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मनन

उचित और अनुचित

1 कुरिन्थियों 10ः23

“सब वस्तुएं मेरे लिये उचित तो हैं, परन्तु सब लाभ की नहीं: सब वस्तुएं मेरे लिये उचित तो हैं, परन्तु सब वस्तुओं से उन्नति नहीं” ।

आज का संसार भौतिक उपलब्धियों का संसार है। आज संसार में ऐसी-ऐसी वस्तुएं हैं जिनकी शायद हमने कुछ साल पहले तक कल्पना भी नहीं की थी। जिस प्रकार से विज्ञान और तकनीक में विकास और प्रगति हो रही है, वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि आज से पांच साल बाद का जो संसार होगा उसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते। परन्तु जिस तेज़ी के साथ भौतिकवाद का विकास हुआ है उतनी ही तेज़ी से आत्मिक मूल्यों का हृास भी हुआ है। चाहे किसी भी क्षेत्र में देखेंः हम पाते हैं कि हर ओर अपना स्वार्थ सर्वोपरि है।

मनुष्य की नैतिकता का मूल्य घटता जा रहा है और वह परमेश्वर के भय से दूर हटता जा रहा है। पौलुस प्रेरित के द्वारा लिखा गया यह पद हमारे लिए चिन्तन का एक बिन्दु लेकर आता है कि सब वस्तुएं हमारे लिए उचित तो हैं परन्तु सब वस्तुएं हमारे लाभ की नहीं।

अपने जीवन में प्रत्येक कदम पर हमें निर्णय करना पड़ते हैं, चाहे वे व्यक्तिगत हों या पारिवारिक। परन्तु निर्णय करते समय हमको इस बात को समझना है कि हमारे लिए उचित क्या है। कौन सी बातें उचित लगते हुए भी इस संसार में समस्याओं का कारण और हमारी आत्मा की हानि का कारण बन सकती हैं और कौन सी बातें हमारे लिए आत्मिक लाभ की हैं।

परमेश्वर का वचन हमको यह बताता है कि हमें इस बात में अन्तर करना सीखना है कि हमारे लिए कौन सी बातें उचित हैं और कौन सी अनुचित। यदि हम इतना अन्तर करना सीख जाएं तो जीवन की बहुत सी समस्याएं खुद ही दूर हो जाएंगी और हम परमेश्वर की समीपी में आगे बढ़ सकेंगे।

प्रार्थना - परमेश्वर पिता, अपने वचन के दर्पण में हमें उचित एवं अनुचित में अन्तर करना सीखने की दृष्टि प्रदान करें। आमीन!