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मनन

अवसरों के द्वार

उत्पत्ति 7ः1-16

“तब यहोवा ने उसका द्वार बन्द कर दिया”।

उत्पत्ति की पुस्तक बाइबिल की पहली पुस्तक है। इस पुस्तक में बहुत सी बातों का प्रारम्भ कैसे हुआ, इन बातों का वर्णन है। इस बात का वर्णन है कि किस प्रकार से परमेश्वर ने सृष्टि की रचना की, सृष्टि का प्रारम्भ कैसे हुआ। इस बात का वर्णन है कि किस प्रकार से मनुष्य ने पाप किया। उसके बाद इस बात का वर्णन है कि किस प्रकार परमेश्वर का क्रोध मनुष्यों पर भड़का और हम पाते हैं कि निरन्तर जैसे-जैसे मनुष्य बढ़ते गए पृथ्वी पर पाप भी बढ़ता गया और उसके बाद लिखा है कि परमेश्वर ने यह सब देखा तो उसको पछतावा हुआ। जो पछतावा शब्द है वास्तव में वह पछताने वाली बात नहीं है। परन्तु वास्तव में परमेश्वर दुखित हुआ, खेदित हुआ। उसके बाद लिखा हुआ है कि परमेश्वर ने निर्णय कर लिया कि मैं सारी पृथ्वी पर से मनुष्यों, पशुओं, रेंगने वाले जन्तुओं और सब पक्षियों को मिटा दूंगा।

उसके बाद लिखा हुआ है कि परमेश्वर ने नूह के घराने को देखा और यह पाया कि नूह का घराना धर्मी था। उसने नूह से कहा कि एक जहाज़ बना और जहाज़ किस प्रकार से बनाना है इस बात की भी व्याख्या परमेश्वर ने की, उसके बाद हम पाते हैं कि नूह जहाज़ बनाता है। अपने परिवार के साथ पृथ्वी पर जितने पशु पक्षी थे और रेंगने वाले जन्तु थे, सब को दो-दो अर्थात् नर और मादा को वह जहाज़ में रखता है। जब नूह के परिवार के लोग और जीव जन्तु जहाज़ में चढ़ गए तो लिखा हुआ है, तब यहोवा ने उसका द्वार बन्द कर दिया।

परमेश्वर हमें अवसर देता है, परमेश्वर सम्भावनाओं के द्वार खोलता है, परमेश्वर हमें बार-बार चिताता है, सम्भालने का प्रयास करता है। परमेश्वर हमें क्षमा करता है, परमेश्वर अपना अनुग्रह हम पर बरसाता है। परन्तु यह वही परमेश्वर है जो द्वार बन्द भी करता है, यह वही परमेश्वर है जो सीमाएं बनाता है, जो बताता है कि हमारी सीमाएं क्या हैं।

क्या आपने उस समय के लिए तैयारी कर ली है। जीवन की तैयारी के लिए, परमेश्वर से मिलने की तैयारी के लिए, अपने जीवन को परमेश्वर के योग्य बनाने के लिए, क्या हम वास्तव में तैयार हैं? इस बात पर हमें ग़ौर करना है क्योंकि वह दिन आने वाला है जब सम्भावनाओं, समय और अनुग्रह का खुला हुआ द्वार बन्द हो जाएगा।

प्रार्थना -पिता परमेश्वर, आपने हमें अब तक सम्भाला है, मार्गदर्शन कीजिए कि आपके अनुग्रह में होकर अनन्त के द्वार में प्रवेश कर सकें। आमीन!