हैं ? हमें उद्धार कैसे मिलेगा ? परमेश्वर कैसा है ? उसका प्रेम कैसा है ? उसका न्याय कैसा है ? वह कैसे क्षमा करता है ? वह कैसे अनन्त जीवन का दान देता है ? ये जीवन के वे प्रमुखतम मुद्दे हैं जो इस संसार में हमारी मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होते । ऐसे मुद्दों की व्याख्या केवल कलीसिया ही करती है । जो बातें आप कॉलेज में सीखते हैं,अखबार में पढ़ते हैं, टेलिविज़न में देखते हैं उन्हें जानना ज़रूरी है । खेल जगत में क्या हो रहा है ? यह जानना ठीक है। विज्ञान में क्या नई प्रगति हो रही है ? यह जानना ठीक है । राजनीति की क्या स्थिति है ? सरकार की क्या स्थिति है ? देश-विदेश में सरकारें किस प्रकार से चल रही हैं ? दुनिया में कहां युद्ध हो रहे हैं ? हमारे देश की आर्थिक स्थिति कैसी है ? इन सब बातों को जानना तो ज़रूरी है परन्तु ये हमारे जीवन के अहम् मुद्दे नहीं हैं । जीवन के जो अहम् मुद्दे हैं वे ये हैं कि मैं कौन हूं ? आत्मा क्या है ? परमेश्वर क्या है ? प्रभु यीशु मसीह क्या है ? उद्धार कैसे मिल सकता है ? अनन्त जीवन क्या है ? इन सारे मुद्दों की व्याख्या इस संसार में केवल कलीसिया के द्वारा ही की जाती है । पासकल एक बहुत प्रसिद्ध गणितज्ञ था । उसने गणित के कुछ सिद्धान्त प्रतिपादित किए । वह एक मसीही गणितज्ञ था । एक बार उसे स्टेज पर कुछ अनीश्वरवादियों के साथ खड़ा कर दिया गया । वाद-विवाद का विषय था - धर्म । पासकल ने वहां खड़े होकर कहा कि यदि तर्क के लिए यह बात मान ली जाती है, कि परमेश्वर कुछ नहीं है । प्रभु यीशु मसीह इस संसार में नहीं आया । परमेश्वर का वचन सही नहीं है । परमेश्वर कोई अनन्त जीवन नहीं देता । कोई क्षमा नहीं है । पाप की कोई परिभाषा नहीं है । उसके बाद आप जो अनीश्वरवादी लोग हैं वे भी मरें और मैं भी मरूं, तो मेरा कुछ नुकसान नहीं होगा । क्योंकि मैं जीवन भर उस बात को मानता रहा जिसका अस्तित्व ही नहीं है । जिसका अस्तित्व नहीं है उसके मानने और न मानने से मुझे कोई नुकसान नहीं होगा । परन्तु तर्क के लिए यदि यह बात मान ली जाए, कि परमेश्वर है । वह अनन्तकाल से है । वह हमारा पिता है । वह सर्वज्ञानी, सर्वव्यापक, सर्वसामर्थी है । उसने अपने एकलौते पुत्र प्रभु यीशु मसीह को इस संसार में भेज दिया ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए । अगर यह बात सिद्ध है, अगर यह बात सत्य है और मैं मरूं और आप भी मरें, तो दोनों ही स्थितियों में मेरी कोई हानि नहीं होगी । मैं कुछ नहीं खोऊंगा । जो कुछ खोएंगे वह आप ही खोएंगे । दोनों स्थितियों में नुकसान आपका ही है । अमेरिका के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने एक उपन्यास लिखा है । उसमें उसने खरगोशों के दो समूहों की कथा लिखी है । उसने लिखा है कि एक जंगल था जिसमें बहुत से खरगोश रहते थे । ये खरगोश संसार के सबसे बड़े खरगोश हुआ करते थे, उनके कान बहुत बड़े-बड़े थे । उनके बाल बहुत बड़े-बड़े थे । उनका वज़न बहुत ज़्यादा था । वे 20-20 किलो के हुआ करते थे । एक समय छोटे खरगोशों का दल वहां पहुंचा । उन्होंने उन खरगोशों को देखा और उनसे कहा कि तुम इतने बड़े कैसे हो गए । बड़े खरगोशों ने जवाब दिया कि हमारे क्षेत्र में हमें बहुत अच्छे गाजर खाने को मिलते हैं । हम नहीं जानते कि ये गाजर कहां से आते हैं परन्तु रोज़ सुबह जब हम अपने बिल में से निकलते है तो बिल के सामने एक प्लेट सजी होती है । उसमें ढेर सारे मीठे गाजर रखे होते हैं । इनको खाने से हमारा शरीर बढ़ जाता है । छोटे खरगोशों ने कहा कि क्या हम भी यहां रह सकते हैं ? उन्होंने कहा क्यों नहीं, तुम भी यहां खुशी से रह सकते हो । ये छोटे खरगोश वहां रहने लगे । रोज़ सुबह ये अपने बिलों में से निकलते तो गाजर की प्लेट सजी हुई मिल जाती । कुछ दिनों के बाद ये छोटे-छोटे खरगोश भी उन गाजरों को खाकर बड़े-बड़े हो गए । एक दिन उन छोटे खरगोशों में से एक ने देखा कि ये बड़े खरगोश दिन ब दिन एक-एक करके गायब होते जा रहे हैं । उसने तय किया कि मैं इस बात का पता लगाऊंगा। तब वह एक दिन एक बड़े खरगोश के पीछे गया । उसने देखा कि एक गड्ढा था । उसने जब उस गड्ढ़े को खोलकर देखा तो पाया कि वहां पर एक फन्दा लगा हुआ था । उसमें इन खरगोशों को फंसाया जाता था । उनका मांस ले जाकर बाज़ारों में बेचा जाता था । यह खरगोश वापस लौटकर आता है और सभी खरगोशों की एक सभा बुलवाता है । वह उनसे कहता है कि क्या तुम जानते हो कि हमारा क्या अन्जाम हो रहा है, क्या तुम जानते हो कि कुछ दिनों के बाद हमारे दलों में से कोई न कोई खरगोश गायब हो जाता है । बाकी खरगोशों ने कहा, हमें इससे कोई मतलब नहीं। इस विषय में हमको कोई चर्चा नहीं करना । इस विषय में हमें कोई वार्तालाप नहीं करना । इस विषय में हमको कोई जानकारी नहीं रखना क्योंकि हमें तो मतलब है अपने गाजरों से । जब तक हमको मीठे-मीठे गाजर मिलते रहेंगे, हमें इन बातों से कोई मतलब नहीं कि हमारे बाकी साथी कहां जाते हैं और उनका क्या होता है । अक्सर हमारे जीवनों में भी ऐसा ही होता है । हम अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाते हैं । जब तक हमें भोजन मिलता है, कपड़े मिलते हैं और रहने की स्वतंत्रता मिलती है; हम सोचते हैं कि हमें इन मुद्दों को जानने की कोई ज़रूरत नहीं कि हम कहां जाएंगे ? हमारा अन्त कहां होगा ? हम यहां क्यों हैं ? हमको किसने बनाया है ? हमको किसलिए भेजा गया है ? परन्तु जीवन के अहम् मुद्दों को जानना हम सभी के लिए बहुत ज़रूरी है । इस संसार में केवल कलीसिया ही एक ऐसी संस्था है जो जीवन के अहम् मुद्दों की निरन्तर व्याख्या करती है । 2. कलीसिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मानव के मूल्य की व्याख्या करती है :- सांसारिक संदर्भो मं देखें तो मानव के जीवन का कोई बड़ा मूल्य नहीं है । ईरान और इराक में जब युद्ध हो रहा था तो सैनिक गांव के बच्चों को इकट्ठा करके 25-30 बच्चों को बान्धकर ले आते थे । इन बच्चों को वे अपनी सेना की टुकड़ी के आगे दौड़ाते थे । चार-पांच साल के ये मासूम बच्चे जब दौड़ते थे तो दुश्मन की सेना यह सोचकर कि शत्रु नज़दीक आ गया है उन बच्चों पर गोलियां चला कर मार डालती थी । उन गोलियों से सेना की टुकड़ी को पता चल जाता था कि हमारे दुश्मन की सेना कहां है । उनका कहना है कि इस प्रकार से कार्य करने से हमारी सेना के जवान समाप्त नहीं होते, वे बच जाते हैं । उनकी दृष्टि में उन बच्चों के जीवन का कोई मूल्य नहीं । खु्रश्चेव एक बार यूनाइटेड नेशन ऑर्गेनाइज़ेशन की सभा में बोल रहे थे। उन दिनों में हुए युद्ध में हज़ारों-लाखों निर्दोष लोगों को मारा डाला गया था । उन हत्याओं को न्यायोचित ठहराने के लिए खु्रश्चेव ने सभा में दिए गए अपने कथन में कहा- अगर ऑमलेट बनाना है तो अण्डों को तोड़ना ही पड़ेगा । अर्थात् हमारा जो उद्देश्य है उसे हमें पूरा करना है । इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए चाहे हमें कितने ही लोगों को नाश करना पड़े, कितनों की भी हत्या करना पड़े, कितनों का भी खून बहाना पड़े, कितने भी बच्चों की कुर्बानी देना पड़े । लेकिन यदि ऑमलेट बनाना है तो उसके लिए अण्ड़ों को तोड़ना ज़रूरी है । किसी ग़ैर मसीही वैज्ञानिक ने कहा है कि जो व्यक्ति स्वस्थ है, सन्तुलित भोजन करता है, व्यायाम करता है, अपने शरीर की चिन्ता करता है, खुशी और शान्ति से रहता है, वह व्यक्ति औसतन 100 वर्ष तक जिएगा । यदि आप चीन देश के इतिहास को देखें तो पाएंगे यह 5 हज़ार वर्षो पुराना है । व्यक्ति की अधिकतम उम्र 100 वर्ष है । किसी देश का इतिहास 2 हज़ार, 3 हज़ार और 5 हज़ार साल पुराना है । व्यक्ति 100 वर्षों तक जीता है, और समाज हज़ार वर्षो तक रहता है । इसलिए व्यक्ति समाज से बहुत छोटा है । समाज के भले के लिए यदि व्यक्ति की कुर्बानी करना पड़े तो इसमें कोई ग़लत बात नहीं है । परन्तु इसके विपरीत कलीसिया बताती है कि प्रभु यीशु मसीह ने मेरे और आप के लिए अपने प्राण दे दिए । ताकि जब हमारी मृत्यु हो, तो हमें अनन्त जीवन प्राप्त हो। अनन्त जीवन कितना लम्बा होगा, उसका आंकलन हम संख्याओं और सीमाओं के आधार पर नहीं कर सकते । जब एक मसीही जन किसी व्यक्ति को देखता है तो पाता है कि प्रभु यीशु मसीह ने व्यक्ति को बनाया है । परमेश्वर ने व्यक्ति को सृजा है । अपनी समानता में बनाया है । अपना श्वास फूंका है । अपना आत्मा दिया है। वह व्यक्ति केवल कुछ वर्षों का नहीं परन्तु अनन्त काल का है । इस संसार तक ही सीमित नहीं वरन् उसके बाद स्वर्ग में अनन्त जीवन प्राप्त कर सकता है । केवल कलीसिया ही एक ऐसी संस्था है जहां निरन्तर मानव जीवन के मूल्य की व्याख्या की जाती है । अफ्रीका के एक पिछड़े इलाके में जहां मात्र 600 लोग रहते थे, वहां परमेश्वर के वचन का प्रचार नहीं हुआ था । लोगों ने इसका कारण जानने का प्रयास किया । यह पता चला कि उस जाति के लोगों की कोई भाषा ही नहीं थी । वे कुछ बोलना ही नहीं जानते थे । तब एक मसीही युवा जिसने ऑक्सफोर्ड यूनिर्वसिटी से बहुत शिक्षा प्राप्त की थी, उसने अपना जीवन समर्पित किया । उसने निर्णय लिया कि वह इन 600 लोगों के बीच में जाएगा और उनकी बोली को भाषा में बदलेगा । वह युवा उस इलाके में पहुंचा । उसने उन लोगों के बीच में काम करना शुरु किया । वह कुछ इशारा करता या आवाज़ निकालता था तो अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उस इशारे या आवाज़ से सम्बन्धित एक आकृति बना देता था । उस आकृति को देखकर प्रत्युत्तर में वे भी कोई इशारा करते थे । धीरे-धीरे इस युवक ने उन इशारों को आकृतियों में बदला, और उन आकृतियों के आधार पर उस कबीले के लोगों की भाषा विकसित की । इस काम को करने में उसे कई वर्ष लग गए । जब वह भाषा विकसित हो गई तो उसने दो वर्षो में उस कबीले के लोगों के लिए नया नियम का उनकी भाषा में अनुवाद कर दिया । अब वह इन 600 लोगों को प्रभु यीशु मसीह की शिक्षा दे रहा है । संसार की दृष्टि से देखा जाए तो उस व्यक्ति को जिसने विश्व की सर्वोच्च संस्था से डिग्री प्राप्त की थी, उसे उस पिछड़े इलाके में जाकर उन अनपढ़ लोगों के बीच में, जिनकी कोई सभ्यता, संस्कृति नहीं थी, अपने जीवन की बाज़ी लगाने की क्या ज़रूरत थी ? परन्तु आत्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह एक बड़ी ज़रूरत थी कि इन 600 लोगों की आत्माएं बचाई जा सकें । वे प्रभु यीशु मसीह के उद्धार के बारे में जान सकें । वे अपना जीवन प्रभु यीशु मसीह को दे सकें । वे उसके नाम का बपतिस्मा ले सकें और अनन्त जीवन प्राप्त कर सकें। मानव के मूल्य की व्याख्या केवल कलीसिया में ही की जाती है । आज ये स्कूल कहां से आ गए ? ये अनाथालय कहां से आ गए ? ये अस्पताल कहां से चल रहे हैं ? आज सारे संसार में मसीहियों के द्वारा सबसे अधिक सेवा की जा रही है । यह कहां से प्रारम्भ हुई ? इसकी प्रेरणा कहां से मिली ? इसका स्त्रोत कहां है ? इसका स्त्रोत कलीसिया है । केवल कलीसिया ही है जो यह बताती है कि मानव का जीवन बहुत बहुमूल्य है । 3. कलीसिया इस कारण महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जीवन के मापदण्डों की व्याख्या करती है :- वह इस बात की व्याख्या करती है कि कोई बात सच है तो क्यों है ? कोई बात ग़लत है तो क्यों है ? सच क्या है और ग़लत क्या है ? कोई बात उचित क्यों है और अनुचित क्यों है ? किसी अनीश्वरवादी ने पिछले दिनों सही और ग़लत की परिभाषा कुछ इस प्रकार से दी - कि सही वह है जो उद्देश्य तक पहुंचने में आपका साथ देता है और ग़लत वह है जो उद्देश्य तक पहुंचने में बाधक होता है । इसका अर्थ तो यह प्रतीत होता है कि अगर उद्देश्य तक पहुंचना है तो आपको उसके लिए कितना भी ग़लत काम क्यों न करना पड़े वह सही है । परन्तु वास्तविकता यह है कि झूठ बोलना सही नहीं है । किसी को धोखा देना सही नहीं है, किसी की वस्तु का लालच करना सही नहीं है । किसी की हत्या कर देना सही नहीं है । सच्चाई की सारी बातें कहां से आ रही हैं ? ये बातें आ रही हैं, परमेश्वर के वचन से, जिनकी व्याख्या केवल कलीसिया में ही की जाती है । पिछले दिनों टेलीविज़न पर दक्षिण भारत के सेलम शहर के एक डॉक्टर का इंटरव्यू आ रहा था । यह डॉक्टर हर माह में हज़ारों गर्भपात करता है । यहां तक कि वह 6 और 7 महीने तक के गर्भपात करता है । इस कार्य में कई बार कई माताओं की मृत्यु हो जाती है । गर्भपात के द्वारा वह कितने बच्चों की हत्या कर चुका, इसकी कोई गिनती नहीं । जब उस डॉक्टर से किसी पत्रकार ने पूछा तो उसने कहा कि मैं तो देश की सेवा कर रहा हूं । मुझे तो बड़ा पुरस्कार मिलना चाहिए । मुझे तो राष्ट्रीय सम्मान मिलना चाहिए क्योंकि मैं जनसंख्या नियंत्रण का काम कर रहा हूं । मैं जनसंख्या को काबू में लाने के लिए शासन को सहयोग दे रहा हूं । इसके लिए तो मुझे बहुत से प्रशस्ति पत्र मिलना चाहिए । मेरा सम्मान राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिए । यदि हम इंग्लैण्ड के इतिहास को देखें तो पाते हैं कि वहां के लोगों का जो सबसे बड़ा व्यापार था वह दासों की खरीद-फरोख्त का था । अफ्रीका के देशों से सैकड़ों-हज़ारों लोगों को बान्धकर समुद्री जहाजों से लाया जाता था । इन लोगों को लंदन और इंग्लैण्ड के विभिन्न शहरों में बीच बाज़ार में लाकर खड़ा कर दिया जाता था । जहां उनको बेचने के लिए उनकी बोली लगाई जाती थी । तब वहां जॉन वेस्ली नाम का एक प्रचारक आया । उसने कलीसिया में प्रचार करना प्रारम्भ किया । जॉन वेस्ली के प्रचार से विलियम विल्बर नाम के व्यक्ति ने प्रभु यीशु मसीह को अपना जीवन दिया। कुछ समय बाद वह कलीसिया का प्रमुख अगुवा हो गया । उसके बाद वह राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा । इस गुलामी प्रथा के विरोध में अकेले आदमी विलियम विल्बर ने आवाज़ उठाई । एक समय आया जब विलियम विल्बर इंग्लैण्ड की संसद का सदस्य बन गया । संसद में रहते हुए वह गुलामी प्रथा को समाप्त करने की बात उठाता रहा । 25 वर्ष के बाद उसकी मृत्यु हो गई । उसकी मृत्यु के दो सप्ताह के पश्चात् इंग्लैण्ड की संसद में निर्णय किया गया कि गुलामी प्रथा को समाप्त कर दिया जाए। परमेश्वर के वचन के प्रचार के प्रभाव से, कलीसिया के पुलपिट के प्रभाव से एक व्यक्ति के जीवन में वह आग पैदा होती है कि वह सारे संसार में गुलामी प्रथा को रोक देता है। जीवन के मापदण्डों की व्याख्या अगर किसी संस्थान से होती है, तो वह संस्थान है कलीसिया, जिसकी नींव प्रभु यीशु मसीह ने रखी । 4. कलीसिया इस कारण महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सारे संसार में हमें मसीही परिवार का अंग बनाती है :- कलीसिया हमको गहरी सहभागिता प्रदान करती है । कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण रूप से सक्षम नहीं है । हम में से प्रत्येक को एक दूसरे की ज़रूरत है । भले ही आज हमें किसी की ज़रूरत न पड़े परन्तु शायद कल पड़ सकती है । इस बात के लिए कलीसिया को एक उदाहरण माना जाता है। जब किसी की मृत्यु होती है, जब कोई पीड़ा में होता है, जब कोई अस्पताल में होता है, जब कोई टूटा हुआ होता है, जब किसी का प्रियजन उठा लिया जाता है तो ऐसे समय में कलीसिया परिवार के रूप में जुड़कर उसको सम्बल प्रदान करती है । उसको दृढ़ता प्रदान करती है । उसके लिए प्रार्थना करती है । उसकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है । दुनिया में और किसी संस्थान में ऐसी गहरी सहभागिता नहीं पायी जाती । कलीसिया हमको ऐसी सहभागिता का अंग बनाती है जो दुनिया के कोने-कोने तक फैली हुई है । विश्वव्यापी कलीसिया में 300 करोड़ लोगों से ज़्यादा सदस्य पाए जाते हैं । भारत की जनसंख्या से तीन गुनी अधिक संख्या में लोग कलीसिया की इस सहभागिता में पाए जाते हैं । यह कलीसिया क्या है ? यह एक भवन से भी बढ़कर है । यह विश्वासियों की, चुने हुए लोगों की सहभागिता है । यह मसीह यीशु को स्वीकार करने वाले, बचाए हुए लोगों की, उद्धार पाए हुए लोगों की सहभागिता है । यदि दमोह की कलीसिया के इतिहास को देखें तो पाते हैं कि बहुत विद्वान और महान लोग इस कलीसिया में हुए हैं। विलियम ईगल रेम्बो, डॉ. मैगावरन, मिस्टर अलप्पा, श्री डी.आर. राम, श्री सैमुएल और डॉ.विजय लाल जैसे लोग हुए जिन्होंने बहुत मेहनत, त्याग, समर्पण और परिश्रम से इस कलीसिया को आगे बढ़ाया । परन्तु इस कलीसिया की महत्ता इससे भी कहीं बढ़कर है । क्योंकि प्रभु यीशु मसीह ने अपना सब कुछ इस कलीसिया के लिए दे दिया । उसने अपने आपको बलिदान कर दिया और कलीसिया की स्थापना की । कलीसिया प्रभु की देह है । हमारे लिए यह गौरव की बात है कि हम इस देह के अंग हैं । परन्तु इस संसार में हम हमेशा के लिए नहीं आए हैं । हमारे दिन गिने हुए हैं । एक दिन हम इस संसार से चले जाएंगे । यदि अपनी पिछली पीढ़ियों को देखें तो हम पाएंगे कि उन्होंने किस कठिनाई को उठाकर, कितने त्याग के साथ कलीसिया को इस स्थान पर पहुंचाया है । यह हमारे लिए गौरव की बात है कि हम इस संसार की सबसे गरिमामय संस्था अर्थात् कलीसिया के सदस्य हैं । परन्तु हमारी भी ज़िम्मेदारी है कि कलीसिया की एकता को बनाकर रखें । सहभागिता को मज़बूत बनाकर रखें । आज जब कलीसिया की एकता और सहभागिता पर प्रहार होते हैं, तो यह कोई साधारण बात नहीं है । यह बहुत गहरी बात है । यह परमेश्वर पर प्रहार है । यह प्रभु यीशु मसीह की देह पर प्रहार है । इस प्रहार को रोकने की ज़िम्मेदारी मेरी और आपकी है । इस संसार में कलीसिया पहाड़ पर बसे हुए उस नगर के समान है, जिसका प्रकाश दूर से दिखाई देता है। इस संसार में कलीसिया ज्योति के समान है । इस संसार में कलीसिया नमक के समान है । निष्कर्ष :- रिले रेस के बारे में आप जानते हैं । रिले रेस में कभी मशाल होती है तो कभी बेटन होता है । दौड़ के समय एक खिलाड़ी उस मशाल को लेता है । अपनी दौड़ पूरी करता है और दूसरे के हाथ में उस मशाल को थमा देता है । आज कलीसिया की मशाल हमारे हाथ में है, जिसे परमेश्वर ने हमें दिया है । परमेश्वर ने हमें यह गौरव प्रदान किया है कि हम इस अद्वितीय कलीसिया के अंग हैं । हम प्रभु यीशु मसीह की देह के अंग हैं । संसार में सबसे महत्वपूर्ण संस्था कलीसिया है । दुनिया की विशिष्टतम संस्था के हम सदस्य हैं । परन्तु इसके साथ गम्भीर और चुनौतीपूर्ण ज़िम्मेदारियां भी जुड़ी हुई हैं । हमें इस ज़िम्मेदारी को बहुत परिपक्वता और गम्भीरता से स्वीकार करते हुए परमेश्वर की योजना को पूरा करना है । हमें उन लोगों तक पहुंचना है जो इस कलीसिया के परिवार से बाहर हैं । ताकि वे भी इसमें शामिल किए जाएं और प्रभु यीशु मसीह के उद्धार का स्वाद चख सकें। परमेश्वर आपको आशीष दे ।