Background

लेख

पुनरुत्थान की व्यवहारिकता

इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम, प्रभु यीशु मसीह का इस संसार में जन्म लेना, मनुष्यों के सामने परमेश्वर के सत्य को सम्पूर्णता से प्रगट करना, उनको पापों की क्षमा देने के लिए क्रूस पर बलिदान होना, मारा जाना, गाड़ा जाना और फिर तीसरे दिन जीवित होना है। प्रभु यीशु मसीह के जन्म, मृत्यु व पुनरुत्थान के आधार पर ही इतिहासकारों ने काल को ईसा पूर्व व ईसा पश्चात में विभाजित किया है। कैलेण्डर, मोबाइल, घड़ी व अन्य स्थानों में 2017 हर दिन सामने आता है जिसका सीधा मतलब होता है 2017 वर्ष ईसा पश्चात। इस प्रकार नास्तिक भी प्रभु यीशु मसीह के अस्तित्व एवं ऐतिहासिक व्यक्तित्व होने के तथ्य को नकार नहीं सकते हैं। आज हमारे लिए प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान की सामर्थ्य को जानना व स्वीकार करना क्यों आवश्यक है? इस जानकारी की हमारे जीवनों में क्या व्यवहारिकता है? इस सम्बन्ध में कुछ प्रमुख बातों की व्याख्या प्रस्तुत है -

1.जीवन की मृत्यु पर विजय:- प्रभु यीशु मसीह ने अपने जीवन काल में पुनरुत्थान और जीवन होने का (यूहन्ना 11ः25), जीवन की रोटी होने का (यूहन्ना 6ः35), जीवन का जल होने का (यूहन्ना 4ः14) दावा किया था।

उसने अपने इस दावे को नाइन नगर के विधवा के मृतक बेटे को जीवित कर (लूका 7ः11-15), याईर याजक की मृतक बेटी को जीवित कर (लूका 8ः41-42,49) तथा चार दिन के मृतक लाजर को जीवित कर प्रमाणित किया था (यूहन्ना 11ः1-44)।

उसके षिश्य व बहुतेरे लोग मृत्यु पर उसके अधिकार व सामर्थ्य के चश्मदीद गवाह थे। उसने उन्हें स्पष्ट बताया था कि वह इसी उद्देश्य को लेकर इस संसार में आया है कि सम्पूर्ण मानव जाति के उद्धार के लिए अपने पवित्र लहू द्वारा क़ीमत चुकाए, क्रूस पर उसका पवित्र बलिदान हो, वह एक पापी की तरह मारा जाए, उसके शरीर को दफनाया जाए और वह फिर तीसरे दिन जीवित हो जाए (मत्ती 16ः21; 20ः17; 26ः28; मरकुस 8ः31; 14ः 58; यूहन्ना 20ः19)। इतनी स्पष्ट जानकारी के बावजूद जब उन्होंने प्रभु यीशु मसीह की निर्ममता व क्रूरता की पराकाष्ठा से परिपूर्ण “मृत्यु” देखी तो अब उनकी उससे “जीवन” की सभी आषाएं समाप्त हो गईं।

मृत्यु के लिए यह असम्भव था कि वह “जीवन” पर अपना शिकंजा रखे (प्रेरितों के काम 2ः24)। “जीवन” ने स्वेच्छापूर्वक मृत्यु को स्वीकार किया था ताकि वह हमेशा—हमेशा के लिए इस मृत्यु के डंक व भय को समाप्त कर सके (यूहन्ना 14ः1-6; 1 कुरिन्थियों 15ः55; इब्रानियों 2ः14-15)। यदि वह ऐसा नहीं करता तो मृत्यु पर जयवन्त कैसे होता?

प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान इतिहास की सबसे अद्वितीय एवं अद्भुत घटना है। उसके सशरीर पुनरुत्थान की बात को स्वीकार करना किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत कठिन बात थी। इसीलिए वह 40 दिनों तक लगातार 500 से अधिक लोगों को दिखाई देता रहा (1 कुरिन्थियों 15ः3-8)। उसने लोगों को, अपने सशरीर पुनरुत्थित होने के असंख्य प्रमाण दिए (लूका 24ः38-39,41-43; प्रेरितों के काम 1ः3)। वह चाहता था कि उसके पुनरुत्थान के विषय में किसी के मन में कोई प्रश्न, शंका अथवा दुविधा न रहे। जब लोगों ने यह निश्चय देख व परख लिया कि प्रभु यीशु मसीह का वास्तव में पुनरुत्थान हुआ है, वह “जीवन” मृत्यु पर वास्तव में जयवन्त हुआ है तब वे अदम्य साहस, अवर्णीय आनन्द तथा उत्साह से भर गए (प्रेरितों के काम 3ः13,21)।

हो सकता है दुःख, तकलीफ, बीमारी, दुर्घटना, असफलता व मृत्यु के कारण हमारे हृदयों में भी भय, अशान्ति व असुरक्षा हो। हो सकता है ऐसे समय से गुज़रते हुए हमें लगता हो कि परमेश्वर हमारी प्रार्थना नहीं सुन रहा है। उसने हमें हमारी बेहाली पर छोड़ दिया है। हमारे जीवन में सब कुछ टूटता-बिखरता दिखाई दे रहा हो और ऐसा प्रतीत होता हो कि परमेश्वर बिल्कुल ख़ामोश है उसको न ही हमारा ध्यान है न ही कोई फ़िक्र। ऐसे समय पर आप प्रभु यीशु मसीह के क्रूस पर ध्यान करें। उसकी यातनाओं पर ध्यान करें। जानें कि परमेश्वर ने अपने ज़िगर के टुकड़े और अपने एकलौते बेटे को भी इन विषमताओं व पीड़ाओं से गुज़रने दिया। वह ख़ामोश रहा ताकि प्रभु यीशु मसीह के द्वारा मेरे और आपके उद्धार की वृहद योजना पूर्ण हो सके। ताकि जीवन का मृत्यु पर अधिकार प्रमाणित हो सके। ताकि उसमें होकर हर एक विश्वासी को मृत्यु के पार बेहतर जीवन की निश्चितता मिल सके (यूहन्ना 11ः25-26)। ताकि हर मसीही पूरी निर्भयता व दृढ़ विश्वास के साथ जीवन की हर विषमता का सामना करने में सक्षम हो सके।

ध्यान देने योग्य तथ्य है कि “पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूं”-कथन न ही कोई धर्म सिद्धान्त है, न ही परम्परा के रूप में मात्र रटने व सुनाने का एक खूबसूरत पद। यह एक व्यक्ति है जिससे मज़बूती से जुड़कर जीवन जीने में ही हमारा वास्तविक पुनरुत्थान व जीवन सम्भव है (इफिसियों 1ः19-20)।

उसमें ही पुनरुत्थान की वह जीवित सामर्थ्य है जो हमारे मृतक सम्बन्धों व परिस्थितियों को पुनर्जीवित कर सकता है। वही जीवन है। हम जीवित को मरे हुओं में न ढूंढें (लूका 24ः5-6)। ऐसा करने से हम केवल निराशा व असफलता में ही उलझेंगे। उस “जीवन” से जुड़ें तथा उसकी सामर्थ्य को अपने जीवन में काम करने दें।

2. अच्छाई की बुराई पर विजय:- प्रभु यीशु ने इस संसार में रहते हुए जो कुछ सोचा, कहा व किया, सब कुछ दूसरों की भलाई के ही लिए किया (मरकुस 7ः37)। बदले में उसे शारीरिक, मानसिक व आत्मिक रूप से असहनीय तथा अवर्णीय पीड़ा व यातना से गुज़रना पड़ा। उसकी क्रूस पर निर्मम मृत्यु को देखकर लगा मानो बुराई की अच्छाई पर जीत हो गई। मानो ईश्वर शैतान से पराजित हो गया। मानो मृत्यु जीवन पर प्रबल हो गई।

परमेश्वर ने आदम और हव्वा को इस पृथ्वी का अधिकारी बनाया था (उत्पŸिा 1ः26)। यह अधिकार “आदम” को ही आदम से वापस लेना था (1 कुरिन्थियों 15ः21-28)। यह कार्य स्त्री के ही वंश से होना निर्धारित था (उत्पत्ति 3ः15; इब्रानियों 2ः14-15)। अतः प्रभु यीशु मसीह का मानव रूप में जन्म, सेवकाई, पीड़ा-यातना, क्रूस पर मृत्यु सब कुछ परमेश्वर की योजना के अनुरूप, उसकी सामर्थ्य व नियंत्रण में हो रहा था। यह सब कुछ इतनी ख़ामोशी, विनम्रता तथा दीनता के साथ घटित हो रहा था कि इस घटनाक्रम में परमेश्वर का विश्ष्टि प्रयोजन व नियंत्रण कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

कितनी बार इस संसार के झूठ, पाप, बुराई, स्वार्थ, लोभ-लालच तथा विश्वासघात की चोटों से आहत होकर हम अपनी अच्छाई खोने लगते हैं। भ्रष्टाचार से निरन्तर साक्षात्कार होने सा लगता है। इस संसार में मानो बुरा करना आसान ही नहीं लाभदायक बात प्रतीत होती है और अच्छा तथा भला करना कठिन बात और मानो अपने ही पैरों में कुल्हाड़ा मारने की बात जैसी लगती है। इस प्रकार का सोच हमें स्वार्थी तथा आत्मकेन्द्रित होने की ओर अग्रसर कर सकता है।

प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान अच्छाई की बुराई पर, जीवन की मृत्यु पर तथा ईश्वर की शैतान पर विजय की मुहर है। उसका पुनरुत्थान इस बात का प्रमाण है “कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं उनके लिए वह सब बातों के द्वारा भलाई को उत्पन्न करता है; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसके अभिप्राय के अनुसार बुलाए गए हैं। क्योंकि जिन के विषय में उसे पूर्वज्ञान था, उसने उन्हें पहिले से ठहराया भी कि वे उसके पुत्र के स्वरूप में हो जाएं, जिससे कि वह बहुत-से भाइयों में पहिलौठा ठहरे” (रोमियों 8ः28-29)।

जीवन में अच्छा और बुरा सब मिलाकर परमेश्वर हमारे लिए भलाई ही उत्पन्न करता है। वह चाहता है कि हम उसके पुत्र के स्वरूप, समानता व स्वभाव में ढलें। वह चाहता है कि हम प्रतिदिन की रोटी के लिए उस पर निर्भर हों (मत्ती 6ः11)। वह चाहता है कि हम उसके प्रेम, दया, क्षमा, अनुग्रह, अच्छाई व भलाई के योग्य प्रतिनिधि बनें। आज प्रभु यीशु मसीह हर एक विश्वासी में होकर जीना व कार्य करना चाहता है (रोमियों 8ः8-12) उसने हमें भले कार्य करने के लिए, दूसरों के जीवन में सकारात्मक अनन्त परिवर्तन लाने के लिए ही चुना है (इफिसियों 2ः10)। वह चाहता है कि हम अपने शरीर के अंगों को धार्मिकता के हथियार होने के लिए उसे सौंप दें (रोमियों 6ः13)। वह हमारी आवाज़, हमारे हाथ व पांवों का उपयोग करता है। वह चाहता है कि हम भलाई करने में निरुत्साहित न हों (गलातियों 6ः9)। हमारा प्रतिफल इस संसार के पार है (मत्ती 5ः12; लूका 6ः23; फिलिप्पियों 3ः14; इब्रानियों 11ः26; 2 तीमुथियुस 4ः8)। जो कुछ हम अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए करते हैं वह सब कुछ इस संसार में ही छूटने वाला है परन्तु जो कुछ हम परमेश्वर के भय में दूसरों की भलाई के लिए करते है वही वास्तव में हमारा स्वर्गीय धन है (मत्ती 6ः19-20; 12ः37; मत्ती 25ः45; प्रकाशितवाक्य 14ः13)।

इसी भलाई के द्वारा ही परमेश्वर की आशीष के रूप में हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, खुशी व संतुष्टि होती है।

प्रभु यीशु मसीह की मृत्यु व पुनरुत्थान हमें सदैव इस बात का स्मरण दिलाता है कि हम उसमें जयवन्त से बढ़कर हैं (रोमियों 8ः37)। हमें बुराई से हार नहीं मानना है परन्तु बुराई को भलाई से जीतना है (रोमियों 12ः21)।

3. विश्वास की सन्देह पर विजय:- सन्देह हम में भय, असुरक्षा, घबराहट व अशान्ति उत्पन्न करता है। हमें चुनौतियों का सामना करने से रोकता है तथा हमारी प्रगति में बाधक बनता है।

विश्वास हमें दृढ़ता व सम्बल प्रदान करता है। यह हमें चुनौतियों का सामना करने के लिए न केवल प्रेरित करता है परन्तु सम्बल व साहस प्रदान करता है। अतः विश्वास बहुत आवश्यक बात होती है।

प्रभु यीशु मसीह के अटल वचन पर सन्देह करने से शिष्यों की भी दयनीय दशा थी किन्तु पुनरुत्थित प्रभु यीशी मसीह को देखकर उनके सारे सन्देह व भय दूर हो गए। अब वे अपने जीवन का दांव उस “जीवन”“ पर लगाने के लिए पूरे दिल और जान से तैयार थे। इसीलिए अब वे पुनरुत्थित यीशु की गवाही पूरी निर्भीकता के साथ देने लगे। अब न ही उन्हें लोगों का, न ही परिस्थितियों का, न जीवन का, न मृत्यु का, न वर्तमान का, न भविष्य का, न ही अन्य किसी भी बात का सन्देह व भय रहा (रोमियों 8ः37-39)।

पुनरुत्थित प्रभु यीशु मसीह को तथा उसके सशरीर जीवित होने के असंख्य प्रमाणों को देखकर उनके दिल व दिमाग से सब सन्देह व भय दूर हो गए थे। उन्हें दृढ़ विश्वास था कि प्रभु यीशु मसीह ही एकमात्र, जीवित व सर्वसामर्थी ईश्वर है।

प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान द्वारा यह बात प्रमाणित हुई कि मृत्यु अन्त नहीं किन्तु अनन्त जीवन में प्रवेश करने का द्वार है (यूहन्ना 3ः16)। मृत्यु के बाद एक बेहतर जीवन का प्रारम्भ निश्चित है (याकूब 1ः12;1 कुरिन्थियों 15ः42-44)। यह नया जीवन इसी संसार में जीवन के स्रोत प्रभु यीशु मसीह के द्वारा जीवन के स्रोत परमेश्वर पिता से जुड़कर सम्भव है (यूहन्ना 5ः24)। अब मृत्यु का भय जाता रहा क्योंकि उन्हें निश्चय हो गया कि देह से अलग होकर प्रभु यीशु मसीह के साथ रहना सर्वोंत्तम है (2 कुरिन्थियों 5ः8)। उसके पुनरुत्थान से हर एक विश्वासी को इसी जीवन में नयी व सही शुरुआत करने की, उसमें नयी सृष्टि बनने की निश्चितता मिली (2 कुरिन्थियों 5ः17)। ऐसी निश्चितता जिसमें पापी स्त्री को प्रचारिका बनने की, मारनेवाला शाऊल को बचानेवाला पौलुस बनने की, शमौन को पतरस बनने की, डाकू को स्वर्गलोक में जाने की निश्चितता है - सुधार का एक और अवसर है।

उसकी मृत्यु के समय मन्दिर का पर्दा ऊपर से नीचे फट जाने से इस बात की भी निश्चितता मिली कि अब कोई और बलिदान की, वेदी की, महायाजक की आवश्यकता नहीं रही। अब हर एक विश्वासी प्रभु यीशु मसीह के द्वारा महापवित्र परमेश्वर के पास प्रार्थना के द्वारा पहुंच सकता है (यूहन्ना 16ः23)। अब उसका शरीर ही पवित्रात्मा का मन्दिर है (1 कुरिन्थियों 3ः16)। अब प्रभु यीशु मसीह ही एकमात्र महायाजक व मध्यस्थ है (इब्रानियों 7ः24-27; 1 तीमुथियुस 2ः5)। उसके बिना कोई भी पिता के पास नहीं पहुंच सकता (यूहन्ना 14ः6)। उसके पवित्र बलिदान से यह भी निश्चित हो गया कि उसने हमारे उद्धार के कार्य को पूरा कर दिया है (2 पतरस 1ः18-19; यूहन्ना 19ः30; रोमियों 5ः19)। हम अच्छे कार्यों, कठोर त्यागपूर्ण अनुशाषित जीवनों व स्वयं की धार्मिकता के द्वारा उद्धार अर्जित कर नहीं सकते। यह केवल और केवल प्रभु यीशु मसीह को स्वीकार करने के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह के रूप में हम प्राप्त कर सकते हैं (इफिसियों 2ः8-10)।

उसके पुनरुत्थान के द्वारा हमें विश्वास के सही अर्थ की भी निश्चितता मिली। हमें बिल्कुल स्पष्ट अहसास हुआ कि उनका विश्वास यदि स्वयं की योग्यताओं अथवा उपलब्धियों पर आधारित होगा तो पतरस के समान वह कभी भी धराशयी हो जाएगा। यदि उनका विश्वास शाऊल तथा अन्य धार्मिक अगुवों के समान स्वयं की धार्मिकता पर होगा तो यह भी उनके लिए घातक व विनाश का कारण होगा। हमें सम्पूर्ण विश्वास पुनरुत्थित प्रभु यीशु मसीह पर तथा उसके उद्धार के कार्य पर, सामर्थ्य, दया व अनुग्रह पर केन्द्रित रखना है तथा इसी विश्वास के अनुरूप गवाही का जीवन जीना है (रोमियों 10ः9-10)।

पतरस से पुनरुत्थित प्रभु यीशु मसीह ने एक ही प्रश्न 3 बार किया कि पतरस क्या तू मुझसे प्रीति रखता है? उसने कहा, हां प्रभु! इस पर प्रभु यीशू मसीह ने उस पर पुनः बार-बार अपना विश्वास प्रगट किया और उसे अपनी कलीसिया की ज़िम्मेदारी सौंपी (यूहन्ना 21ः15-17)।

आज भी हर एक विश्वासी से पुनरुत्थित प्रभु यीशु मसीह का वही प्रश्न है और वह हम में से हर एक को कलीसिया की एकता, पवित्रता, विकास व दृढ़ता की ज़िम्मेदारी सौंपता है। व्यक्तिगत रूप से हमारा क्या प्रत्युत्तर है? इसी प्रश्न के सकारात्मक उत्तर में ही पुनरुत्थान की सार्थकता एवं व्यवहारिकता निहित है।

डाॅ. श्रीमती इन्दु लाल