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वायदों से आगे

वायदों से आगे

सन्दर्भ: मत्ती 21:28-31

मत्ती 21:28-31 में प्रभु यीशु के एक प्रमुख दृष्टान्त का वर्णन है । यह दृष्टान्त बहुत सरल और समझने में आसान है । प्रभु यीशु कहते हैं कि एक मनुष्य के दो पुत्र थे । इस मनुष्य ने अपने पहले पुत्र के पास जाकर कहा , हे पुत्र दाख की बारी में जाकर काम कर । उसने उत्तर दिया मैं नहीं जाऊंगा परन्तु बाद में पछताकर गया । फिर पिता ने दूसरे के पास जाकर ऐसा ही कहा । उसने उत्तर दिया , जी हां जाता हूं परन्तु नहीं गया । प्रभु यीशु कहते हैं कि इन दोनों में से किसने पिता की इच्छा पूरी की ? लोगों ने कहा - पहले ने । यीशु ने उनसे कहा- मैं तुम से सच कहता हूं कि महसूल लेने वाले और वेश्याएं तुमसे पहले परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करते हैं ।
प्रभु यीशु पूछते हैं कि किसने पिता की इच्छा को पूरा किया ? दूसरे बेटे ने बात तो बहुत अच्छी की , उसके विचार तो बड़े नेक थे । उसने अपने पिता की बात को उसके मुंह पर ठुकराया नहीं परन्तु उस बात के आगे कुछ हुआ नहीं । यहां जो बात प्रभु यीशु फरीसियों से कह रहे हैं वह यह कि हमें अपने इरादों से आगे जाना है (we have to go beyond our intentions) । हमें अपने इरादों , अपनी धारणा , अपने अच्छे विचारों , अपनी अच्छी बातचीत और अपने बड़े वायदों से आगे जाना है । मात्र धारणा और अच्छे विचारों से कुछ होने वाला नहीं है । जिसने अच्छी -अच्छी बातें कीं उसने पिता की इच्छा पूरी नहीं की और जिसने नकार दिया , उसने पश्चाताप किया और पिता की इच्छा पूरी की । उसके बाद प्रभु यीशु ने फरीसियों की ओर मुड़कर कहा कि - महसूल लेने वाले और वेश्याएं तुमसे पहले परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करेंगे ।
प्रभु यीशु मसीह इन फरीसियों से यह कह रहे हैं कि तुम अच्छे दिखते हो , अच्छी बातें करते हो , अच्छे वस्त्र पहनते हो , अच्छे उद्देश्य बताते हो , खूबसूरत प्रार्थनाएं करते हो परन्तु वास्तविकता में तुम उससे आगे नहीं बढ़ पाते । तुम मन नहीं फिराते , तुम पश्चाताप नहीं करते , अपनी ग़लतियों को स्वीकार नहीं करते , फल नहीं लाते । तुम्हारे जीवन से गवाही नहीं होती । तुम्हारे जीवन में परमेश्वर के प्रति तुम्हारे विश्वास का कोई प्रमाण दिखाई नहीं देता । फलहीन वृक्ष के समान तुम्हारा जीवन है , तुमने धर्म को परम्परा बना दिया है और उसे रीति- रिवाजों तक सीमित कर दिया है । अपने पापों को स्वीकार कर लेने की बात है नहीं ! इसीलिए अच्छी बातों से , अच्छे इरादों से , अच्छी अभिव्यक्ति से आगे तुम कुछ कर नहीं पाते । तुम्हारे जीवन में फल नहीं , पश्चाताप नहीं , आन्तरिक परिवर्तन नहीं , तुम्हारे हृदय में बदलाव नहीं । उसके आगे प्रभु यीशु कहते हैं कि ये जो वेश्याएं और महसूल लेने वाले हैं , जब इनमें परिवर्तन आता है तो इनकी गवाही दिखाई तो देती है! इनके विश्वास , परिवर्तन और पश्चाताप के परिणाम और फल दिखाई देते हैं ।
महसूल लेने वाले जक्कई से सब लोग घृणा करते थे । जीवन भर वह अपने कार्यों से लोगों को धोखा देता रहा , उन्हें ठगता रहा , छल-कपट करता रहा । परन्तु जब प्रभु यीशु उसके नाम से उसको पुकारते हैं , उससे कहते हैं कि मुझे तेरे घर जाना अवश्य है और उसके घर जाकर उसके साथ सहभागिता करते हैं , तो उसके घर में उद्धार आ जाता है । लूका 19: में लिखा है कि उसने कहा , हे प्रभु देख! मैं अपनी आधी सम्पत्ति कंगालों को देता हूं और किसी का कुछ अन्याय करके लिया है तो उसे चौगुना फेर देता हूं । हे प्रभु देख! मैं प्रमाण दे रहा हूं । मेरा पश्चाताप मात्र शब्दों तक सीमित नहीं है । प्रभु , मैं मात्र अपने घर का दरवाज़ा तेरे लिए नहीं खोल रहा हूं , मात्र अपने होठों से तेरी स्तुति नहीं कर रहा हूं । मैं अपनी सम्पत्ति का आधा भाग कंगालों को बांट देता हूं और यह मेरे विश्वास का प्रमाण है , यह मेरे विश्वास की अभिव्यक्ति है । यह मेरे पश्चाताप का फल है । यह आत्मा का फल है जो मेरे जीवन में दिखाई देता है ।
सामरिया नगर में याकूब के कुंए पर एक स्त्री आती है । प्रभु यीशु से उसका वार्तालाप होता है । वह उससे कहते हैं कि तू पांच पति कर चुकी है और जिसके साथ रह रही है वह भी तेरा पति नहीं है । उसके बाद जब प्रभु यीशु उससे जीवन के जल की बात करते हैं , परमेश्वर की योजना उस पर प्रगट करते हैं , तब हम यूहन्ना 4:39 में उस सामरी स्त्री की गवाही का परिणाम पाते हैं । स्पष्ट लिखा हुआ है कि उस नगर के बहुत सामरियों ने उस स्त्री के कहने से जिसने गवाही दी थी कि यीशु ने मेरे साथ क्या किया , विश्वास किया ।
एक महसूल लेने वाले के जीवन में जो परिवर्तन आया , उसके उस परिवर्तन की गवाही हुई और उस परिवर्तन का कार्यरूप में बदलना सबको दिखाई दिया । यूहन्ना 4:39 में वर्णित दुश्चरित स्त्री के लिए लिखा हुआ है कि उसने गवाही दी । उसके कहने से , लोगों ने प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास किया ।
हमारे साथ शायद ऐसा ही होता है कि हम सीखते तो बहुत ज़्यादा हैं परन्तु करते बहुत कम हैं । प्रश्न यह नहीं है कि हमें कितना ज़्यादा बाइबिल का ज्ञान है परन्तु प्रश्न यह है कि जितना हमें आता है उसमें से उसका कितना उपयोग हम अपने जीवन में करते हैं , अपने व्यवहार में उन बातों को लाते हैं ? हमारे पास information तो बहुत है परन्तु जीवन में transformation बहुत थोड़ा है । हमारे पास ज्ञान तो ज़्यादा है पर कार्य कम है ।
इस घटना से हमारे लिए क्या शिक्षा है ?
1. मात्र अच्छे इरादों और अच्छे विचारों से हम परमेश्वर के लिए तब तक कुछ नहीं कर सकते जब तक हम कुछ ठोस निर्णय न करें:- दूसरे पुत्र का उत्तर तो बहुत सकारात्मक था कि हां , मैं जाऊंगा और कार्य करूंगा । वह पिता का आदर करता है , वह पिता के हृदय को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता , वह पिता की बात को स्वीकार करता है । सतही तौर पर वह पिता को सम्मान दिखाता है परन्तु उसके आगे कुछ नहीं । मात्र अच्छे विचारों और अच्छे इरादों से हम परमेश्वर के लिए तब तक कुछ नहीं कर सकते जब तक हमारे निर्णय पक्के न हों , जब तक हम ठान न लें । हो सकता है कि हमारे विचार अच्छे हों , हमारी योजनाएं अच्छी हों , हमारा स्वप्न अच्छा हो परन्तु जब तक हम निर्णय न करें तब तक सब बेकार है ।
दानिय्येल 1:8 में लिखा हुआ है - परन्तु दानिय्येल ने अपने मन में ठान लिया कि वह राजा का भोजन न खाएगा और न दाखमधु पीकर अपवित्र होगा । दानिय्येल ने सिर्फ़ इरादा नहीं किया , विचार नहीं बनाया परन्तु एक स्पष्ट और विशिष्ट निर्णय किया कि वह राजा का भोजन न खाएगा और न दाखमधु पीकर अपवित्र होगा ।
उत्पत्ति के 41 वें अध्याय में राजा फिरौन ने स्वप्न देखा । सात मोटी गायें , सात पतली कुरूप गायें । यूसुफ उस स्वप्न का अर्थ बताता है कि सात अच्छे वर्ष होंगे । सात अच्छी फसल के वर्ष होंगे , उपजाऊ भूमि होगी और उसके बाद जो सात वर्ष आएंगे उनमें अकाल पड़ेगा । उनमें भयंकर स्थिति हो जाएगी । ये सात दुबली गायें सात मोटी गायों को खा जाएंगी । यूसुफ ने इतना ही नहीं , कि बता दिया कि ऐसा होने वाला है , बल्कि यह भी बताया कि अब क्या करना है ? वह एक एक्शन प्लान बताता है कि अब फिरौन किसी समझदार और बुद्धिमान पुरुष को ढूंढ़कर उसे मिस्र देश पर प्रधानमंत्री ठहराए । दूसरी बात , फिरौन यह करे कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में अधिकारियों को नियुक्त करे । तीसरी बात , जब तक अच्छी उपज हो रही है सारे किसानों से उपज का पचमांश लेक । वे इन अच्छे वर्षों में सब प्रकार की भोजन वस्तुएं इकट्ठा करें और नगर-नगर में भण्डार गृह भोजन के लिए बनाए जाएं और फिरौन के वश में करके उसकी रक्षा की जाए । 36 वीं आयत में लिखा है कि उन भोजन वस्तुओं को मिस्र देश में आने वाले सात वर्षों के अकाल के समय भोजन के लिए रखा जाए । जिससे देश अकाल से सत्यानाश न हो जाए । इस बात का विशेष ध्यान रखा जाए कि नगर - नगर में भण्डार गृहों में जो पचमांश जमा होगा , उसमें से कोई खाएगा नहीं ।
फिरौन ने यह स्वप्न दो बार देखा अर्थात् यह होना तो निश्चित है । अब एक निर्णय लेना है कि क्या किया जाए । अगर हमसे यह कहा जाए कि कितने लोग परमेश्वर की सेवा करना चाहते हैं तो हम सबका उत्तर हां में ही होगा । परन्तु उसके लिए एक्शन प्लान क्या है ? क्या निर्णय आपने किया है ? अपनी योग्यताओं को किस प्रकार आप कलीसिया की मज़बूती के लिए , उसके राज्य के विस्तार के लिए लगा सकते हैं ? वे कौन से कार्य होंगे जिन्हें करने के बाद , अपने जीवन के अन्तिम समय में आप यह कह सकें कि मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है , मैंने अच्छी कुश्ती लड़ी है , मैंने विश्वास की रखवाली की है ।
क्या आप अपनी आय का दशमांश दे रहे हैं ? क्या पिछले वर्षों में इस राशि में बढ़त हुई है ? या फिर जितना 10 साल पहले देते थे अभी भी वही दे रहे हैं कि चर्च में सदस्यता बनी रहे । क्या परमेश्वर को सब कुछ देने का निर्णय इस लिफाफे के ऊपर दिखाई देता है ? क्या आपने निर्णय लिया है कि हम अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखेंगे ? यदि लिया है तो इसके लिए क्या एक्शन प्लान है ? क्या हम व्यायाम कर रहे हैं ? क्या हम अपने भोजन में संयमित हैं ? क्या हम नशे की वस्तुओं से दूर हैं ? हमें आत्मिकता में आगे बढ़ना है तो उस आत्मिकता में आगे बढ़ने के लिए हम क्या कर रहे हैं ? हमारा एक्शन प्लान क्या है ?
2. हमारे निर्णय का स्पष्ट प्रमाण दिखना चाहिए:- जिस बेटे ने पिता से कह दिया मैं नहीं जाऊंगा , उसने फिर पश्चाताप किया और जाकर उसने काम किया । उसने पिता की इच्छा को पूरी किया । परमेश्वर के लिए हमारे समर्पण और जीवन जीने के निर्णय के क्या कोई प्रमाण हमारे जीवन में दिखाई दे रहे हैं ?
1 यूहन्ना 1:5-6 में लिखा है - जो समाचार हमने सुना और तुम्हें सुनाते हैं वह यह कि परमेश्वर ज्योति है और उसमें कुछ भी अन्धकार नहीं । यदि हम कहें कि हमारी उसके साथ सहभागिता है और फिर अन्धकार में चलें तो हम झूठे हैं और सत्य पर नहीं चलते ।
यदि हम कहें कि हम मसीही हैं परन्तु उसके प्रमाण दिखाई न दें तो हम झूठे हैं! क्या मेरे विश्वास और मेरी जीवन शैली में समानता दिखाई देती है ? क्या मैं अपने अनुभवों और अनुभूति के अनुसार अपने जीवन में चलता हूं ? क्या मेरा व्यवहार और प्रतिक्रियाएं सामने वाले के व्यवहार के अनुसार होती हैं ? या फिर मैं परमेश्वर के वचन की निश्चितता और उसके प्रति मेरे विश्वास की प्रतिबद्धता के आधार पर चलता हूं ? परमेश्वर ने हमें अपनी समानता में रचा परन्तु जब हम इस संसार में आए तो यह अभिशापित , दूषित और कुलषित संसार है , इस संसार में शैतान का राज्य है । क्या हमने इसको प्रभावित किया है कि इसने हमें प्रभावित किया है ? क्या हम परमेश्वर की इच्छा पर चलेंगे या अपनी इच्छा पर चलेंगे ? क्या मेरा जीवन इस बात की गवाही है कि मैं परमेश्वर की इच्छा पर चल रहा हूं ?
किसी टीकाकार ने लिखा है कि दो प्रकार के मसीही इस संसार में होते हैं । एक वे , जो अपनी इच्छा के अनुसार परमेश्वर को चलाने की कोशिश करते हैं । जो कहते हैं कि अरे! परमेश्वर ने बड़ा द्वार खोल दिया है इसके लिए और बड़ा धन मिल गया है । परमेश्वर ने बड़ा द्वार खोल दिया और फलां जगह शादी कर ली । परन्तु कभी-कभी हम भूल जाते हैं कि हमारे लिए शैतान भी बहुत से द्वार खोलता है ।
दूसरे प्रकार के मसीही वे होते हैं , जो स्वयं को परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलाने की कोशिश करते हैं ।
अपने जीवन में यदि हमें अच्छे इरादों से , वायदों से आगे जाना है तो इसके लिए ज़रूरी है कि हम निर्णय लें और हमारे निर्णय के प्रमाण लोगों को दिखाई दें ।
3. हमारी ज़िन्दगी की सीमाओं का क्या प्रमाण है ? हमारी ज़िन्दगी की सीमाओं का प्रमाण स्पष्ट होना चाहिए । वास्तव में , हमारे साथ समस्या यह हो जाती है कि हम सोचते हैं कि मसीही जीवन की सीमाओं को लांघना बहुत आसान है ।
यशायाह 49:16 में बहुत प्रमुख सन्दर्भ है , जहां परमेश्वर अपना प्रेम व्यक्त करते हुए कहता है - देख , मैंने तेरा चित्र अपनी हथेलियों पर खोद कर बनाया है । तेरी शहरपनाह सदैव मेरी दृष्टि के सामने बनी रहती है ।
जब हथेलियों पर खोदेंगे तो खून निकलेगा और उसने अपना खून बहाया है । इसलिए हमारे मसीही जीवन की सीमा शहरपनाह के समान होना चाहिए । किसी लकीर की तरह नहीं बल्कि दीवार जैसी होना चाहिए । यह शहरपनाह परमेश्वर की दृष्टि में बनी रहनी चाहिए ।
जब नहेमायाह के मित्र उससे मिलने राजमहल में आए तो उनका दिल भारी था , उनकी भावनाएं बोझिल थीं , आंखों में आंसू थे , क्यों ? क्योंकि यरूशलेम उजड़ गया था । यरूशलेम कैसे उजड़ गया ? क्योंकि उसके फाटक जल गए और उसकी शहरपनाह टूट गई । क्या हमारे जीवन की शहरपनाह मज़बूती से बनी है ? अगर हमने अपने जीवन की शहरपनाह को सुरक्षित रखा है , सीमाओं को बान्ध रखा है तो हमारा दिल , हमारी ज़िन्दगी , हमारी आत्मा सुरक्षित रहेगी । अगर हमने मात्र लकीरें खींचकर रखी हैं तो फिर सुरक्षा नहीं बनी रह पाएगी ।
शहरपनाह का उद्देश्य सिर्फ़ नगर की सीमाओं का निर्धारण नहीं होता था । दूसरी बात यह थी कि बाहर के दुश्मनों से रक्षा भी होती थी । लकीर के पार जाना तो आसान होता है परन्तु शहरपनाह को लांघकर आना दुश्मन के लिए मुश्किल होता था । नगर की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए भी शहरपनाह का होना ज़रूरी होता था ।
बाइबिल कॉलेज में मेरे एक मित्र थे जिनका नाम स्कॉट था , वे मेरे साथ तीन महीने रूममेट भी रहे । फिर उनके भाई के साथ कुछ दुर्घटना हो गई तो उन्हें बाइबिल कॉलेज छोड़कर जाना पड़ा । मैंने उस थोड़े से समय में उनसे बहुत कुछ सीखा । मुझ से उम्र में वे छोटे थे पर आत्मिक रूप में मुझ से बहुत ज़्यादा परिपक्व थे । उन्होंने अपने जीवन में सीमाएं बान्ध कर रखी थीं । वे कहते थे कि अजय मेरे साथ यह समस्या है कि मैं अश्लीलता की तरफ आकर्षित हो जाता हूं इसलिए जहां अश्लील साहित्य और गन्दी मूवीज़ मिलती हैं , मैं उन से खुद को दूर रखता हूं । आज कितना आसान हो गया है यह सब , क्योंकि सब कुछ इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध है । क्या हमने इससे खुद की सुरक्षा के लिए शहरपनाह बना रखी है ?
जब मेरा बेटा अभिजीत अपने अध्ययन के बाद अमेरिका से वापस आया तो उसने मुझसे कहा कि अपने ऑफिस में हमें इन्टरनेट सिक्योरिटी का सिस्टम लगाना चाहिए । इस सिस्टम में यह होता है कि हम जिस भी साइट्स पर जाएंगे , उसकी रिपोर्ट उस व्यक्ति के पास जाएगी जिसे आपने उस सिस्टम में जोड़ा है । वह व्यक्ति आपके अधिकारी , आपकी पत्नी या आपके बच्चे हो सकते हैं । इस तरह हमारी जवाबदारी बन जाती है । वास्तव में ये बाउण्ड्रीज़ बनाना ज़रूरी है । इसका उम्र या पद से कोई लेना-देना नहीं है । इसका अधिकारी , पासबान या अगुवे हो जाने से कोई ताल्लुक नहीं है । प्रत्येक व्यक्ति परीक्षा में पड़ सकता है क्योंकि उसके पास निर्णय करने का अधिकार होता है । हमारी बाउण्ड्रीज़ कहां हैं ? यदि हम ग़लत दिशाओं में अपना चिन्तन , पैसा और ऊर्जा लगाएंगे तो हम सही दिशा में नहीं बढ़ पाएंगे ?
एक टीकाकार ने लिखा है - ऊर्जा , बिना नियंत्रण के विध्वंसक हो जाती है , विस्फोटक हो जाती है । अधिकार , बिना नियंत्रण के राज्य को बर्बाद कर देता है । आग , बिना नियंत्रण के विनाशक हो जाती है , शहरों और जंगलों को बर्बाद कर देती है । मन , बिना नियंत्रण के व्यक्ति को पागल बना देता है । राह , बिना संकेतक के भटका देती है । जहाज़ , बिना दिशा सूचक यन्त्र के दुर्घटना ग्रस्त हो जाता है । जीवन , बिना अनुशासन के अभिशाप बन जाता है ।
स्वतन्त्रता का अर्थ यह नहीं कि जो मन में आए वही हम करते जाएं । किसी भी दिशा में जाने से हमें मन्ज़िल नहीं मिल जाती । किसी भी म्यूज़िक नोट को दबाने से गीत की धुन नहीं बन जाती । किसी भी वस्तु को खाने से स्वास्थ्य नहीं बन जाता । किसी भी नम्बर को दबाने से घर पर फोन नहीं लग जाता । ट्रेन को ट्रैक पर चलना पड़ता है तब ही वह सही चल सकती है और यात्री सुरक्षित रह सकते हैं । गाड़ी को सड़क की सीमाओं में चलना पड़ता है तब गाड़ी सुरक्षित , मन्ज़िल तक पहुंच सकती है ।
बहुत कठिन है अपने दुश्मनों से प्रेम करना , अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना करना , बुराई का बदला भलाई से देना । भावनाओं के आधार पर , अपनी सुविधा के अनुसार , अपनी इच्छा के अनुसार हम यह कर नहीं सकते । यह बात तभी सम्भव है जब हम ईश्वर की इच्छा को पूरा करेंगे , ईश्वर की इच्छा पर चलने का निर्णय करेंगे ।
नीतिवचन 23:19 में लिखा है - हे मेरे पुत्र , तू सुनकर बुद्धिमान हो और अपना मन सुमार्ग में सीधा चला ।
4. अन्तिम बात यह है कि हमारे जीवन में सच्चे विश्वास का प्रमाण क्या है ? अगर हमें अपने इरादों से आगे बढ़ना है , तो हमारे विश्वास का प्रमाण क्या है ? उस बेटे के विश्वास का प्रमाण यह हुआ कि उसने पश्चाताप किया और उसका पश्चाताप दिखाई भी दिया क्योंकि उसने खेत में दाख की बारी में जाकर , पिता की आज्ञा और उसकी इच्छा को पूरा किया । विश्वास तो वे भी करते हैं जो प्रभु यीशु को नहीं जानते , विश्वास तो अनीश्वरवादी भी करते हैं क्योंकि वे इस बात पर विश्वास करते हैं कि ईश्वर नहीं है । वे इस बात पर विश्वास करते हैं कि पृथ्वी पहले आग का जलता हुआ गोला थी ।
बाइबिल में लिखा है विश्वास तो दुष्टात्माएं भी करती हैं परन्तु यदि हमारा विश्वास सच्चा है तो उसका प्रमाण क्या है ? अक्सर होता यह है कि हम जो कहते हैं और जो हम करते हैं , उसमें अन्तर होता है और जो हम करते हैं उससे पता चलता है कि हमारा विश्वास क्या है । हमारे परिणामों से , हमारे फलों से इसका प्रमाण दिखाई देता है । हमारे सच्चे विश्वास का प्रमाण क्या है ?
जब से प्रभु यीशु हमारे जीवन में आया है तो क्या कोई अन्तर आया है ? क्या हम एक बेहतर व्यक्ति बने हैं ? क्या हम एक बेहतर पति बने हैं ? क्या हम बेहतर पिता बने हैं ? क्या हम एक बेहतर अधिकारी बने हैं ? क्या हम एक बेहतर कर्मचारी बने हैं ? क्या हम बेहतर नागरिक बने हैं ? क्या अन्तर आया है हमारे व्यवहार और हमारी प्रतिक्रियाओं में ? क्या हमारे जीवन में पवित्रात्मा का फल है ? क्या हमारे जीवन में पवित्रात्मा का नियन्त्रण है ? क्या हमारे जीवन में प्रभु यीशु का धैर्य है ? क्या हम अपने क्रोध पर नियन्त्रण कर पाते हैं ? क्या हम विषमताओं में भी विश्वास करने में सक्षम हैं ? क्या हम त्रासदियों में भी परमेश्वर पर आशा रखते हैं ? क्या हम मृत्यु की छाया में भी शान्ति से परमेश्वर की ओर देखते हैं ? क्या हमें अनन्त जीवन की निश्चितता है ? क्या यह निश्चितता हमारे विश्वास में दिखाई देती है ?
1 पतरस 1:7 में लिखा है - और यह इसलिए कि तुम्हारा परखा हुआ विश्वास जो आग के ताए हुए नाशवान सोने से कहीं अधिक बहुमूल्य है । यीशु मसीह के प्रगट होने पर प्रशंसा और महिमा और आदर का कारण ठहरे।
सोना तो नाशवान है परन्तु जीवन के अन्तिम समय तक हमारा प्रभु पर जो विश्वास है , परखा हुआ विश्वास है वह मसीह के प्रगट होने पर प्रशंसा और महिमा और आदर का कारण ठहरेगा ।
हम कैसे समय बिता रहे हैं ? हमारे जीवन में परमेश्वर के प्रति हमारे विश्वास का क्या प्रमाण है ? क्या चिन्ह हैं ? क्या फल हैं क्योंकि वृक्ष अपने फलों से पहचाना जाता है ।
1 कुरिन्थियों 9:24 में पौलुस लिखता है - क्या तुम नहीं जानते कि दौड़ते तो सब हैं पर ईनाम एक ही ले जाता है । तुम ऐसे दौड़ो कि जीतो ।
कुछ वर्ष पहले ओलम्पिक खेलों में नाइजीरिया का एक धावक अपने छोटे से देश का प्रतिनिधित्व करते हुए फाइनल रेस तक पहुंच गया । जब वह फाइनल रेस में दौड़ रहा था तो उसका पैर गिरने से टूट गया । उसे असहनीय पीड़ा होने लगी , उसके बाद वह उठा और लड़खड़ाता हुआ , लंगड़ाता हुआ अपने अन्तिम बिन्दु तक पहुंचा और उस दौड़ को पूरा किया । जब उस से पत्रकारों ने पूछा कि तुम कैसे व्यक्ति हो! तुम गिर गए , रक्त से पांव भर गया , तुम्हारे पैर की हड्डी टूट गई फिर भी उस रेस ट्रैक पर क्यों चले गए ? उसने कहा मेरे देश ने मुझे इसलिए नहीं भेजा कि मैं अपनी दौड़ अधूरी छोड़कर वापस लौट जाऊं और अपने देश का झण्डा नीचा कर दूं । मेरे देश ने मुझे यहां इसलिए भेजा है कि मैं इस दौड़ को पूरा करूं , चाहे लड़खड़ाते हुए , चाहे पीड़ा से और चाहे असहनीय वेदना सहते हुए ।
परमेश्वर ने हमें इस संसार में भेजा है कि हम अपनी दौड़ पूरी करें । चाहे कितनी भी पीड़ा हो और चाहे कितनी भी विषमता हो! जिससे उसके सत्य का प्रमाण और उसके हमारे प्रति विश्वास का प्रमाण हमारे जीवन में बना रहे।

परमेश्वर आपको आशीष दे।