प्रेरितों के काम 21:27-31 परिचय :- जब रिवायवल मीटिंग्स होती हैं, तो उन आत्मिक जागृति सभाआें मेंं यह प्रयास होता है कि हमारे जीवन ईश्वर की निकटता मेंं लाए जाएं । एक बार हम फिर से अपने और परमेश्वर के सम्बन्धों का पुर्नमूल्यांकन कर सकें । परन्तु कुछ समय के बाद हम पाते हैं कि हम वहीं के वहीं हैं । हम बहुत बात करते हैं कि हमारे समाज मेंं जागृति आनी चाहिए, हमें वचन का प्रचार करना चाहिए, हमारे शहर मेंं जागृति आना चाहिए । हमें अपने क्षेत्र मेंं जागृति लाना है, सुसमाचार का प्रचार करना है । प्रभु यीशु मसीह की गवाही देने के लिए अपनी कलीसिया मेंं, अपने जीवनों मेंं जागृति लाने के लिए जिन तरीकों का हम इस्तेमाल करते हैं; वास्तव मेंं वे तरीके ऐसे होते हैं जो सम्भवत: परमेश्वर की ओर से नहीं होते । वे अच्छे तो होते हैं, उचित भी प्रतीत होते हैं । ऐसा लगता है उनसे प्रभाव तो होता है परन्तु बहुत बड़ा कोई काम होता नहींंं । बहुत कुछ अन्तर आता नहींं । पौलुस प्रेरित के विषय मेंं लिखा गया है कि वह जहां-जहां गया वहां दो घटनाएं प्रमुख रूप से हुइंर्। पहली बात, जहां भी पौलुस प्रेरित ने वचन का प्रचार किया, वहां हलचल मच गई, वहां तहलका मच गया । वहां उलट-फेर हो गया, एक बड़ी क्रांति आ गई । दूसरी बात, हम पाते हैं कि लोगों में जागृति आई, बहुत से लोगों ने प्रभु यीशु मसीह के वचन को स्वीकार किया, बहुत से लोगों कीे आत्माएं बचाई गइंर् । इनका वर्णन प्रेरितों के काम नामक पुस्तक मेंं मिलता है । पौलुस प्रेरित के जीवन मेंं देखने पर एक बहुत विचित्र बात सामने आती है कि पौलुस प्रेरित जब क़ैद में होता था तो जागृति आ जाती थी और जब मन्दिर मेंं होता था तो दंगे हो जाते थे । बड़ी अजीब सी बात लगती है कि जागृति का प्रारम्भ तो मन्दिर से होना चाहिए, वचन का प्रकाशन तो मन्दिर से होना चाहिए परन्तु जब पौलुस मन्दिर मेंं जाता था तो वहां दंगे हो जाते थे । प्रेरितों के काम २१:२७-३१ में हम पाते हैं कि यरूशलेम के मन्दिर मेंं पहुंचकर पौलुस प्रचार कर रहा था । वहां आसिया के बहुत से लोग थे। आसिया वह स्थान था जहां पौलुस प्रेरित ने सेवकाई की थी, कलीसिया की स्थापना की थी । मन्दिर में जब उन्होंने पौलुस को देखा तो लोगों को उसके विरोध मेंं भड़काया । वहां एक बड़ी हलचल मच गई, एक बड़ा तहलका मच गया । लोग आने लगे और दौड़-दौड़कर उस स्थान पर एकत्रित होने लगे । वहां पौलुस ने एक बड़े सताव का सामना किया। पौलुस और सीलास मार्ग पर जा रहे थे । उन्होंने पाया कि एक युवती थी जिसमेंं भविष्य बताने वाली आत्मा थी । वह युवती दुष्टात्मा से ग्रसित थी। पौलुस ने उसे देखा और उस पर तरस खाया । उसके बाद उस भविष्य बताने वाली आत्मा को उसमेंं से निकाल दिया। वह युवती न सिर्फ्र उस दुष्टात्मा के द्वारा क़ैद थी बल्कि उसके द्वारा अपने स्वामियों के लिए धन कमाने का काम करती थी । उसके स्वामियों ने पौलुस और सीलास को पकड़ लिया और चौक मेंं उनको प्रधानों के पास ले गए । उन्होंने हाकिमों के पास ले जाकर उनसे कहा कि ये लोग जो यहूदी हैं, हमारे नगर मेंं बड़ी हलचल मचा रहे हैं। लोगों की भीड़ ने उनके विरोध मेंं इकट्ठे होकर उन्हें चौराहे पर पकड़ लिया । हाकिमों ने उनके कपड़े फाड़कर उतार डाले और उन्हेंं बेंत मारने की आज्ञा दी । उसके बाद दरोगा ने उन्हेंं बहुत बेंतें लगाइंर्, उनको कोठरी मेंं डाल दिया, और उनके पांव काठ मेंं ठोंक दिए गए । वहां पर बाद में एक बड़ी आत्मिक जागृति आई । लोगों ने प्रभु यीशु मसीह को पहचाना और उसे स्वीकार किया। हमारे जीवनों और परिवारों मेंं वास्तव मेंं आत्मिक जागृति तब नहींंं आती जब हम सुख चैन और शांति से रहते हैं । जब हम सफलता के शिखर पर होते हैं । जब हम सम्पन्नता मेंं होते हैं । जब हम आराम की नींद सोते हैं और चैन से खाते हैं । तब हमारे जीवनों मेंं कोई आत्मिक जागृति आती नहींंं, कोई क्रान्ति आती नहींं। परन्तु यह आत्मिक जागृति और क्रान्ति तब आती है, जब हमारे जीवनों मेंं हलचल मचाई जाती है । जब हमारे जीवनों मेंं कोलाहल होता है । जब हमारे जीवनों मेंं मृत्यु होती है । जब हमारे जीवनों मेंं मृत्यु की छाया से हम गुज़रते हैं, जब हमारे जीवनों मेंं अकेलेपन की घुटन का अहसास होता है । जब हमारे जीवनों मेंं हम पराजित होते हैं, जब हमारे जीवनों मेंं खुद को टूटा हुआ महसूस करते हैं । जिन कन्धों का हमें सहारा होता है, जब वे कन्धे हमसे टूट जाते हैं । हमारे अपने हमसे रूठ जाते हैं । उस समय हमारे जीवनों मेंं परमेश्वर का काम होता है । मसीही कलीसिया का इतिहास यदि हम देखें तो पाते हैं कि मसीही कलीसिया का प्रादुर्भाव वहां हुआ और मसीही कलीसिया वहां सबसे तेज़ी से बढ़ी; जहां उस पर दबाव डाला गया, जहां मसीही अगुवों को मार डाला गया, जहां उनको क़ैद मेंं डाला गया । चीन का उदाहरण हमारे सामने है । चीन की कलीसिया नामक पुस्तक में हम पाते हैं कि वहां बहुत थोड़े से मसीही थे । जब माओत्से तंुग का शासन आया, लाल क्रान्ति आई तो सारे गिरजाघरों पर ताले डाल दिए गए। सारे पादरियों, बिशपों, मॉडरेटर्स को जेल मेंं बन्द कर दिया गया । सब प्रकार की आराधनाआें पर बैन लगा दिया गया । सारी बाइबिल्स को जला डाला गया । जितनी मसीही संस्थाएं थीं उनको बन्द कर दिया गया । परन्तु इन सब के बन्द होने के बाद हम पाते हैं कि सबसे अधिक क्रान्ति और जागृति चीन मेंं इसी दौरान आई । जब माओत्से तंुग का शासन काल समाप्त हुआ तो पता चला कि इस दमन के दौरान, इस लाल क्रान्ति के दौरान, इस पीड़ा के दौरान चीन की कलीसिया न सिर्फ्रदुगनी बल्कि चौगुनी हो गई । हम सोचते हैं कि हमें प्रचार करना है तो लाउडस्पीकर लगाना पड़ेगा, दीवारों पर आयतों को लिखना पड़ेगा, पर्चे बांटना पड़ेंगे, समितियां बनाना पड़ेंगी, बहुत सी चर्चा करनी पड़ेगी । ये बातें ठीक हो सकती हैं, आवश्यक हो सकती हैं, परन्तु वास्तव मेंं परमेश्वर का तरीका कुछ और है तथा मनुष्यों का तरीका कुछ और। सांसारिक रूप से तो हम ऐसा सोचते हैं, परन्तु परमेश्वर के कार्य करने का तरीका कुछ औरहै। १ शमूएल १७:३८ में उस समय का वर्णन है जब दाऊद ने चुनौती स्वीकार की कि वह जाकर गोलियत को नाश करेगा, वह गोलियत से टकराएगा । राजा शाऊल उसको बुलाता है, उसे सम्मानित करता है । लिखा हुआ है कि यह अपने वस्त्र दाऊद को पहना देता है, पीतल का टोप उसके सिर पर रख देता है। अपनी झिलम उसको पहना देता है । लिखा हुआ है कि दाऊद ने उसकी तलवार अपनी कमर में कसी और चलने का यत्न किया । परन्तु दाऊद ने तो उसको न परखा था इसलिए उसने शाऊल से कहा कि इन्हें पहनकर मुझसे चला नहींं जाता क्योंकि मैंने इन्हें नहींंं परखा । सो दाऊद ने उन्हेंं उतार दिया । राजा का तरीका है कि टोप पहन लो, झिलम पहन लो, कवच ले लो, तलवार ले लो और लड़ने के लिए जाओ । परन्तु दाऊद कहता है कि यह वास्तव में सही तरीका नहीं हैं । इस तरीके से मैं युद्ध कर नहींंं सकता। दाऊद बड़ी दीनता और विनम्रता से उन सबको उतार देता है । उसके बाद वह एक नाले में जाता है और पांच पत्थरों को बटोरता है । उन पांच पत्थरों को लेकर, अपने गोफन को लेकर, परमेश्वर के नाम को लेकर, उसकी सामर्थ्य से भरकर, वह जाता है और उस दानव को परास्त कर देता है । एक संसार का तरीका है; टोप का, झिलम का, तलवार का और कवच का । दूसरा परमेश्वर का तरीका है कि उन पांच पत्थरों के द्वारा, एक गोफन के द्वारा, एक चरवाहे के द्वारा, जो परमेश्वर के नाम से उसकी सामर्थ्य मेंं आता है; एक दानव परास्त हो जाता है । पौलुस और सीलास की इस सच्ची घटना (प्रेरितों के काम १६:१९-३५) से चार बातें देखेंगे कि वास्तव मेंं हम जागृति लाने के लिए कैसे तैयारी कर सकते हैं । किन चार बातों से जागृति प्रारम्भ हो सकती है? आत्मिक जागृति कैसे आ सकती है ? १. उनका तरीका सही था :- यह जो सही तरीका था, वह प्रार्थना का तरीका था । जब इतनी हलचल हुई, उनको बेंतें लगाई गइंर्, भीड़ उन पर चढ़ आई, उनके कपड़े फाड़ दिए गए, उनको मारा गया और उन्हेंं बन्दीगृह मेंं डाल दिया गया, तब आधी रात के लगभग पौलुस और सीलास प्रार्थना कर रहे थे । (प्रेरितों के काम १६:२५) आत्मिक जागृति का प्रारम्भ, हमारे जीवनों के परिवर्तन का प्रारम्भ, प्रार्थना से होता है । आत्मिक जागृति का प्रारम्भ, प्रार्थना की शक्ति से होता है । परमेश्वर के वचन मेंं लिखा हुआ है कि तुम्हें मिलता नहींं क्योंकि मांगते नहींं। प्रभु यीशु मसीह कहता है कि मांगोगे तो तुम्हेें दिया जाएगा, ढूंढोगे तो पाओगे, खट-खटाओगे तो खोला जाएगा । पौलुस और सीलास सब प्रकार समस्याआें से घिरे प्रार्थना कर रहे थे। वे जानते थे कि परमेश्वर की कोई योजना है । यहां पर कोई न कोई क्रान्ति आने वाली है, आत्मिक जागृति आने वाली है । कुछ लोग कह सकते हैं कि वे हमारे ही समान लोग थे, जो समस्याआें मेंं पड़ते हैं तो प्रार्थना करते हैं । परन्तु यदि १६ वीं आयत को देखें तो लिखा हुआ है ``जब हम प्रार्थना करने की जगह जा रहे थे ।'' इस घटना के पहले वे प्रार्थना करने की जगह जा रहे थे । प्रार्थना उनके जीवन का प्रमुख अंग था । चाहे सम्पन्नता हो, चाहे सुख-शांति हो, चाहे सब कुछ थमा हो; उस समय भी वे प्रार्थना करते हैं और जब समस्याआें से घिरे हुए हों तब भी प्रार्थना करते हैं । क्या जो लोग प्रार्थना का जीवन जीते हैं, जो घुटनों पर अपनी यात्रा पूरी करते हैं, उन लोगों के जीवन मेंं सताव नहींंं आता ? उनके जीवन मेंं कठिनाई नहींंं आती? उनके जीवन मेंं दर्द और पीड़ाएं नहींंं आतीं ? उनके जीवन मेंं समस्याएं नहींंं आतीं? हम पाते हैं कि पौलुस और सीलास प्रार्थना करने वाले लोग थे । प्रार्थना मेंं उनका विश्वास था । प्रार्थना उनकी गवाही थी । सारी नकारात्मक बातों के दरमियान वे प्रार्थना कर रहे थे । २५ वीं आयत मेंं लिखा हुआ है कि मध्य रात्रि, आधी रात के लगभग वे प्रार्थना कर रहे थे । हमारे जीवन के सबसे अन्धकार का जो समय होता है, उसमेंं प्रार्थना करना आवश्यक है । किसी ने लिखा है क्तऱ् रूक् छल्ख्ल्ड्ड ऱ्द्भद्भ श्वीड्डब ऱ्द्भ ढ्यड्डीए. जब जीवन की मध्यरात्रि हो, जब हमें ऐसा लगे कि अन्धेरे से हम घिर गए हैं, चारों तरफ अन्धेरा है, सुबह की कोई किरण नहींंं तो हमें वास्तव मेंं प्रार्थना करना है । प्रभु यीशु मसीह के जीवन मेंं भी प्रार्थना का बहुत महत्व था । जब प्रभु यीशु मसीह ने प्रार्थना की तो आंधी थम गई, तूफान शान्त हो गया, रोगी चंगे हो गए, मृतक जिलाए गए । यहां तक कि क्रूस पर लटके हुए भी प्रभु यीशु मसीह ने प्रार्थना की । क्रूस पर लटके हुए उसके जीवन के अन्तिम शब्द भी एक प्रार्थना ही थी जब उसने कहा - ``हे पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों मेंं सौंपता हूं ।'' हमारे लिए जो बात है वह यह कि प्रार्थना की शक्ति को परखिए, प्रार्थना की शक्ति को चखिए, प्रार्थना की शक्ति का अहसास कीजिए। दिन भर मेंं कम से कम पांच मिनट का समय अवश्य निकालिए और प्रार्थना कीजिए। पतरस जेल में डाल दिया गया और जब वह प्रार्थना कर रहा था तो वह स्थान हिल गया । जब हम प्रार्थना करते हैं तो हमारे जीवन भी हिलाए जाते हैं, वे समस्याएं भी हिलायी जाती हैं, वे काल कोठरियां भी हिलायी जाती हैं । मई १९८६ की घटना है (सम्भवत: वह २१ मई का दिन था) । महाराष्ट्र के नागपुर जिले के रामटेक नामक स्थान पर बड़ी संख्या में ऐसे लोग एकत्र होने वाले थे जिनका यह कहना था कि वे भारत में मसीही संस्थाआें, अस्पतालों, अगुवों, पासबानों और मसीही सेवकों को समाप्त कर देंगे । वे लोग वहां इकट्ठा होकर इस बात की शपथ लेने वाले थे । इस आयोजन के लिए देशव्यापी अभियान चलाया गया था । लगभग पौने दो लाख लोगों के वहां पर इकट्ठा होने की सम्भावना थी । उस आयोजन के लिए बड़ी तैयारी की गई। नागपुर के टेन्ट हाऊसेस से टेन्ट और शामियाने और कुर्सियां मंगवाई गइंर् । लगभग १ लाख लोगों के बैठने के लिए कुर्सियों की व्यवस्था की गई । ७५ हज़ार लोगों के बैठने के लिए दरियां बिछा दी गइंर् । तब दो मसीही प्रचारकों को यह बात पता चली और उन्होंने विचार किया कि वे क्या कर सकते हैं । उन्होंने कहा कि हम इस बात के लिए प्रार्थना करेंगे । उन्होंने ई-मेल के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर सबको सूचना भेज दी । राष्ट्रीय स्तर के मसीही अगुवों को इस ई-मेल के मिलने के कुछ घण्टों के अन्दर ही अन्तरराष्ट्रीय स्तर के अगुवों तक यह खबर पहुंचा दी गई । और फिर किसी देश मेंं ८० लाख मसीही, किसी देश मेंं ५० लाख और ऐसा करके बहुत से मसीही देशों के लाखों मसीही इस दिन के लिए प्रार्थना करने लगे । उसके बाद वह तारीख जब आई तो उस दिन सुबह ५ बजे से ही बहुत तेज़ आंधी चली और तूफान चला । बहुत तेज़ी से बादल गरजने लगे, काली घटाएं घिर आइंर् और ऐसा तूफान आया, ऐसी मूसलाधार बारिश हुई जैसी कि वहां के इतिहास मेंं पहले कभी नहींंं हुई थी । सारा पंडाल टूटकर बिखर गया । शामियाने हवा में उड़ गए । कुर्सियां चकनाचूर होकर बह गइंर् और सारा का सारा आयोजन तहस-नहस हो गया । जब ये दोनों मसीही प्रचारक उस स्थान को देखने के लिए गए तो पता चला कि एक भी व्यक्ति उस दिन वहां मौजूद नहींंं था । यहां तक कि जो आयोजक थे वे भी मौजूद नहींं थे। यह प्रार्थना की शक्ति है जो हमारे जीवनों को हिलाती है । यह प्रार्थना की ताकत है जो हमारे जीवनों को हिलाती है । यह प्रार्थना की ताकत है, यह परमेश्वर की ताकत है । इस पर हम विश्वास करें तो द्वार खोले जाएंगे, चट्टानें तोड़ी जाएंगी, भुइंर्डोल होगा और सुसमाचार प्रचार का कार्य हो सकेगा । २. उनका चिन्तन और व्यवहार सही था :- २५ वीं आयत को ही देखें तो पाते हैं कि आधी रात के लगभग पौलुस और सीलास प्रार्थना करते हुए परमेश्वर के भजन गा रहे थे । बड़ी अजीब सी बात लगती है कि वे नाराज़ नहींंं थे, वे शिकायत नहींं कर रहे थे, वे अपने आपको कोस नहींंं रहे थे । वे परमेश्वर से पूछ नहींं रहे थे कि परमेश्वर हमारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है । परन्तु वे भजन गा रहे थे । वे बड़े आनन्दित थे, वे बड़े उत्साह से भरे हुए थे । उन्होंने परमेश्वर की बुलाहट को माना था (प्रेरितों १६:९-११) । जब स्वर्गदूत ने स्वप्न मेंं दर्शन दिया तो पौलुस मकिदुनिया की ओर चला गया । उसने अपनी कमर कसी और दर्शन पाकर, जो बुलाहट परमेश्वर ने उसको दी थी, उसके अनुसार उसने किया। वे बहुत सी आत्माआें को जीत रहे थे (१४-१५ आयत) । वे प्रार्थना करने वाले लोग थे। वे प्रार्थना करने जा रहे थे (१६ आयत) । उन्होंने दुष्टात्मा से ग्रसित एक युवती को मुक्त कराया था। वे तो परमेश्वर के कार्य मेंं लगे थे । वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल रहे थे । वे तो परमेश्वर की योजना के अनुसार जी रहे थे । उसको प्रसन्न करने के लिए वे उसकी सेवा मेंं लगे हुए थे । वे परमेश्वर के आदेशों को पूरा कर रहे थे । फिर भी उनके जीवनों मेंं सताव आया ? यदि हम परमेश्वर के पीछे चलने वाले लोग हैं, उस पर विश्वास करने वाले लोग हैं, और जब नकारात्मक परिस्थितियां हमारे जीवन मेंं आती हैं तो हम अकसर प्रश्न करते हैं कि परमेश्वर, मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ? हम तो सही हैं फिर हमेंं इस समस्या का सामना क्यों करना पड़ा ? ऐसा क्यों होता है कि अधर्मी धर्मी पर राज्य करता है ? ऐसा क्यों होता है कि बुराई अच्छाई पर प्रबल हो जाती है ? हम तो धर्मी हैं, हम तो तेरे भक्त लोग हैं, फिर हमारे सामने ऐसी बातें क्यों आइंर् ? उनका जो फोकस था, उनका जो ध्यान था वह अपने जीवन की समस्याआें की ओर नहींंं था वरन् निरन्तर परमेश्वर की ओर लगा हुआ था । उन सब नकारात्मक बातों के बावजूद भी वे भजन गा रहे थे । वे यह नहींंं सोच रहे थे कि वे क्या कर सकते हैं बल्कि वे यह सोच रहे थे कि परमेश्वर क्या कर सकता है । वे जानते थे कि परमेश्वर इतना सामर्थी है कि वह उन्हें छुड़ाएगा । परमेश्वर ने जो सताव भेजा है, उसमेंं भी उसका प्रयोजन है । न सिर्फ्रहमारा तरीका प्रार्थना का होना होना चाहिए परन्तु व्यवहार भी सकारात्मक होना चाहिए । हमारा ध्यान अपनी समस्याआें से हटकर परमेश्वर की ओर लगना चाहिए । यह नहींं कि मैं क्या कर सकता हूं या नहींंं कर सकता, मैं किन परिस्थितियों मेंं घिरा हुआ हूं; परन्तु यह कि परमेश्वर क्या कर सकता है, परमेश्वर की क्या योजना है ? ३. वे सही स्थान पर थे :- कुछ लोग कहेंगे कि बड़ी अजीब सी बात है कि वे सही स्थान पर थे । वे तो क़ैद मेंं थे, उनको बेंतें लगी थीं । वे तो सही स्थान पर नहींंं थे । संसार की दृष्टि मेंं वे ग़लत स्थान पर थे । यदि हममेंं से किसी को जेल हो जाए तो क्या होता है ? कभी हमारे घर पुलिस आ जाए तो हम घबरा जाते हैं । हम कहते हैं कि हमारे बाप-दादाआें ने भी कभी कोर्ट-कचहरी का मुंह नहींंं देखाथा । हम सोचते हैं कि अगर कोई कचहरी मेंं खड़ा है तो वास्तव मेंं वह कुकर्मी और अधर्मी है । कोई क़ैद मेंं चला जाए तो हम कहते हैं कि इसके पाप का घड़ा फू ट गया । अब देखो, जो कुछ किया है वही भर रहा है । परन्तु वे क़ैद मेंं थे और वे सही स्थान पर थे । वे सही स्थान पर इस सन्दर्भ मेंं थे कि वे वहां परमेश्वर की योजना के अन्तर्गत थे । वे सही स्थान पर थे क्योंकि उनका सम्बन्ध परमेश्वर से सही था । वे परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर रहे थे । उनका ध्यान परमेश्वर की ओर लगा हुआ था । वे जानते थे कि परमेश्वर की योजना के अनुसार अगर वे क़ैद में भी हैं तो सही स्थान पर हैं । दानिय्येल को सिंहों की मांद मेंं डाल दिया गया । संसार की दृष्टि मेंं तो यह दण्ड था क्योंकि दानिय्येल तो ग़लत स्थान पर था । परन्तु परमेश्वर और स्वयं अपनी दृष्टि मेंं दानिय्येल सही स्थान पर था क्योंकि वह परमेश्वर की योजना मेंं था । उसने प्रार्थना की। एक आश्चर्यकर्म हुआ और सिंहों के मुंह बन्द हो गए । एलिय्याह के विषय में लिखा है कि वह एक महान व्यक्ति था और यही एलिय्याह करीत के नाले में दो वर्षों तक छुपा रहा । बड़ी अजीब सी बात लगती है कि यह परमेश्वर की कैसी योजना है कि दो साल तक करीत के नाले मेंं एलिय्याह छुपा हुआ था । करीत का नाला सूख गया। वहां बहुत गरमी पड़ती थी और एलिय्याह को वहां पर छुपे हुए एक-दो दिन नहीं, दो-चार हफ्ते नहीं, चंद महीने नहीं बल्कि दो साल बीत गए । तब तक परमेश्वर की कोई आवाज़ उसको सुनाई नहींं दी । वह प्रार्थना करता रहा और करीत के नाले मेंं छिपा रहा । परन्तु हम पाते हैं कि एलिय्याह का उस सूखे करीत के नाले मेंं ठहरे रहना भी परमेश्वर की योजना का एक अंग था। शदरक, मेशक और अबेदनगो को सज़ा दे दी गई कि आग मेंं उन्हें जला दिया जाए। संसार की दृष्टि से वे ग़लत स्थान पर थे परन्तु परमेश्वर की दृष्टि से, उसकी योजना के अनुसार वे सही स्थान पर थे ताकि वहां से परमेश्वर के नाम की गवाही हो । पौलुस क़ैद मेंं था, हम कहते हैं कि वह ग़लत स्थान पर था । यूसुफ को बंधुवा बना दिया गया, जेल में डाल दिया गया, हम सोचते हैं कि वह ग़लत स्थान पर था। प्रभु यीशु मसीह को क्रूस पर चढ़ा दिया गया । जो निष्पाप था उसे क्रूस पर चढ़ाकर मृत्यु दण्ड दे दिया गया । सांसारिक न्याय की दृष्टि से वह ग़लत स्थान पर था । हमारी दृष्टि से हम सोचते हैं कि वह ग़लत स्थान पर था । परन्तु परमेश्वर की योजना के अन्तर्गत ही वह क्रू स भी था । इसीलिए प्रभु यीशु मसीह सही स्थान पर था । पौलुस क़ैद में न होता तो आज उसकी पत्रियां हमारे बीच मेंं नहींं होतीं । उसकी लेखनी से जितने जीवन बदले जा रहे हैं शायद उतना सम्भव नहींंं हो पाता । हमारे स्थान मेंं यदि गड़हा भी है, यदि शेरों की मांद भी है, अगर हमारे जीवन में आग भी लिखी हुई है, अगर हमारे जीवन मेंं क़ैद भी लिखी हुई है, अगर हमारे जीवन में कोड़ों और बेंतों का सहना भी लिखा हुआ है; और अगर हम परमेश्वर की योजना के अन्तर्गत हैं तो हम सही स्थान पर हैं । जब हम पीड़ा में होते हैं, जब हम मृत्यु की छाया मेंं होते हैं, जब हम कठिनाइयों में होते हैं, जब हम त्रासदियों से गुज़रते हैं, तब हमारी गवाही सबसे सशक्त और प्रभावशाली होती है। वे सही स्थान पर थे, क्योंकि यह परमेश्वर की योजना थी । ४. उनके पास सही सन्देश था :- उनके जीवनों से गवाही हो रही थी वे प्रार्थना कर रहे थे और भजन गा रहे थे । दूसरे क़ैदी देख रहे थे कि ये कैसे विचित्र लोग हैं । जब भुइंर्डोल हुआ और वहां के दरवाज़े खुल गए तो पौलुस और सीलास वहां से भागे नहींंं बल्कि उस स्थान पर खड़े रहे । जब दरोगा अपने आपको सामाप्त करना चाहता था, आत्महत्या करना चाहता था यह सोचकर कि क़ैदी भाग गए तब पौलुस ने उसको ऐसा करने से रोका। ३१ वीं आयत मेंं वह कहता है कि प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा । फिर उन्होंने दरोगा और उसके घर के सब लोगों को प्रभु का वचन सुनाया । रात को उसी घड़ी दरोगा ने उन्हें ले जाकर उनके घाव धोए और अपने घराने समेत तुरन्त बपतिस्मा लिया। वहां एक क्रान्ति आ गई, एक जागृति आ गई । दरोगा और उसके घराने ने प्रभु यीशु मसीह को स्वीकार कर लिया और उन्होंने परमेश्वर का सन्देश सुना । पौलुस और सीलास के पास सही सन्देश था । उन्होंने कहा कि प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा । अपने जीवनों से हम क्या सन्देश दे रहे हैं ? ज़रूरी नहींं कि हम पुलपिट पर खड़े होकर सन्देश दें । परन्तु हमारे परिवार के लोगों पर, हमारी पत्नी पर, हमारे पति पर, हमारे बच्चों पर; हम कौन सा सन्देश छोड़कर जा रहे हैं ? अपने प्रियों पर, अपने सहकर्मियों पर, अपने घर आए मेहमानों पर, अपने बच्चों पर कौन सा सन्देश है जो हमारे जीवन से प्रसारित हो रहा है ? कभी आपने सोचा कि जब आप इस संसार से चले जाएंगे तो लोग आपके विषय मेंं क्या कहेंगे ? हो सकता वे कहें कि आप बहुत अच्छे शिक्षक रहे, आप बहुत अच्छी शिक्षिका रहीं । हो सकता है बच्चे कहें कि पापा बहुत प्यार करने वाले थे, मां बहुत प्यार करने वाली थीं । मां ने हमें शिक्षा दी, हमें पढ़ाया । या फिर हो सकता कि यह कहें कि हमारे पिता बहुत क्रोध करने वाले थे, हमें अनावश्यक मारते थे । हम कैसा सन्देश और कैसा स्मारक अपने जीवन मेंं छोड़ जा रहे हैं ? कौन सी गवाही हमारे जीवनों से हो रही है ? यहूदा के विषय मेंं हमने बहुत सी बातें सुनी हैं । यहूदा के विषय मेंं हम पाते हैं कि उसने जो सन्देश छोड़ा, उसके जीवन की जो गवाही है, वह यह कि उसने प्रभु यीशु मसीह को पकड़वा दिया। उसके जीवन से जो सन्देश जाता है वह अधूरे समर्पण का है । प्रभु यीशु मसीह से अधूरे प्रेम का है । अधूरी शिष्यता, अधूरे विश्वास और अधूरे पश्चात्ताप का है । अन्त मेंं जब यहूदा ने पश्चात्ताप किया तो ऐसा लगता है कि उसको सिर्फ्र पछतावा हुआ । उसने पश्चात्ताप नहींं किया । वह उन तीस चांदी के सिक्कों को फेंककर आ गया और उसने कहा कि मैंने धर्मी व्यक्ति, सही व्यक्ति का लहू बहाकर अपराध किया है । तब उसने अपने जीवन का अन्त कर लिया । लोगों ने कहा कि इन तीस चांदी के सिक्कों को यहां रखना ठीक नहींंं है, ये तो अधर्म की कमाई है, यह तो लोहू की कमाई है, यह तो निर्दोष के लोहू का मोल है । उसके बाद उन तीस चांदी के सिक्कों से एक खेत खरीद लिया गया । एक कुम्हार का खेत; जिसको लोहू का खेत कहते हैं । वह लोहू का खेत क्यों कहलाया ? इसलिए कि जो लावारिस लाशें शहर मेंं पड़ी रहती हैं, उनको वहां दफना दिया जाए । यहूदा अपने जीवन मेंं अधूरे पश्चात्ताप का, अधूरे प्रेम का, अधूरी शिष्यता का, अधूरे विश्वास का स्मारक छोड़कर गया । यहूदा ने स्मारक छोड़ा, उस लोहू के खेत का, कुम्हार के खेत का; जहां लावारिस लाशों को दफनाया जाता था । हम अपने जीवन मेंं चाहें न चाहें पर कोई न कोई सन्देश दे रहे हैं अपने परिवार के लोगों को, अपने समाज के लोगों को, अपने सहकर्मियों को, अपने मित्रों को, अपने बच्चों को, अपनी कलीसिया के लोगों को । हम कैसा सन्देश दे रहे हैं ? क्या हमारे पास सही सन्देश है ? क्या हमारे जीवनों से प्रभु यीशु मसीह का प्रेम, उसका विश्वास मुखरित होता है ? कौन सा स्मारक छोड़ रहे हैंहम ? प्रेम का स्मारक या क्रोध का स्मारक, क्षमा का स्मारक, सेवा का स्मारक । या फिर नशे का स्मारक, धोखे का स्मारक, चोरी का स्मारक? किन बातों से लोग हमें याद रखेंगे ? निष्कर्ष :- यदि हमें आत्मिक जागृति लाना है तो इन चार बातों पर हमें गौर करना पड़ेगा। पहली बात - हमारा तरीका सही हो । हम प्रार्थना की शक्ति पर विश्वास करें । आत्मिक जागृति मसीहियों से प्रारम्भ होती है और उसके बाद ग़ैर मसीहियों में जाती है । इस बात का हमें ध्यान रखना है कि आत्मिक जागृति हमसे प्रारम्भ होगी। आग कहीं तो लगनी होगी । क्योंकि जब आग लगेगी तब ही उसका प्रकाश दूसरों तक पहुंचेगा। इसका प्रारम्भ तो हमसे ही होना है और इसके लिए जो सही तरीका है वह प्रार्थना का तरीका है । दूसरी बात - हमारी सोच और हमारा चिन्तन सही होना चाहिए। वह परमेश्वर की ओर फोकस्ड होना चाहिए । अपने जीवन की असफलताआें, अपने जीवन की सीमाआें और अपने जीवन की पराजयों पर नहींं परन्तु परमेश्वर की ओर हमारा फोकस होना चाहिए। यह सम्भव नहींं कि हम स्वयं से कुछ कर सकें । परमेश्वर कर सकता है । हम नहींं कर सकते । मैं नहींं कर सकता । परन्तु परमेश्वर कर सकता है । प्रार्थना करें । प्रयास करें। हमारा सही चिन्तन हो । तीसरी बात - हम सही स्थान पर हों । सही स्थान से मेरा तात्पर्य है कि क्या हम परमेश्वर की योजना के अन्तर्गत चल रहे हैं ? क्या परमेश्वर हमारे जीवनों से प्रसन्न है ? चौथी बात - हमारे पास सही सन्देश हो । क्या हमारे पास सही सन्देश है? सही गवाही है ? सही व्यवहार है ? अगर हमारे जीवन मेंं ये बातें होंगी तो हम अपने जीवनों से, अपने परिवारों में, अपनी कलीसियाआें में, अपने समाज में और सारे क्षेत्र में क्रान्ति ला सकेंगे । प्रभु यीशु मसीह के प्रकाश को रोशन कर सकेंगे । बहुत सी आत्माआें को बचा सकेंगे। और तब ये त्योहार जो आते हैं ये मात्र परम्पराआें को पूरा करना नहींंं रहेंगे परन्तु वास्तव मेंं आत्मिक जागृति की वह चिंगारी होंगे जो आग की लपटों मेंं परिणित होगी और दूर- दूर तक फैलेगी और बहुत से लोग प्रभु यीशु मसीह को जान सकेंगे । परमेश्वर आपको आशीष दे ।