रोमियों 12ः10 “भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे पर मया रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो”। हमारे जीवनों में भोजन, वस्त्र और छत के अलावा भी हमारी बहुत सी आवश्यकताएं होती हैं। ऐसी बहुत सी आवश्यकताएं होती हैं जो हमारे मन से, हमारे दिल से जुड़ी हुई होती हैं और उन आवश्यकताओं में से एक आवश्यकता है प्रोत्साहन की। हम में से कोई भी ऐसा नहीं जिसे प्रोत्साहन की आवश्यकता न हो। प्रोत्साहन हमारे जीवनों में ईंधन का काम करता है। जैसे गर्मी की तपन में हवा का झोंका होता है। जैसे प्यास से त्रस्त व्यक्ति को ठण्डे पानी से सन्तुष्टि मिलती है। जैसे अकाल से ग्रसित क्षेत्र में वर्षा की फुहार होती है; वैसे ही हमारे जीवनों में प्रोत्साहन होता है। प्रतिदिन जीवन की तपन से गुज़रते हुए, लोगों के तानों व आलोचनाओं को सहते हुए, कठिनाइयों से, संघर्षों से गुज़रते हुए हर व्यक्ति को प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है। परन्तु यह प्रोत्साहन आज के संसार में बहुत कठिनाई से मिलता है। यदि प्रोत्साहन की प्रमुखता को हम समझें तो हम न सिर्फ़ इस बात को समझेंगे कि हमें प्रोत्साहन की आवश्यकता है। परन्तु उससे भी एक कदम आगे इस बात को समझ सकेंगे कि हमें भी प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। मसीही जीवन में कुछ बातें बिना मूल्य की होती हैं, जो हम किसी के लिए कर सकते हैं। जैसे प्रार्थना की बात है, उसी प्रकार प्रोत्साहन की बात है। वचन में लिखा है कि तुम प्रतिदिन एक दूसरे को प्रोत्साहित करो। किसी लेखक ने लिखा है कि प्रोत्साहन का अंग्रेज़ी शब्द ‘एनकरेज़मेन्ट’ होता है जो अंग्रेज़ी भाषा के ‘ई’ शब्द से शुरु होता है और यह ई विटामिन ई के समान हमारे जीवन में काम करता है। हमारे जीवन में शक्ति का संचार करता है। हमारे शरीर, हमारे जीवनों, हमारे मनो में स्फूर्ति लाता है। आज मैं यह बात आपके सामने रखना चाहता हूं कि जब दिन समापन की ओर जाए तो आप अपने आप से पूछें कि क्या मैंने अपने जीवन में आज किसी को प्रोत्साहित किया है? प्रार्थना -परमेश्वर पिता, हमें ऐसा हृदय दे कि हम दूसरों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण न रखें बल्कि तेरे वचन के अनुसार लोगों को प्रोत्साहित करने वाले हों। आमीन!