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लेख

कड़वा सच

(प्रमुख सन्दर्भ: मत्ती 15ः8-9; मरकुस 7ः6-9,13) ऐसे रीति-रिवाज़, विधि-विधान जो वंश दर वंश हस्तांतरित होते हैं जिन्हें पीढ़ियां बड़ी श्रद्धा व समर्पण के साथ पालन करती हैं उन्हें परम्पराएं कहते हैं।

प्रभु यीशु मसीह ने शास्त्रियों और फरीसियों की परम्पराओं की कटु शब्दों में भत्र्सना क्यों की?वे तो भक्ति के लिए स्वयं को बहुत अनुशासित रखते थे (1 तीमुथियुस 4ः7)। वे उपवास के साथ निरन्तर प्रार्थना करते थे (मत्ती 6ः5)। वे आराधनाओं में निरन्तर उपस्थित होते थे (मत्ती 23ः6)। वे अपनी हर वस्तु का दसमांश देते थे (मत्ती 23ः23)। वे व्यवस्था के नियमों का कट्टरता से पालन करते थे (मत्ती 23ः28)। वे धार्मिक शब्दावली का उपयोग करते थे (लूका 20ः45-46)। उनमें से बहुत से लोग परमेश्वर के नाम से बहुत से आश्चर्यकर्म करते थे, भविष्यवाणियां करते थे, दुष्टत्माओं को भी निकालते थे (मत्ती 7ः21-22)। इतनी सब अच्छाइयों के बावजूद प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें चूना पुती हुई क़ब्र तथा कुकर्मियों जैसी संज्ञा क्यों दी (मत्ती 23ः27)? उसने लोगों से आखि़र क्यों कहा कि जब तक तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो तुम कभी भी स्वर्ग राज्य में प्रवेश नहीं कर सकोगे?(मत्ती 7ः21) क्यों उसने कहा कि मैं ऐसों को अपने राज्य में पहचानने से भी इन्कार कर दूंगा (मत्ती 7ः23)।

इन सन्दर्भों से आज हमारे व्यक्तिगत, पारिवारिक व कलीसियाई जीवन के लिए क्या शिक्षा है? यहां प्रमुख 3 आधारभूत शिक्षाओं का वर्णन किया जा रहा है -

1. मसीही जीवन व धार्मिक परम्पराओं में अन्तर समझें - मसीही जीवन की शुरुआत मसीह पर विश्वास करने से अर्थात् उसे अपने जीवन का मालिक, स्वामी, प्रभु, ठवेे या डंदंहमत स्वीकार करने से होती है (मरकुस 16ः16; प्रेरितों के काम 4ः12; यूहन्ना 3ः15-16,36; रोमियों 10ः9-10)। जब व्यक्ति यह कदम उठाता है तो वह अपने पापों का अंगीकार करता है (मत्ती 10ः32-33; रोमियों 10ः9-10; 1 यूहन्ना 1ः9)। इसके साथ ही उसे इस बात की भी निश्चितता होती है कि केवल प्रभु यीशु मसीह के क्रूस पर मारे जाने, क़ब्र में गाड़े जाने व जी उठने के द्वारा ही उसे पाप व मृत्यु के बन्धन से छुटकारा, मोक्ष या मुक्ति प्राप्त हो सकती है (1 कुरिन्थियों 15ः20-22; रोमियों 6ः3-7)। इस अंगीकार के साथ ही वह अपने पापों के साथ मसीह में मरने के लिए तैयार होता है। सच्चा पश्चात्ताप का अर्थ ही मसीह में होकर नये जीवन की शुरुआत करने का दृढ़ निश्चय व पूरा समर्पण होता है (2 कुरिन्थियों 5ः17)। पश्चात्ताप के साथ वह मसीह की समानता में पानी की क़ब्र में बपतिस्मे की जल संस्कार की विधि द्वारा गाड़ा जाता है। प्रतीकात्मक रूप से उसके सब पाप-अपराध के साथ पुराना मनुष्यत्व पानी की क़ब्र में दफन हो जाता है (रोमियों 6ः6)। जब वह पानी की क़ब्र से ऊपर आता है तो यही उसका मसीह में नया जन्म होता है (रोमियों 6ः3-4)। अब वह मसीह में नयी सृष्टि “मसीही” होता है (2 कुरिन्थियों 5ः17)। मसीह के द्वारा वह परमेश्वर पिता से जुड़ता है अर्थात् अब वह आत्मिक रूप से जीवित होता है (गलातियों 2ः20)। अब वह परमेश्वर की सन्तान और वारिस ठहरता है अर्थात् उसके परिवार का सदस्य (यूहन्ना 1ः12; 1 यूहन्ना 3ः1) और उसकी देह का अंग बनता है (1 कुरिन्थियों 12ः27)। अब पवित्रात्मा उसे उत्तम सहायक के रूप में मिलता है कि वह निरन्तर परमेश्वर पिता से जुड़कर उसके वचन के प्रकाश में आगे बढ़ सके (यूहन्ना 16ः7)।

कुछ मसीही उपरोक्त आधारभूत सत्य को ना ही समझते और ना ही स्वीकार करते हैं। वे स्वयं को पुश्तैनी मसीही मानने के भ्रम में रहते हैं (यूहन्ना 1ः11-13; 3ः3-5; 8ः39; रोमियों 9ः6-8)। कुछ मसीही शास्त्रियों और फरीसियों के समान स्वयं की धार्मिकता के आधार पर स्वयं को मसीही समझने के भ्रम में रहते हैं (मरकुस 12ः38-40)। परन्तु वास्तव में उनका दूर-दूर तक न ही परमेश्वर के साथ दिल से कोई सम्बन्ध रहता है और न ही कोई समर्पण। मरकुस 5ः1-13 में एक दुष्टात्मा ग्रसित व्यक्ति का वर्णन है। उसमें लगभग 6000 दुष्टात्माओं की सेना समाई हुई थी। ये सभी दुष्टात्माएं प्रभु यीशु मसीह को ईश्वर करके मानती थीं अर्थात् वे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करती थीं। वे उसके नाम से, भय से कांपती भी थीं (लूका 4ः41)। उन्होंने झुककर उसकी आराधना भी की। उन्होंने उससे प्रार्थना भी की। परन्तु उनके विश्वास और मसीही विश्वास में बहुत बड़ा अन्तर दिल के समर्पण, आधीनता, विश्वासयोग्यता व आज्ञाकारिता का होता है। जब तक ये बातें हमारे विश्वास में नहीं हैे तब तक हमारा विश्वास मृतक और व्यर्थ होता है (याकूब 2ः26)। ऐसे में प्रार्थना करना, बाइबिल पढ़ना, आराधनाओं में शामिल होना, प्रचार करना, आश्चर्यकर्म करना, धार्मिक शब्दावली का प्रयोग करना, दान देना आदि सब कुछ महज़ स्वयं की धार्मिकता का दिखावा करना होता है (मत्ती 6ः1)। यह अपने प्रयासों से स्वयं को धर्मी प्रमाणित करने का असफल प्रयास होता है (लूका 11ः52)। इस तरह का विश्वास जिसमें परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए व मोक्ष अर्जित करने के लिए मनुष्य स्वयं के प्रयासों, कार्यों, रीति-रिवाजों, विधि-विधानों को पूरा करने के लिए बाध्य है; परमेश्वर को स्वीकार्य नहीं (इफिसियों 2ः5ब,8-9)। वास्तव में इस तरह का विश्वास परमेश्वर की इच्छा, आज्ञा, महिमा, गवाही व योजना के विरोध में होता है। ये परम्पराएं बोझिल व उबाऊ होती हैं (मत्ती 23ः4)। ये हृदय की शान्ति, सन्तुष्टि, आनन्द, जीवन, आशा व उत्साह सब कुछ समाप्त कर देती हैं (कुलुस्स्यिों 2ः20-23)। इन सबका स्रोत प्रभु यीशु मसीह है उससे अलग होकर हम परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए कुछ भी नहीं कर सकते (यूहन्ना 15ः5)।

आज एक मसीही के व्यक्तिगत, पारिवारिक और कलीसियाई जीवन में जो प्रेम, दया, क्षमा, पवित्रता, संयम, आनन्द, शान्ति; मन, वचन, कर्म में दिखाई देना चाहिए; क्यों नहीं दिखाई देते हैं? कहीं इसका मूल कारण; मूल स्रोत प्रभु यीशु मसीह से दूरी तथा महज़ खोखली परम्पराओं का निर्वहन तो नहीं है?ऐसी परम्पराएं जो परमेश्वर की दृश्टि में घृणित हैं (मत्ती 23ः5-7) जिनसे किसी का भला नहीं हो रहा है, जिनसे केवल हमारे अहं व स्वार्थ की तुष्टि हो रही है; व्यर्थ हैं।

2. वास्तविक धार्मिकता व झूठी धार्मिकता में अन्तर समझें - प्रभु यीशु मसीह ने कहा “पहले तुम मेरे धर्म और राज्य की खोज करो” (मत्ती 6ः33)। उसका धर्म; उसके बलिदान पर विश्वास करना तथा परमेश्वर के अनुग्रह में सम्पूर्णता से समाहित हो जाना है (रोमियों 10ः9-10)। यह संसार की मोह माया त्याग कर, परमेश्वर को पूरे दिल से प्यार करना है (मत्ती 22ः37)। यह शरीर की इच्छाओं, भावनाओं, लालसाओं को परमेश्वर की आज्ञाओं के आधीन करना है (1 कुरिन्थियों 9ः27)। यह लोगों को खुश करने के लिए नहीं परन्तु परमेश्वर को खुश करने का जीवन है। यह परिस्थितियों एवं विषमताओं के बावजूद अपना ध्यान परमेश्वर पर केन्द्रित करके उसके मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ते जाने का जीवन है (फिलिप्पियों 4ः13-14; कुलुस्सियों 2ः6)। यह स्वयं के अहं, हठ, अधिकार व साम्राज्य को नहीं किन्तु उसकी महिमा, गवाही, सेवकाई व राज्य के विस्तार को प्राथमिकता देने की बात है (मत्ती 28ः18-20)। यह अपनी -अपनी कलीसियाओं की सदस्य संख्या बढ़ाने की नहीं किन्तु लोगों तक पहुंचकर उन्हें प्रभु यीशु मसीह के चेले बनाने की बात है। यह लेने का नहीं किन्तु देने का, स्वयं का अधिकार जताने का नहीं किन्तु दूसरों की सेवा करने का जीवन है (मरकुस 10ः45)। इसमें हर एक सांस, हर एक धड़कन के लिए परमेश्वर पर निर्भरता है, उसके प्रति धन्यवाद, समर्पण व कृतज्ञता है (1 यूहन्ना 1ः5-6; 2ः2)। ठीक वैसी निर्भरता जैसे पानी में डूबते हुए व्यक्ति को सांस के लिए होती है।

झूठी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों के समान स्वयं को महिमा मण्डित करने तक, अपने ही साम्राज्य को विस्तार देने तक, अपने ही स्वार्थों की पूर्ति तक सीमित होती है। यही कारण था कि जब प्रभु यीशु मसीह रोगियों को चंगाई देता था, अंधों को आंखे देता था, पापियों को क्षमा करता था, कोढ़ियों को छूकर शुद्ध करता था, मृतकों को हाथ पकड़कर जिला उठाता था तो वे आनन्द मनाने के बदले प्रभु यीशु मसीह पर और साथ ही चंगाई प्राप्त करने वाले लोगों पर क्रोधित होते थे। वे न्याय, नियंत्रण व प्रशंसा, स्तुति पर परमेश्वर का नहीं स्वयं का एकाधिकार चाहते थे। प्रभु यीशु मसीह ने उनकी ऐसी झूठी धार्मिकता को सबके सामने बेनकाब किया और वास्तविक धार्मिकता सब पर प्रगट की।

आज हमारे व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन व कलीसियाई जीवन में अशान्ति, फूट व कलह का मूल कारण भी हमारी झूठी धार्मिकता तो नहीं है क्योंकि परमेश्वर की धार्मिकता में इनका कोई स्थान नहीं है (याकूब 3ः15-17)।

3. मनुष्यों की शिक्षाओं व बाइबिल के सिद्धान्तों में अन्तर समझें - बाइबिल के प्रमुख मूलभूत विषयों की मौलिक नये नियम पर आधारित अवधारणाओं अथवा शिक्षाओं को जिसमें कोई फेर बदल नहीं हो सकता है; बाइबिल के सिद्धान्त कहते हैं। इन बुनियादी विषयों के अन्तर्गत बाइबिल त्रिएक परमेश्वर, पाप, उद्धार, बपतिस्मा, कलीसिया आदि विषय आते हैं।

बाइबिल के सिद्धान्त के अनुसार प्रभु यीशु मसीह के क्रूस पर बलिदान होने के बाद अब और किसी बलिदान की आवश्यकता नहीं (इब्रानियों 10ः10-12)। इसलिए अब कोई वेदी की भी आवश्यकता नहीं (इब्रानियों 9ः11-14)। आज प्रत्येक मसीही को जीवित-पवित्र और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान बनने की अपेक्षा है (रोमियों 12ः1)।

बाइबिल के सिद्धान्त के अनुसार प्रभु यीशु मसीह ही हमारे व परमेश्वर के बीच एकमात्र महायाजक, मध्यस्थ व कड़ी है(इब्रानियों 4ः14; 1 तीमुथियुस 2ः5)। अब और कोई दूसरे महायाजक की आवश्यकता नहीं है। महापवित्र स्थान की वेदी के सामने जो पर्दा रहता था वह प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु के समय ऊपर से नीचे दो भागों में फट गया (मत्ती 27ः51)। यह प्रतीक था कि अब परमेश्वर और विश्वासी के बीच में कोई दीवार नहीं रही। जब एक बार प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर से हो गया है तो आवश्यकता है कि इस मेल को हम अन्तरंग, आत्मीय, मजबूत सम्बन्धों में बदलने में केन्द्रित करें।

प्रभु यीशु मसीह ही जीवन की रोटी (यूहन्ना 6ः35) व जीवन का जल (यूहन्ना 4ः10) है; उसे प्रतिदिन ग्रहण करें। उससे निरन्तर जुड़े रहने से ही हम जीवन, आशा, आनन्द, शान्ति व सन्तुष्टि के स्रोत से जुड़े रह सकते हैं।

प्रभु यीशु मसीह व उसकी शिक्षाएं ही पूर्ण, सिद्ध व अटल सत्य हैं (इब्रानियों 7ः28; यूहन्ना 14ः6)। उसके प्रकाश में ही हम संसार के झूठ, अनैतिकता, पाप, बुराई व ग़लत मार्ग को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं।

प्रार्थना के स्वरूप व तौर-तरीके को लेकर भी कलीसियाओं में बहुत भ्रान्तियां पाई जाती हैं परन्तु वचन का अध्ययन करना और प्रार्थना करने का उद्देश्य परमेश्वर के साथ अन्तरंग, आत्मीय, मज़बूत सम्बन्ध बनाना होना चाहिए। प्रार्थना का उद्देश्य स्वयं की धार्मिकता प्रगट करना, लोगों को सुनाना एवं लोगों को प्रभावित करना नहीं परन्तु परमेश्वर को तहे दिल से महिमा, आदर भक्ति देना होना चाहिए। प्रार्थना पश्चात्तापी हृदय के साथ पूरे समर्पण व सच्चाई के साथ की जाना चाहिए। प्रार्थना करते समय हमारा पूरा ध्यान परमेश्वर की ओर केन्द्रित होना चाहिए। यदि प्रार्थना के समय लोग भिन्न-भिन्न आवाज़ें निकालेंगे और उछलना कूदना करेंगे तो स्वाभाविक रूप से ध्यान प्रार्थना में न लगकर लोगों की तरफ लगेगा। साथ ही प्रार्थना स्पष्ट रूप से सुनाई भी नहीं देगी। बाइबिल में इस प्रकार के प्रचलन को मना किया गया है (मत्ती 6ः5-8; लूका 18ः9-14; 1 कुरिन्थियों 14ः9, 15-17,23,33)।

मसीही विश्वास का यह भी एक महत्वपूर्ण बुनियादी सिद्धान्त है कि जो प्राण देने तक विश्वासयोग्य रहेगा उसे ही जीवन का मुकुट मिलेगा (प्रकाशितवाक्य 2ः10) और जो कोई प्रभु यीशु मसीह को ठुकराएगा तथा उसके प्रति अनाज्ञाकारी रहेगा वह चाहे इस दुनिया में कितना ही फले-फूले इस दुनिया के पार वह नरक की अनन्त मृत्यु का भागीदार होगा (मत्ती 25ः46; 2 थिस्सलुनीकियों 1ः8-9; 2 थिस्सलुनीकियों 2ः12; यूहन्ना 3ः16-18,36; रोमियों 1ः18-23; रोमियों 2ः12-15; प्रकाशितवाक्य 21ः8; यिर्मयाह 13ः9-10)।

बाइबिल के सिद्धान्तों की ठोस जानकारी हर एक विश्वासी को होना चाहिए। इसके द्वारा हम मनुष्यों द्वारा स्थापित परम्परावादी धार्मिकता से झूठी शिक्षाओं व सब प्रकार की भ्रान्तियों से बच सकते हैं तथा मसीह “में” दृढ़ता से परिपक्वता की ओर आगे बढ़ सकते हैं।

हम ध्यान पूर्वक अपने आपको देखें कि हमने अपना सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर को समर्पित किया है या नहीं?हमने उसको अपने जीवनों में सर्वोच्च व प्राथमिक स्थान दिया है या नहीं? या हम मात्र होठों से उसकी आराधना करते हैं परन्तु हमारे दिलों में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। या धार्मिकता हमारे लिए महज़ एक अच्छी परम्परा है वास्तविक भक्ति नहीं?

डाॅ. श्रीमती इन्दु लाल