परमेश्वर पिता ने मनुष्य को अपने स्वरूप व समानता में बनाया था (उत्पत्ति 1ः27)। वह चाहता था कि मनुष्य उससे अपने पूरे दिल, दिमाग व शक्ति से प्रेम करे (मत्ती 22ः37)। इसके साथ ही साथ वह चाहता था कि मनुष्य दूसरे मनुष्यों के साथ स्वयं के समान प्रेम रखे (मत्ती 22ः39)। वह चाहता था कि मनुष्य उसके स्वरूप व समानता को उसकी पवित्रता, प्रेम, दया, क्षमा, विनम्रता, दीनता, धीरज, सहनशीलता व संयम जैसे सद्गुणों के साथ अपने सदाचरण, सद्व्यवहार तथा भले कार्यों के द्वारा प्रगट करे (1 पतरस 2ः9; गलातियों 5ः22; इफिसियों 2ः10) परमेश्वर ने मनुष्य जाति पर स्पष्ट रूप से यह बात प्रगट की थी कि वह उसकी आशा, इच्छा, योजना, महिमा, गवाही, सेवकाई तथा उसके द्वारा निर्धारित समय व सीमाओं के अनुरूप ही जीवन जिए (व्यवस्थाविवरण 11ः26-28,32; 12ः28; 13ः3-4)। परमेश्वर पिता ने मनुष्य को सदाचारी, सभ्य व सुसंस्कृत बनाने हेतु परिवार की स्थापना भी की थी। उसकी आकांक्षा थी कि मनुष्य प्रारम्भ से ही उसकी जान-पहचान-ज्ञान में बढ़े। उससे उसका मज़बूत अन्तरंग व आत्मीय सम्बन्ध हो (उत्पत्ति 18ः19; व्यवस्थाविवरण 6ः4-9; 11ः18-20) वह पूरे समर्पण तथा विश्वासयोग्यता से उसके कार्यों का तथा उसके राज्य का विस्तार करे। उसकी देह अर्थात् कलीसिया की पवित्रता, एकता व उन्नति में तन-मन-धन से योगदान दे (व्यवस्थाविवरण 10ः12-13, 20; 2 तीमुथियुस 1ः9; 1 पतरस 2ः5, 4ः10; प्रेरितों के काम 20ः28; 1 कुरिन्थियों 14ः12, 26ब; मत्ती 28ः19)। वर्तमान परिवेश में अधिकांश स्वयं को मसीही कहने वाले और अनेक मसीही परिवार परमेश्वर के इन उद्देश्यों से विमुख होते हुए नज़र आते हैं। आज चारों ओर पद, प्रतिष्ठा, नाम और अधिकार प्राप्त करने की होड़ है। विभिन्न भौतिक संसाधन जुटाने की, अनेक क्षेत्रों में विशेष उपलब्धियां हासिल करने की तथा आवश्यकता से अधिक जीवकोपार्जन की मानो अन्धी दौड़ है। सफलता के सोपानों पर तेज़ी से चढ़ने की धुन है। साथ ही साथ चारों ओर धार्मिक अन्धकार तथा नैतिकता का पतन एवं प्रदूशण है। ऐसे माहौल में तथाकथित मसीही परमेश्वर द्वारा निर्धारित समय-सीमाओं तथा मूल्यों- मापदण्डों का अतिक्रमण कर रहे हैं। जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पिता ने उन्हें संसार में भेजा है उन उद्देश्यों से वे भटक गए हैं। उसके द्वारा ठहराए गये वर्जित फलों को खाने में ही वे वास्तविक स्वतंत्रता, सफलता व आनन्द का अहसास कर रहे हैं। सांसारिकता आत्मिकता पर इस कदर हावी है कि वे एक कटोरा दाल के बदले में अपने शरीर, चरित्र, ईमान, सम्बन्धों व अनन्त का सौदा करने पर अमादा हैं। ऐसे में दुष्टात्मा ग्रसित मनुष्य के समान वे स्वयं को विभिन्न नुकीले पत्थरों अर्थात् नशे, व्यभिचार, झूठ-फरेब, अनैतिक सम्बन्धों आदि से घायल कर रहे हैं। आत्मिक रूप से मृतक होने के कारण उनकी सम्वेदनशीलता समाप्त हो चुकी है। उनकी बुद्धि अंधेरी हो गई है (2 कुरिन्थियों 4ः4)। उन्हें सही-ग़लत, शैतानी व ईश्वरीय, नश्वर व अनश्वर, सच व झूठ में अन्तर ही नहीं समझ में आता है। उनका विवेक पूरी तरह मृतक हो चुका है। ऐसी स्थिति का लाभ शैतान भरपूरी से उठा रहा है। वह उससे जो कुछ अच्छा है वह सब कुछ छीन रहा है। बदले में वह उसे उड़ाऊ पुत्र के समान सुअरों जैसी स्थिति में लाकर छोड़ रहा है। जहां घर-परिवार, कलीसिया सबसे दूरी है, बस आस-पास सुअरों की संगति है और उन्हीं का ही भोजन है। यदि ऐसी स्थिति में हम स्वयं हैं या हमारा परिवार है या हमारा कोई भी परिचित है तो आज भी समय है कि हम तुरन्त परमेश्वर पिता से जुड़ें। एक बार फिर से हम परमेश्वर पिता के पास वापस लौटें। उससे लिपट जाएं। इस कदम के लिए आत्मावलोकन करना और जीवन के कुछ कड़वे सच को स्वीकार करना आवश्यक है। उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त (लूका 15ः11-24) में उड़ाऊ पुत्र ने पिता के करीब आने के लिए जो प्रमुख क़दम उठाए उन्हीं को अपनाकर हम भी पिता के पास लौट सकते हैं। वे कदम इस प्रकार हैं। 1. व्याकुलता (आतुरता):- अपनी वर्तमान स्थिति को परिवर्तित करने हेतु हम आतुर हो जाएं। उड़ाऊ पुत्र का चित्त जब ठिकाने आया (लूका 15ः17-19) तब उसे अपनी वास्तविक स्थिति का अहसास हुआ। तब उसे लगा पिता के घर में मैं कितना सुरक्षित था। भरपूरी का जीवन था। अब मैं अपना सम्बन्ध, चरित्र, धन-सम्पत्ति, योग्यता, समय, अवसर सब कुछ गंवा बैठा हूं। यहां केवल निराशा, अशान्ति, असन्तुष्टि, भय, कुण्ठा, असफलता, तनाव, अकेलापन, बेचैनी है। मैं अपनी सहायता स्वयं नहीं कर सकता। मेरे पास दो ही विकल्प हैं या तो मैं इसी स्थिति में अपने बाकी के जीवन को बर्बाद कर लूं या मैं पिता के पास लौट जाऊं और शेष जीवन उसके अनुसार जी लूं। इस सोच ने उसके मन में पिता के पास वापस लौटने की एक आतुरता पैदा कर दी। हम आत्म मूल्यांकन करें कि किन सम्बन्धों, परिस्थितियों, व्यस्तता, व्यसन आदि के कारण हमारी ये स्थिति हुई है? हमको पुनः अकेले व खालीपन से भरपूरी की ओर, असफलता से सफलता की ओर, चिन्ता-निराशा से विश्वास की ओर, असुरक्षा से सुरक्षा की ओर, घबराहट व भय से साहस की ओर, बिखराव व अलगाव की स्थिति से मेल-मिलाप की ओर लौटना है। जब तक ऐसे परिवर्तन की व्याकुलता हमारे दिल-दिमाग में नहीं आएगी तब तक हम सुअरों की संगति व सुअरों के भोजन में ही मगन रहेंगे। जैसे गहरे पानी में डूबता हुआ व्यक्ति एक सांस के लिए व्याकुल होता है वैसे ही हमको पिता के साथ पुनः सम्बन्ध स्थापित करने के लिए आतुर होना है। 2. अंगीकार:- हम अपने सभी पाप-बुराई-अधर्म का अंगीकार कर लें। उड़ाऊ पुत्र ने अंगीकार किया कि मैंने परमेश्वर के विरोध में पाप किया है (लूका 15ः17-18)। परमेश्वर पिता हमारा सृजनहार है। उसने हमको अपने विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विशिष्ट बनाया है (कुलुस्सियों 1ः16)। उसने हमारी सुरक्षा के लिए अपनी आज्ञाएं, अपना वचन, अपना आत्मा हमको दिया है (व्यवस्थाविवरण 30ः15-20; यहेजकेल 36ः26-27) उसके बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं (यूहन्ना 15ः5)। हम मान लें कि हमने अब तक अपनी शारीरिक व सांसारिक लालसाओं को, अपनी दुर्वासनाओं को, अपने स्वार्थ, घमण्ड, हठ, अपने दुव्र्यसनों को, अपने अनैतिक सम्बन्धों को, अपनी ग़लत संगति को, अपने ग़लत शौक को, अपने पद, प्रतिष्ठा, अधिकार को ही प्रमुखता दी है। हमने इनको ही सफलता के मापदण्ड समझा। इसके द्वारा हमने मूर्ति-पूजा का, आत्मिक व्यभिचार का पाप किया है। वह अंगीकार करता है कि पिता ही वास्तविक जीवन, आनन्द, सन्तुष्टि, सामर्थ्य, आशा, शान्ति का स्त्रोत है। वही छुटकारा देनेवाला, चंगाई देनेवाला, क्षमा करनेवाला, सब कुछ नया करने वाला, असम्भव को सम्भव करने वाला परमेश्वर है। हमने अपनी जीवन गाड़ी को अपनी इच्छा अनुसार चलाकर उसका दुष्परिणाम देख लिया। अब अपनी जीवन गाड़ी को हम पिता को संचालित करने दें। हमने स्वयं अपना, लोगों का, परिस्थितियों का नियंत्रण करके देख लिया । अब यह नियंत्रण हम सम्पूर्णता से पिता को ही करने दें। हमने अपनी मनमानी करने का हश्र देख लिया अब हम सम्पूर्णता से स्वयं को उसकी आज्ञाओं के आधीन करें। हमने अपने ग़लत चुनाव व ग़लत निर्णयों के कारण स्वयं को परमेश्वर पिता से दूर कर लिया है। अपनी दुर्दशा के लिए हम “स्वयं” जि़्ाम्मेदार हैं। परिस्थितियों व दूसरे लोगों पर दोषारोपण करते रहने से, विभिन्न बहाने बनाने से, कल पर टालते रहने से स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। अंगीकार करें कि पिता का प्रेम, दया व क्षमा हमारे हर एक पाप से कहीं अधिक बढ़कर है। हमारे हर एक अपराध से उसका अनुग्रह कहीं अधिक बड़ा है। हमारे जीवन की हर एक मृतक होती परिस्थितियों व सम्बन्धों से उसके पुनरुत्थान की सामर्थ्य कहीं अधिक बढ़कर है। हमारे हर एक बन्द दरवाज़ों से उस उद्धार का द्वार जो प्रभु यीशु मसीह ने खोला है कहीं अधिक बड़ा है। वह आज हमको दौड़कर गले से लगाने के लिए और पूर्ण रूप से नयी शुरुआत देने के लिए तैयार है। 3. सम्पूर्ण सर्मपण:- हम स्वयं को सम्पूर्णता से पिता के हाथों में समर्पित करें। उड़ाऊ पुत्र पहले अपने पिता से अपने हिस्से की, अपने अधिकार की मांग करता है (लूका 15ः12)। परन्तु जब वह अपनी समझ, इच्छा व भावना को परमेश्वर को समर्पित करता है तब वह पिता से कहता है कि तू मुझे अब अपना सेवक बना ले (लूका 15ः19)। यही आन्तरिक परिवर्तन है जिसमें व्यक्ति का ध्यान स्वयं से हटकर परमेश्वर की ओर, लोगों, संसार, शरीर व परिस्थितियों से हटकर आत्मा की ओर केन्द्रित होता है। जब व्यक्ति अपने भविष्य की चिन्ता स्वयं न करके अपने आपको उस पिता के हाथों में समर्पित करता है जिसके हाथों में उसका भविष्य व अनन्त सुनिश्चित व सुरक्षित रहता है। अब व्यक्ति आशीषों के पीछे भागने के बदले आशीषों के स्रोत अर्थात स्वर्गीय पिता से ही जुड़ जाता है। अब वह सबको नियंत्रित व परिवर्तित करने के अथक, असफल प्रयास का त्याग कर अपने जीवन के हर क्षेत्र का नियंत्रण पिता के हाथों में सम्पूर्णता से सौंपता है। अब वह अपने सम्पूर्ण शरीर को परमेश्वर का मन्दिर होने के लिए समर्पित करता है। जब पिता का आत्मा उसके शरीर में वास करता है (1 कुरिन्थियों 3ः16-17) तब वह जो कुछ सोचता है, देखता है, कहता है, सुनता है, हाथों से करता है, जिन स्थानों पर जाता है हर एक बात से परमेश्वर की शोभा तथा पवित्रता प्रगट होती है। अब उसका सर्वस्व परमेश्वर की सेवकाई का उपयोगी उपकरण बन जाता है (रोमियों 6ः13; गलातियों 6ः7-8)। जब हम पिता के पास सच्चे दिल से वापस लौटते हैं तब पिता हमें इस संसार में सब कुछ “अच्छे से अच्छा” (लूका 15ः22) देता है और इस संसार के पार अनन्त जीवन देता है (यूहन्ना 3ः16, 36)। भरपूरी का जीवन शरीर की लालसाओं को सांसारिक संसाधनों के द्वारा पूरा करने में नहीं है (गलातियों 6ः7-8)। यह केवल पिता से जुड़कर उसकी आज्ञाओं के अनुरूप जीवन जीने में ही सम्भव है (व्यवस्थाविवरण 30ः19-20)। तो आइए, अब हम अपने पिता के पास लौट चलें। डाॅ. श्रीमती इन्दु लाल