“तुम्हारा जीवन धन लोलुपता से मुक्त हो। जो तुम्हारे पास है उसी में सन्तुष्ट रहो क्योंकि उसने स्वयं कहा है मैं तुझे कभी नहीं छोडूंगा और न ही कभी त्यागूंगा” (इब्रानियों 13ः5)। बहुत से परिवारों में यह देखा जाता है कि किसी भी मूलभूत आवश्यकता की घटी नहीं है। भरा पूरा परिवार है परन्तु केवल अतृप्त लालसाओं को पूरा करने की तीव्र इच्छा, कुछ और पाने की चाहत परिवारों में तनावपूर्ण वातावरण निर्मित कर देती है। इतना ही नहीं यही अतृप्ति ऐसे परिवारों में विश्वासघात, अलगाव, बिखराव अथवा बर्बादी का भी कारण बनती है। आखि़र वे कौन से कारण हैं जिनके द्वारा शैतान परिवारों में विषाद उत्पन्न कर रहा है? और किन कारणों के आधार पर हमें अपने परिवारों का मूल्यांकन करना है? यही इस लेख का उद्देश्य है। यहां प्रमुख तीन कारणों का उल्लेख किया जा रहा है। 1. अनुचित आचरण:- (अ) परमेश्वर के प्रति:- पौलुस ने इस उक्त सन्दर्भ में परमेश्वर की प्रतिज्ञा को ध्यान में रखकर सन्तुष्ट रहने के लिए कहा है। उसका तात्पर्य यह था कि जब जीवित सर्वशक्तिमान, जीवन और जीवन की सभी आशीषों का स्त्रोत परमेश्वर स्वयं तुमको वचन दे रहा है कि वह तुम्हारे साथ रहेगा, वह तुम्हें कभी छोड़ेगा नहीं, कभी त्यागेगा नहीं तो फिर तुम क्यों व्यर्थ की बातों से असन्तुष्ट रहते हो? भजन संहिता 34ः10 में भी यह बात स्पष्ट है कि, “जवान सिंहों को तो घटी होती है और वे भूखे भी रह जाते हैं परन्तु यहोवा के खोजियों को किसी भली वस्तु की घटी नहीं होगी”। वह सब आवश्यक वस्तुएं हमें देता है परन्तु ज़रूरी नहीं कि वह हमारी सभी मांगों या चाहतों को पूरा करे। इस प्रकार परमेश्वर के प्रति हमारा अनुचित आचरण हम में असंतुष्टि उत्पन्न करता है। हम स्वयं की सीमाओं को देखकर घबराते हैं, चिन्ता करते हैं। उसकी सामर्थ्य पर भरोसा हमारा रहता नहीं। हम स्वयं की कभी खत्म न होने वाली अतृप्त इच्छाओं को लेकर असन्तुष्ट रहते हैं। जो कुछ हमारे पास है उसे नज़रअन्दाज़ करते हैं और उनके प्रति धन्यवादित नहीं रहते। (ब) मनुष्यों के प्रति:- न सिर्फ़ परमेश्वर के साथ अनुचित आचरण हम में असन्तोष उत्पन्न करता है किन्तु मनुष्यों के साथ भी अनुचित व्यवहार हमें कभी खुशी व सन्तुष्टि नहीं प्रदान कर सकता। नीतिवचन 28ः27 में स्पष्ट लिखा है - “जो निर्धन को देता है उसे कभी घटी नहीं होगी परन्तु जो दृष्टि फेर लेता है वह शाप पर शाप पाता है”। याकूब 4ः17 में भी यही बात लिखी है कि, “जो उचित काम करना जानता है और नहीं करता, उसके लिए यह पाप है”। जब तक व्यक्ति अपनी योग्यताओं, धन, वाणी तथा अपने सम्पूर्ण जीवन से, दूसरों के लिए कुछ भला नहीं करते, केवल अपने स्वार्थों के दायरे में ही सीमित रहते हैं तब तक उन्हें सच्ची सन्तुष्टि प्राप्त नहीं हो सकती। ऐसे मनुष्य कुंठित होते हैं। ऐसे लोगों के लिए ही यिर्मयाह ने लिखा है कि परमेश्वर जो आशीषों का स्त्रोत है वह चाहता है कि हम भी आशीषों के सोते बन जाएं परन्तु हमने अपने लिए हौद बना लिए हैं, ऐसे हौद जो टूटे हुए हैं (यिर्मयाह 2ः13)। हम परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गये लोग हैं। परमेश्वर का प्रमुख गुण है देना। उसकी प्रतिज्ञा है कि हम जितना देंगे उतने ही और भी अधिक आशीषित होंगे। हम दूसरे लोगों से तो सब कुछ पाना चाहते हैं परन्तु स्वयं दूसरों के लिए कुछ भी त्याग नहीं करना चाहते। बाइबिल में यह बात स्पष्ट है कि, “जैसा तुम चाहते हो कि मनुष्य तुम्हारे लिए करें तुम भी उनके साथ वैसा करो”। हम सबको एक दूसरे के साथ की, प्रेम, दया, क्षमा तथा प्रोत्साहन आदि की आवश्यकता होती है। जांचें कि दूसरे मनुष्यों के साथ हमारा कैसा सम्बन्ध है? 2. अनुचित अपेक्षाएं:- बाइबिल हमें स्पष्ट निर्देश देती है कि जो कुछ हमारे पास है, हमें उसमें सन्तुष्ट रहना सीखना है। होता इसके ठीक विपरीत है। जो कुछ हमारे पास रहता है उस की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता, परन्तु जो कुछ हमारे पास नहीं है वहीं हमारा ध्यान केन्द्रित होता है। वे ही वस्तुएं हमें लुभाती हैं। उन्हीं को येन-केन-प्रकारेण प्राप्त करने की धुन हमें रहती है। यदि ये वस्तुएं हमें नहीं मिलतीं तो हम असन्तुष्ट, असंतुलित तथा अशान्त हो जाते हैं। मत्ती 20ः1-15 में दाख की बारी के मज़दूरों का दृष्टान्त है। यहां उन मजदूरों का वर्णन है जिनको उनकी निर्धारित मज़दूरी दी गई परन्तु जब उन्होंने देखा कि जो उनसे बाद में आए उन्हें भी बराबर ही मज़दूरी दी गई तो वे स्वामी पर कुड़कुड़ाने लगे। वजह? अनुचित अपेक्षा। जब स्वामी ने उनके आत्म मूल्यांकन के लिए उनके सामने कुछ प्रश्न रखे तो वे निरुत्तर हो गये। हम स्वयं अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी नहीं करते फिर भी दूसरों से अपेक्षा करते हैं। इस प्रकार जब अपेक्षाएं न्यायसंगत नहीं होतीं तो पूरी भी नहीं होतीं और हम में असंतुष्टि की भावना पनपती है। इस सम्बन्ध में बात चाहे परिवार में पति-पत्नी की हो, माता-पिता तथा बच्चों की हो। व्यवसाय के क्षेत्र में अधिकारी तथा कर्मचारी की हो या कलीसिया में पासबान तथा सदस्यों की हो; सब जगह यह बात लागू होती है। प्रार्थना के साथ गम्भीरता पूर्वक सही विश्लेषण करने के द्वारा ही हम इन अनुचित अपेक्षाओं से प्रेरित होकर स्वयं को ग़लत मार्ग पर आगे बढ़ने से तथा ग़लत प्रतिक्रियाओं से रोक सकते हैं और सम्बन्धित त्रासदीपूर्ण परिणामों से बच सकते हैं। 3. अनुचित तुलनाएं:- उत्पत्ति के 29 तथा 30 अध्यायों में राहेल का वर्णन है। राहेल सुन्दर थी। वह पति को प्रिय थी। उसके पास धन-दौलत, नौकर-चाकर सब कुछ था किन्तु अपनी ही सगी बहन लिआ से स्वयं की तुलना करके वह इस हद तक चिड़चिड़ी और असन्तुष्ट हुई कि उसने आत्महत्या की बात तक सोच ली। सबसे बुद्धिमान राजा सुलैमान नीतिवचन 15ः16 में इस सम्बन्ध में सलाह देता है कि “परेशानी से संचित विशाल कोष से यही उत्तम है कि यहोवा के भय के साथ थोड़ा ही हो”। परन्तु हमारे विचार इस सलाह के ठीक विपरीत होते हैं। धन का मोह हमें अन्धा कर देता है। परमेश्वर का भय हमारे जीवनों से समाप्त हो जाता है और यहीं से हमारे नैतिक, आत्मिक तथा पारिवारिक पतन की दास्तां प्रारम्भ होती है। हमारा ध्यान सिर्फ़ सांसारिक वस्तुओं पर ही केन्द्रित होता है। हमारी दृष्टि केवल इसी जीवन तक ही सीमित होती है। इन्हीं भौतिक वस्तुओं को ही हम अपने जीवन की खुशियों का आधार मान बैठते हैं। ऐसी क्षणिक व नाशवान वस्तुएं जब धराशायी होती हैं तो वे हमें भी ले डूबती हैं। पौलुस यद्यपि सांसारिक रूप से अकेला, बूढ़ा व कमज़ोर था। वह कै़दखाने व अन्य सभी विषम परिस्थितियों से घिरा हुआ था, फिर भी आत्मिक रूप से बहुत दृढ़ था। वह अदम्य साहस, उत्साह तथा पूर्ण सन्तुष्टि की एक मिसाल था। इसका कारण क्या था? उसने अपने जीवन में सही तुलना कर सही चयन किया था। फिलिप्पियों 3ः8-9 अ में उसने लिखा है कि “मैं अपने प्रभु यीशु के ज्ञान की श्रेष्ठता के कारण सब बातों को तुच्छ समझता हूं जिसके कारण मैंने सब वस्तुओं की हानि उठाई है और उन्हें कूड़ा समझता हूं जिससे मैं मसीह को प्राप्त करूं और मैं मसीह में पाया जाऊं”। अनुचित तुलनाएं मनुष्य में असन्तोष उत्पन्न करती हैं। सकारात्मक चिन्तन, रचनात्मक कार्य और अनन्त जीवन के परिप्रेक्ष्य में इस जीवन तथा सम्बन्धित बातों की तुलना द्वारा ही हम स्वयं को शैतान के इस शस्त्र से घायल होने से बचा सकते हैं। यदि आप अपने जीवन से, परिवार से असन्तुष्ट हैं तो परिस्थितियों को दोष न देकर स्वयं का मूल्यांकन कीजिये। आपकी अपेक्षाएं न्यायसंगत हैं या नहीं? आप अनुचित तुलना करने में तो नहीं लगे हुए हैं और आपका आचरण कैसा है? आप इन मुद्दों पर तर्कसंगत मूल्यांकन कर अपनी ख़ामियों को दूर करें। फिर देखिए आपके जीवन तथा आपके परिवार में किस प्रकार ख़ुशी, सन्तुष्टि व शान्ति बहाल होती है। डाॅ. श्रीमती इन्दु लाल