स्वर्ग: पिता का घर
सन्दर्भ: प्रकाशितवाक्य 4:1-6
मुझे लगभग 40 वर्ष हो गए प्रचार करते हुए । बहुत से स्थानों पर परमेश्वर ने प्रचार करने का मौका दिया , बहुत सी पुस्तकें लिखने का अवसर दिया । यदि आप पूछें कि मेरा सबसे प्रिय विषय कौन सा है जिस पर मैं प्रचार करना चाहता हूं , जिस पर मैं लिखना चाहता हूं , जिसकी खोज करना चाहता हूं ? तो वह विषय है मृत्यु । हर व्यक्ति अपने जीवन में मृत्यु के विषय में अवश्य सोचता है । एक सर्वे के दौरान किसी वैज्ञानिक ने कहा कि एक व्यक्ति एक दिन में औसतन 14 बार अपनी मृत्यु के विषय में सोचता है । मृत्यु का आगमन निश्चित है , मृत्यु से हम बच नहीं सकते , मृत्यु से होकर हमको गुज़रना है । इसलिए बाइबिल में सभोपदेशक 8:8 में लिखा है - ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसका वश प्राण पर चले कि वह उसे निकलते समय रोक ले , और न कोई मृत्यु के दिन पर अधिकारी होता है । यह बात परमेश्वर का वचन कहता है कि कोई भी मृत्यु के दिन पर अधिकारी नहीं हो सकता । चाहे कोई कितना भी बड़ा विद्वान हो , वैज्ञानिक हो , कितना भी बड़ा चिकित्सक हो; मृत्यु के दिन पर कोई अधिकारी नहीं हो सकता । कोई भी मृत्यु को कोई रोक नहीं सकता । ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसका प्राण पर वश चले । मृत्यु का उम्र से कोई सम्बन्ध नहीं होता । कोई बाल्यकाल की अवस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है , कोई युवा , कोई प्रौढ़ और कोई बुजुर्ग होकर । व्यक्ति चाहे जाना-माना हो , चाहे गुमनाम हो , पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़ हो , शक्तिशाली हो या कमज़ोर , धार्मिक हो या फिर अधर्मी हो । खिलाड़ी हो या अनाड़ी , स्वस्थ हो या बीमार , प्रसन्न हो , चाहे दुःखी; मृत्यु हर एक व्यक्ति को स्पर्श करती है । सभोपदेशक 3:20 में लिखा है - सब मिट्टी से बने हैं , और सब मिट्टी में फिर मिल जाते हैं । 11 सितम्बर 2001 की उस सुबह 5000 लोग अमेरिका के न्यूयोर्क शहर में वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर में काम करने को गए थे । एक सामान्य सा दिन था । सामान्य सी दिनचर्या से वे लोग गुज़र रहे थे । कोई कॉफ़ी पी रहा था , कोई बॉस से बात कर रहा था , कोई अपने पिता की हालत पूछ रहा था , कोई फोन पर बात कर रहा था , कोई पैसा ले रहा था , कोई चेक काट रहा था । परन्तु वे नहीं जानते थे कि मृत्यु से उनकी दूरी केवल एक क़दम की है । एक हवाई जहाज़ उस इमारत से आकर टकराता है और वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर को धराशायी कर देता है । पल भर में हज़ारों लोग समाप्त हो जाते हैं । कुछ वर्षों पहले भोपाल में भयानक दुर्घटना हुई । उस सुबह छोटे-छोटे बच्चे रिक्षों , ऑटो और स्कूल बसों में बैठकर अपने स्कूल जा रहे थे । किसी की मां ने टिफिन बॉक्स तैयार किया था , किसी के पिता ने बच्चे को पढ़ाया था कि बेटा तुम्हारा एग्ज़ाम है , किसी की मां ने बच्चे को नहलाया था , किसी को ज़बरदस्ती स्कूल भेजा गया था । जब वे रास्ते में जा रहे थे तो यूनियन कार्बाइड प्लांट से मिथाइल आइसो-साइनाइट गैस लीक हो गई और स्कूल के रास्ते में ही वे 1200 बच्चे दम घुटने से मृत्यु का शिकार हो गए । कुछ साल पहले क्रिसमस की तैयारियों के दौरान 24 दिसम्बर को 40 हज़ार लोग ईरान में भूकम्प के कारण मृत्यु का शिकार हो गए । दक्षिण भारत में एक शादी के मण्डप में आग लग गई और बहुत से लोग जलकर मर गए । लोगों ने सोचा होगा कि हम वहां विवाह का जश्न मनाने के लिए जा रहे हैं । लोगों ने सोचा होगा आनन्द का अवसर होगा , उत्सव का माहौल होगा , गीत गाए जाएंगे , संगीत होगा और घर में नई बहू को लेकर आएंगे परन्तु मण्डप में आग लग गई और बहुत से लोग मर गए । मेरे बड़े भाई राजकमल डेविड लाल कुछ वर्षों पूर्व उस रात दिल्ली में थे , जिस रात दिल्ली में बहुत से बम ब्लास्ट हुए । मेरे भाई को उसी रास्ते से नई दिल्ली रेल्वे स्टेशन जाने के लिए गुज़रना था । किसी ने बताया कि भैय्या ट्रेन तो दूसरी तरफ से आती है , अजमेरी गेट की तरफ से जाएं । पहले प्लेटफार्म से न जाएं पीछे से जाएं और वह दूसरी तरफ से चले गए । जिस समय उनको उस पहले प्लेटफॉर्म पर होना था उसी स्थान पर , उसी सड़क पर , उसी समय धमाका हुआ और लोगों की लाशो के चिथड़े उड़ गए । कोई ट्रेन में यात्रा करता है । उत्साह और आनन्द है कि कार्य से छुट्टी मिली है , अब अपने प्रिय लोगों से मिलेंगे । लोग तैयारी करते हैं कि हमारे मेहमान आ रहे हैं , कुछ अच्छा खाना बनाएंगे , कहीं घूमने जाएंगे , पिकनिक मनाएंगे और तब फोन पर खबर आती है , जो जीवन की धारा को बदल देती है । पता चलता है कि उस ट्रेन का एक्सीडेन्ट हो गया । जीवन के चित्र को यदि हम सांसारिक नज़रिये से देखें तो उस चित्र में मृत्यु की छाया जब पड़ती है तो एक निराशा और समापन की स्थिति दिखाई देती है । ऐसा लगता है सब कुछ समाप्त हो गया । परन्तु प्रभु यीशु मसीह के परिप्रेक्ष्य में जब हम मृत्यु को देखते हैं तब मृत्यु नकारात्मक नहीं सकारात्मक हो जाती है । मृत्यु पीड़ादायक समाचार नहीं परन्तु सुसमाचार बन जाती है । मृत्यु संसार के लिए तो समापन का दृश्य है परन्तु किसी विश्वासी के लिए अनन्त जीवन का द्वार बन जाती है । मृत्यु ऐसे जीवन का द्वार बन जाता है जहां एक बेहतर जीवन है । जहां एक बेहतर निवास स्थान , एक बेहतर देह , एक बेहतर संगति और एक बेहतर प्रारम्भ स्थान है । इसलिए मैं आपसे स्वर्ग के विषय में बातचीत करना चाहता हूं , जो हम सभी की मंज़िल होना चाहिए । जो हमारे जीवन के चित्र में , हमारे उद्देश्य में होना चाहिए । हम अपने जीवन में छोटे-छोटे उद्देश्य को लेकर यहां-वहां भटकते रहते हैं । परन्तु अगर हम अपने जीवन के बड़े चित्र को देखें जिसमें मृत्यु है , जिसमें स्वर्ग है तो हम सही रास्ते पर जाएंगे । स्वर्ग के सम्बन्ध में हम चार बातें देखेंगे । वास्तव में स्वर्ग का सटीक वर्णन करना किसी भी व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं है । स्वर्ग का चित्र बनाना किसी चित्रकार के लिए सम्भव नहीं है। स्वर्ग के सम्बन्ध में गीतों को तैयार करना और उसको संगीत में ढालना असम्भव कार्य है परन्तु हम देखें कि परमेश्वर के वचन में स्वर्ग के सम्बन्ध में क्या वर्णन किया गया है । 1. स्वर्ग एक स्थान है:- स्वर्ग कोई काल्पनिक स्थान नहीं है, कहानियों में गढ़ा गया स्थान नहीं है । स्वर्ग , स्वप्न में देखी हुई प्रतिच्छाया नहीं है , परियों की कहानियों की बात नहीं है । मूवीज़ की शूटिंग के लिए लगाया हुआ सेट नहीं है परन्तु एक निश्चित स्थान है । प्रकाशितवाक्य 21:1 में लिखा है - फिर मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा , क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी , और समुद्र भी न रहा । स्वर्ग एक पवित्र नगर है , उसे एक नया यरूशलेम कहा गया है । एक वास्तविक स्थान है , उसका एक नाम है , उसको एक संज्ञा दी गई है । उसमें खूबसूरती है । लिखा है कि वह दुल्हिन के समान थी जो पति के लिए श्रृंगार किए हो; पर मैंने सिंहासन पर से किसी को ऊंचे शब्द से यह कहते हुए सुना कि देख परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है । वह उनके साथ डेरा करेगा , वे उसके लोग होंगे; परमेश्वर आप उनके साथ रहेगा । और वह उनका परमेश्वर होगा । प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में विभिन्न स्थानों पर हम पाते हैं- प्रकाशितवाक्य 4:1 - स्वर्ग में एक द्वार है । दूसरी आयत में लिखा हुआ है - उसमें एक बड़ा सिंहासन है । चौथी आयत में लिखा है - चौबीस और सिंहासन हैं । पांचवी आयत में लिखा है - वहां प्रकाश है, वहां आवाज़ है । छठवीं आयत में - वहां परमेश्वर की आराधना हो रही है और वहां स्वयं परमेश्वर उपस्थित है । प्रकाशितवाक्य 21 में लिखा है कि वहां एक पवित्र नगर है , सजाया हुआ नगर है । एक नगर है उसकी एक नींव है , उसकी बुनियाद है , उसमें फाटक है । प्रकाशितवाक्य 7:15 - वहां सड़कें है; वहां परमेश्वर का मन्दिर है । प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में 16 बार यह बात आई है कि स्वर्ग में परमेश्वर का मन्दिर है । एक ऐसा स्थान है जो परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए अपने हाथों से तैयार किया है । 1 कुरिन्थियों 2:9 में लिखा है - परन्तु जैसा लिखा है , कि जो आंख ने नहीं देखी , और कान ने नहीं सुनीं , और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं वे ही हैं , जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिये तैयार की हैं । स्वर्ग एक तैयार किया हुआ स्थान है । प्रकाशितवाक्य 21:21 में लिखा है - और बारहों फाटक , बारह मोतियों के थे; एक एक फाटक , एक एक मोती का बना था; और नगर की सड़क स्वच्छ कांच के समान चोखे सोने की थी । सांसारिक दृष्टिकोण से देखें तो सोना प्रतिष्ठा का , मान-मर्यादा और सम्पन्नता का प्रतीक है । जिसके पास जितना अधिक सोना है , वह उतना धनवान है । हमारी अर्थव्यवस्था का आधार है । मैं जब स्कूल में था तो अपने टीचर से पूछता था कि भारत में गरीबी क्यों है ? क्यों नहीं भारत ढेर सारे नोट छाप देता जिससे गरीबी दूर हो जाए ? जिनके पास नहीं है उनको और दे दें । उसमें क्या दिक्कत है ? तब मेरे शिक्षक ने बताया कि बेटा , ऐसा नहीं होता; देश में जितना सोना होता है उसके आधार पर तय किया जाता है कि कितनी मुद्रा मुद्रित होगी ? हमारी अर्थव्यवस्था का आधार , संसार की अर्थव्यवस्था का आधार सोना बन गया है । परन्तु प्रकाशितवाक्य में लिखा है - प्रभु यीशु कहते हैं कि स्वर्ग में हमारे यहां सड़कें सोने की हैं । यदि मैं एक डामर का टुकड़ा लाकर दिखाऊं जो सड़क पर आसानी से मिल सकता है । यदि उस पर मैं गर्व करूं और कहूं कि यह टुकड़ा रखना बड़ी प्रतिष्ठा की बात है । इसके आधार पर सब चलता है , इसी के आधार पर आदमी की अहमियत नापी जाती है संसार में , इसी के आधार पर सारी अर्थव्यवस्था चलती है । यदि मैं ऐसा कहूं तो लोग कहेंगे कि मैं बेवकूफी की बात कर रहा हूं । यह टूटा हुआ कचरा गिट्टी और डामर का टुकड़ा कैसे इतना महत्वपूर्ण हो सकता है! परमेश्वर कहता है इस संसार में तुम्हारे लिए सोने की बात महत्वपूर्ण है! इस संसार में पद और प्रतिष्ठा, अहंकार और धन और बड़े सम्मान की बात है; हमारे यहां तो इसकी सड़कें होती हैं । उसका कोई अर्थ नहीं है स्वर्ग में । परमेश्वर कहता है बेवकूफ हो तुम लोग जो ऐसी-ऐसी बातों के लिए लड़ते हो , रिश्तो को तोड़ते हो , जीवन भर इसे पाने के लिए प्रयास करते हो । जो चीज़ संसार में प्रतिष्ठा की बात है वह परमेश्वर के लिए महत्वहीन डामर है । 2. स्वर्ग हमारे पिता का घर है:- यूहन्ना 14:2-3 में लिखा है - मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं , यदि न होते , तो मैं तुम से कह देता क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूं । और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूं , तो फिर आकर तुम्हें अपने यहां ले जाऊंगा , कि जहां मैं रहूं वहां तुम भी रहो । पिता का घर चाहे कैसा भी हो ? चाहे कितना भी पुराना हो , पर पिता का घर पिता का घर पिता का घर होता है! पिता का घर अपना घर होता है । एक लम्बी यात्रा के बाद , कठिन परिश्रम के बाद बच्चा लौटता है , कहां ? अपने पिता के घर । अपना कार्य पूरा करने के बाद बेटा लौटता है , बेटी लौटती है अपने पिता के घर । अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद बच्चे रास्ता देखते हैं कहां लौटना है ? अपने पिता के घर । जब सब कुछ समाप्त हो जाता है , जब सुअरों का सा जीवन हो जाता है , जब वह अपने आपे में आता है तो वह उड़ाऊ पुत्र , लौटता है अपने पिता के घर । पिता का घर जहां आराम है , जहां अपनापन है । जहां प्रेम और अपनों का बसेरा है! पिता का घर जो अपनी आंखें बिछाए , अपनी बांहें पसारे हुए है , जहां कोई रास्ता देख रहा है । जब मैं और मेरी पत्नी इन्दु और मेरे परिवार के और भी लोग इन्दु के घर बिलासपुर जाते थे तो रात का समय हो या दिन का समय हो , घर के बाहर उनके पिता डॉ. डगलस हेनरी ज़रूर हम लोगों को मुस्कुराकर अपने गले लगाते थे । आज जब अपने पिता के घर जाता हूं तो अपनी पत्नी से यही कहता हूं कि मुझे लगता है कि मेरे पिता का घर यही है । मैं याद करता हूं अपने पिता को जिनकी कैन्सर से अनेक वर्षों पूर्व मृत्यु हो गई । मेरे पिता ने मेरे साथ अधिक समय नहीं बिताया , बहुत व्यस्त जीवन रहा उनका , काफी संघर्ष किया , कभी-कभी महीने हो जाते थे उनसे बातचीत नहीं होती थी । मुझे याद आता है हमारे बंगले के सामने लगे नीम के पेड़ के पास बैट पकड़कर पापा खड़ा कर देते थे और सामने से बॉल फेंकते थे । इस तरह वह मुझे क्रिकेट खिलाना सिखाते थे । अब न पिता हैं , और न वह नीम का पेड़ पर पिता का घर , पिता का घर है । अफ्रीका के एक मिशनरी के जीवन की घटना है । उसका नाम सैमुएल मॉरिसन था । सैमुएल मॉरिसन 25 वर्ष तक अफ्रीका में सेवा करता रहा । परमेश्वर के वचन का प्रचार करता रहा । इन 25 वर्षों तक वह कभी अमेरिका वापिस नहीं लौटा । 25 वर्षों के बाद वह पानी के जहाज़ से न्यूयॉर्क आ रहा था । उसी जहाज़ में अमेरिका के राष्ट्रपति टेडी रोज़वेल्ट भी यात्रा कर रहे थे । टेडी रोज़वेल्ट , शिकार करने और जंगली जानवरों को मारने के लिए 14 दिन की यात्रा पर अफ्रीका गए थे और अब लौटकर वापस आ रहे थे । जब जहाज़ न्यूयॉर्क के तट पर पहुंचता है , हज़ारों लोग मौजूद हैं । बहुत से लोग फूल लिए हुए खड़े हैं । बहुत से लोग तालियां बजा रहे हैं । बहुत से लोगों के हाथ में गुब्बारे हैं । बहुत से लोग खड़े होकर म्यूज़िक बजा रहे हैं। राष्ट्रपति के स्वागत के लिए हज़ारों लोग मौजूद हैं , जो 14 दिन जानवरों को मारकर अपने देश वापिस लौट रहे हैं । तब सैमुएल मॉरिसन देखता है इन हज़ारों लोगों को और तालियों की गड़गड़ाहट को , और गुब्बारों को , और म्यूज़िक को । उसके बाद वह जहाज़ से बाहर निकलता है तो उसको पता चलता है कि उसे लेने कोई नहीं आया । तब वह प्रार्थना करता है कि पिता परमेश्वर एक व्यक्ति जो 14 दिन शिकार खेलकर वापिस लौट रहा है , उसका ऐसा भव्य स्वागत और मैं तेरा दास हूं , तेरे वचन का प्रचार करके 25 वर्षों के बाद मैं लौट रहा हूं । मुझको लेने यहां पर एक भी व्यक्ति नहीं है । कोई ताली नहीं , कोई फूल नहीं , कोई भी यहां पर नहीं है , यह कैसी बात है । सैमुएल मॉरिसन लिखते हैं तब मुझे एक आवाज़ आई जिसने कहा - माई डियर सन , यू आर नॉट होम येट! मेरे बेटे अभी तुम घर कहां पहुंचे हो! हम यह कल्पना भी नहीं कर सकते जब हम पिता के घर जाएंगे तो किस प्रकार से हमारा स्वागत होगा । इसीलिए फिलिप्पियों 3:20 में लिखा है - पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम पर उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहां से आने की बाट जोह रहे हैं । 2 कुरिन्थियों 5:1 में लिखा है - क्योंकि हम जानते हैं , कि जब हमारा पृथ्वी पर का डेरा सरीखा घर गिराया जाएगा तो हमें परमेश्वर की ओर से स्वर्ग पर एक ऐसा भवन मिलेगा , जो हाथों से बना हुआ घर नहीं परन्तु चिरस्थाई है । यह डेरा है , यह तम्बू है , एक दिन जब यह तम्बू गिराया जाएगा तब हमें परमेश्वर की ओर से एक भवन मिलेगा । यह डेरा है वह भवन है , यह तम्बू है वह घर है । हमें एक ऐसा भवन मिलेगा जो हाथों से बनाया हुआ घर नहीं परन्तु चिर-स्थाई है । जिसे हमारे पिता ने हमारे लिए तैयार किया है । यह मसीही जीवन की आशा है । यह अनन्त जीवन की आशा है कि जब हमारा पृथ्वी पर का डेरा सरीखा घर गिराया जाएगा तो हमें वह भवन मिलेगा जो हमारे पिता ने हमारे लिए तैयार किया है । 3. स्वर्ग अनन्त शान्ति का स्थान है; सिद्धता का स्थान है:- प्रकाशितवाक्य 7:16-17 में स्वर्ग के विषय में 7 बातें लिखी हुई हैं । 7 सिद्धता का अंक है और स्वर्ग के वर्णन में 7 बातें लिखी हुई हैं । पहली बात - वहां कोई दुःख नहीं है । दूसरी बात - वहां परमेश्वर की छाया है । परमेश्वर का आश्रय है । तीसरी बात - कोई भूख और प्यास नहीं है । चौथी बात - कोई धूप और तपन नहीं है । वहां सूर्य और चन्द्रमा की ज़रूरत नहीं है । धूप और तपन की ज़रूरत नहीं है । प्रकाशितवाक्य 22:5 में लिखा है - और फिर रात न होगी , और उन्हें दीपक और सूर्य के उजियाले का प्रयोजन न होगा , क्योंकि प्रभु परमेश्वर उन्हें उजियाला देगाः और वे युगानुयुग राज्य करेंगे । परमेश्वर स्वयं वहां उपस्थित है । सूर्य और चन्द्रमा को बनाने वाला , उन्हें प्रकाशित करने वाला , उन्हें तेज देने वाला स्वयं वहां उपिस्थत है । उसका चेहरा तेजोमय है , उससे इतना प्रकाश होगा कि फिर दीपक और सूर्य के उजियाले का प्रयोजन नहीं होगा । यह बाइबिल में लिखा हुआ है । पांचवीं बात - मेम्ना उनकी रखवाली करेगा अर्थात् प्रभु यीशु मसीह हमारी रखवाली करेगा । छठवीं बात - परम संतुष्टि होगी । वह मेम्ना प्रभु यीशु मसीह , जल के स्त्रोतों के पास हमें ले जाएगा । सातवीं बात - परमेश्वर उनकी आंखों से सब आंसू पोंछ देगा । बुराई , द्वेष , घृणा , आलोचना , बीमारी , कमज़ोरी , दर्द , ख़तरा , दुःख , गरीबी , भविष्य की असुरक्षा; ये सारी बातें समाप्त होंगी । प्रकाशितवाक्य 21:1 में लिखा है - मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा , क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी , और समुद्र भी न रहा । डॉ. बिली ग्राहम की बेटी एन ग्राहम ने अपनी एक नॉवेल ‘माय फादर्स हाउस’ में स्वर्ग का वर्णन किया है। इस पुस्तक में 36 वें पृष्ठ पर उन्होंने एक घटना का वर्णन किया है । वह महिलाओं की एक सभा में भाषण देने गईं थीं । जब सभा समाप्त हुई तो एक महिला रोते हुए उनके पास आई और उसने रोते हुए अपनी कहानी सुनाई । उसने बताया कि किस प्रकार दक्षिण अमेरिका के एक कस्बे में , झुग्गी-झोपड़ियों के इलाके में वह बढ़ी पली । उसने बताया कि किस प्रकार उसके स्वयं के भाइयों ने छोटी सी अवस्था में उसके साथ बलात्कार किया । उसने बताया कि किस प्रकार उसके माता-पिता ने उसको परेशान किया । उसको लोहे की सलाखों से मारा । किस प्रकार उसके रिश्तेदारों और उसके पड़ोसियों ने उसके साथ घृणित काम किया और उसका जीवन बहुत पीड़ादायक रहा । उसने एन से कहा , उन पुरानी बातों को मैं भूल नहीं पाती । उन लोहे की सलाखों को और वह बलात्कार जो मेरे साथ किया गया , उसको मैं भूल नहीं पाती । वह पीड़ा मेरे दिल और दिमाग में आ जाती है । वह पीड़ा मेरे जीवन पर हावी हो जाती है । वे स्मृतियां मैं अपने दिल से , अपने मन से अलग नहीं कर पाती । एन ग्राहम ने कहा बहन , मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती परन्तु यदि तुम प्रभु यीशु के साथ हो तो एक दिन आएगा जब वह स्वयं अपने हाथों से तुम्हारे आंसू पोंछ देगा। तब कोई चोटें नहीं होंगी , तब कोई घाव नहीं होंगे , तब कुछ स्मृतियों के स्थान नहीं रह जाएंगे । हमारे दिल , हमारे मन से वे सारे दाग मिट जाएंगे । तब केवल आनन्द ही आनन्द होगा , उत्साह ही उत्साह होगा क्योंकि परमेश्वर अपने हाथों से सारे आंसू पोंछ डालेगा । यह उसका वचन है , यह उसकी प्रतिज्ञा है । एक गांव में दो कबीलों में किसी बात को लेकर अन्तर्कलह हो गया । उन दोनों कबीलों में झगड़ा हो गया , मार-पीट मच गई । यहां तक कि गोले चले , बन्दूकें चलीं । एक गोला वहां की चर्च बिल्डिंग में आकर भीतर की ओर दीवार में फट गया और उस गोले ने वहां पर काले रंग का घिनौना धब्बा बना दिया । वह धब्बा वहां पर कई वर्षों तक बना रहा । एक दिन एक टीम वहां पर आई । उस टीम में एक व्यक्ति था , वह कहता है कि कलीसिया की दीवाल पर ये जो धब्बे , दाग हैं , इसके लिए मैं कुछ करना चाहता हूं । पासबान ने कहा बिल्कुल करिये । वह व्यक्ति अपने बैग में से कुछ ब्रश , कुछ पेन्सिल और कुछ रंग निकालता है और उस धब्बे को वह प्रभु यीशु मसीह के क्रूसित होने का एक खूबसूरत चित्र बना देता है । उसके नीचे वह अपना दस्तखत करता है , एडविन लेन्ड सील जो कि सर एडविन सील कहलाए । एडविन सील ग्रेट ब्रिटेन के महान चित्रकार हुए । परमेश्वर भी कुछ ऐसा ही चित्र बनाता है । जब हम अपने आपको उसे समर्पित करते हैं तो वह हमारे हृदय के दाग , धब्बे लेता है और एक खूबसूरत ब्रश लेकर प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का चित्र हमारे हृदय की पटिया पर बना देता है । तब हमारे दिल के जो दाग हैं , वे हमारी गवाही बन जाते हैं । जो हमारी स्मृतियों के अंश हैं वे प्रभु यीशु को पुकारते हैं । जो घाव हमें लगे हैं उन से प्रभु यीशु की महिमा होती है और वे चोटें हमारे जीवन की गवाही बन जाती हैं । 4. स्वर्ग मिलन का स्थान है:- स्वर्ग अनन्त मिलन का स्थान है । जहां हमारा मिलन परमेश्वर से होगा । हम परमेश्वर को ऐसे देखेंगे जैसे आमने-सामने । हम देखेंगे और कहेंगे , यह इब्राहीम जा रहा है , यह याकूब जा रहा है , यह दानिय्येल जा रहा है । इसी को तो सिंहों की मांद में डाल दिया गया था , अरे! बात तो कर लो , ज़रा पूछ तो लो । कोई कहेगा देखो पौलुस बैठा है , उससे कुछ चर्चा तो कर लो । प्रभु यीशु मसीह के चेले हैं उनसे मिल तो लो । हमारे बिछड़े हुओं से , हमारे प्रियों से हमारी मुलाकात होगी । 2 शमूएल 12:23 में दाऊद अपने बेटे के लिए प्रार्थना करता है जो बीमार था । वह उसके लिए उपवास रखता है , भक्तिभाव से परमेश्वर से मांगता है , दिन-रात अपने बेटे की बीमार देह के पास गिड़गिड़ाता है । मगर उसका बेटा मर जाता है । दाऊद अपने बेटे के मरने के बाद कहता है - वह मेरे पास लौटकर न आएगा पर मैं तो उसके पास जाऊंगा । यह निश्चितता केवल प्रभु यीशु मसीह में हमें मिल सकती है । मेरे पिता तो लौटकर नहीं आएंगे पर मैं उनके पास जाऊंगा । जब हमारे किसी प्रिय की मृत्यु होती है और अन्तिम बार उसको आप विदा देते हैं , दर्शन करते हैं या आप जब प्रभु वाटिका में जाते हैं और प्रिय की क़ब्र के पास खड़े होते हैं , आपकी आंखों में आंसू होते हैं , आपकी पलकें बोझिल होती हैं । परन्तु हमारे पास भी दाऊद के समान ऐसा विश्वास होना चाहिए कि हम भी यह कह सकें कि वह तो मेरे पास लौटकर नहीं आएंगे पर मैं उनके पास जाऊंगा । कौन जा सकता है इस प्रभु यीशु के पास ? कौन जा सकता है उस परमेश्वर के पास ? कौन जा सकता है उस अनन्त जीवन में ? जिसने प्रभु यीशु को अपने दिल में ग्रहण किया । जिसने उसके वचन के अनुसार पश्चाताप किया । जिसने उसके वचन के अनुसार उसके नाम का बपतिस्मा लिया । जिसने प्रभु यीशु मसीह के सामने यह निर्णय किया कि वह मेरा उद्धारकर्ता है , वह मेरा बल , मेरी चट्टान , मेरा मित्र , मेरा स्वामी और मेरा अनन्त है । स्वर्ग में बिना प्रभु यीशु के कोई नहीं जा सकता । चाहे हमारे पास कितनी भी डिग्रियां हों , चाहे हम में कितनी भी योग्यता हो । इंग्लैण्ड की बहुत पुरानी घटना है । किसी बहुत बड़े शहर में डॉ. डी.एल. मूडी जो कि बहुत प्रसिद्ध विद्वान प्रचारक हुए हैं , सन्देश देने के लिए आने वाले थे । उस शहर के चारों तरफ कोयले की खदानें थीं । इन कोयले की खदानों में एक लड़का काम करता था । उसकी उम्र करीब 15-16 वर्ष की थी । उसने सुना डॉ. डी. एल. मूडी शहर में आने वाले हैं । उसने सोचा कि जैसे ही मेरा काम खत्म होगा मैं उनको सुनने के लिए जाऊंगा । उसका काम खत्म होता है , वह पैदल यात्रा शुरू करता है । उसके पास बग्घी थी नहीं और कोई दूसरा साधन उन दिनों उस क्षेत्र में नहीं था । जब वह उस हॉल के प्रवेश द्वार पर पहुंचा जहां डी.एल. मूडी आने वाले थे तो द्वार पर खड़े व्यक्ति ने उसके कन्धे पर हाथ रखकर पूछा - तुम कौन हो ? बालक बताता है मैं फलां-फलां हूं । मैं यहां डी.एल. मूडी को सुनने के लिए आया हूं । वह व्यक्ति कहता है - तुम इस भव्य ऑडिटोरियम में जाने के योग्य नहीं हो । तुमने अपने हाथ देखे हैं , उनमें कालिख लगी है । तुमने अपना चेहरा देखा है , जो चेहरा तुम बिना धोए चले आए हो । तुमने अपने कपड़े देखे हैं ? इस स्तर के व्यक्ति को इस ऑडिटोरियम में घुसने नहीं दिया जाएगा । तुम्हारी औक़ात क्या है ? यहां से चले जाओ । उसके बाद वह लड़का कोशिश करता है कि किसी दरवाजे़ , खिड़की से वह जा सके । पर सब कुछ बन्द था । वह सीढ़ियों पर बैठकर रोने लगता है । बहुत दिनों से उसकी तमन्ना थी कि डी.एल. मूडी वहां पर आएंगे , उनके भाषण को वह सुनेगा । तब एक गाड़ी रुकती है और गाड़ी से एक बड़ा आकर्षक दिखने वाला व्यक्ति उतरता है । उसके हाथ में बाइबिल है । वह व्यक्ति उतरकर उस बच्चे के पास आता है और कहता है - बेटा तुम क्यों रो रहे हो ? वह कहता है - मैं डी.एल. मूडी का भाषण सुनने के लिए महीनों से सोच रहा था । योजना बनाई थी , दो घण्टे पैदल चलकर यहां आया और मुझको भगा दिया गया । उस व्यक्ति ने कहा - तुमको इतना करना है कि तुम मेरी उंगली को पकड़े रहो । वह बालक उठता है और उस व्यक्ति को पकड़ लेता है । अब उस बालक को कोई नहीं रोकता । न लोग , न द्वारपाल । वह बालक इस व्यक्ति की उंगली पकड़े हुए मंच तक आता है और सबसे सामने की सीट पर यह व्यक्ति उसे बिठा देता है । वह बालक बड़े आराम से वहां पर बैठता है और उसको पता चलता है कि जिस व्यक्ति की उंगली मैंने पकड़ी थी वही तो स्वयं डी.एल. मूडी है । हमारे साथ भी ऐसा होता है! हम स्वर्ग कैसे जाएंगे ? हमारे हाथों में भी कालिख पुती है , हमारे कपड़ों में भी धब्बे लगे हैं , हमारा दिल भी टूटा हुआ है , हमारे जीवन में पापों की , गुनाहों की बदबू आती है , हमारी क्या औक़ात ? हम कैसे जाएंगे ? केवल प्रभु यीशु मसीह की उंगली पकड़कर । प्रभु यीशु मसीह हमें देखता है , जब हम चर्च की सीढ़ी पर बैठकर रोते हैं । प्रभु यीशु मसीह कहता है , वह सीढ़ी तुम्हारी जगह नहीं है । तुम को तो पहली पंक्ति में बैठना है । यहां बैठकर निराश होने की बात नहीं है । तुम्हें तो उस प्रतिष्ठित अवस्था में बैठना है; मगर यह काम तुम अपने बल-बूते पर नहीं कर सकते , अपने आप से नहीं कर सकते । तुम्हें एक काम करना होगा , तुम्हें मेरी उंगली पकड़ना होगा; और जब हम उस प्रभु यीशु मसीह की उंगली पकड़ेंगे तो वह हमें स्वर्ग में ले जाएगा । परमेश्वर आपको आशीष दे।