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लेख

मंज़िल की ओर बढ़ते कदम

यह एक प्रमाणित सत्य है कि हम अपना ध्यान जिधर केन्द्रित करते हैं उसी दिशा में आगे बढ़ते हैं। यही दिशा हमारी मन्ज़िल का निर्धारण करती है। यही कारण है कि जिनका ध्यान खेल पर केन्द्रित होता है वे खेल जगत में ख्याति प्राप्त नामी खिलाड़ी बन जाते हैं। जिनका ध्यान शिक्षा पर केन्द्रित होता है वे अध्ययन के क्षेत्र में अपनी मन्ज़िल तक पहुंचते हैं। आजकल अधिकांश लोग अपना ध्यान टी.वी., इन्टरनेट, कैरियर, फेसबुक एवं अन्य भौतिक संसाधनों में केन्द्रित किए हुए दिखाई देते हैं। इन्हें बुरा नहीं कहा जा सकता परन्तु यदि ये आधुनिकता के संसाधन हमको हमारी प्राथमिक ज़िम्मेदारियों व सम्बन्धों से दूर करते हैं व इनसे हमारा ध्यान भटकाते हैं तो ये माध्यम ऐसी दिशा में आगे बढ़ाते हैं जिसकी मंज़िल घातक होती है। इसका प्रभाव न केवल युवा पीढ़ी पर किन्तु बच्चों, पालकों, अधिकारियों, परिवार और समाज पर तीव्रता से बढ़ रहा है।

किसी भी मशीन के लम्बे व उचित संचालन के लिए उसको बनाने वाला इंजीनियर हमेशा उसके साथ एक पुस्तक रखता है जिसे निर्देश पुस्तिका (manual or guide) कहा जाता है। इस पुस्तक के निर्देशों के विपरीत करना मशीन के लिए घातक सिद्ध होता है। ठीक इसी प्रकार जिस इंजीनियर ने मनुष्य की रचना की है उसने भी मानव जीवन के कुशल संचालन के लिए एक निर्देश पुस्तिका दी है। वह इंजीनियर परमेश्वर पिता है और उसकी निर्देश पुस्तिका बाइबिल है। बाइबिल के निर्देशों का पालन करके हम अपने जीवन को सब प्रकार के पाप-बुराई अधर्म से होने वाली अशान्ति, असन्तुष्टि व कुण्ठा से बचा सकते हैं। इसके निर्देशों पर चलकर हम अपने जीवनों को सफल, सार्थक, उपयोगी और आदर्श बना सकते हैं तथा निरन्तर सही मार्ग पर सही मन्ज़िल की ओर बढ़ सकते हैं।

इस सम्बन्ध में कुछ प्रमुख बातें -

1. परमेश्वर पर अटूट विश्वास:- लोगों के तानों-प्रहारों व जटिल परिस्थितियों के थपेड़ों से हमारी छवि-धूमिल हो जाती है। हीनता व आत्मग्लानि की धुंध में हम अपनी पहचान खो बैठते हैं। यह बहुत खतरनाक स्थिति होती है जिसके कारण हमारे कदम ग़लत दिशा में बढ़ने लगते हैं। हम अपनी पहचान ग़लत संगति में, उपलब्धियों में व अन्य “कर्मों” में ढूंढ़ने लगते हैं। ऐसे में जो हम हैं नहीं वह बनने का व दिखाने का प्रयास करते हैं। यह प्रयास बहुत बोझिल व उबाऊ होता है। इससे मन में और भी अधिक खिन्नता-तनाव और निराशा उत्पन्न होती है।

परमेश्वर तथा उसके जीवित वचन पर विश्वास करने से ही हम स्वयं को वास्तविक रूप में पहचान पाते हैं कि हम वास्तव में उसके सन्तान, वारिस व प्रतिनिधि हैं (1 पतरस 2ः9)। उसकी दृष्टि में हम जैसे भी हैं, बेशक़ीमती हैं। यह क़ीमत केवल इसलिए कि वह हमारा प्रेमी पिता है। उसने अपना प्रेम अपने एकलौते बेटे के पवित्र लहू की क़ीमत चुकाकर प्रगट किया है। उसने हमें अपने परिवार का सदस्य बनाया है (यूहन्ना 1ः12)। उसने हमें अपनी देह का अंग बनाया है (यूहन्ना 15ः5)। उसने हमें अपना नाम ”मसीही“ दिया है। उसने अपना उत्तम सहायक व सलाहकार-पवित्रात्मा हमें दिया है (1 कुरिन्थियों 3ः16; 6ः19-20)। वह चाहता है कि हम स्वयं को उसके पुत्र प्रभु यीशु मसीह में होकर देखें, जाने व स्वीकार करें। ऐसा करने से ही हमारी आत्मछवि निखरेगी। हमारा मनोबल बढ़ेगा। जब अन्दर से हम दृढ़ होंगे तो निश्चित रूप से हम दूसरों के लिए भी प्रेम, प्रोत्साहन, आशा व आशीष का कारण बनेंगे। सकारात्मक चिन्तन व रचनात्मक कार्यों के द्वारा से हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा रहेगी और हमारे कदम हमारे सही दिशा में आगे बढ़ते जाएंगे। जानें कि हमारा विश्वास अपने आप में कुछ भी नहीं है इसलिए अपने विश्वास पर अधिक विश्वास न कर सम्पूर्णता से परमेश्वर पिता पर तथा उसके जीवित वचन पर सम्पूर्ण हृदय से विश्वास करें। दाऊद ने अपने इसी विश्वास के कारण गोलियत का सामना दृढ़ता पूर्वक किया और उस पर जयवन्त हुआ (1 शमूएल 17ः35-51)। दानिय्येल अपने इसी विश्वास के कारण सिंहों की मान्द में भी शान्त व सुरक्षित रहा (दानिय्येल 6ः23ब)। एलीशा विरोधी सेनाओं से घिरने के बावज़ूद ज़रा भी विचलित नहीं हुआ क्योंकि उसे मालूम था कि उसके साथ उसका जीवित सच्चा, सर्वशक्तिमान सेनाओं का यहोवा परमेश्वर है (2 राजा 6ः16-17; 2 इतिहास 32ः7-8)।

परमेश्वर पर विश्वास के सम्बन्ध में एक और बात कि अपनी अयोग्यताओं व सीमाओं को देखकर स्वयं को कमज़ोर महसूस करना स्वाभाविक बात है। इसमें विश्वास में कमज़ोर होने की बात नहीं है। यह सच्चाई को स्वीकारने की बात है। परन्तु अपनी चुनौतियों व समस्याओं के सामने परमेश्वर को छोटा, सीमित व कमज़ोर समझना उस पर सन्देह करने की बात है। उसकी सामर्थ्य हमारे जीवन की बड़ी से बड़ी चुनौतियों, समस्याओं व विषमताओं से कहीं अधिक बढ़कर बड़ी व महान है (1 यूहन्ना 4ः4; यूहन्ना 16ः33)। चाहे आन्धी-तूफानों के बीच हमें लगे कि परमेश्वर ख़ामोश व निश्क्रिय है, चाहे प्रार्थनाओं के उत्तर हमें हमारी अपेक्षाओं के विपरीत मिलें, चाहे यूसुफ व पौलुस के समान हमें एक के बाद एक निराशाओं व विषमताओं से होकर क्यों न गुज़रना पड़े - हम दृढ़ निश्चय करें कि हम अपने परमेश्वर पिता से लिपटे रहेंगे - उसमें बने रहेंगे क्योंकि उसमें ही हमारी विजय की निश्चितता है (रोमियों 8ः37-38)। उसमें ही हमारे जीवन उपयोगी, सार्थक व सफल होते हैं (यूहन्ना 15ः5-6)। उसमें ही हमारा अनन्त सुनिश्चित है (यूहन्ना 5ः24)।

बिना निराश हुए साहस के साथ सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए सबसे प्रमुख तथा आवश्यक बात परमेश्वर पर दृढ़ विश्वास रखना है।

2. परमेश्वर का भय:- परमेश्वर का भय मानना बुद्धि का प्रारम्भ है (नीतिवचन 1ः7)। जिनके हृदय में परमेश्वर का कोई भय नहीं होता है, वे सांसारिकता व भौतिकवाद में पूरी तरह डूबे रहते हैं। उन्हें आत्मा, परमात्मा व अनन्त की कोई परवाह नहीं होती है। वे सोचते हैं कि वे सब कुछ जानते हैं, उन्हें सब कुछ आता है।

परमेश्वर के भय का अर्थ होता है उसके प्रति ऐसा प्यार, आदर व समर्पण होना कि उसके साथ, प्यार, सामर्थ्य व अनुग्रह के बिना जीवन की कल्पना से भी मन में सिहरन उत्पन्न हो। वर्तमान संसार में पाप को अधिकांशतः हर स्थान पर आकर्षक व महिमामण्डित कर लोकप्रिय फैशन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। साथ ही परमेश्वर के मूल्यों और मापदण्डों को दकियानूसी करार कर उनका मखौल तक उड़ाया जाता है।

परमेश्वर के भय के द्वारा ही हम ध्यान पूर्वक यह निर्णय लेते हैं कि हम क्या देखेंगे, क्या सुनेंगे, कैसी संगति में रहेंगे, किन बातों से बिल्कुल दूर रहेंगे व किन बातों में आगे बढ़ेंगे।?

परमेश्वर के भय के द्वारा ही हम लोगों व परिस्थितियों से निर्भय होकर परमेश्वर के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं (2 तीमुथियुस 1ः7; यशायाह 41ः10; भजन संहिता 27ः1,3)।

3. शरीर पर नियंत्रण रखें:- परमेश्वर ने हमको शरीर दिया है। शरीर में भावनाएं व इच्छाएं दी हैं। इस शरीर को अपने मन की लालसाओं को पूरा करने का माध्यम समझकर आगे बढ़ना बहुत त्रासदीपूर्ण बात होती है। ऐसे लोग सब प्रकार की दुर्भावनाओं व दुर्वासनाओं के मायाजाल में फंस जाते हैं। इनके जीवन में स्वार्थ व सांसारिकता ही प्राथमिकता हो जाती है।

शरीर को नियंत्रण में रखने के लिए आवश्यक है कि हम स्वीकार करें कि हमारा शरीर पवित्रात्मा का मन्दिर है (1 कुरिन्थियों 3ः16-17)। हम निर्णय करें कि हम अपने शरीर को शैतान का हथियार नहीं बनने देंगे परन्तु हम अपने शरीर के अंगों को परमेश्वर की महिमा के लिए उसके हाथों में समर्पित करेंगे (रोमियों 12ः1; 6ः12-13)। हम जानें कि हम शारीरिक इच्छाओं व भावनाओं को पूरी कर कभी भी परमेश्वर को ग्रहणयोग्य जीवन नहीं जी सकते हैं, जैसा परमेश्वर के महान दास पौलुस ने भी रोमियों 7ः14-24 में इस अन्र्तद्वन्द्व को खूबसूरती से प्रगट किया है। गलातियों 5ः19-20 में शरीर के कामों की स्पष्ट सूची है। इन कामों में ध्यान लगाकर आगे बढ़ना विनाश की ओर कदम बढ़ाना है (रोमियों 8ः6-8,14)। इच्छाओं व भावनाओं का नियंत्रण केवल पवित्रात्मा तथा परमेश्वर की आज्ञाओं की आधीनता स्वीकार करने के द्वारा ही सम्भव है (1 यूहन्ना 2ः4-6; 1 यूहन्ना 1ः6-7; 1 यूहन्ना 3ः24; यूहन्ना 8ः51; रोमियों 6ः16)।

यदि हम इन तीन प्रमुख आधारभूत बातों का ध्यान रखेंगे तो हमें मन्ज़िल बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देगी और हमारे कदम सही दिशा की ओर बढ़ते जाएंगे।

डाॅ. श्रीमती इन्दु लाल