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मनन

परमेश्वर के प्रश्न

उत्पत्ति 3ः9

“तब यहोवा परमेश्वर ने पुकारकर आदम से पूछा, तू कहां है?”

इस संसार में दो इच्छाएं हैं, एक परमेश्वर की इच्छा और दूसरी शैतान की इच्छा। हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम परमेश्वर की इच्छा पर चलें। शैतान हमको प्रेरित करता है कि परमेश्वर से अलग हमारी स्वतंत्र इच्छा हो जाए। परमेश्वर से हट कर हम स्वतंत्रता से अपना निर्णय ले सकें और वहीं से पाप प्रारम्भ होता है। हो सकता है कि परमेश्वर की इच्छा के रास्ते पर हम चल रहे हों, परन्तु हमारा अपना भी रास्ता हो सकता है। बुराई का रास्ता नहीं, भ्रष्टाचार का रास्ता नहीं, पर हम अपने मन के मालिक हों। परमेश्वर ने हमें स्वतंत्रता दी है कि हम अपना रास्ता खुद बना सकते हैं।

बड़ी खूबसूरती से शैतान हमको पाप करने के लिए प्रेरित करता है। हम कोई बुरा कार्य नहीं कर रहे परन्तु यदि हम परमेश्वर की इच्छा से अलग अपनी इच्छा से चल रहे हैं तो यह एक गम्भीर समस्या है, यह हमारी आत्मा को विनाश के कगार पर ले जा सकती है। इसलिए हमें प्रयास करना चाहिए कि हम परमेश्वर की इच्छा और उसकी योजना के ही रास्ते पर चलें और उन्हीं सीमाओं में रहकर अपने जीवन के निर्णय ले सकें।

परमेश्वर ने हमें स्वतंत्रता दी है। परन्तु उस स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि हम परमेश्वर की इच्छा से और उसके वचन के रास्ते से अलग हो जाएं। जब यह बात हो जाती है और हम पाप में पड़ जाते हैं तो परमेश्वर का पहला प्रश्न यही होता है जो उसने आदम से पूछा था कि तू कहां है? अगर आज परमेश्वर मुझसे और आपसे प्रश्न करे कि तू कहां है तो हमारा क्या उत्तर होगा?

ऐसा नहीं था कि परमेश्वर नहीं जानता था कि आदम और हव्वा कहां हैं। वह जानता था कि वे शारीरिक रूप से किस स्थिति में हैं! वे आत्मिक रूप से किस स्थिति में हैं! यही परमेश्वर आज हमसे भी यह प्रश्न करता है कि तू कहां है? हम दुनिया से तो झूठ बोल सकते हैं, दुनिया को तो हम धोखा दे सकते हैं, परन्तु जब परमेश्वर हमसे पूछता है कि तू कहां है तो हम परमेश्वर से छुप नहीं सकते।

उसे अधिकार है पूछने का कि तू कहां है? अगर हम पाते हैं कि हम ग़लत स्थान पर हैं, हमने पाप किया है, हम परमेश्वर से दूर हैं तो परमेश्वर हमें आज खुद को सुधारने का एक और मौका देता है।

प्रार्थना -परमेश्वर पिता, हमें ज्ञान और बुद्धि से परिपूर्ण करिये कि हम अन्धकार से निकलकर तेरे प्रकाश में चलने वाले बन सकें। आमीन!