नीतिवचन 22ः24 “क्रोधी मनुष्य का मित्र न होना, और झट क्रोध करनेवाले के संग न चलना”। परमेश्वर का भय मानने का क्या प्रभाव है? इस प्रश्न के बहुत से उत्तर दिये जा सकते हैं। परन्तु सबसे प्रमुख बात यह है कि जो व्यक्ति परमेश्वर का भय मानता है वह अपने जीवन में सदैव सही निर्णय करेगा। हमारे जीवन की सफलता-असफलता और हमारे जीवन की नियति का निर्धारण हमारे निर्णय पर आधारित होता है। यदि हम सही निर्णय करेंगे तो उसके अच्छे परिणाम हमको मिलेंगे। अगर हम ग़लत निर्णय करेंगे तो उसके दुष्परिणाम हमको मिलेंगे। यह बात बिल्कुल सीधी, सच्ची और साफ है। परन्तु कभी हमने अपने हृदय को टटोला है, कभी अपने आप से यह प्रश्न पूछा है कि हमारे जीवन के निर्णय, चाहे वे छोटे हों, चाहे बड़े, वे किस आधार पर होते हैं? हमें आराधना के लिए चर्च जाना है नहीं जाना, यह निर्णय अगर इस बात पर आधारित है कि हमको क्या अच्छा लगता है तो अक्सर हमारी इच्छा नहीं होगी। सुबह से उठकर हमको नहीं लगेगा कि आज हमको चर्च की आराधना में जाना है, या हमको आज दफ्तर जाना है, या आज हमको कक्षा अटेन्ड करना है, या हमको अपना अध्ययन करना है। इस प्रकार का निर्णय, जो हमारी इच्छाओं के आधार पर होता है और हमारी इच्छाओं के आधार पर किये गये निर्णय की नियति हमको, हमारे परिवार को बर्बाद कर सकती है और इसके दुष्परिणाम हमसे सम्बन्धित लोगों को भी प्रभावित कर सकते हैं। आज सुबह हम प्रार्थना करें कि अपने जीवन के निर्णय परमेश्वर के भय को प्रधान जानकर परमेश्वर की इच्छा के प्रकाश में लेने वाले बन सकें। परमेश्वर की इच्छा में जब हम निर्णय लेंगे, उसके भय के प्रभाव में हम निर्णय लेंगे तो हमारा जीवन सही दिशा में होगा। हमारी आत्मा सही दिशा में होगी और हम निश्चित रूप से उस मंज़िल तक पहुंच सकेंगे जो परमेश्वर ने हमारे लिए निर्धारित की है। प्रार्थना -परमेश्वर पिता, आपको धन्यवाद देते हैं कि वचन के द्वारा हम इस बात को समझ सके कि आपके भय में रहकर अपने जीवन के निर्णय करें। आमीन!