नीतिवचन 4ः23 “सब से अधिक अपने मन की रक्षा कर; क्योंकि जीवन का मूल स्त्रोत वही है”। जीवन में सन्तुलन बनाए रखना बहुत ज़रूरी है। जीवन में बहुत सी बातें सामने आती हैं और हमको सन्तुलन बना कर चलना पड़ता है। सर्वप्रथम हम विश्वास और व्यवहारिकता के बीच में सन्तुलन बनाएं। परमेश्वर ने हमें बुद्धि दी है, उसका सही इस्तेमाल करें। उसके द्वारा अपने कार्यों में व्यवहारिकता लाएं। हम भोजन अपने सामने रख लें और प्रार्थना करें कि पेट भर जाए तो ऐसा नहीं होगा। परमेश्वर ने हमें हाथ दिये हैं, परमेश्वर ने हमें दिमाग दिया है। जब तक अपने हाथों से भोजन उठाकर अपने मुंह में नहीं डालेंगे हमारा पेट नहीं भरेगा। हम बच्चे से कहें कि बस तुम तो प्रार्थना करते रहो और परीक्षा देने चले जाओ और तैयारी नहीं करो तो उसका परिणाम क्या होगा हम समझ सकते हैं। हमें अपने जीवन में व्यवहारिकता और विश्वास के बीच में एक सन्तुलन बना कर चलना है। हमें दिल और दिमाग के बीच में सन्तुलन बनाकर चलना है और यह बहुत कठिन काम है। अक्सर हमारे मनों में एक अन्र्तद्वन्द्व चलता है, मन कुछ कहता है और दिमाग कुछ कहता है और तब मस्तिष्क और हृदय के बीच एक संघर्ष चलता है। इस कारण से हमें अपने हृदय और दिमाग के बीच सही सन्तुलन बनाकर चलना है। जब ऐसा सन्तुलन का जीवन हम जीएंगे तो परमेश्वर हमें आशीषित करेगा, हमारे कार्यों को आशीषित करेगा, हमारे परिवारों को आशीषित करेगा। यदि हमारा चिन्तन सही हो तो फिर हमारे जीवन की दिशा भी सही होगी। प्रार्थना -परमेश्वर पिता, हमें ऐसी समझ दे कि हम अपने विश्वास को और अपने जीवन के सन्तुलन को दृढ़ बनाए रख सकें और उसे अपने कार्यों से प्रकट कर सकें जिसके द्वारा तेरी गवाही हमारे जीवनों से लोगों तक पहुंच सकें। आमीन!