मत्ती 20ः20-22 “उस ने, उन से पूछा, यह मूर्ति और नाम किस का है? उन्होंने उस से कहा, कैसर का; तब उस ने उन से कहा; जो कैसर का है, वह कैसर को, और जो परमेश्वर का है, वह परमेश्वर को दो”। इस संसार में रहते हुए अनेक सम्बन्धों में हम जीते हैं। मित्रता का सम्बन्ध, पति-पत्नी का सम्बन्ध, पिता और बेटे का सम्बन्ध होता है। इन सम्बन्धों में समस्याएं और दरार तब आती है जब हमारी अनुचित अपेक्षाएं होती हैं। यदि पति की अनुचित अपेक्षाएं हैं पत्नी से, तो समस्याएं आ जाती हैं। पति कहता है कि मैं नहीं चाहता तुम घर से बाहर निकलो, मैं नहीं चाहता कि घर में कोई आए और तुम उससे बातें करो। मैं नहीं चाहता कि जब कार्यक्रमों में हम जाएं तो तुम किसी और से बात करो। पत्नी की भी कुछ अनुचित अपेक्षाएं हो सकती हैं। जब अनुचित अपेक्षाएं हमारे जीवन में आ जाती हैं तो ये सम्बन्धों को तोड़ देती हैं। हमारे बीच में भयंकर गहरी दरार पैदा कर देती हैं। मित्र की मित्र से अनुचित अपेक्षाएं हो जाएं, माता-पिता की बच्चों से अनुचित अपेक्षाएं हो जाएं तो सम्बन्ध टूट जाते हैं। हर एक सम्बन्धों में सीमाओं का ध्यान रखना आवश्यक है। यदि सीमाओं का ध्यान नहीं रखा जाएगा तो धीरे-धीरे भीतर से ये चीज़ें बड़ी घातक हो सकती हैं। एक अवसर पर प्रभु यीशु मसीह के पास जबदी के पुत्रों की माता आती है और उससे अनुचित अपेक्षाएं करती है। वह कहती है कि मैं चाहती हूं कि जब तू अपने राज्य में आए तो मेरा एक पुत्र तेरी दाहिनी ओर और एक पुत्र तेरी बांयी ओर बैठे। अनुचित अपेक्षाओं के बारे में बाइबिल में बहुत से सन्दर्भ हैं। वास्तव में होता यह है कि अनुचित अपेक्षाओं का हम मूल्यांकन कर नहीं पाते और ये हमको तोड़ देती हैं। हमें अपने जीवन में देखना है, स्वयं का मूल्यांकन करना है। हमारे सम्बन्धों में हमारी अनुचित अपेक्षाएं तो नहीं हैं? क्योंकि ये अनुचित अपेक्षाएं कैंसर के समान घातक होती हैं। हमारे जीवन में यदि ऐसा है तो हम ध्यान रखें कि हमारे जीवन में इस प्रकार की अनुचित अपेक्षाओं का कोई स्थान न हो और यह तब सम्भव है जब वास्तव में हमको क्या मिलेगा, इससे ज़्यादा बढ़कर इस बात पर ग़ौर करें कि हम क्या कर सकते हैं। हम अपने जीवन का पुर्नमूल्यांकन करें और ऐसी अनुचित अपेक्षाओं को अपने जीवन से दूर करें। इन्हें जीवन से जितना दूर रख सकेंगे उतना ही स्थायित्व हमारे सम्बन्धों में होगा, उतना ही आदरणीय स्थान हमारा होगा और उतना ही हम परमेश्वर की दृष्टि में धन्य होंगे। प्रार्थना -पिता परमेश्वर, मुझे सामथ्र्य दीजिए कि अनुचित अपेक्षाओं की ओर मेरा ध्यान न हो वरन अपने कत्र्तव्यों एवं ज़िम्मेदारियों को निभा सकूं। आमीन!