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लेख

जीवन बिन ज़िन्दगी

आज के संसार में अक्सर मसीहियों और ग़ैर- मसीहियों की जीवन-शैली में कुछ अन्तर समझ में नहीं आता है। अधिकांश मसीहियों का जीवन भी धन- सम्पन्नता, स्वार्थ, अधिकार व भौतिकवाद में ही सिमट गया है। सांसारिक मान्यताओं से प्रभावित अनेकों के लिए धर्म मात्र धार्मिक औपचारिकताओं को पूरा करना रह गया है। नशे, व्यभिचार,दुर्व्ययसन, दुर्वासना, दुर्व्ययवहार तथा दुष्कर्मों में तथाकथित मसीहियों की भागीदारी में दिन- दूनी, रात-चैगुनी बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे “मुखौटाधारी मसीहियों” के भ्रम में पड़कर जवान बेटे- बेटियों के जीवन सब प्रकार के दुःख-विपत्तियों और दूषित मानसिकता के शिकार बन रहे हैं। ऐसे में आधारभूत प्रश्न यह उठता है कि हम इन बातों से कैसे बचें? हम इन प्रपंचों से कैसे उबरें? आखिर कैसे हम इन बातों पर जयवन्त हों? इस सम्बन्ध में बाइबिल पर आधारित प्रमुख बातें -

1. परमेश्वर पिता से जुड़ें - परमेश्वर पिता से व्यक्तिगत सम्बन्धों के बिना हम आत्मिक रूप से मृतक होते हैं (इफिसियों 2ः1; 5ः14; कुलुस्सियों 2ः13; रोमियों 5ः12,14-15,17-21)। इस प्रकार के लोग जीवन के बिना दिखावटी ज़िन्दगी जीने, उसे सुधारने-संवारने में लगे रहते हैं। ऐसे लोग जीविकोपार्जन को संसार की विभिन्न उपलब्धियों को, सुख-सम्पन्नता को ही ज़िन्दगी और शान समझने की ग़लतफ़हमी में रहते हैं। ऐसों की जैसे ही आंखें खुलती हैं, और उनका चित्त ठिकाने आता है तब वे स्वयं को या तो उड़ाऊ पुत्र के समान सुअरों के बीच में सा पाते हैं (लूका 15ः16-17) या शाऊल के समान धर्मान्धता के कट्टरपंथ में डूबा हुआ अनुभव करते हैं। (प्रेरितों के काम 22ः3-8) परमेश्वर ने हमारे सामने जीवन और मृत्यु (व्यवस्थाविवरण 30ः15-20), आशीष और स्राप (व्यवस्थाविवरण 28ः1-14, 15-68) दोनों रखे हैं। उसने हमें निर्णय करनेे की, चुनाव करने की तो स्वतंत्रता दी है परन्तु हर निर्णय के साथ उनके परिणाम उसके द्वारा पूर्व निर्धारित हैं। बाइबिल का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब- जब लोगों ने अनाज्ञाकारिता और विश्वासघात किया तब-तब परमेश्वर ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया (रोमियों 1ः26-32)। ईश्वर की अनुपस्थिति में लोगों ने वही किया जो संसार में दूसरों को करते देखा। ऐसे काम जिससे उनके शरीर की लालसाएं तृप्त होती नज़र आईं, किन्तु जिसका अन्त परिणाम हमेशा त्रासदीपूर्ण रहा (गलातियों 5ः19-21)। उन्हें समझ ही नहीं आया कि स्वतंत्रता के भ्रम में वे न जाने कितनी गुलामियों की बेड़ियों में जकड़ गए और कब उनके अपने पराए हो गए। वर्तमान समय में भी परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारिता और विश्वासघात, चरित्रों के हास, विघटित होते हुए परिवारों और उनके टूटते-बिखते सम्बन्धों के प्रत्यक्ष परिणाम है। परमेश्वर से सम्बन्ध तोड़कर हम स्वयं अपनी बदहाली का कारण बन जाते हैं।

सम्भवतः हम भूल जाते हैं कि शान्ति, आनन्द, सन्तुष्टि, आशा, सुरक्षा, सामर्थ्य, क्षमा सबका स्रोत परमेश्वर है। परमेश्वर पिता जो जीवन है उसके बिना ज़िन्दगी जीने की कल्पना करना और जीवन को सजाने- संवारने का प्रयास करना महज़ मृग-तृष्णा है। यह मानो केवल वायु को पकड़ने जैसी बात है। यह जीवित को निर्जीव वस्तुओं में ढूंढ़ने की बात है। उससे जुड़ने के लिए उड़ाऊ पुत्र के समान पश्चात्तापी हृदय से उसके पास वापस आना अनिवार्य है। इसी से हमारा सम्बन्ध पिता से होगा।

2. उससे निरन्तर संलग्न रहें - विकसित व फलवन्त होने के लिए डालियों को दाखलता से और अंगों को देह से निरन्तर जुडे़ रहना आवश्यक होता है। हमको परमेश्वर पिता से जुड़े रहने के लिए हर दिन ध्यानपूर्वक- intentional होकर और उसके वचन का अध्ययन कर उसकी आवाज़ को सुनना है। हर दिन प्रार्थना के द्वारा उससे बातचीत करना है। हर रविवारीय आराधना में भाग लेना है। उसकी देह अर्थात् कलीसिया की उन्नति, एकता और विकास के लिए अपना सम्पूर्ण योगदान देना है। इसके अलावा हर दिन अपनी सांसारिक और शारीरिक लालसाओं का इन्कार करना है (लूका 9ः23) अर्थात् अपने हठ, घमण्ड, दुर्भावनाओं, ग़लत संगति, ग़लत आदतों और हर एक उन बातों का त्याग करना है जो परमेश्वर की आज्ञा, इच्छा, गवाही और महिमा के विरोध में है।

हमें यह बात समझना है कि विश्वासघाती होकर हम विश्वास की गवाही नहीं बन सकते हैं। हम जलन, कुढ़न, कड़वाहट, घृणा, प्रतिशोध, परनिन्दा और अन्य दुर्भावनाओं से भरकर उसके प्रेम व शान्ति के गवाह नहीं बन सकते हैं। हम घमण्ड से भरकर उसकी विनम्रता और दीनता के गवाह नहीं बन सकते हैं। हम संसार और शरीर की नाशमान बातों में लिप्त होकर उस जीवन तथा पवित्र आत्मा के गवाह नहीं बन सकते। हम समझौतावादी, मौकापरस्त होकर, भावनाओं में बहकर, परिस्थितियों और लोगों से डरकर कभी भी परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं हो सकते। हम अन्धकार के कार्यों में लिप्त रहकर कभी भी ज्योति के गवाह नहीं बन सकते (1 कुरिन्थियों 10-21; फिलिप्पियों 3ः18; रोमियों 8ः6-9)। ऐसी परिस्थितियों में हम गवाही का नहीं बल्कि ठोकर का कारण बनते हैं, हम बिना स्वाद के नमक और बुझती-धुंआ देती हुई बातियां ही बनते हैं। परमेश्वर पिता से निरन्तर जुड़े रहने के लिए उसके प्रति सम्पूर्ण समर्पण, विश्वासयोग्यता तथा आज्ञाकारिता आवश्यक है। (रोमियों 2ः6-8; 1 यूहन्ना 1ः5-6; 2ः4-5)

3. जीवन शैली से प्रगट करें - परमेश्वर चाहता है कि हम उसके साथ अपने सम्बन्धों को अपनी सम्पूर्ण जीवन शैली से प्रगट करें। वह चाहता है कि हम संसार की वासनाओं के कारण भ्रष्ट आचरण से छूटकर ध्यानपूर्वक ईश्वरीय गुणों को अपनाकर ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी हो जाएं (1 पतरस 1ः15; 2ः11-12; 2 पतरस 1ः4-11)। वह चाहता है कि हमारे हृदय का धन्यवाद, समर्पण, कृतज्ञता व भक्ति हमारे भले कार्यों व सद्व्यवहार से प्रगट हो। (मत्ती 5ः16; 7ः19-21; इफिसियों 2ः10; 5ः20-21; 1 थिस्सलुनीकियों 5ः17-18) मसीही, प्रभु यीशु के महान गुणों को प्रगट करने के लिए बुलाए गए हैं। (1 पतरस 2ः9)

हम में से अधिकांश तथाकथित मसीही “मसीही धर्म” की कुछ पारम्परिक औपचारिकताओं को पूरा करके सन्तुष्ट हो जाते हैं। मूल तथ्य यह है कि मसीहियत में सम्बन्धों की तथा विश्वासयोग्य जीवन शैली की प्रमुखता है। इसमें सम्बन्ध से बढ़कर बड़ी भविष्यद्वाणियां करने को, बड़े-बड़े आश्चर्यकर्म करने को अथवा अन्य किसी भी बात को प्रमुख नहीं माना गया है (मत्ती 7ः21-23; 1 कुरिन्थियों 13ः1-3)। प्रभु यीशु मसीह का अनुगमन करने में सबसे बड़ी बात यह है कि परमेश्वर को सच्चे दिल से प्यार करना और उसकी इच्छा पूरा करना। उसकी स्पष्ट इच्छा यह है कि हम आपस में एक-दूसरे से बिना किसी छल-कपट, लोभ-लालच अथवा स्वार्थवश प्रेम रखें।(मत्ती 22ः17-19; 1 यूहन्ना 4ः7-12,16-21)

निष्कर्ष और मुद्दे की बात यही है कि हम जीवन बिन ज़िन्दगी जीने के भ्रम में न रहें। हम उस जीवन के स्रोत से संलग्न हों। क्योंकि उसी में वास्तविक ज़िन्दगी है, भरपूरी का जीवन है, उसी में जीवन की सार्थकता तथा उपयोगिता है,उसी में जीवन की सफलता है और उसी में इस जीवन के पार अनन्त जीवन की निश्चितता है।

डाॅ. श्रीमती इन्दु लाल