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मनन

असफलता नज़दीक लाती है

2 कुरिन्थियों 4ः8-9, 17

“हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते; निरुपाय तो हैं, पर निराश नहीं होते, सताए तो जाते हैं’ पर त्यागे नहीं जाते; गिराए तो जाते हैं; पर नाश नहीं होते”।

पिछले दिनों में हमने परमेश्वर के वचन के दर्पण में इस बात पर मनन किया है कि जब हमारे जीवन में असफलता आती है तो उसका क्या प्रभाव पड़ता है। असफलता हमारे घमण्ड को तोड़ती है और हमें परमेश्वर की निकटता में लाती है। इस सन्दर्भ में एक और बात परमेश्वर का वचन हमें बताना चाहता है, कि जब असफलता जीवन में आती है तो हमें लोगों के निकट लाती है। अक्सर हम अपने कार्य क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए अपने मित्रों से बहुत आगे बढ़ जाते हैं। हमें लगने लगता है कि हमारे सहकर्मी तो बहुत छोटे हैं, अयोग्य हैं, हम तो उनसे बहुत अच्छे हैं। हम उनसे बहुत अधिक योग्य हैं। हम में उनसे ज़्यादा कर्मठता है। हम बहुत होशियार हैं।

परन्तु जब हम असफल होते हैं तो वास्तव में हम धरातल पर आ जाते हैं और तब लोगों से हम जुड़ते हैं। तब हमें अहसास होता है कि हम लोगों के सहयोग के बिना कोई काम नहीं कर सकते। हमें अहसास होता है कि जिस व्यक्ति को हम हेय दृष्टि से देखते थे, वह व्यक्ति भी हमारे लिए प्रमुख है। वह व्यक्ति जिसका हमने कभी आदर नहीं किया, उसका प्रेम भी हमारे लिए प्रोत्साहन का कारण है। जब हम टूटते हैं तो वास्तव में हम जुड़ते हैं लोगों से और तब हम जुड़ते हैं उनसे, जो असफल होते हैं, जो टूटते हैं, हम उनकी पीड़ा को समझ सकते हैं क्योंकि अब हम भी उसी पीड़ा से गुज़र चुके हैं। असफलता हमें लोगों से जोड़ती है।

प्रार्थना - परमेश्वर पिता, धन्यवाद देते हैं जीवन के कठिन पलों को हमें देने के लिए क्योंकि इन्हीं पलों में हम अपने लोगों की अहमियत को महसूस कर पाते हैं। आमीन!