असन्तोष
सन्दर्भ: 2 कुरिन्थियों 5:1-8
जिस विषय की मैं आपसे चर्चा करना चाहता हूं वह शैतान का बहुत बड़ा औज़ार है । यह एक ऐसा औज़ार है जिसका इस्तेमाल शैतान हर किसी पर करता है । यह एक ऐसा औज़ार है कि जब इससे हम पर वार किया जाता है तो कई बार हमें पता ही नहीं चलता कि यह शैतान का औज़ार है । यह एक ऐसा ख़तरनाक औज़ार है जो हमारे शरीर , हमारे सम्बन्धों , हमारी आत्मा और हमारे अनन्त को विनाश की ओर ले जाता है । और यह औज़ार है , असन्तोष! इन्टरनेट पर असन्तोष की परिभाषा कुछ इस प्रकार दी गई है - उन चीज़ों और उन बातों की बेचैनी और भूख , जो तुम्हारे पास है नहीं । (Restless desire or craving of things that you don't have.) किसी टीकाकार ने असन्तोष को सरल तौर पर परिभाषित करते हुए लिखा है - भौतिकता की अतृप्त प्यास। एक और टीकाकार ने परिभाषित किया है - नाम और पहचान पाने की अविरल असन्तुष्टि और बेचैनी । एक और ख़तरनाक परिभाषा दी गई है , उसमें लिखा है - स्वयं की इच्छा और सन्तुष्टि के लिए नैतिकता और मर्यादा की हदों को अनदेखा कर गुज़रने की लालसा । फारलैक्स डिक्शनरी में असंतोष के विषय में लिखा गया है कि वे लोग जिन्हें उम्र बढ़ने का अहसास अधिक होता है और वे उसे दबाना , ढांपना और छुपाना चाहते हैं वे सबसे ज़्यादा , सबसे जल्दी असंतुष्ट हो जाते हैं । असन्तोष वास्तव में अतीत की निराशा , वर्तमान की कड़वाहट और भविष्य की अनिश्चितता और परमेश्वर पर विश्वास की अनुपस्थिति है । (discontentment is dissatisfaction with the past , _distaste for the present and distrust of the future. above all absent of the trust in God.) असन्तोष दिल से पैदा होता है । यह किसी ज़हर के समान दिमाग को दूषित करता है , आत्मा को विनाश की ओर ले जाता है और परिवारों व सम्बन्धों को विघटित करता है । अपने जीवन के अन्तिम समय में जब पौलुस प्रेरित जेल में कै़द था , उसे यह नहीं मालूम था कि किस दिन उसे मृत्युदण्ड मिल जाएगा , उसे यह नहीं मालूम था कि किस दिन सुबह सिपाही आएगा और कहेगा तुम्हारे मृत्युदण्ड का समय आ गया । अपने जीवन के ऐसे कठिन समय में पौलुस लिखता है - यह नहीं कि मैं अपनी घटी के कारण यह कहता हूं क्योंकि मैं ने यह सीखा है कि जिस दशा में हूं; उसी में सन्तोष करूं । मैं दीन होना भी जानता हूं और बढ़ना भी जानता हूं; हर एक बात और सब दशाओं में मैंने तृप्त होना , भूखा रहना , और बढ़ना-घटना सीखा है । जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूं । (फिलिप्पियों 4:11-13) पौलुस कह रहा है कि परमेश्वर की सामर्थ्य में होकर मैं सब कुछ कर सकता हूं । चाहे मैं गरीबी की स्थिति में रहूं या अमीरी की स्थिति में , चाहे मृत्यु की छाया हो , चाहे मैं घटूं , चाहे बढूं , चाहे भूख की स्थिति हो; सब बातों में मैंने सन्तोष करना सीखा है । सब बातों में मैंने तृप्त रहना सीखा है । कभी-कभी हम वचन की गम्भीरता को नहीं समझते । उसकी गहराई , उसके प्रभाव और उसकी चेतावनियों पर हमारा ध्यान नहीं जाता परन्तु 1 तीमुथियुस 6:6-10 में भयंकर बात लिखी है । लिखा है - सन्तोष सहित भक्ति बड़ी कमाई है । क्योंकि न हम जगत में कुछ लाए हैं और न कुछ ले जा सकते हैं । यदि हमारे पास खाने और पहिनने को हो , तो इन्हीं पर सन्तोष करना चाहिए । पर जो धनी होना चाहते हैं , वे ऐसी परीक्षा और फंदे और बहुत सी व्यर्थ और हानिकारक लालसाओं में फंसते हैं , जो मनुष्यों को बिगाड़ देती हैं और विनाश के समुद्र में डुबा देती हैं । क्योंकि रुपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है , जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए बहुतों ने विश्वास से भटककर अपने आप को नाना प्रकार के दुःखों से छलनी बना लिया है । असन्तोष की यह भावना एक ऐसी भावना है जो मनुष्यों को बिगाड़ देती है , उन्हें विनाश के समुद्र में डुबो देती है और हम हानिकारक लालसाओं में फंसते जाते हैं । इसे वचन में व्यर्थ कहा गया है । इस सन्दर्भ में जो सबसे बड़ा और प्रमुख उदाहरण है और जिस पर हमने शायद कभी उस दृष्टि से ग़ौर नहीं किया , वह प्रभु यीशु की परीक्षा का उदाहरण है । शैतान प्रभु यीशु की परीक्षा ले रहा है हालांकि वह जानता है कि वह किसकी परीक्षा ले रहा है । शैतान जानता है कि वह सबसे शक्तिशाली व्यक्ति की परीक्षा ले रहा है । वह परमेश्वर के पुत्र की परीक्षा ले रहा है । वह सृष्टिकर्ता की परीक्षा ले रहा है । वह उस परमेश्वर की परीक्षा ले रहा है जो सर्वज्ञानी , सर्वव्यापक और जो सर्वसामर्थी है । इसलिए जब वह प्रभु यीशु की परीक्षा लेता है तो अपने सबसे शक्तिशाली और प्रभावषाली शस्त्र का इस्तेमाल करता है; और वह शस्त्र है असन्तोष! लूका रचित सुसमाचार के चौथे अध्याय में प्रभु यीशु की परीक्षा लेते समय शैतान अपना पहला वार करता है और कहता है कि यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो इस पत्थर से कह दे कि रोटी बन जाए । दूसरे शब्दों में , वह यीशु से यह कह रहा है कि चालीस दिन से तू भूखा है! तू परमेश्वर का पुत्र है , तू तो राजाओं का राजा है , प्रभुओं का प्रभु है । तू तो सृष्टि का मालिक है! क्या परमेश्वर तेरा भला नहीं चाहता ? तू इन पत्थरों के योग्य नहीं , तुझे तो रोटियों की आवश्यकता है । तुझ में तो इतनी क्षमता है , कि तू तो पत्थर को रोटी बना सकता है । तेरे पास ये पत्थर नहीं , तेरे पास तो रोटी होना चाहिए । क्योंकि जहां तू है; भूख में , प्यास में , इस पीड़ा में , इस स्थिति में; इसमें तृप्ति नहीं है । तू पत्थरों से क्यों नहीं कह देता कि रोटियां बन जाएं ? उसके बाद शैतान का प्रभु यीशु पर दूसरा वार होता है । लूका 4:6-8 में इसका वर्णन है । शैतान कहता है , जगत के राज्य , वैभव और अधिकार को देख । देख इस अधिकार को , वैभव को , भौतिकता को , सारे जगत के राज्य के सोने-चांदी , पद को , प्रतिष्ठा को , नाम को; बस थोड़ा समझौता कर ले । बस! मेरे सामने झुकना है , मुझे प्रणाम करना है , इसमें कौन सी बड़ी बात ? इतने छोटे से समझौते में तुझे सब कुछ मिल जाएगा । संसार का वैभव , राज्य , अधिकार; तुझे सब कुछ मिल जाएगा । झुककर प्रणाम ही तो करना है । बस थोड़ा सा समझौता कर लो , बहुत कुछ मिल जाएगा । फिर शैतान के तीसरे वार का वर्णन है , लूका 4:9-13 में; जहां पर वह प्रभु यीशु को मन्दिर के कंगूरे पर ले गया और उस से कहता है कि यदि तू अपने आप को नीचे गिरा दे तो क्या परमेश्वर तुझे उठा नहीं लेगा ? परमेश्वर पर अविश्वास की बात है , परमेश्वर की परीक्षा की बात है! अपने आप को नीचे गिरा दे , ऊंचाई से नीचाई की ओर चला जा , नैतिकता से अनैतिकता की ओर चला जा , स्वर्गीय मापदण्डों से सांसारिक मापदण्डों की तरफ बढ़ जा , अपने आपको नीचाइयों पर तो ले आ! परमेश्वर बहुत शक्तिशाली है , वह तुझे सम्हाल लेगा । शैतान का यही झूठ व्यक्ति में असन्तोष उत्पन्न करता है । वह इस संसार के वैभव , अधिकार और प्रतिष्ठा को दिखाकर हमसे कहता है कि यह तुम्हारा नहीं है और तब वह हमारे हृदय में असन्तोष उत्पन्न कर देता है । अपने कार्य के प्रति , अपने पद , अपने जीवनसाथी , अपने स्रोतों , अपनी तनख्वाह , अपने निवास स्थान , अपने वाहन के प्रति हमारे हृदय में वह असन्तोष की भावना डाल देता है । मानो वह हमसे कहता है कि लोग तुम्हारी क़ीमत नहीं जानते , तुम्हारी योग्यता की कद्र नहीं करते । तुम्हें तो बहुत कुछ मिल सकता है , तुम तो बहुत पाने की क्षमता रखते हो । आजकल टेलीविजन के कामर्शियल्स में भी जो कुछ हम देखते हैं , उनका उद्देश्य क्या है ? उनका उद्देश्य है , व्यक्ति को अपने आप में असन्तुष्ट कर देना । इन कामर्शियल्स में व्यक्ति की कमज़ोरियों और परेशानियों को दिखाकर उनके सामने एक हल प्रस्तुत किया जाता है । चाहे वह बाल उगाने का तेल हो , मोटापा घटाने की क्रीम हो , किसी चाय या एनर्जी ड्रिंक को पीकर शरीर को स्वस्थ रखने की बात हो । चाहे हाथ में पहने गए ब्रेसलेट से ब्लड-प्रेशर नियमित करना हो , या फिर गले में पहनने से धनवान बना देने की बात हो । ये विज्ञापन हमारे हृदय में उन बातों को दिखाकर असन्तोष उत्पन्न करते हैं जिनकी हमारे पास कमी है और हम उन प्रोडक्ट्स के प्रति आकर्षित हो जाते हैं । मरकुस 4:19 में प्रभु यीशु तीन बातें बताते हैं जो हमारे जीवन में वचन को दबा देती हैं , जो परमेश्वर की आवाज़ को हमारे जीवन में शून्य कर देती हैं । जिनकी वजह से हम परमेश्वर की आवाज़ की अवहेलना करने लगते हैं । ये तीन बातें हैं - संसार की चिन्ता , धन का धोखा और वस्तुओं का लोभ । पहली बात - संसार की चिन्ता । वास्तव में अपने जीवन में जितनी बातों की हम चिन्ता करते हैं , उनमें से 90 प्रतिशत बातें तो कभी घटित होती ही नहीं परन्तु हम उन चिन्ताओं के कारण तनाव में अपना समय बिता देते हैं । दूसरी बात - धन का धोखा । हमें लगता है कि धन मिल जाएगा तो सब कुछ मिल जाएगा । परन्तु मानसिक रूप से सबसे ज़्यादा बीमार वे लोग हैं जिनके पास अपार धन है । तीसरी बात - वस्तुओं का लोभ । हमारे अन्दर असन्तोष उत्पन्न होता है क्योंकि हम तुलना करने लगते हैं कि दूसरों के पास क्या है और हमारे पास क्या नहीं ? इसी असन्तोष से हृदय में लालच उत्पन्न होता है । पुराने नियम में जब परमेश्वर ने मूसा को 10 आज्ञाएं दीं तो उनमें से एक आज्ञा थी कि - लालच न करना । कई बार हम सिर्फ़ इतना ही पढ़ते हैं परन्तु यदि निर्गमन 20:17 को ध्यान से पढ़ें तो सिर्फ़ इतना ही नहीं लिखा कि किसी के घर का लालच न करना , किसी की स्त्री का लालच न करना , किसी के अधिकार का लालच न करना और किसी की सम्पत्ति का लालच न करना बल्कि यह भी लिखा है कि यदि ऐसा करोगे तो परीक्षा में गिरोगे । हमारे जीवन के जिस क्षेत्र में हम असन्तुष्ट हैं , उसमें हम गिर जाएंगे और तब इसके कारण हमारा जीवन नारकीय बन जाएगा । जलन , लोभ , लालच , घृणा , ईर्ष्या , क्रोध , कुण्ठा , धोखा , व्यभिचार , निराशा; यह सब कुछ असन्तोष से ही उत्पन्न होता है । 1 तीमुथियुस 6:10 में लिखा है - रुपये का लोभ सब प्रकार की बुराई की जड़ है , कितने विश्वास से भटक गए । कितनों ने इसको प्राप्त करने के लिए अपने आप को नाना प्रकार के दुखों से छलनी कर लिया है । पौलुस यहां पर ‘छलनी’ शब्द का उपयोग करता है , जैसे किसी ने मशीन गन से किसी एक व्यक्ति पर सैकड़ों वार कर दिए और उसके शरीर को छलनी कर दिया । दुःखद बात यही है कि जब असन्तोष हमारे जीवन में आता है तो फिर हम तुलना करने लगते हैं , और लालच करने लगते हैं । न्यायियों 16:20 में जो बात शिमशोन के साथ घटित हुई वही बात हमारे साथ भी होती है , जहां लिखा है - वह तो नहीं जानता था कि यहोवा उसके पास से चला गया है । हमें भी अहसास नहीं होता कि परमेश्वर हमसे दूर हो गया है । अपने जीवन में सन्तुष्ट रहने के लिए हम क्या करें ? असन्तोष से हम कैसे बचें ? इस सन्दर्भ में परमेश्वर के वचन पर आधारित तीन बातों को हम देखेंगे । 1. हमारा सही व्यवहार हो:- सही व्यवहार से तात्पर्य है कि जो कुछ हमारे पास है उसमें हम धन्यवादित रहना सीखें । सन्तुष्ट रहने की बात जीवन में अपने आप से नहीं आती जबकि असन्तोष अपने आप आ जाता है । इसलिए यह सीखने की बात है कि हम हर बात में धन्यवाद करें । ठीक वैसे ही जैसे बचपन से माता-पिता बच्चे को बार-बार सिखाते हैं कि थैंक-यू बोलो । बच्चे को यह बार-बार सिखाना पड़ता है । 1 थिस्सलुनीकियों 5:18 में लिखा है - हर बात में धन्यवाद करो क्योंकि तुम्हारे लिए प्रभु यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है । हम कहते हैं कि हम नहीं जानते कि परमेश्वर की इच्छा हमारे जीवन में क्या है ? वास्तव में परमेश्वर की इच्छा यह है कि हम हर बात में धन्यवाद करें । यही परमेश्वर का आदेश है , यही उसकी इच्छा है । जब धन्यवाद से भरा हृदय होगा तो शैतान हमारी आत्मा का नाश नहीं कर पाएगा । इसीलिए यह परमेश्वर की इच्छा है कि हम हर बात में धन्यवाद करना सीखें । 1 तीमुथियुस 6:8 में लिखा है - यदि हमारे पास खाने और पहनने को हो तो हमें इसी पर सन्तोष करना चाहिए । क्या इतना ही पर्याप्त है ? परमेश्वर का वचन ऐसा क्यों कह रहा है ? आगे के पदों में इसके कारण का भी वर्णन है । 2. हमारा सही सोच हो:- सोच सही करने का अर्थ है कि हम दूसरों की आशीषें गिनना बन्द कर दें और यह देखें कि परमेश्वर ने हम पर कितने उपकार किए हैं । दूसरों के पास क्या है जो हमारे पास नहीं है ? हम इसी तुलना में कुण्ठित होते जाते हैं परन्तु डिग्रीज़ , धन , सुन्दरता , पद , प्रतिष्ठा की यह चूहा दौड़ कभी खत्म नहीं होती । थोड़ा सा और , थोड़ा सा और.. और अनन्त में मिलता क्या है ? आत्मा का विनाश! अक्सर हम एसाव के समान एक कटोरा दाल के बदले अपने पहिलौठेपन का अधिकार बेच देते हैं और इसका हश्र होता है अनन्त की मृत्यु , अनन्त की आग । अपने जीवन की छोटी-छोटी बातों में परमेश्वर की आशीषों को कभी क्या हमने गिना है ? क्या उस ऑक्सीजन के लिए जिसमें हम सांस ले सकते हैं , एक नये दिन के लिए जो परमेश्वर ने दिया है , क्या हमने परमेश्वर को इन बातों के लिए धन्यवाद दिया है ? क्या हमने कभी धन्यवाद दिया कि हमारे शरीर के सभी अंग ठीक से काम कर रहे हैं ? हम ने कभी धन्यवाद दिया कि हम देख सकते हैं ? कितने दृष्टिहीन लोग इस संसार में हैं जो देख नहीं सकते , पर फिर भी खुश रहते हैं , धन्यवादित रहते हैं । हमें उनसे सीखना है । हमें धन्यवाद देना चाहिए कि हम छू सकते हैं , हमारे हाथों में संवेदनशीलता है , उन कुष्ठ रोगियों के समान नहीं जिनके हाथों की संवेदनशीलता समाप्त हो गई । हम परमेश्वर को धन्यवाद दें कि हमें भूख लगती है क्यों भूख न लगना भी एक गम्भीर शारीरिक समस्या है , जिससे और भी समस्याएं उत्पन्न होती हैं । कैंसर से जूझता व्यक्ति जब मृत्यु के करीब आता है तो उसका एक बड़ा सिमटम यह होता है कि उसे भूख लगना बन्द हो जाती है । हम परमेश्वर को धन्यवाद दें कि उसने हमें क्षमा किया है , हम पर अपना अनुग्रह किया है , उस ने हम पर दया की है और अनन्त जीवन की निश्चितता दी है । कुछ समय पूर्व किसी देश में सात प्रचारकों को , जब वे प्रचार कर रहे थे आतंकवादी पकड़कर ले गए और 15 मिनट के बाद उनके गले काट कर उनकी हत्या कर दी गई । हम स्वतन्त्रतापूर्वक आराधना कर सकते हैं , यह बहुत बड़ा धन्यवाद देने की बात है । उस परिवार के बच्चों से तो पूछिए जिनके पिता आराधना कर रहे थे और उनका गला काट दिया गया! उस पत्नी से तो पूछिए जिसके पति की हत्या कर दी गई , जो प्रभु यीशु की महिमा का गीत गा रहा था । 3. हमारा सही उद्देश्य हो:- सच्चा धन वस्तुओं की लालसा और उनकी बहुतायत में नहीं है वरन् सन्तुष्ट और खुश रहने में है । कुछ समय पूर्व मैं अपने एक मित्र के साथ यात्रा के दौरान एक गांव से जा रहा था । गांव के कुछ बच्चे बेशरम के पेड़ की डाली काटकर , उसकी हॉकी स्टिक बनाए हुए थे । इन 15-20 बच्चों ने कपड़ों से एक बॉल बनाई हुई थी और वे बड़े उत्साह और आनन्द के साथ खेल रहे थे । मेरे मित्र कहने लगे कि कितने गरीब लोग हैं , बेचारे चीथड़ों की गेंद से खेल रहे हैं । मेरे साथ हमारे दूसरे मित्र ने कहा - ये गरीब नहीं हैं । वास्तव में ये हमसे अमीर हैं क्योंकि हमारे पास नाइकी और एडिडास की बॉल्स और कपड़े होने के बाद भी हम खुश नहीं होते हैं । हम असन्तुष्ट रहते हैं लेकिन इनके पास कुछ नहीं है फिर भी वे चीथड़ों में खुश हैं । वे आनन्द कर रहे हैं , उत्साह से भरे हुए हैं , उन्माद से भरे हुए हैं , धन्यवाद से भरे हुए हैं । किसी ने कहा है कि जीवन की दो त्रासदियां हैं - एक , बहुत कुछ पाने की कामना करने की त्रासदी और दूसरी त्रासदी , उन्हें पाकर भी अतृप्ति का अहसास करना । क्योंकि सब कुछ हासिल करने के बाद भी अगर असन्तोष बना हुआ है तो प्यास और बढ़ती चली जाती है । सबसे प्रमुख बात यही है कि केवल प्रभु यीशु में ही सन्तुष्टि मिलती है । उस में ही जीवन है । इसीलिए लिखा है कि सन्तोष सहित भक्ति बड़ी कमाई है । यदि प्रभु यीशु हमारे जीवनों में है , हम उसकी आराधना कर रहे हैं , हमारे जीवन में सन्तोष है , हम धन्यवाद के गीत गा रहे हैं , तो इससे बड़ी कमाई कोई नहीं है । क्योंकि इसका कारण पौलुस यह बताता है कि जब हमारा पृथ्वी पर का डेरा सरीखा घर गिराया जाएगा तब परमेश्वर की ओर से हमें स्वर्ग में भवन मिलेगा जो चिरस्थायी है । जो मनुष्यों के हाथ से बनाया हुआ नहीं है वरन् जिसे परमेश्वर ने हमारे लिए बनाया है । रोमियों 1:21 में लिखा है - इस कारण कि परमेश्वर को जानने पर भी उन्होंने परमेश्वर के योग्य बड़ाई और धन्यवाद न किया , परन्तु व्यर्थ विचार करने लगे , यहां तक कि उन का निर्बुद्धि मन अन्धेरा हो गया । हम अपनी दृष्टि किस तरफ लगाएंगे ? हमारा फोकस कहां होगा ? उस डेरे की ओर जो इस संसार में छूट जाएगा या उस भवन की ओर जिसे परमेश्वर ने हमारे लिए बनाया है ? जॉन वेस्ली ने लिखा है कि - हर बात का मूल्य उतना ही है , जितनी क़ीमत उसकी अनन्त में है और सबसे बड़ी क़ीमत जो है वह हमारे सम्बन्ध हैं । इसीलिए प्रभु यीशु ने कहा - अपने सारे मन से , अपनी सारी बुद्धि से , अपनी सारी शक्ति से परमेश्वर से प्रेम रख । और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख । नीरो बादशाह की सल्तनत में एक रोमी अधिकारी था , जिसका नाम जॉर्ज टरटूलियन था । वह स्टेडियम में बैठकर देखता था कि किस प्रकार से भूखे सिंहों के सामने मसीहियों को छोड़ दिया जाता है और वे भूखे सिंह कैसे उन्हें फाड़ खाते हैं । वह लिखता है कि - मैं देखता था कि जिस मसीही भाई की बारी आती थी तो उसका मित्र आगे आ जाता था कि सिंह उसको खा जाए । मैं देखता था कि जब बच्चों की बारी आती थी तो माताएं आगे आ जाती थीं और बच्चों को पीछे कर देती थीं कि सिंह बच्चों को न खाए , मां को खा जाए । उन लोगों ने अपने विश्वास से समझौता नहीं किया । उन्होंने अपने सम्बन्ध एक-दूसरे से नहीं तोड़े , उन्होंने अपने सम्बन्ध परमेश्वर से नहीं तोड़े । टरटूलियन ने आगे चलकर मसीह को स्वीकार कर लिया और उसने लिखा कि - देखो! वे एक दूसरे से कितना प्यार करते हैं और अपने परमेश्वर पर कितना विश्वास करते हैं , उससे कितना प्रेम करते हैं । (See how they love each other and how they love their God.) क्या होगा ? जब मेरे और आपके लिए कहा जाएगा मिट्टी को मिट्टी , धूल को धूल , राख को राख । प्यार से क़ब्र पर बिछाए कुछ फूल होंगे , कांपते हाथों से लगाई हुई एक मोमबत्ती होगी और उस क़ब्र को समतल करते शायद छोटे-छोटे हाथ होंगे । वह प्यार , वह सम्बन्ध , किसी की आंखों में उस प्यार की स्मृति के आंसू होंगे , और सबसे बढ़कर स्वर्ग में हमें भवन मिलेगा । परमेश्वर , प्रभु यीशु के द्वारा अपना हाथ बढ़ाकर हमको अपने आगोश में ले लेगा । परमेश्वर आपको आशीष दे।