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मनन

चेतावनी

प्रकाशितवाक्य 2ः5

“सो चेत कर, कि तू कहां से गिरा है, और मन फिरा और पहिले के समान काम कर; और यदि तू मन न फिराएगा, तो मैं तेरे पास आकर तेरी दीवट को उस स्थान से हटा दूंगा”।

चेतावनियां जीवन के हर सन्दर्भ में आवश्यक होती हैं। चेतावनियां हमारे सामने आती हैं। चाहे हम बालक हों, युवा हों, किशोर हों, चाहे हम शिक्षा प्राप्त कर रहे हों। हम कार्य कर रहे हों, चाहे हम जीवन के किसी भी क्षेत्र में हों; चेतावनियां प्रमुख होती हैं और चेतावनियां हमारे जीवन में आती हैं।

परमेश्वर के वचन में जो चेतावनियां दी गई हैं वे हमारे इस सांसारिक जीवन ही नहीं वरन् उसके बाद हमारे अनन्त के लिए हैं। इस संसार में आनन्द प्राप्त करने के लिए, सुख और शान्ति प्राप्त करने के लिए कुछ सीमाएं हैं और उन सीमाओं से पार जाने पर कुछ चेतावनियां हैं। अक्सर उन चेतावनियों की हम अवहेलना करते जाते हैं, और सोचते हैं कि परमेश्वर निरन्तर क्षमा करता जाएगा। हम निरन्तर परमेश्वर के न्याय और उसके धैर्य की परीक्षा करते हैं और उसके बाद एक समय ऐसा आता है कि परमेश्वर को परखने के प्रयास में स्वयं अनन्त विनाश की ओर चले जाते हैं।

परमेश्वर का वचन हमसे कहता है कि बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है। परमेश्वर का वचन हमसे कहता है कि हमें अपने हृदय को नियंत्रण में रखना है। हमें अपने मन की चौकसी करना है। परमेश्वर का वचन कहता है कि हमें किसी से कपट की बात नहीं करना है। हमें किसी के लिए अपशब्द नहीं कहना है। किसी पर ग़लत दृृष्टि नहीं डालना है। परन्तु इन चेतावनियों की हम अवहेलना करते हैं और मानसिक रूप से हम अपने विचारों को नियंत्रित कर नहीं पाते।

इसलिए आवश्यकता है कि हम अपने विचारों को केन्द्रित रखें। इसलिए प्रतिदिन प्रार्थना करना, वचन का अध्ययन करना, उसके मार्ग पर चलना, प्रति भोर अपने अध्ययन को प्रारम्भ करने के पहले परमेश्वर की निकटता में आना आवश्यक है। ताकि ऐसा करने से हमें अपने जीवन की सीमाओं को याद रखें। हम अपने विचारों को नियंत्रण में रख सकें। हम अपने हृदय की चौकसी कर सकें क्योंकि जीवन का मूल स्त्रोत हमारा हृदय ही है।

प्रार्थना -परमेश्वर पिता, आपकी संगति हमारे जीवन में बनी रहे, जिससे कि आपकी चेतावनियों की हम अवहेलना न करें वरन् आपके बताए हुए मार्ग पर चलने वाले बने रहें। आमीन!