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मनन

कार्य के प्रति हमारा नज़रिया

मत्ती 20ः12-13

“उस ने उन में से एक को उत्तर दिया, कि हे मित्र, मैं तुझ से कुछ अन्याय नहीं करता; क्या तू ने मुझ से एक दीनार न ठहराया? जो तेरा है, उठा ले, और चला जा; मेरी इच्छा यह है, कि जितना तुझे, उतना ही इस पिछले को भी दूं। क्या उचित नहीं कि मैं अपने माल से जो चाहूं सो करूं”?

एक स्थान पर मन्दिर बन रहा था और बहुत से मज़दूर काम कर रहे थे। एक यात्री वहां से गुज़रा और रुका, बनते हुए मन्दिर की तरफ अपनी नज़र दौड़ाई और एक मज़दूर जो वहां काम कर रहा था उससे पूछा, कि तुम क्या कर रहे हो? जवाब मिला कि देखते नहीं हो, मैं मज़दूरी कर रहा हूं। वह व्यक्ति थोड़ा सा आगे बढ़ा और दूसरे मज़दूर से यही प्रश्न किया। उस मज़दूर ने जवाब दिया, मैं अपनी रोजी-रोटी कमा रहा हूं। उस यात्री ने तीसरे मज़दूर से भी यही प्रश्न किया और उसे जवाब मिला, कि पत्थर फोड़ रहा हूं। परन्तु जब वह चौथे के पास गया और उससे यही प्रश्न किया, तो उसने मुस्कुराते हुए कहा, मैं मन्दिर बना रहा हूं।

अक्सर अपने कार्य क्षेत्र में हम यह भूल जाते हैं कि कार्य चाहे कैसा भी हो, परमेश्वर ने हमें वहां पर रखा है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि मात्र हम रोजी-रोटी कमा रहे हैं, कभी लगता है कि सारे कठिन काम हमें ही थमा दिये जाते हैं, कभी ऐसा लगता है कि हमारे साथ पक्षपात होता है, कभी ऐसा लगता है कि हमें इतनी यात्राएं करनी पड़ती हैं कि हम अपने परिवार को समय ही नहीं दे पाते। परन्तु जो बात है वह यह कि जिस कार्य को हम कर रहे हैं, उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है।

उससे भी बढ़कर जो बात है वह यह कि यदि हम किसी ऐसे कार्य में लगे हैं, किसी ऐसी संस्था में सेवारत हैं, जहां से प्रभु यीशु मसीह की गवाही एवं सेवा के कार्य किये जाते हैं तो हमें इस बात को और भी दृढ़ता से अपने हृदय में लाना है कि जो भी कार्य हमें दिया जाए उसे हम परमेश्वर की सेवा समझकर सम्पूर्ण समर्पण से करें।

प्रार्थना - परमेश्वर पिता, हमको ऐसी समझ दे कि हम अपने कार्यों को आपके द्वारा दी गई ज़िम्मेदारी समझकर सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ, सम्पूर्ण समर्पण के साथ पूर्ण कर सकें। आमीन!