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मनन

परिपक्वता

मत्ती 5ः41-42

“और जो कोई तुझे कोस भर बेगार में ले जाए तो उसके साथ दो कोस चला जा। जो कोई तुझ से मांगे, उसे दे; और जो तुझ से उधार लेना चाहे, उस से मुंह न मोड़”।

परमेश्वर के वचन में बहुत सी ऐसी बातें हैं, ऐसा लगता है कि जिन तक व्यवहारिक रूप में हम पहुंच नहीं पाएंगे। अपने बैरियों से प्रेम रखने की बात है, जो एक कोस बेगार में ले जाए उसके साथ दो कोस जाने की बात है। जो कुर्ता मांगे उसे दोहर देने की बात है, और लिखा हुआ है कि कोई तेरे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा भी फेर दे। लिखा हुआ है सिद्ध बनो जैसा तुम्हारा पिता सिद्ध है। प्रश्न यह उठता है कि परमेश्वर के समान सिद्ध कैसे बनें? परन्तु यदि हम देखें तो इन बातों में व्यवहारिकता है। मात्र उथलेपन से देखने से हमें बहुत सी बातें समझ में नहीं आतीं परन्तु हम गहराई में उतरें तो पाते हैं कि व्यक्ति परिपक्व तभी होता है जब वह ऊंचाइयों तक पहुंचता है।

जो परिपक्व व्यक्ति है जिसमें आत्मिक परिपक्वता है, उस व्यक्ति के जीवन में उसका उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए। एक स्पष्ट उद्देश्य हमारे जीवन में होना चाहिए। यदि हम से कोई पूछता है कि आपके जीवन का क्या उद्देश्य है तो एक वाक्य में हम उस उद्देश्य को स्पष्ट कर सकें। उदाहरण के लिए यह उद्देश्य हो सकता है कि मैं परमेश्वर की सेवा करना चाहता हूं। कोई दूसरा उद्देश्य भी हो सकता है। क्या हमारा उद्देश्य हमारे सामने स्पष्ट है? जीवन की दिशा हमने निर्धारित की है कि नहीं?

पौलुस के जीवन में हम देखते हैं, बहुत से बाइबिल चरित्रों में हम देखते हैं कि उन्हें मालूम था कि उनको किस दिशा में जाना है। इसलिए पौलुस कहता है कि पीछे की बातों को छोड़कर मैं आगे की ओर दौड़ा चला जाता हूं।

इसलिए हमें अपने जीवन में परिपक्वता और सन्तुलन के साथ, अपने काम को पूरा करना है। कभी अपनी भावनाओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना है। जब इस दिशा में हम बढ़ेंगे तो परमेश्वर के रास्ते पर बहुत तेज़ी से हम आगे बढ़ सकेंगे। हमारे जीवन में परिपक्वता आएगी और हम सही दिशा में आगे बढ़ने वाले हो सकेंगे।

प्रार्थना -पिता परमेश्वर, हमारी अगुवाई करें कि हम आपके वचन पर चलते हुए आपकी योजना को पूर्ण करने वाले बन सकें। आमीन!