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मनन

सम्बन्ध

होशे 6ः4-6

“मैं बलिदान से नहीं, स्थिर प्रेम से ही प्रसन्न होता हूं, और होमबलियों से अधिक यह चाहता हूं कि लोग परमेश्वर का ज्ञान रखें”।

बहुत से सम्बन्धों के जाल में मनुष्य जीता है। जीवन में हमारे बहुत से सम्बन्ध होते हैं, बिना सम्बन्धों के हम जी नहीं सकते। हमारे पारिवारिक, व्यक्तिगत एवं सामाजिक सम्बन्ध होते हैं। सम्बन्ध बहुत ज़रूरी होते हैं पर सबसे बड़ा और सबसे प्रमुख जो सम्बन्ध होता है और जो सारे सम्बन्धों के लिए मानो नींव के समान होता है, वह हमारा सम्बन्ध परमेश्वर के साथ होता है। हमारा सम्बन्ध परमेश्वर के साथ सही है तो निश्चित रूप से मनुष्यों के साथ भी हमारा सम्बन्ध सही होगा। आधारभूत बात यह है कि हमारा सम्बन्ध परमेश्वर के साथ कैसा है? यहां पर छठवीं आयत में परमेश्वर के वचन में लिखा है कि मैं बलिदान से नहीं परन्तु स्थिर प्रेम से प्रसन्न होता हूं।

क्या हमारा प्रेम परीक्षाओं में मज़बूत बना रहता है? जीवन के दुख दर्दों में, मृत्यु की छाया में, शारीरिक पीड़ा में, मानसिक तनाव में, आत्मिक निराशा में, क्या हमारा प्रेम ठण्डा हो जाता है? क्या हमारा प्रेम भोर के मेघ के समान होता है, जो थोड़ी देर के लिए छाता है और चला जाता है? क्या हमारा प्रेम सबेरे उड़ जाने वाली ओस के समान होता है, जो थोड़ी सी धूप की किरणों से ओझल हो जाती है?

परमेश्वर से हमारा प्रेम निरन्तरता का हो, नज़दीकी का हो, दृढ़ता का हो। परमेश्वर के प्रति हमारा प्रेम विश्वासयोग्यता, सच्चाई और समर्पण के साथ हो। जिसमें सरलता हो, जिसमें उसकी उपस्थिति का अहसास हो, जिसमें गवाही हो, जिसमें आडम्बर न हो, जिसमें दिखावा न हो, जो सतही न हो, जो ऊपरी न हो पर हृदय की गहराई से हो। अन्त में जब हमारे हृदय की धड़कनों का अन्तिम स्पंदन हो और हमारी श्वास की रफ्तार थम जाए, उस रफ्तार के थमने की आखिरी मंज़िल तक, जीवन के आखिरी पड़ाव तक, हमारा प्रेम परमेश्वर के प्रति मज़बूत हो, स्थिर हो, और दृढ़ता का हो तो हम परमेश्वर की दृष्टि में धन्य होंगे।

प्रार्थना -परमेश्वर पिता, हमारे टूटे हुए मन को आप स्वीकार करें और अपनी सामर्थ्य से भर दें कि हम आपकी समीपता में बने रहें। आमीन!