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मनन

पहला सा प्रेम

प्रकाशितवाक्य 2ः4

“पर मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है कि तू ने अपना पहिला सा प्रेम छोड़ दिया है”।

प्रकाशितवाक्य की पुस्तक के दूसरे अध्याय में यूहन्ना सातों कलीसियाओं के नाम जो बातें लिखता है, उनमें एक बात वह इफिसुस की कलीसिया को लिखता है, जहां प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है कि तूने अपना पहला सा प्रेम छोड़ दिया है।

बहुत आसान होता है कि हम अपना पहला सा प्रेम छोड़ दें। कोई ऐसा पति अगर कहे कि जैसा प्रेम मैंने अपनी पत्नी से प्रारम्भ में किया था उस प्रेम में कोई कमी नहीं आई है, वह प्रेम बढ़ता ही गया है। और मात्र पति कहे न बल्कि पत्नी भी उसको मान ले तो यह बहुत बड़ी बात होगी। यदि आप कह सकें कि आपके माता-पिता से या भाई से या अपने मित्र से आपका प्रेम जो था वह बढ़ता ही गया है तो यह बहुत बड़ी बात होगी। परन्तु यहां पर पहला सा प्रेम त्याग देने की बात है। अक्सर पहला सा प्रेम कम हो जाना बड़ा आसान सा होता है, बड़ा सामान्य सा होता है।

प्रभु यीशु मसीह से जो हमारा पहला सा प्रेम था, क्या वह बना हुआ है या वह चला गया है? जब हम मसीही जीवन में प्रवेश करते हैं तो बहुत उत्साह होता है, हृदय बहुत धन्यवाद से भरा होता है, प्रभु यीशु मसीह की बातें हम करते हैं, प्रभु यीशु मसीह के वचनों का हम अध्ययन करते हैं, प्रभु यीशु मसीह से हम प्रार्थना करते हैं परन्तु उसके बाद हम पाते हैं कि धीरे-धीरे हमारे जीवन में इन बातों की कमी आ जाती है।

यदि हमें अपना पहला सा प्रेम बरकरार रखना है तो आवश्यकता इस बात की है कि जिस उम्मीद से, जिस उत्साह से, जिस प्रेरणा से, जिस एकाग्रता से, जिस खुशी से हमने मसीही जीवन में पदार्पण किया है। उसको हम अपने दिलों से, अपने मनों से जाने न दें, उसमें हम निरन्तर आगे बढ़ते जाएं।

प्रार्थना -पिता परमेश्वर, हमें अगुवाई दे कि हम तेरे वचन पर चलते हुए आपकी नज़दीकी और प्रेम में बने रहें। आमीन!