लूका 19ः1-10 “जक्कई ने खड़े होकर प्रभु से कहा; हे प्रभु, देख, मैं अपनी आधी सम्पत्ति कंगालों को देता हूं, और यदि किसी का कुछ भी अन्याय करके ले लिया है तो उसे चैगुना फेर देता हूं”। जीवन में यदि हमें परिपक्वता की ओर बढ़ना है तो हमारे जीवन में विकास होना चाहिए और यह विकास तभी सम्भव है जब हम अपने जीवन में परिवर्तन लाने के लिए तैयार हों। जो व्यक्ति यह सोच लेता है कि मैं बहुत जानता हूं, मैं बहुत समझता हूं, मुझको और सीखने की आवश्कता नहीं है। वह व्यक्ति कभी मानसिक रूप से, आत्मिक रूप से बढ़ नहीं सकता। इसलिए हमारे जीवनों में परिवर्तन होना बहुत आवश्यक है। परिवर्तन होने के लिए एक और बात होती है और वह यह कि जब हमें इस बात का अहसास हो कि हमारे जीवन में कुछ कमियां हैं, हमारे जीवन में कुछ कमज़ोरियां हैं और यह बहुत प्रमुख बात है कि हम अपने जीवन की कमज़ोरियों को स्वीकार कर सकें। इस सम्बन्ध में बात यही है कि संसार हमको बाहर से बदल सकता है परन्तु प्रभु यीशु मसीह है जो भीतर से परिवर्तन लाता है। संसार हमको बाहर से बदल सकता है, हमारी प्रतिष्ठा बदल सकता है हमारी डिग्रियों के द्वारा, हमारे पद के द्वारा। परन्तु वास्तव में जो परिवर्तन भीतर से आता है वही वास्तविक परिवर्तन होता है और ऐसा वास्तविक परिवर्तन प्रभु यीशु मसीह करने में सक्षम है। प्रभु यीशु मसीह के सम्पर्क में लोग आते हैं और जो लेने वाला है, जो स्वार्थी है वह उदार बन जाता है। जो पापिनी स्त्री है वह प्रभु यीशु मसीह के सम्पर्क में आती है, तो प्रभु यीशु मसीह के गुणों का वर्णन करने वाली प्रचारिका बन जाती है। प्रभु यीशु मसीह आन्तरिक परिवर्तन लाने में सक्षम है। परमेश्वर की चेतावनियां हमारे जीवन के लिए हैं, हमारे शारीरिक जीवन के लिए हैं, हमारे सम्बन्धों के लिए हैं, हमारे लाभ के लिए हैं, हमें सही दिशा देने के लिए हैं। हमें अनन्त में सही दिशा की ओर ले जाने के लिए हैं। जब हम अपने जीवनों में परिवर्तन लाएंगे तभी हम अनन्त जीवन में स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकेंगे। प्रार्थना -परमेश्वर पिता, हमारी अगुवाई करिये कि हम अपने जीवन में परिवर्तन ला सकें और जैसा प्रभु यीशु ने हमसे प्रेम किया वैसा ही हम दूसरों को प्रेम करने वाले बन सकें। आमीन!