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विषमताएं और परमेश्वर का उद्देश्य

विषमताएं और परमेश्वर का उद्देश्य

सन्दर्भ: मत्ती 14:22-33

मैं एक सीनियर पासबान का सन्देश सुन रहा था जिनकी कलीसिया में 12-15 हज़ार लोग हैं । अपने सन्देश में उन्होंने कहा कि आपके जीवन में एक बात निश्चित है; या तो आप तूफान के क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं , किसी न किसी विषमता ने आपके जीवन को प्रभावित कर दिया है या आप किसी तूफान के बीच में फंसे हैं । कहीं न कहीं अपने जीवन में हम शारीरिक समस्याओं , मानसिक समस्याओं अथवा आत्मिक समस्याओं के कारण पीड़ा से गुज़र रहे हैं । हम बहुत प्रयास करते हैं अपनी पीड़ाओं को छिपाने का , हम बहुत प्रयास करते हैं अपने दर्द पर , अपने तनाव पर पर्दा डालने का , हम बहुत प्रयास करते हैं अपने परिवार की समस्याओं को मानो किसी कारपेट के नीचे छिपाने का ताकि ऊपर बहुत ख़ूबसूरत दिखाई दे कारपेट और हमारी समस्याएं छिपी रहें।
हम में से हर एक विषमताओं से गुज़रता है । इस बात से कि कोई धार्मिक या अधर्मी है , विश्वासी या अविश्वासी; इसका कोई सम्बन्ध नहीं होता । विषमता से गुज़रते हुए हमारी प्रतिक्रिया क्या होती है इस बात में भिन्नता हो सकती है और यही बात हमें संसार से भिन्न बनाती है । मेरी प्रार्थना है कि यदि हम इन समस्याओं से गुज़र रहे हैं तो हम इन्हें गम्भीरता से लेंगे । परमेश्वर की चेतावनी के स्वरूप में लेंगे । परमेश्वर के संदर्भ में लेंगे और इनमें हम परमेश्वर का उद्देश्य ढूंढने का प्रयास करेंगे ।
एक विश्वासी के जीवन में जब विषमता , त्रासदी या पीड़ा आती है तो उस विषमता में परमेश्वर का एक उद्देश्य होता है जो उस समय दिखाई नहीं देता ।
कुछ वर्षो पहले एक अखबार में ख़बर छपी , पेटलावाद में मौत का धमाका । फर्टिलाइज़र की दुकान में अवैध रूप से रखे डेटोनेटर में ब्लास्ट और 88 लोगों की मौत , 200 लोग चपेट में , 41 से ज़्यादा वाहन 20 फीट और शव 40 फीट तक फिंक गए । यह घटना झाबुआ की है । इस ख़बर को देखें तो आप पाएंगे कि न सिर्फ़ वह फर्टिलाइज़र की दुकान प्रभावित हुई परन्तु समीप में जो रेस्टोरेन्ट और वहां पर जो लोग बैठे थे , वे भी प्रभावित हुए । उनमें उस फर्टिलाइज़र की दुकान के मालिक का बेटा भी था , जिसकी मृत्यु हो गई । पांच लोगों का एक परिवार जो गुजरात से जा रहा था , जिसमें 4 साल की बेटी भी थी , उस धमाके में सब के सब समाप्त हो गए । उसी अखबार में एक और ख़बर थी , जबलपुर में ट्रॉली पलटी , पांच की मौत । तीसरी ख़बर थी , सिकंदराबाद-मुम्बई एक्सप्रेस के 9 कोच बेपटरी 9 की मौत 7 घायल । तीन अलग-अलग घटनाएं हैं , कोई परिवार के साथ घूमने जा रहा है , कोई ट्रेन की यात्रा कर रहा है , कोई रेस्टोरेन्ट में बैठा है , कोई अपने बच्चे को अपनी गोद में बैठाकर नाश्ता करा रहा है । इनमें से किसने कुछ सेकेण्ड पहले सोचा था कि इस प्रकार की त्रासदी आ जाएगी । ऐसी त्रासदी जब आती है तो हमें अपने जीवनों को गम्भीरता से देखना है । हमें अपने जीवनों में परमेश्वर के उद्देश्यों को ढूंढ़ना है और ऐसी परिस्थितियों में अपने विश्वास की गवाही देना है ।
विषमता तो हर किसी के जीवन में आती है परन्तु उनके प्रति जो प्रतिक्रिया है वह मसीही व्यक्ति को विशिष्ट बनाती है । जितना गहरा अन्धकार होता है प्रकाश उतनी ही तीव्रता से और तीक्ष्णता से दिखाई देता है । अपनी पीड़ा में जो बात आप कहेंगे , वह सीधे दिल तक पहुंचेगी क्योंकि उस बात में कोई बनावट नहीं होगी । उस में कोई लीपापोती नहीं होगी क्योंकि वह सीधे आपकी पीड़ा से निकली हुई बात होगी । इसीलिए हम जब सबसे ज्यादा पीड़ा में होते हैं , हमारी गवाही भी उतनी ही ज़्यादा प्रभावशाली होती है ।
मत्ती रचित सुसमाचार के इस सन्दर्भ में दो विषमताओं की बात है । राजा हेरोदेस ने एक नाचने वाली को खुश करने के लिए यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का सिर कटवा दिया था । जब प्रभु यीशु ने इस बात को सुना कि यूहन्ना की हत्या कर दी गई है , उसका सिर कटवा दिया गया है तो वह एकान्त में चले गए । प्रभु यीशु के दिल में यूहन्ना के प्रति बहुत प्रेम था , उनकी आत्मा में यूहन्ना के प्रति बहुत आदर था । वह यूहन्ना को बहुत विशिष्ट व्यक्ति मानते थे । वह जानते थे कि परमेश्वर की ओर से , पवित्र आत्मा की ओर से एक विशेष उद्देश्य के लिए यूहन्ना को भेजा गया है । एक नाचने वाली को खुश करने के लिए , एक दुष्ट राजा गर्दन काटकर उसकी हत्या करवा देता है । यूहन्ना और यीशु हम-उम्र थे , रिश्तेदार भी थे । व्यक्तिगत सम्बन्ध के साथ प्रभु यीशु का यूहन्ना से आत्मीय सम्बन्ध भी था । जब प्रभु यीशु ने यूहन्ना की हत्या का समाचार सुना तो इस बात से वह विचलित हो गए । इसी बात से प्रभावित होकर प्रभु यीशु अपने चेलों से कहते हैं कि चलो नाव उठाकर उस पार चलते हैं और वे एकान्त में चले गए । इस घटना में गलील की झील का वर्णन है । गलील की झील बहुत बड़ी है , जो 33 किलोमीटर लम्बी और 20 किलोमीटर चौड़ी है । ऐसा लगता है कि एक समुद्र के पास हम खड़े हों । रात का पहर है और चेले झील में नाव में हैं । तब झील में लहरें उठती हैं और विनाशकारी तूफान आता है । नाव डगमगाने लगती है और चेले घबरा जाते हैं । उनको लगता है कि मृत्यु सामने है और तब प्रभु यीशु चेलों के पास आते हैं । यीशु को देखकर चेले और भी डर जाते हैं , लिखा हुआ है कि वे सोचते हैं कि कोई भूत आ गया ।
जीवन की विषमताओं में हमारे लिए क्या शिक्षा है , कुछ बातें हम विषमताओं के बारे में देखेंगे ।
1. विषमताएं हमारे जीवनों का भाग हैं । जब तूफान और त्रासदियां हमारे जीवन में आती हैं तो अचानक से आती हैं , बिना सूचना दिए आती हैं , बिना दस्तक दिए आती हैं । टेलीफोन पर एक कॉल आती है और सब कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है । ब्लड टेस्ट की एक रिपोर्ट , एक टेलीफोन कॉल , डॉक्टर का एक परीक्षण; अचानक आपके जीवन की दिशा को बदल सकता है और हमारे जीवन में तूफान आ सकता है ।
अय्यूब के जीवन से हम देख सकते हैं । सब कुछ सही है , सब कुछ अच्छा चल रहा है । परमेश्वर की आशीषें हैं , धार्मिकता का जीवन है । परिवार के लिए समर्पित है , प्रार्थना करने वाला व्यक्ति है , बेटे-बेटियों को साथ रखने वाला है और अचानक से एक सूचना आती है , फिर दूसरी सूचना और तीसरी सूचना आती है; और सब कुछ चला जाता है ।
नाओमी और एलीमेलेक बैतलहम से मोआब को चले जाते हैं । अकाल के देश को छोड़कर समृद्धि के देश की ओर चले जाते हैं , समस्याओं से सेफ्टी ज़ोन की ओर; और सोचते हैं कि सब अच्छा होगा । परदेश में एलीमेलेक की मृत्यु हो जाती है । दोनों बेटे महलोन और किल्योन मोआबी स्त्रियों से विवाह कर लेते हैं और फिर अचानक से दोनों बेटों की मृत्यु हो जाती है ।
जैसा हम सोचते हैं , जो हम अपेक्षा करते हैं वैसा होता नहीं और ये तूफान अचानक से हमारे जीवन में आ जाते हैं ।
स्तिफनुस प्रचार कर रहा है और प्रचार करते-करते यह स्थिति आ जाती है कि लोग नाराज़ हो जाते हैं , भड़क जाते हैं , पत्थरवाह करके उसकी हत्या कर देते हैं ।
प्रेरितों के काम के 12 वें अध्याय में हम पाते हैं कि हेरोदेस ने कलीसिया के कई अगुवों को तलवार से मरवा डाला । उसने प्रभु यीशु के चेले यूहन्ना के भाई याकूब को तलवार से मरवा डाला ।
2 तीमुथियुस 12:3 में लिखा है - जितने मसीह में धार्मिकता का जीवन बिताना चाहते हैं , वे सब सताए जाएंगे ।
इसलिए हमें तैयार रहना है कि ये तूफान हमारे जीवन में कभी भी आ सकते हैं । बहुत से लोग दावा करते हैं कि आप हमें दान भेजिए , हमें प्रार्थना निवेदन भेजिए । हम लोग बड़े धर्मी हैं , हम आपके लिए दुआ करेंगे , हमें चंगाई का वरदान है । आपके लिए सब बढ़िया हो जाएगा , आपको किसी भी प्रकार की समस्या नहीं आएगी आप सारी समस्याओं से मुक्त हो जाओगे । वास्तव में ऐसा नहीं होता । बाइबिल इस बात का जीवन्त उदाहरण है कि सारे अगुवे विषमताओं से गुज़रे । अधिकांश अगुवे इस कारण विषमताओं से गुज़रे क्योंकि उन्होंने प्रभु यीशु पर विश्वास किया था । उन्होंने परमेश्वर के लिए सच्चाई का प्रचार किया था । स्वयं प्रभु यीशु भी निन्दा , विश्वासघात , धोखे और षड़़यन्त्र से होकर गुज़रे यहां तक कि क्रूस की मृत्यु भी उसने सह ली ।
इसलिए हमें यह स्वीकार करना है कि तूफान हमारे जीवन में अवश्य आएंगे ।
2. तूफानों में हमें यीशु को पहचानना है । गलील की झील में जब तूफान आया तो चेले प्रभु यीशु को पहचान नहीं पाए । हमें ऐसी परिस्थितियों में परमेश्वर को पहचानना है कि प्रभु यीशु मसीह का क्या उद्देश्य हमारे जीवनों में है । इस विषमता में प्रभु यीशु की कौन सी आशीषें जुड़ी हैं । मैंने अपने जीवन में बहुत सी विषमताओं का सामना नहीं किया परन्तु अपने पिता की बीमारी और मृत्यु , अपने बहुत से प्रियों की मृत्यु का , बीमारियों का सामना किया । उन सब में इस बात का अहसास किया कि ऐसे समयों में परमेश्वर की निकटता और उसकी सामर्थ्य और भी अधिकाई से मिलती है । इस बात का अहसास आप सब ने भी किया होगा , जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं ।
किसी ने कहा है कि हम उपलब्धियों में तो परमेश्वर को पहचानते हैं , प्रभु यीशु को पहचानते हैं । आशीषों में , चंगाई में , सम्पन्नता में , कलीसिया की आराधना में , उत्साह की प्रार्थना में तो परमेश्वर को पहचानते हैं परन्तु जब पीड़ा आती है; क्या उस समय प्रभु यीशु को पहचानते हैं ? क्या इस बात का अहसास होता है कि उस पीड़ा के माध्यम से वह हमारे जीवन में कोई विशिष्ट कार्य करना चाहता है ?
यूहन्ना 21:4 में लिखा है - भोर होते ही प्रभु यीशु मसीह किनारे पर खड़ा हुआ था तौभी चेलों ने नहीं पहचाना कि यह यीशु है । यह पुनरुत्थान के बाद की घटना है । मरियम मगदलीनी नहीं पहचान पाती कि यह प्रभु यीशु है , जिसका पुनरुत्थान हुआ है । इस घटना में वे चेले उस प्रभु यीशु को पहचान नहीं पाए जिसके साथ उन्होंने रात-दिन बिताए थे । जिसके साथ भोजन किया था , यात्राएं की थीं । जिसके साथ उन चेलों के अन्तरंग सम्बन्ध थे । जिन्होंने प्रभु यीशु को आश्चर्यकर्म करते देखा था , जिन्होंने प्रभु यीशु मसीह के आंसू देखे थे । यहां तक कि वे इतने निकट थे कि उन्होंने प्रभु यीशु के दिल की धड़कन भी सुनी थी । ऐसे समय में इन चेलों ने प्रभु यीशु को नहीं पहचाना और वे घबरा गए ।
मरकुस 6:48 में लिखा है कि वे खेते-खेते घबरा गए और हवा उनके विरुद्ध थी । रात के उस चौथे पहर जो कि नाव से मछली पकड़ने वालों के लिए सबसे ख़तरनाक होता है , उस समय जब प्रभु यीशु उनके पास आ रहा था , जब उसकी उन पर दृष्टि थी , जब वह उन्हें बचाना चाह रहा था , तब उन्होंने प्रभु यीशु को नहीं पहचाना ।
अमेरिका की एक घटना है । एक अपार्टमेन्ट में आग लगी और चारों तरफ धुआं भर गया । जैसे-तैसे पिता कूदकर नीचे आ गया , उसके साथ माता भी नीचे आ गई । बेटा खिड़की पर खड़ा था । चारों तरफ धुआं था , आग की लपटें बढ़ रही थीं । पिता अपने बेटे से कहता है , तू जल्दी से नीचे कूद जा । दूसरी मंज़िल से बेटे को कूदना था और यह आसान बात नहीं थी । बेटा कहता है , मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है , यहां तो आग की लपटे हैं , यहां तो धुआं है मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है । पिता कहते हैं तू मुझको देख सके या न देख सके परन्तु मैं तो तुझे देख सकता हूं । तू तो बस मेरी निकटता में आ जा । तू तो बस मेरी बांहों में आ जा। तू तो बस मेरे हृदय के निकट आ जा ।
अक्सर ऐसा ही हमारे साथ होता है कि हम इतने धुंधलके में हो जाते हैं कि वास्तव में परमेश्वर पर सम्पूर्णता से हमारी जो निर्भरता होना चाहिए , विश्वास का एक कदम बढ़ाने की बात जो होना चाहिए , बोझ से निकलने की जो बात होना चाहिए वह नहीं हो पाती और हम तूफानों में फंसे रह जाते हैं ।
1 कुरिन्थियों 10:13 में लिखा है - तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े जो मनुष्य के सहने से बाहर है और परमेश्वर सच्चा है । वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा । वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा कि तुम सह सको ।
अगर हम परमेश्वर की इस प्रतिज्ञा को मानते हैं कि वह हमें परीक्षा में नहीं छोड़ेगा । हमें हमारी सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में नहीं पड़ने देगा , कभी ऐसी परिस्थिति नहीं आ पाएगी कि हम उससे बाहर न निकल सकें तो हमें सम्पूर्णता से अपने आप को प्रभु यीशु के हाथ में समर्पित कर देना होगा ।
कई बार जब हमारे जीवनों में कठिनाइयां नहीं आतीं और विश्वास में हमारी जड़ें गहरी नहीं होतीं तो तूफानों में हम गिर जाते हैं ।
कुछ समय पहले की घटना है । इंग्लैण्ड में आंधी आई और हज़ारों पेड़ गिर गए । आंधी उतनी भयंकर नहीं थी पर फिर भी लगभग 10 हज़ार से ज़्यादा पेड़ गिर गए । जब कारण का पता लगाया गया कि ये पेड़ क्यों गिर गए; तो पता चला कि वे पेड़ इतनी उपजाऊ मिट्टी में लगे हुए थे कि उनकी जड़ें गहरी ही नहीं हुईं । उनकी जड़ें बहुत उथली थीं ।
कई बार हम भी इतनी उपजाऊ मिट्टी में पड़े रहते हैं कि हमारी जड़ें उथली ही रह जाती हैं । हम सोचते हैं कि सब कुछ अच्छा है क्योंकि उन विषमताओं , उन परीक्षाओं , उन संघर्षों से और उन तूफानों से भागने की और बचने की हम कोशिश करते हैं । हमारी जड़ें उथली रहती हैं और तूफान में हम धराशायी हो जाते हैं ।
3. हमें शैतान और परमेश्वर में अन्तर करना आना चाहिए । कब शैतान हमसे बात कर रहा है , कब परमेश्वर हमसे बोल रहा है , शैतान की बुलाहट है कि परमेश्वर की बुलाहट है; इसमें हम अन्तर नहीं कर पाते । आदम और हव्वा भी अन्तर नहीं कर पाए , उन्होंने सोचा कि वास्तव में ज्ञानवान हो जाएंगे । यहां पर भी यही बात लिखी है कि चेलों ने यीशु को देखकर सोचा कि यह तो भूत है ।
यूहन्ना रचित सुसमाचार 4:47-48 में लिखा है - जो परमेश्वर से होता है वह परमेश्वर की बातें सुनता है और तुम इसलिए नहीं सुनते क्योंकि तुम परमेश्वर की ओर से नहीं हो । यह सुन यहूदियों ने उससे कहा , क्या हम ठीक नहीं कहते कि तू सामरी है और तुझमें दुष्टात्मा है ।
वे लोग कहने लगे कि प्रभु यीशु में तो दुष्टात्मा है । शैतान बहुत होशियार है । उसने आदम और हव्वा से यह नहीं कहा कि तुम परमेश्वर की निन्दा करो । उसने परमेश्वर के लिए कुछ बुरा नहीं बोला । उसने बस यह कहा कि तुम परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे , तुम तो परमेश्वर के बराबर ज्ञानवान हो जाओगे ।
2 कुरिन्थियों 11:14 में लिखा है - यह कुछ अचम्भे की बात नहीं क्योंकि शैतान आप ही ज्योर्तिमय स्वर्गदूत का रूप धारण करता है ।
आप से भी वह यही कहता है कि छोटा सा समझौता कर लो! बहुत समस्या में हो , बहुत तनाव में हो , थोड़ा सा नशा कर लो! थोड़ा सा बाउण्ड्री के बाहर चले जाओ क्योंकि कभी-कभी ऐसा करना ठीक है । शैतान जिस प्रकार से हमें बहकाता है , हमें आवश्यकता इस बात की है कि हम शैतान में और परमेश्वर में अन्तर करना सीखें ।
कई बार हमारी अपनी स्वयं की इच्छा होती है और अपनी उस इच्छा को पूरा करने के लिए हम कहते हैं कि हमें ऐसा लग रहा है कि परमेश्वर हमसे ऐसा करने को कहता है । हम परमेश्वर के नाम , प्रार्थना आदि को बीच में ले आते हैं । इसी कारण विषमताओं को गम्भीरता से लेना आवश्यक है ।
विषमताओं को हमें गम्भीरता से इसलिए भी लेना है क्योंकि विषमताएं हमें या तो परमेश्वर के पास ला सकती हैं या फिर परमेश्वर से दूर ले जा सकती हैं ।
एक वरिष्ठ पासबान बता रहे थे कि एक वृद्ध स्त्री जिसे कोढ़ था , उनके पास आई और बताने लगी कि मैं परमेश्वर को धन्यवाद देती हूं कि मुझे कोढ़ की बीमारी हुई क्योंकि इस कोढ़ की बीमारी के कारण मैं प्रभु यीशु मसीह के पास आ सकी ।
यह पीड़ा कभी हमें प्रभु के पास ले आती है । झोले के मारे का उदाहरण देखें तो वह प्रभु यीशु मसीह के पास आया और प्रभु यीशु ने उसे शारीरिक चंगाई और आत्मिक चंगाई दी । ये विषमताएं हमें परमेश्वर के पास भी ला सकती हैं और उससे दूर भी ले जा सकती हैं ।
क्रूस पर लटका दूसरा डाकू कहता है कि यह कैसा परमेश्वर का पुत्र है! अगर है तो हमें बचा और खुद को बचा । जीवन की उस विषमता में वह प्रभु से दूर चला गया । हमारे जीवनों की पीड़ा , त्रासदी और विषमता हमें परमेश्वर के पास भी ला सकती है और दूर भी ले जा सकती है । हमें गम्भीरता से इन बातों को लेना है कि इन पीड़ाओं में हम इस बात को समझें कि हमारा विश्वास इस संसार पर , इस संसार की परिस्थितियों पर , इस संसार के लोगों पर , अपने परिवार के लोगों पर , अपने सहकर्मियों पर नहीं वरन् हमारी सम्पूर्ण निर्भरता , हमारा सम्पूर्ण ध्यान केवल और केवल परमेश्वर पर है । उस पर यह निर्भरता बनी रहे और बढ़ती जाए इन विषमताओं के द्वारा; तब परमेश्वर का उद्देश्य हमारे जीवन में पूरा हो सकेगा ।
विषमताओं और परीक्षाओं में इस बात की परख भी हो जाती है कि कौन अपना है और कौन पराया है । कौन परमेश्वर का है , कौन शैतान की ओर से । पतरस प्रभु यीशु से कहता है कि मैं तेरे साथ जीने-मरने के लिए तैयार हूं । मुझे मरना भी पड़े तो मैं तैयार हूं परन्तु जब विषमता आती है तो वह कहता है कि मैं तो इस पुरुष को जानता ही नहीं , उसका नाम तक नहीं जानता और यहां तक कि वह यीशु के लिए अपशब्द भी कह देता है । विषमता में हमारी परख भी हो जाती है ।
2 तीमुथियुस 4:10 में लिखा है - क्योंकि देमास ने इस संसार को प्रिय जानकर मुझे छोड़ दिया है और थिस्सलुनीके को चला गया है ।
विषमताओं में हमारे विश्वास की भी परख हो जाती है । शदरक , मेशक , अबेदनगो का उदाहरण हमारे सामने है । विषमता में उनके विश्वास की परख हो गई । अय्यूब का उदाहरण है , उसके विश्वास की परख हो गई । पौलुस का वर्णन है , उसके विश्वास की परख हो गई । पौलुस कहता है कि ये सब बातें जिनसे मैं गुज़रा; चाहे मुझे मारा गया हो , चाहे मुझे प्रताड़ित किया गया हो, चाहे मुझे कोड़े लगाए गए हों , चाहे मुझे क़ैद में डाल दिया गया हो , चाहे मुझ पर पत्थरवाह किया गया हो , चाहे मुझको ऐसी कै़द में डाल दिया गया हो जहां मेरे हाथों-पैरों में बेड़ियां थीं , चाहे मेरा आधा शरीर भूमि के अन्दर था , मैं काल कोठरी में था जहां न उजाला दिखता था , न अन्धेरा , न दिन न रात । उसके बाद भी पौलुस लिखता है कि मेरे लिए जीना मसीह है और मर जाना लाभ । वह कहता है मेरी यही इच्छा है कि मैं जीऊं या मरूं परन्तु मेरी देह से प्रभु की महिमा होती रहे , उसकी बड़ाई होती रहे । यह मेरे जीवन का उद्देश्य है ।
विषमताओं में हमारी सारी निर्भरता केवल और केवल परमेश्वर पर आकर निर्भर हो जाती है । क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर के वचन की प्रतिज्ञा क्या है ? कि जब हम विश्वासयोग्य बने रहेंगे , जब हम अपनी गवाही देते रहेंगे , जब हम और भी अधिक गहराई से उसकी समीपता में आएंगे । जब हम पूरी तरीके से उसको अपने जीवन को समर्पित करेंगे तब हमें स्वर्ग में इसका बड़ा प्रतिफल मिलेगा ।
जो लोग पर्वतारोही होते हैं और ख़ासकर माउण्ट एवरेस्ट को फतह करना चाहते हैं उनके सम्बन्ध में एक पुस्तक लिखी गई है । इस पुस्तक में बताया गया है कि इन पर्वतारोहियों को 3 श्रेणियों में बांटा जा सकता है।
पहले प्रकार के वे पर्वतारोही होते हैं जो अपनी सब तैयारी पूरी करते हैं । उनकी कोचिंग क्लासेस भी होती हैं । सब औपचारिकताएं पूरी हो जाती हैं । सब बातें उनके दिमाग में भी आ जाती हैं परन्तु वे यात्रा प्रारम्भ नहीं कर पाते ।
कितनी बार ऐसा होता है कि हमारे दिमाग में तो बहुत कुछ है , जानते तो बहुत कुछ हैं पर जिस यात्रा को हमें करना है , वह यात्रा जो गवाही की यात्रा है , जो प्रभु यीशु मसीह के प्रेम को प्रगट करने की यात्रा है , जो सेवा करने की यात्रा है , जो त्याग करने की यात्रा है , जो क्रूस उठाकर उसके पीछे चलने की यात्रा है; उसे हम प्रारम्भ नहीं कर पाते ।
दूसरे प्रकार के पर्वतारोही वे होते हैं जो यात्रा प्रारम्भ तो कर लेते हैं । कोचिंग भी कर लेते हैं परन्तु जब ऊंचाई बढ़ती जाती है और यात्रा कठिन हो जाती है और जब ऑक्सीजन कम होती जाती है तो वे आधी दूर से लौटकर आ जाते हैं और हार मान लेते हैं ।
तीसरे प्रकार के पर्वतारोही वे होते हैं जो बर्फीले तूफानों का सामना करते हैं और कहते हैं या तो हम अपनी यात्रा पूरी करेंगे या हमारा जीवन समाप्त हो जाएगा । हम ज़िन्दा पराजित होकर नहीं लौटेंगे । अगर लौटे तो विजयी होकर लौटेंगे और अगर नहीं लौटे तो हम मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे ।
क्या वह प्रतिबद्धता है हम में ? हमने यात्रा तो प्रारम्भ कर दी है , उसके पीछे तो चल पड़े हैं , जिसने हमारे लिए सब कुछ सह लिया , जिसने सारी परीक्षाओं और यातनाओं को सहकर कहा कि इस संसार में तुम्हारे लिए बहुत क्लेश होंगे परन्तु घबराना मत क्योंकि मैंने इस संसार पर विजय प्राप्त की है । जिसने सब कुछ सहा और जिसने अपनी मृत्यु के द्वारा हमारी मृत्यु पर विजय प्राप्त की । हमारे लिए अनन्त जीवन का द्वार खोला । वह जीवित है इस कारण हम भी जीवित रहेंगे ।
क्या हम अभी तक प्रशिक्षण में लगे हैं ? या हमने वह यात्रा प्रारम्भ कर दी है ? या हम विजयी होने वाले हैं ?

परमेश्वर आपको आशीष दे।