मत्ती 11:1—6 “यूहन्ना ने बन्दीगृह में मसीह के कामों का समाचार सुनकर अपने चेलों को उस से यह पूछने भेजा। कि क्या आनेवाला तू ही है: या हम दूसरे की बाट जोहें? यीशु ने उत्तर दिया, कि जो कुछ तुम सुनते हो और देखते हो, वह सब जाकर यूहन्ना से कह दो”। आज के समय में किसी के ऊपर दोश लगाना बहुत आसान सी बात हो गई है। किसी के ऊपर आरोप लगाना बड़ा आसान होता है और कुछ लोगों को ऐसा करने में बड़ा अच्छा लगता है। परन्तु ऐसी बातें व्यक्ति की अपरिपक्वता और उसकी उथली मानसिकता को दर्शाती हैं और इन सबसे बढ़कर वह अपनी आत्मा की हानि उठाता है। जब इस प्रकार की झूठी अफवाहों का शिकार हम होते हैं तो अक्सर हमारे मन में कटुता की भावना आ जाती है। हम निराश हो जाते हैं, हम क्रोधित हो जाते हैं। हमें लगने लगता है कि ऐसी झूठी अफवाह फैलाने वालों को उनकी करनी का दण्ड हम किस प्रकार से दें। आज वचन का यह सन्दर्भ हमें बताता है कि ऐसी आलोचनाओं का जवाब ख़ामोशी के साथ अपने कार्य में आगे बढ़ते जाना है। जब हमारे प्रति झूठी आलोचनाएं की जाएं तो हमें उन्हें नकारात्मक भाव से नहीं लेना है। इन सब उथली बातों से उठकर हमें कुछ करना है, हमें अपनी दिशा में, अपने कार्य क्षेत्र में और अपनी कर्म भूमि में आगे बढ़ते जाना है। हमें यह समझना है कि जो आरोप लगाने वाला है, वह अपनी उथली मानसिकता में उलझ कर अपने जीवन को खोखला करता जाएगा और उसके इस कार्य का परिणाम परमेश्वर उसे देगा। जब हमारी आलोचना हो, जब हमारी विश्वसनीयता और खराई पर झूठे आरोपों की आंच आए तो हम भी कह सकें कि प्रमाणों को स्वयं देख लीजिए, मुझे कहने की आवश्यकता नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे यीशु मसीह ने कहा, जाकर यूहन्ना से कह दे कि अन्धे देखते हैं, लंगड़े चलते हैं, कोढ़ी शुद्ध किये जाते हैं, बहरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाए जाते हैं, और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है। प्रार्थना -परमेश्वर पिता, अपने वचन के द्वारा हमें दृढ़ कर कि हम इस संसार की आलोचनाओं से उबरकर तेरी योजना और तेरी इच्छा के अनुसार बढ़ते जाएं। आमीन!