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अन्धकार के उपहार

लूका 17:11-19

परिचय :- इस घटना का वर्णन हमने अनेक बार सुना है कि किस प्रकार प्रभु यीशु मसीह ने दस कोढ़ियों को चंगाई दी । इन दस कोढ़ियों में से एक वापस आता है और प्रभु यीशु मसीह को धन्यवाद देता है । उसकी महिमा करता है । प्रभु यीशु मसीह उसे विशेष आशीष देता है और उससे कहता है कि जा, तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है ।

हम देखेंगे कि इन कोढ़ियों से हमको क्या शिक्षा मिलती है । परमेश्वर का वचन महान है । उसमें सामर्थ्य है । यह वचन छोटी-छोटी बातों से हमको शिक्षा देता है । जो बातें संसार की दृष्टि में छोटी हैं और गिनी भी नहीं जातीं, उन बातों से परमेश्वर हमको शिक्षा देता है । महत्वहीन लोग, महत्वपूर्ण बन जाते हैं, जब वे परमेश्वर की योजना के अंग बनते हैं । जब उनका मिलन प्रभु यीशु मसीह से होता है, जब वे प्रभु यीशु मसीह के उद्धार को स्वीकार करते हैं ।

लूका 17:11-12 में लिखा है - ``और ऐसा हुआ कि वह यरूशलेम को जाते हुए सामरिया और गलील के बीच से होकर जा रहा था । और किसी गांव में प्रवेश करते समय उसे दस कोढ़ी मिले'' ।

यह किसी छोटे से गांव की घटना है । एक ऐसी महत्वहीन जगह जिसके नाम का भी उल्लेख नहीं किया गया । प्रभु यीशु मसीह इस छोटे से अन्जान गांव से होकर गुज़रता है और वह महत्वहीन जगह महत्वपूर्ण बन जाती है । बैतलहम का गौशाला और चरनी दुनिया के लिए महत्वहीन है परन्तु प्रभु यीशु मसीह उस महत्वहीन जगह में जन्म लेता है । वह बैतलहम की चरनी सारे संसार व इतिहास का केन्द्र बन जाती है । नासरत जैसी अभिशप्त जगह में यीशु मसीह का लालन-पालन होता है जिसके लिए लोग कहते हैं कि क्या नासरत से भी कोई अच्छी वस्तु निकल सकती है ? ऐसी अभिशप्त जगह नासरत से जगत का उद्धारकर्त्ता निकलता है । गुलगुता की पहाड़ी, जो शापित है, जो अन्धकार से पूर्ण है, जहां पर हत्यारों और व्याभिचारियों को क्रूस पर लटकाकर, उन्हें मृत्युदण्ड दिया जाता है । उस गुलगुता की पहाड़ी पर प्रभु यीशु मसीह को क्रूस पर चढ़ाया जाता है । उसके बाद प्रभु यीशु मसीह तीन दिन के बाद मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है, उसका पुनरुत्थान होता है। अंधकार से भरी शापित गुलगुता की पहाड़ी जैसी महत्वहीन जगह, महत्वपूर्ण बन जाती है, क्योंकि प्रभु यीशु मसीह की सलीब वहां पर है ।

लैव्यव्यवस्था 13:45-46 में लिखा है - ``और जिस में वह व्याधि हो उस कोढ़ी के वस्त्र फटे और सिर के बाल बिखरे रहें, और वह अपने ऊपरवाले होंठ को ढांपे हुए अशुद्ध,अशुद्ध पुकारा करे । जितने दिन तक वह व्याधि उस में रहे उतने दिन तक वह तो अशुद्ध रहेगा; और वह अशुद्ध ठहरा रहे; इसलिए वह अकेला रहा करे, उसका निवास स्थान छावनी के बाहर हो'' ।

कोढ़ी महत्वहीन लोग माने जाते हैं, शापित लोग माने जाते हैं । उन दिनों में लोग समझते थे कि कोढ़ की बीमारी व्यक्ति के पापों का परिणाम है । उन्होंने कुछ पाप ऐसे किए होंगे जिनकी वज़ह से उनको कोढ़ हो गया । परन्तु यह बात वास्तव में ग़लत थी ।

जक्कई जैसा महत्वहीन व्यक्ति जो लेना जानता था, लोगों को ठगना जानता था, जब प्रभु यीशु मसीह से मिलता है तो महत्वपूर्ण हो जाता है । जो लेने वाला था वह देने वाला बन जाता है। जो धोखा देने वाला था वह आशीष का कारण ठहरता है । सामरी स्त्री एक व्यभिचारणी स्त्री थी, जो दुनिया की दृष्टि में नगण्य थी, जो दुनिया की दृष्टि में कलंकित थी; जब प्रभु यीशु मसीह से मिलती है; जब उसे समझती है, उसे स्वीकारती है तो वह प्रचारिका बन जाती है । संसार में उसका एक आदरणीय स्थान हो जाता है । आज भी संसार में बहुत से ऐसे लोग हैं, ऐसे स्थान हैं, जिन्हें दुनिया महत्वहीन समझती है । जिनका समाज में कोई स्थान नहीं है । परन्तु जब वे प्रभु यीशु मसीह से मिलते हैं, उसको समझते हैं, उसके चरणों में अपना समर्पण करते हैं, तो वे परमेश्वर की दृष्टि में महत्वपूर्ण हो जाते हैं । वे परमेश्वर की महत्वपूर्ण योजना का अंग बन जाते हैं । बैतलहम की चरनी, बैतलहम गांव, नासरत नगर और गुलगुता की पहाड़ी जैसे सामान्य छोटे-छोटे स्थान मसीही इतिहास की राजधानियां बन जाते हैं ।

इन महत्वहीन से दस कोढ़ियों के जीवन से जो शिक्षाएं मिलती हैं, हम उन पर विचार करेंगे।

1. निराशाजनक स्थिति में भी उन्होंने अपना प्रयास जारी रखा :- दुनिया में ऐसी कोई सदी नहीं हुई, ऐसा कोई समय नहीं हुआ जबकि लोगों को असाध्य रोग नहीं हुए । हर समय, हर सदी, और हर दशक में ऐसे रोग हुए हैं जो लाइलाज थे । बाइबिल में कोढ़ के विषय में बहुत प्रारम्भ से ही वर्णन है । जिसे कोढ़ हो जाता था, वह समझ जाता था कि अब कोई उपचार सम्भव नहीं है । अब धीरे-धीरे मृत्यु आ जाएगी । मृत्यु होना निश्चित है । पिछले दिनों में ट्यूबरक्लोसिस की बीमारी का पता चला। जिसका कोई इलाज नहीं था । वर्षों तक लोग इस बीमारी से मरते रहे। आज हम कैंसर और एड्स जैसे घातक रोगों के विषय में सुनते हैं। आज भी ऐसे रोग हैं जिनका कोई इलाज नहीं । हो सकता है कि आने वाले समय में कोई ऐसी दवा ईजाद हो जिससे कि उस रोग का इलाज हो सके । कहने का तात्पर्य यह है कि संसार में हर समय ऐसे रोग हुए हैं जो लाइलाज थे ।

उन दिनों मे कोढ़ की बीमारी बड़ी घृणित बीमारी मानी जाती थी। व्यक्ति को घर से अलग कर दिया जाता था । आप समझ सकते हैं कि कितनी भावनात्मक पीड़ा से वह व्यक्ति गुज़रता होगा । उसको अपने सारे सम्बन्धों से अलग होकर, अपने परिवार के लोगों से अलग होकर, अपने प्रिय लोगों, अपनी पत्नी, अपने बच्चों, अपने माता-पिता और अपने कार्य से अलग होकर जीवन बिताना पड़ता था । सम्भवत: कई ऐसे रोगी भी होते होंगे जो युवा हों । जिन पर उनके घर के लोग आश्रित हों । परन्तु कोढ़ की बीमारी हो गई इसलिए व्यवस्था के अनुसार उन्हें अपने घर के लोगों से अलग रहना पड़ा । ऐसी स्थिति में उन्हें वहां रहना पड़ा जहां कोई आशा नहीं है। उन्हें सिर्फ्र मौत का इन्तज़ार था, क्योंकि उन दिनों कोढ़ का कोई इलाज नहीं था ।

परन्तु इन कोढ़ियों ने अपनी आशा नहीं छोड़ी थी । वे निरन्तर प्रयास कर रहे थे । उन्होंने अपने दिल को छोटा नहीं किया था । उन्होंने आत्महत्या की ओर कदम नहीं उठाया था । उन्होंने किसी निराशा को अपने ऊ पर हावी होने नहीं दिया था। इसीलिए जब भी वे किसी चंगाई के विषय में सुनते, कोई सम्भावना उन्हें नज़र आती थी कि शायद वे शुद्ध किए जा सकते हैं, उन्हें चंगाई मिल सकती है, वे उस दिशा में प्रयासरत हो जाते थे ।

यह बात आज भी लागू होती है । जब संसार के दृष्टिकोण से अन्त नज़र आता हो तो वहीं से परमेश्वर का नया प्रारम्भ हो जाता है । जब संसार के दृष्टिकोण से सब कुछ निराशा से भरा हो तो परमेश्वर की आशा वहां पर उपलब्ध होती है । इसीलिए पौलुस प्रेरित कहता है कि जब-जब मैं निर्बल होता हूं तब-तब उसकी सामर्थ्य मुझ पर बलवान होती है । जब-जब मैं निर्बल और असहाय होता हूं तब-तब उसकी सामर्थ्य का अहसास करता हूं।

हमारे जीवनों में भी ऐसा ही होता है । परमेश्वर की उपस्थिति का अहसास हमें अपने जीवन के पर्वत शिखरों पर नहीं होता । परमेश्वर के महान कार्य, उसकी योजना का अहसास हमें अपने जीवन में सफलता के पर्वत शिखरों पर नहीं होता । परन्तु उसकी योजना, उसकी बुलाहट और उसकी महानता का अहसास तब होता है जब हम अपने जीवन में तराइयों से होकर गुज़रते हैं । जब हम त्रासदियों से गुज़रते हैं । जब हम निराशा के अन्धकार में होते हैं । जब मृत्यु की छाया हमारे परिवारों पर होती है तब हमें परमेश्वर की उपस्थिति, उसकी महानता और उसकी सामर्थ्य का अहसास होता है ।

भजनकार भजन संहिता 116:6 में लिखता है - ``जब मैं बलहीन हो गया था, उस ने मेरा उद्धार किया''।

बाइबिल में हम मूसा के विषय में पाते हैं । अपने जीवन के पहले 40 वर्षों तक वह महल में रहा परन्तु राजमहल में उसको परमेश्वर की बुलाहट नहीं हुई । उसके बाद अगले 40 वर्ष मूसा ने बियाबान में अपने ससुर की भेड़-बकरियों को चराते हुए बिताए । उन 40 वर्षो में परमेश्वर ने मूसा को संसार के एक महान कार्य के लिए तैयार किया। परमेश्वर ने उसको राजमहल में नहीं चुना क्योंकि वहां मूसा सोचता था कि मैं भी कुछ हूं । परमेश्वर ने मूसा को उस बियाबान में भेड़-बकरियों कोचराते समय, उसके जीवन की तराई में चुना और तैयार किया कि वह राजा के सामने यह जाकर कह सके कि मेरे लोगों को जाने दो।

रोमियों 5:6 में लिखा है - ``क्योंकि जब हम निर्बल ही थे, तो मसीह ठीक समय पर भक्तिहीनों के लिये मरा'' ।

जब पापों की क्षमा का कोई दूसरा रास्ता नहीं था, जब हम निर्बल थे, जब हम स्वयं अपने उद्धार को अर्जित करने में सक्षम नहीं थे; तब ऐसी निर्बलता की स्थिति में प्रभु यीशु मसीह भक्तिहीनों के लिए मरा । इसलिए पहली शिक्षा इन कोढ़ियों से यह मिलती है कि जब हमारे जीवन में निराशा हो, जब हमारे जीवन में त्रासदी हो, जब हम अपने जीवन के पर्वत शिखरों से उतरकर तराइयों का अनुभव करें; उस समय परमेश्वर का काम हमारे सामने हो और उसकी सामर्थ्य को हम समझें । हम निराश न हों । क्योंकि जब-जब हम निर्बल होते हैं, परमेश्वर की सामर्थ्य हम में बलवान होती है । जीवन में निराशाओं को अन्त न समझें । क्योंकि हो सकता है कि हमारे जीवन की निराशा संसार के लिए अन्त हो परन्तु परमेश्वर के लिए एक नया प्रारम्भ हो ।

2. जीवन की त्रासदियां हमें अपनों के और निकट लाती हैं :- जीवन में जब त्रासदियां आती हैं, जब समस्याएं और निराशाएं आती हैं तो हम सब एक हो जाते हैं । ये दस कोढ़ी थे और सब एक साथ थे । कोढ़ की बीमारी ने उनको समाज से अलग कर दिया था, अपने लोगों से अलग कर दिया था । परन्तु वे जानते थे कि अकेले रहकर हम टूट जाएंगे, इसीलिए एक साथ हो गए । उनकी बीमारी उन्हें एक-दूसरे की निकटता में ले आयी। वे एक साथ चलने लगे । एक साथ प्रयास करने लगे। एक दूसरे के हितों की चिन्ता करने लगे ।

हमारे जीवन में जब त्रासदियां और निराशाएं आती हैं, जब हम मृत्यु के अन्धकार से भरी हुई तराई से होकर गुज़रते हैं, तो हमें अहसास होता है कि ऐसे समय में हम अपने लोगों के बहुत निकट आ गए हैं । जब विरोधी हम पर वार करता है तो परिवार के लोग एक हो जाते हैं । जब हम मृत्यु के निकट होते हैं तो हमें इस बात का अहसास होता है कि किन छोटी-छोटी बातों में हम उलझे हुए हैं । जब हम क़ब्रिस्तान में होते हैं और अपने प्रिय की अन्तिम क्रिया में सहभागी होते हैं तो हमें इस बात का अहसास होता है कि जीवन में जिसे हमने प्राथमिक बना लिया है वास्तव में वह परमेश्वर की दृष्टि में महत्वहीन है । जिन बातों के कारण हम अपने लोगों से सम्बन्धों को तोड़ रहे हैं, जिन बातों के कारण हम आपस में खाई बनाते जा रहे हैं, दीवारें उठाते जा रहे हैं, आपस में द्वेष उत्पन्न कर रहे हैं; उन सबसे कुछ होने वाला नहीं । ये सब व्यर्थ की बातें हैं । प्रमुख वही है जो परमेश्वर की दृष्टिमें प्रमुख है।

प्रेरितों के काम की पुस्तक के पहले अध्याय में एक घटना का वर्णन है । प्रभु यीशु मसीह का स्वर्गारोहण हो चुका था । उसके चेले उसके भाइयों और मरियम के साथ एकचित्त होकर प्रार्थना में लगे रहे । उनके सामने प्रश्न था कि प्रभु यीशु मसीह के स्वर्गारोहण के पश्चात अब कौन अगुवाई करेगा ? अब उन्हें क्या करना है ? ऐसे समय में प्रभु यीशु मसीह की अनुपस्थिति में वे एक मन होकर प्रार्थना में लगे रहे।

यह बहुत साल पुरानी बात है, संसद में त्यागी बिल आया था। वास्तव में यह जो बिल था वह मसीहियत की व्यवहारिकता को रोकता था और प्रभु यीशु मसीह के आदेश को पूरा करने में हमारे लिए बाधक था। ऐसे समय में कलीसियाओं में जो गुटबाज़ी थी, जो राजनीति और अलगाव की बाधाएं थीं; वे सब दीवारें टूट गइंर्। रोमन कैथोलिक्स और प्रोटेस्टेन्ट्स के बीच की दीवार टूट गई और सारे मसीही एक होकर उस बिल के विरोध में सड़कों पर निकल आए । नतीजतन त्यागी बिल संसद में पारित नहीं हो सका ।

आज संसार के 28 देशों में मसीही अगुवों को मारा जा रहा है, चर्च भवनों को जलाया जा रहा है । इण्डोनेशिया में करीब डेढ़ हज़ार कलीसियाओं को जला दिया गया और ऐसे समय में उन्हें जलाया गया जब कि आराधना चल रही थी । मसीही विरोधियों ने चारों तरफ से घेरकर पूरे चर्च भवन को उसमें आराधना कर रहे मसीहियों के साथ जला दिया । बहुत से मुस्लिम देशों में मसीहियत का घोर विरोध किया जा रहा है और मसीहियों को सताव का सामना करना पड़ रहा है ।

किसी लेखक ने अपने लेख में लिखा है कि जितना अधिक सताव आया है उससे मसीहियों में ऐसी एकता देखने को मिली जैसी पहले कभी नहीं देखी गई । अपने आपमें यह एक मिसाल है कि मसीही एक होते जा रहे हैं । सारे भेदभावों को भुलाकर, सारी दीवारों को तोड़कर, सारी खाइयों को पाटकर वे एक- दूसरे के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं । जीवन की त्रासदियां हमको जोड़ती हैं और अपनों के करीब लाती हैं ।

3. इन दस कोढ़ियों को पता था कि एकता में ही उनकी शक्ति है:- ये कोढ़ी जानते थे कि अलग होकर रहेंगे तो घबरा जाएंगे, टूट जाएंगे, निराश होंगे, हताश होंगे । परन्तु यदि एकता से रहेंगे तो एक-दूसरे को प्रोत्साहित करेंगे । एक-दूसरे का ढाढ़स बंधाएंगे। जब एक-दूसरे के साथ मिलकर चलेंगे और कोई गिर जाएगा तो उसे उठा लेंगे । कोई अपंग होगा तो उसको कांधे पर ले जाएंगे । उन्हें पता था कि एकता में बड़ी शक्ति है । उन्हें मालूम था कि सहभागिता में ताकत है ।

नीतिवचन की पुस्तक के तीसवें अध्याय में छोटे जन्तुओं की चर्चा की गई है । जो छोटे तो हैं परन्तु अत्यन्त बुद्धिमान हैं । जिनके द्वारा परमेश्वर हमें शिक्षा देना चाहता है ।

जिन पहले जन्तुओं का ज़िक्र है वे चींटियां हैं । नीतिवचन का लेखक लिखता है चींटियां धूपकाल में अपनी भोजन वस्तुएं बटोरती हैं । चींटियों को समय की पहचान होती है । वे कल की तैयारी आज कर लेती हैं । दूसरा जन्तु शापान है । जिसके लिए वह कहता है कि शापान बड़ी जाति का नहीं होता है परन्तु उनकी मान्दें पहाड़ों पर होती हैं । शापान एक छोटा सा कोमल प्राणी होता है परन्तु उसकी मान्दें पहाड़ों पर होती हैं । क्योंकि वह अपनी कमज़ोरियों को जानता है । वह जानता है कि उसका शरण स्थान क्या है । इस कारण से वह अपनी मान्द के पास रहता है ।

फिर तीसरे जन्तु का ज़िक्र है । यह जन्तु टिडि्डयां हैं । उनके लिए लिखा है कि टिडि्डयों के राजा तो नहीं होता, तौ भी वे सब की सब दल बांध-बांधकर पयान करती हैं । टिडि्डयों का कोई राजा नहीं होता । उन्हें कोई हांकने वाला नहीं होता। उनका कोई अधिकारी नहीं होता परन्तु वे सब दल बांधकर पयान करती हैं । वे जानती हैं कि हमारी शक्ति एकता में है, जहां टिड्डी दल आता है वहां अकाल आ जाता है, भुखमरी आ जाती है।

इसी प्रकार हम सब एक देह के समान हैं। परमेश्वर ने हम सबको भिन्न योग्यताएं दी हैं । हमारे सोचने-समझने का तरीका भिन्न है । परमेश्वर ने हमें भिन्न पदों पर रखा है । परमेश्वर ने भिन्न-भिन्न अधिकार दिए हैं । विभिन्न सेवाएं दी हैं। परन्तु हम सब एक देह के अंग हैं । हमारे काम और हमारी योग्यताएं भिन्न-भिन्न हो सकती हैं । परन्तु वास्तव में हम सब एक देह हैं । प्रभु यीशु मसीह के रक्त के द्वारा हम सब एक परिवार के रूप में जुड़े हुए हैं । सांसारिक रिश्तेदारी से कहीं मज़बूत बन्धन प्रभु यीशु मसीह के रक्त का है, जो हमें जोड़ता है और बांधता है । क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले प्रभु यीशु मसीह ने अपने पीछे चलने वालों के लिए प्रार्थना की। जो सबसे खास बात उस प्रार्थना में थी वह यह कि ``मैं केवल इन्हीं के लिये विनती नहीं करता परन्तु उनके लिये भी जो इन के वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे, कि वे सब एक हों'' (यूहन्ना 17:20) ।

प्रारम्भिक कलीसिया में एकता थी। एक मन होकर वे आपस में जुटते थे । एक साथ मिलकर प्रार्थना करते थे, रोटी तोड़ते थे । एक मन होकर वे भोजन करते थे । उनमें इतनी एकता थी कि उनकी सारी वस्तुएं साझे की थीं । यदि किसी को कोई कमी होती थी तो दूसरा अपनी जायदाद बेचकर उसकी मदद कर देता था । ऐसी बेमिसाल एकता उनमें थी । आज कलीसिया और मसीही समाज में हम एक रहेंगे तो मज़बूत होंगे, शक्तिशाली होंगे । सही दिशा की ओर बढ़ सकेंगे । यदि हम में एकता नहीं होगी तो हम एक दूसरे में उलझ जाएंगे । शैतान हमें भीतर से तोड़ेगा । हम कभी परमेश्वर की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाएंगे । इन कोढ़ियों को इस बात का अहसास था कि एकता में ही शक्ति निहित है ।

4. वे प्रार्थना करना जानते थे :- वे प्रभु यीशु मसीह को देखकर बड़ी दूर से चिल्लाते हैं कि हे स्वामी ! हे यीशु ! वे यीशु के स्वामित्व को स्वीकार करते हुए, बड़ी विनम्रता से उससे प्रार्थना करते हैं कि हे स्वामी ! हम पर दया कर । उनमें प्रार्थना करने की समझ थी। किसी घमण्ड से उन्होंने प्रार्थना नहीं की । वे घमण्ड किस बात का करते ? उन्होंने क्रूस पर चढ़े हुए उस दूसरे डाकू के समान आदेशात्मक लहजे में नहीं कहा कि यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो हमको चंगा कर, अपना आश्चर्यकर्म हम पर प्रगट कर । परन्तु वे कहते हैं - हे स्वामी ! हम पर दया कर। यदि उनसे कोई प्रार्थना की शक्ति के बारे में पूछे कि प्रार्थना क्या अन्तर लाती है तो वे कहते होंगे कि वही अन्तर जो एक मृतक और जीवित में होता है । जो अन्तर एक आशाजनक स्थिति और निराशाजनक परिस्थिति में होता है; वह अन्तर प्रार्थना की शक्ति ला सकती है । ज़मीन और आसमान का अन्तर प्रार्थना की शक्ति ला सकती है । वे प्रार्थना की शक्ति को जानते थे और उसी शक्ति ने उनके जीवनों को शुद्ध किया।

अगर आज संसार में किसी भी बढ़ती हुई कलीसिया को देखें, किसी भी सफल सेवक को देखें तो पाएंगे कि उसके पीछे जो शक्ति है, उसकी ऊ र्जा का जो केन्द्र है, वह प्रार्थना की शक्ति है । वे लोग जो प्रार्थना करते हैं, जो घुटनों पर आते हैं; वे और उनके परिवार आशीषित हैं । क्योंकि उनके पीछे प्रार्थना की शक्ति है ।

5. वे प्रभु यीशु मसीह के प्रति आज्ञाकारी थे : - चौदहवें पद में प्रभु यीशु मसीह उनसे कहता है - ``उसने उन्हें देखकर कहा - जाओ अपने तइंर् याजकों को दिखाओ और जाते ही जाते वे शुद्ध हो गए'' । प्रभु यीशु मसीह ने उनको पहले शुद्ध नहीं किया। उसने ऐसा क्यों किया । उन दिनों में जो नियम था वह यह कि व्यक्ति जब कोढ़ से शुद्ध हो तो याजक के पास जाए । जो विश्वास है वह अनदेखी वस्तुओं का निश्चय और अनदेखी बातों का प्रमाण है। प्रभु यीशु मसीह उन्हें सिखाना चाहता था कि तुम तो अभी भी अशुद्ध हो परन्तु याजक तक जाने की प्रक्रिया तो तुम्हें अभी प्रारम्भ करना है । तुम्हें उस विश्वास की सड़क पर यात्रा प्रारम्भ अभी करना है ।

लैव्यव्यवस्था 14:1-2 में लिखा है - ``फिर यहोवा ने मूसा से कहा, कोढ़ी के शुद्ध ठहराने की व्यवस्था यह है, कि वह याजक के पास पहुंचाया जाए'' । लैव्यव्यवस्था 13:2-3 में भी लिखा हुआ है कि याजक के पास जाना आवश्यक था । यह उन दिनों की व्यवस्था थी । इसीलिए प्रभु यीशु मसीह ने कहा - ``जाओ और जाकर अपने आपको याजकों को दिखाओ'' ।

प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें याजकों के पास जाने के लिए इसलिए कहा क्योंकि इससे उनके विश्वास की परख हो रही थी । हो सकता है कि उनमें से कोई कहता कि पहले शुद्ध तो करो फिर मैं याजक के पास जाऊंगा । अभी तो मैं अशुद्ध हूं । मैं कैसे याजक के पास चला जाऊं। वह यात्रा तो बाद में प्रारम्भ होगी । परन्तु प्रभु यीशु मसीह जानता था कि वे कह तो रहे हैं कि हे स्वामी ! हम पर दया कर । पर क्या वे इस स्वामी के स्वामित्व पर विश्वास करते हैं । अगर उनका विश्वास है तो वे इस यात्रा को अभी से प्रारम्भ कर देंगे । वह यात्रा जो विश्वास की यात्रा है । प्रभु यीशु मसीह ने इसलिए ऐसा कहा क्योंकि वह चाहता था कि यरूशलेम के बीच में, याजकों के बीच में उसकी गवाही हो । वे याजक जो प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाते थे, जो उसका तिरस्कार करते थे, जो उसको फंसाना चाहते थे, जो उससे नाराज़ थे । प्रभु यीशु मसीह चाहता था कि ये कोढ़ी यरूशलेम में उन याजकों के सामने जाएं जिससे उन पर उसके ईश्वरत्व और उसकी शक्ति का प्रमाणीकरण हो सके । उसका प्रगटीकरण हो सके । उन पर उसकी गवाही प्रगट हो सके । इसी कारण प्रभु यीशु मसीह कहता है कि जो मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए तौ भी जीवित रहेगा । आज हम मरनहार स्थिति में हैं क्योंकि हमारी देह मरनहार देह है । आज हम निराशा की स्थिति में हैं । बीमारियों की स्थिति में हैं । सब प्रकार की नकारात्मक परिस्थिति में हैं । परन्तु उसके बावजूद भी हमें उसके द्वारा मिलने वाले अनन्त जीवन, उसके उद्धार और मृत्यु के पार जीवन पर विश्वास करके इन कोढ़ियों के समान उस विश्वास की यात्रा को प्रारम्भ करना है । यूहन्ना 14:21 में प्रभु यीशु मसीह कहता है - ``जिसके पास मेरी आज्ञाएं हैं, और वह उन्हें मानता है, वही मुझ से प्रेम रखता है''। प्रभु यीशु मसीह यह कह रहा है कि यदि तुम कहो कि मैं तुमसे प्रेम रखता हूं परन्तु आज्ञाओं को न मानो तो यह झूठा प्रेम है । यह प्रेम ऐसा है जो मात्र होठों तक है, हृदय से नहीं है । यदि तुम्हें मुझसे वास्तव में दिल से प्रेम होगा तो तुम मेरी आज्ञाओं को मानोगे । किसी से हम प्रेम करते हैं तो यह प्रयास करते हैं कि उसको खुश रखें, उसकी इच्छा को पूरा करें, उसकी आज्ञा का पालन करें । प्रभु यीशु मसीह से हमारा जो प्रेम है उसका यह प्रमाण होगा कि हम उसकी आज्ञाओं को मानें । 6. केवल एक ही ने वापस लौटकर धन्यवाद दिया :- वे दसों कोढ़ी चंगे हुए थे परन्तु वापस लौटकर केवल एक ही आया । उसने प्रभु यीशु को धन्यवाद दिया । प्रभु यीशु मसीह ने उससे कहा - क्या दसों शुद्ध न हुए तो फिर नौ कहां हैं? आज भी जो मसीही कहलाते हैं, जिन्होंने प्रभु यीशु मसीह के उद्धार को चखा है उनका भी वही अनुपात है । अभी भी नौ ऐसे हैं जो धन्यवाद नहीं देते । केवल एक ही है, जो धन्यवाद देता है । 90% लोग कृतघ्न हो गए । मात्र 10% लोग ऐसे हैं जो धन्यवाद से भरे हुए हैं ।

उन नौ कोढ़ियों के लिए धन्यवाद न देने के, यीशु के पास न लौटने के बहुत से बहाने हो सक ते थे । वे कह सकते थे कि उसने तो हमसे नहीं कहा कि लौटकर आना । उसने तो यह कहा कि जाकर याजकों को दिखाओ । हम उसकी बात को ही मान रहे थे । उनमें से कुछ कहते कि हम उसको बाद में ढ़ूंढ़ लेंगे, पहले इस प्रक्रिया को तो पूरा कर लें । कुछ कहते कि वह तो स्वामी है और जानता है कि हमारे दिलों में उसके लिए धन्यवाद है। क्या आवश्यकता है कि हम अपना धन्यवाद उसके पास जाकर उसके चरणों में गिरकर प्रगट करें । कुछ शायद कह सकते थे कि हमें तो जल्दी है अपने परिवारजनों से मिलने की । टीकाकारों का मत है कि उन दस में से नौ कोढ़ी यहूदी थे और एक कोढ़ी सामरी था । यहूदी तो चले गए । उन्होंने धन्यवाद नहीं दिया। परन्तु सामरी कोढ़ी जो परदेशी था, जो विजातीय था; वह प्रभु यीशु मसीह को धन्यवाद देने के लिए वापस आया । इसीलिए प्रभु यीशु मसीह कहता है - क्या दसों शुद्ध न हुए थे तो फिर वे नौ कहां हैं ? क्या इस परदेशी को छोड़ और कोई न निकला जो परमेश्वर की बड़ाई करता ? इस कोढ़ी को प्रभु यीशु मसीह ने परदेशी कहा क्योंकि वह सामरी था ।

यूहन्ना 4:9 में लिखा हुआ है - ``क्योंकि यहूदी सामरियों के साथ किसी प्रकार का व्यवहार नहीं रखते''। प्रेरितों के काम 10:28 में लिखा है - ``उन से कहा, तुम जानते हो, कि अन्यजाति की संगति करना या उसके यहां जाना यहूदी के लिये अधर्म है, परन्तु परमेश्वर ने मुझे बताया है; कि किसी मनुष्य को अपवित्र या अशुद्ध न कहूं'' ।

उन दिनों की प्रथा थी कि विजातीय लोगों के साथ संगति करना यहूदी व्यक्ति के लिए अधर्म माना जाता था । यहूदी ऊंची जाति के लोग थे जो कहते थे हम परमेश्वर की निज प्रजा हैं । इब्राहीम और इसहाक हमारे पूर्वज थे । परन्तु ऐसे लोग जो परमेश्वर के अपने थे, ऐसे यहूदी लोग जिन्होंने उसके आश्चर्यकर्मो का स्वाद चखा था, जिनके पूर्वज लाल समुद्र से पार होकर आए थे, वे लोग धन्यवाद देना भूल गए । परन्तु एक सामरी व्यक्ति प्रभु यीशु मसीह को धन्यवाद देता है ।

आज हम जो मसीही परिवारों में पैदा हुए, जिनका लालन-पालन मसीही परिवारों में हुआ, कलीसिया की छांव में हुआ, परमेश्वर के मार्ग पर बहुत पीछे रह जाते हैं । जो नए विश्वासी हैं, जिन्होंने दूसरे धर्मो से आकर प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण किया, वे मसीहियत में आगे निकल जाते हैं । प्रचार करने में वे आगे निकल जाते हैं और हम बहुत पीछे छूट जाते हैं । गवाही देने में वे आगे निकल जाते हैं, दूसरों तक सुसमाचार पहुंचाने में वे आगे निकल जाते हैं, और हम बहुत पीछे छूट जाते हैं। वे आगे निकल जाते हैं उस सामरी के समान जो धन्यवाद देने के लिए आया। हम पीछे छूट जाते हैं उन नौ यहूदियों के समान ।

वह सामरी व्यक्ति इस बात को जानता था कि उसे अपना धन्यवाद प्रगट करना है । वह जानता था कि न सिर्फ्र धन्यवाद प्रगट करना है परन्तु सही समय पर करना है । कभी बाद में रास्ते में मिल गए और धन्यवाद दे दिया तो उसका क्या अर्थ ? वह सामरी जानता था कि मात्र शब्दों से धन्यवाद नहीं देना है । बल्कि प्रयास करके, अपने परिश्रम और अपने जीवन से धन्यवाद देना है । अक्सर हम यह बात भूल जाते हैं । जब हम कलीसिया की आराधना में आते हैं, हमें परमेश्वर को धन्यवाद देना है । आराधना वास्तव में धन्यवाद का प्रगटीकरण है । जब हम प्रार्थना करते हैं तो हम परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं । हम भेंटें चढ़ाते हैं तो हम परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं । जब हम प्रभुभोज में शामिल होते हैं तो परमेश्वर को उसके उद्धार के लिए धन्यवाद देते हैं । वास्तव में, धन्यवाद हमारे जीवनों से दिखाई देना चाहिए । हमारे जीवनों से हमारे धन्यवाद की गवाही होना चाहिए । मात्र होठों से धन्यवाद पर्याप्त नहीं है।

हम एक-दूसरे को भी धन्यवाद देने में अक्सर चूक जाते हैं । उदारता से धन्यवाद देने के बजाय हम अपने शब्दों में कंजूस हो जाते हैं । किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उस मृतक के प्रति हमारे अच्छे भाव होते हैं, बड़े अच्छे विचार होते हैं । हम उन अच्छी बातों को टटोलते हैं जो उसने अपने जीवन में कीं और बड़े अच्छे शब्दों से उसको श्रद्धांजलि प्रस्तुत करते हैं । परन्तु जब तक वह व्यक्ति जीवित रहता है हम अक्सर उसकी बुराइयां ही खोजते हैं, आलोचना करते हैं, नकारात्मक बातें करते हैं, हतोत्साहित करते हैं । हम प्रशंसा नहीं करते बल्कि प्रशंसा के शब्दों में हम कंजूसी करते हैं ।

7. विश्वास परिपूर्णता लाता है :- इस सम्पूर्ण घटनाक्रम की जो सबसे प्रमुख और अन्तिम बात है वह 19 वें पद में है । जहां प्रभु यीशु मसीह ने उससे कहा- जा तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया। हिन्दी की बाइबिल में बहुत स्पष्ट रूप से अनुवाद नहीं किया गया है परन्तु यदि ग्रीक भाषा से इसका अनुवाद देखें तो उसका अर्थ है कि तेरे विश्वास ने तुझे परिपूर्ण किया है। तेरे विश्वास ने तुझे बचा लिया है । जो केन्द्रीय बात है वह यह कि जिन्होंने धन्यवाद नहीं दिया, उन्होंने तो सांसारिक आशीष पायी थी, उन्हें तो शारिरिक चंगाई मिली थी । परन्तु यह सांसारिक चंगाई कितने दिन की होती है ? एक न एक दिन तो हमें मरना ही है । इस व्यक्ति को प्रभु यीशु मसीह ने आत्मिक चंगाई दी, उसे विशेष आशीष दी । यीशु ने कहा -तेरे विश्वास ने तुझे पूर्णकिया है, तेरे विश्वास ने तुझे परिपूर्ण किया है, तेरे विश्वास ने तुझे बचा लिया है - जा ।

इस व्यक्ति को धन्यवाद प्रगट करने का जो प्रतिफल मिला वह था पापों की क्षमा । उसे आत्मिक रूप से भी चंगाई मिली । उसे उद्धार प्राप्त हुआ । वह सिर्फ्र शारीरिक रूप ही से नहीं बल्कि आत्मिक रूप से भी पूर्ण हो गया। प्रभु यीशु मसीह ने उससे कहा - जा तेरे विश्वास ने तुझे पूर्ण किया है ।

हम कलीसिया की आराधना में क्यों आते हैं ? हम आराधना में इसलिए आते हैं कि परमेश्वर को धन्यवाद दें । हम आराधना के द्वारा, भेंटों के द्वारा, उसकी मेज़ में सहभागी होने के द्वारा, गीतों को गाने के द्वारा और प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर को धन्यवाद दे सकते हैं । जीवन भर हम परमेश्वर से केवल लेते रहते हैं । मात्र धन्यवाद ही है जो हम परमेश्वर को दे सकते हैं । यह मात्र होठों और शब्दों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि हमारे जीवन की गवाही, हमारे विश्वास के प्रगटीकरण के द्वारा भी दिखाई देना चाहिए । यही वजह है कि जो लोग कलीसिया से अलग हैं वे अपूर्ण रह जाते हैं । उन्हें सांसारिक और शारीरिक आशीषें तो किसी हद तक मिल जाती हैं परन्तु आत्मिक चंगाई और आत्मिक आशीषें उन्हें नहीं मिल पाती । क्योंकि वे परमेश्वर के भवन में आकर उसके सामने अपने होठों से, अपने हृदय से, अपनी भेंटों से, अपनी आत्मा में भरकर उसे धन्यवाद नहीं देते । कलीसिया में कभी जब मैं दान गिनता हूं तो मुझे बड़ा दुख होता है क्योंकि कई बार भेंटों में देखता हूं कि फटे हुए नोट हैं । नोटों के आधे टुकड़े हैं । ऐसे नोट हैं जिनमें दिखता ही नहीं कि एक का नोट है या दो का। मैंने देखा है कि भेंटों में खोटे सिक्के आते हैं । परमेश्वर हमारे टुकड़ों के लिए मोहताज नहीं । वह हमारे धन का मोहताज नहीं है परन्तु वह हमारे धन्यवाद की अपेक्षा करता है । इस कारण हृदय के धन्यवाद का प्रगटीकरण आराधना में होना चाहिए तभी वह परिपूर्ण होगी।

लिखा हुआ है कि तब उनमें से एक यह देखकर कि मैं चंगा हो गया हूं ऊंचे शब्द से परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ लौटा और यीशु के पांव पर मुंह के बल गिरकर उसका धन्यवाद करने लगा ।

फिलिप्पियों 4:6-7 में जो बात लिखी हुई है वही इस सारे सन्देश का सार है, केन्द्र बिन्दु है । वहां पर परमेश्वर का वचन यह कहता है ``किसी भी बात की चिन्ता मत करो : परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएं ''...... और तब परमेश्वर की एक बहुत बड़ी प्रतिज्ञा आगे दी हुई है जहां लिखा है - ``तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से बिल्कुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी'' ।

ऐसी शान्ति परमेश्वर तुमको देगा जिसका वर्णन तुम शब्दों में नहीं कर सकते, मात्र अनुभव कर सकते हो। यह परमेश्वर की प्रतिज्ञा है । किसी भी बात की चिन्ता मत करो । परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख प्रस्तुत किए जाएं ।

निष्कर्ष :- उस एक विजातीय कोढ़ी के समान हम भी परमेश्वर को धन्यवाद देना सीखें। अपने प्रियों को धन्यवाद देना सीखें । धन्यवादित और कृतज्ञ हृदय से अपने जीवन में आगे बढ़ें । हमारा धन्यवाद मात्र हृदय तक न रहे वरन् होठों तक आए । हमारा धन्यवाद हमारे प्रयासों में दिखाई दे, हमारे परिश्रम में दिखाई दे, हमारे कार्यो में दिखाई दे । जब हमारे जीवनों की गवाही से यह धन्यवाद दिखाई देगा तो हमारा जीवन परमेश्वर की दृष्टि में धन्य ठहरेगा । परमेश्वर हम से भी कहेगा - तेरे विश्वास ने तुझे पूर्ण किया है । तेरे विश्वास ने तुझे बचा लिया है । तेरे विश्वास ने तुझे परिपूर्ण किया है ।

परमेश्वर आपको आशीष दे ।