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प्रार्थना का महत्व

प्रार्थना का महत्व

सन्दर्भ: मत्ती 6:5-8

कई ऐसे लोग मिलते हैं जो कहते हैं कि हम हर दिन आप लोगों के लिए प्रार्थना करते हैं । इनमें कई बुजुर्ग होते हैं , विधवाएं , युवा , पुराने मित्र और पासबान होते हैं । जब वे कहते हैं कि हम हर दिन आपके लिए प्रार्थना करते हैं तो सुनकर दिल इतना भर आता है कि हमारे पास कहने को कोई शब्द नहीं होते ।
इंग्लैण्ड के एक वैज्ञानिक ने इस बात पर शोध किया कि प्रार्थना का सकारात्मक प्रभाव लोगों के जीवनों में किस प्रकार होता है ? अपने शोध में उसने यह खोजने का प्रयास किया कि कौन से ऐसे लोग हैं जिनके लिए सबसे ज़्यादा प्रार्थना की जाती है ? जो सूची सामने आई उसमें वे लोग थे जो बीमार थे , बुजुर्ग थे , परमेश्वर के सेवक थे , जो अपंग और लाचार थे । ऐसे परिवार भी थे जो टूटने की कगार पर थे । इन लोगों की सूची बनाने के बाद उनके बारे में जानकारी प्राप्त की गई । इस वैज्ञानिक ने यह जानने का प्रयास किया कि जिनके लिए प्रार्थना सबसे ज़्यादा की जाती है उनके जीवन में तो अधिक आशीषें होनी चाहिए , उनका अच्छा स्वास्थ्य होना चाहिए , उनके पास दीर्घायु का वरदान होना चाहिए परन्तु वास्तव में ऐसा होता नहीं! तब उस वैज्ञानिक ने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रार्थना का व्यवहारिक महत्व शून्य है!
परन्तु वास्तविक प्रश्न यह है कि प्रार्थना को हम किस रूप में देखते हैं ? प्रार्थना के प्रति हमारा सम्पूर्ण नज़रिया क्या है ? प्रार्थना से हमारी अपेक्षा क्या है ? प्रार्थना हर बार सफलता की कुन्जी नहीं होती । जिस बात के लिए हम प्रार्थना करते हैं , उसके अनुसार हमारे जीवन में अक्सर नहीं होता । जिस बात को हम सफलता सोचते हैं वह वास्तव में परमेश्वर की दृष्टि में सफलता नहीं होती । हम किसी बीमार के लिए प्रार्थना करते हैं कि वह स्वस्थ हो जाए परन्तु उसकी मृत्यु हो जाती है । हम प्रार्थना करते हैं कि हमारी टीम जीत जाए परन्तु टीम हार जाती है । हम प्रार्थना करते हैं कि हमें दर्द से छुटकारा मिल जाए परन्तु वह दर्द बढ़ जाता है । हम प्रार्थना करते हैं कि हमारे बच्चे परीक्षा में सफल हों , उनका नाम मेरिट लिस्ट में आए पर वे असफल हो जाते हैं ।
हम में से कोई ऐसा नहीं होगा जिसे अपनी ज़िन्दगी में कभी न कभी प्रार्थना से निराशा नहीं हुई । कई बार प्रार्थना करने के बाद हताश हुए । कोई भी ऐसा नहीं होगा जिसने प्रार्थना पर शंका नहीं की ।
कई बार यह निराशा हमारी ख़ुद की समझ और हमारी सोच के आधार पर होती है । यह निराशा दुनिया के मापदण्डों के आधार पर होती है , भौतिकता के परिप्रेक्ष्य में होती है । हम सोचते हैं कि प्रार्थना एक जादू के समान है कि जो कुछ हमने कहा , वैसा हो जाए । यह किसी तथाकथित मंत्र के समान है कि हमने प्रार्थना को उच्चारित किया और उसका परिणाम सामने आ जाना चाहिए । हम सोचते हैं कि प्रार्थना किसी लॉटरी के सही नम्बर के समान है कि ड्रा में नम्बर लगते ही हमें सब कुछ मिल गया ।
वास्तव में प्रार्थना के सम्बन्ध में बाइबिल में ऐसी शिक्षा नहीं दी गई है । प्रभु यीशु ने प्रार्थना के सम्बन्ध में यह शिक्षा नहीं दी कि प्रार्थना केवल अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति का ज़रिया है । परन्तु प्रार्थना वास्तव में जीवन शैली की बात है । प्रार्थना वास्तव में मसीही व्यवहार है । प्रार्थना परमेश्वर से जुड़ने का एक माध्यम है । सम्पूर्ण मसीही जीवन में प्रार्थना उस तंत्र के समान है जो हमें परमेश्वर से बान्धे रखती है ।
इसीलिए बाइबिल में लिखा हुआ है - प्रार्थना में लगे रहो , निरन्तर प्रार्थना करते रहो । क्योंकि प्रार्थना परमेश्वर से हमारा एक बार का सम्वाद मात्र नहीं परन्तु एक सतत् प्रक्रिया है । प्रार्थना एक सतत् अनुशासन की बात है , परमेश्वर के साथ सतत् सम्बन्ध की बात है । उसके साथ-साथ चलने की बात है । प्रार्थना परमेश्वर पर हमारे सतत् अटूट विश्वास की गवाही है । प्रार्थना हमारे अनुशासन , हमारे धैर्य , हमारी साधना की अभिव्यक्ति है कि आत्मिकता की गहराई और ऊंचाई तक तथा उस परिपक्वता तक हम पहुंच सकें जिसकी अपेक्षा एक मसीही विश्वासी से की जाती है । परन्तु बहुत थोड़े हैं जो प्रार्थना में उस परिपक्वता के स्तर तक पहुंच पाते हैं । प्रार्थना के बिना मसीही जीवन जीना ऐसा है जैसे बिना बुनियाद का घर बनाना , बिना परिश्रम किए उद्देश्य तक पहुंचने का प्रयास करना , बिना ज्ञान प्राप्त किए गोल्ड मैडल की अपेक्षा करना।
प्रभु यीशु मसीह ने अपने सबसे पहले उपदेश , जिसे हम पहाड़ी उपदेश के नाम से जानते हैं; में दो स्थानों पर प्रार्थना के सम्बन्ध में चर्चा की ।
मत्ती 6:5-8 में वह कहते हैं - "जब तू प्रार्थना करे , तो कपटियों के समान न हो । (ग्रीक भाषा में कपटी के लिए जो मूल शब्द आया है उसका अर्थ है अन्धविश्वासियों के समान न होना । अन्धविश्वासियों के समान प्रार्थना न करना) । क्योंकि लोगों को दिखाने के लिए आराधनालयों में और सड़कों के मोड़ों पर खड़े होकर प्रार्थना करना उनको अच्छा लगता है । मैं तुम से सच कहता हूं कि वे अपना प्रतिफल पा चुके । परन्तु जब तू प्रार्थना करे , तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द कर के अपने पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर । तब तेरा पिता जो गुप्त में देखता है , तुझे प्रतिफल देगा । प्रार्थना करते समय अन्यजातियों के समान बक-बक न करो , क्योंकि वे समझते हैं कि उनके बहुत बोलने से उनकी सुनी जाएगी । इसलिए तुम उन के समान न बनो , क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हारे मांगने से पहले ही जानता है कि तुम्हारी क्या-क्या आवश्यकताएँ हैं ?"
कई बार हम यह भी कहते हैं कि हमारा पिता हमारे मांगने के पहले ही जानता है कि हमारी क्या-क्या आवश्यकता है तो हम प्रार्थना क्यों करें ? यह हमारा उथला चिन्तन है , क्योंकि हम सोचते हैं कि प्रार्थना मात्र मांगना है , और जब परमेश्वर जानता है कि किन बातों की आवश्यकता है तो फिर हम प्रार्थना क्यों करें परन्तु प्रार्थना का अर्थ मांगने से कहीं अधिक गहरा है ।
यहां लिखा है कि कपटियों के समान प्रार्थना न करना क्योंकि जब वे प्रार्थना करते थे तो दिखावे के लिए करते थे । जब हम प्रार्थना करते हैं तो हमारा श्रोता, हमारा सुनने वाला; परमेश्वर है । हम परमेश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं । कपटी लोग , लोगों को सुनाने के लिए प्रार्थना करते थे । उनका श्रोता समूह उनके इर्द-गिर्द जमा भीड़ होती थी और उन लोगों को सुनाने के लिए वे ढोंग भरी प्रार्थनाएं करते थे । उनकी प्रार्थना का उद्देश्य परमेश्वर से सम्वाद करना नहीं होता था । उनकी प्रार्थना परमेश्वर की ओर दृष्टि लगाने के लिए नहीं होती थी । उनकी प्रार्थनाओं का उद्देश्य लोगों के सामने अपनी झूठी धार्मिकता और धूर्तता का दिखावा करना होता था । इसीलिए बड़ी लच्छेदार भाषा में , बड़ी आकर्षक भाषा में , बड़ी ऊंची-ऊंची आवाज़ में और बड़े आकर्षक वस्त्र पहनकर ये शास्त्री और फरीसी प्रार्थना करते थे ।
प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि ऐसी प्रार्थना मत करना । लोगों को दिखाने के लिए , लोगों को प्रभावित करने के लिए , लोगों को अपना श्रोता मानकर प्रार्थना मत करना । जब तू प्रार्थना करे तो अपनी कोठरी में जाना और द्वार बन्द कर लेना । तब तू सही प्रार्थना करेगा और तेरा ध्यान परमेश्वर की ओर रहेगा । तब वास्तव में तू परमेश्वर से प्रार्थना करेगा , लोगों को दिखाने के लिए नहीं । तब तेरा श्रोता परमेश्वर होगा और तेरी प्रार्थना परमेश्वर की ओर केन्द्रित होगी ।
प्रभु यीशु के इस पर्वतीय उपदेश में प्रार्थना के सम्बन्ध में तीन बातें सामने आती हैं ।
1. प्रार्थना विश्वासियों के लिए एक विशिष्ट वरदान है ।
जब हम प्रार्थना करते हैं तो सृष्टि के कर्ता का ध्यान हमारी ओर लगता है । सृष्टि का कर्ता हमारी याचना पर ध्यान देता है । सृष्टि का कर्ता हमारे हृदय के , हमारे मुख के वचनों को सुनता है ।
जब हम प्रार्थना करते हैं तो क्या कभी हमने इस बात का अहसास किया है कि हम राजाओं के राजा , प्रभुओं के प्रभु , इस सृष्टि के कर्ता से , इस सृष्टि के निर्माता से प्रार्थना कर रहे हैं । वह हमारी ओर ध्यान दे रहा है । वह हमारी आवाज़ को सुन रहा है । वह सृष्टिकर्ता , जिसके कहने मात्र से चन्द्रमा , सूर्य , तारे , पृथ्वी और सारा सौर-मण्डल अस्तित्व में आ गया , जिसके कथन मात्र से सारी सृष्टि की सृजना हो गई; वह परमेश्वर मुझ पर और आप पर ध्यान देता है । वह परमेश्वर हमें अपनी निकटता का अहसास कराता है । वह परमेश्वर हमारी आवाज़ को सुनता है । जिसने आदम और हव्वा को मिट्टी से बनाया और जिसकी श्वास से उसमें जीवन आ गया , वह परमेश्वर मुझे और आपको देख रहा है , हमारी आवाज़ को सुन रहा है । जिस परमेश्वर ने लाल समुद्र को दो भागों में बांट दिया , जिस परमेश्वर ने मृतकों को जीवित कर दिया , जिस परमेश्वर ने सिंहों के मुख को बन्द कर दिया । जिस परमेश्वर ने आग की लपटों में अपने लोगों की रक्षा की , जिस परमेश्वर ने मृत्यु के दंश को समाप्त कर दिया , जिस परमेश्वर ने अपने हाथों से मेरे और आपके लिए स्वर्ग में जगह तैयार की; वह अद्भुत परमेश्वर हमारी आवाज़ सुन रहा है , वह हम पर ध्यान दे रहा है ।
यह विशिष्ट वरदान किसके लिए है ? यह वरदान विश्वासियों के लिए है; यदि हमारा सम्बन्ध प्रभु यीशु से है , यदि हम उससे जुड़े हुए हैं । अगर मात्र नल लगा हुआ है और उसका सम्बन्ध टंकी से नहीं है , अगर मात्र टेलीफोन रखा है , और उसमें कोई सिग्नल्स नहीं हैं , अगर कोई उपकरण रखा है और उसका कनेक्शन बिजली से नहीं है तो फिर उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं है । परन्तु एक विचित्र सी बात जो हमारी समझ से परे है वह यह कि परमेश्वर कैसे हमारी आवाज़ को सुनता है!
मार्कोनी एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था जिसने वायरलेस का आविष्कार किया था । वायरलेस का आविष्कार करने के बाद जब उसका इन्टरव्यू लिया गया तो उसने एक बात कही कि मैं जानता हूं कि वायरलेस क्या है , मैं जानता हूं कि इससे क्या होता है , इसके कार्य का परिणाम भी मैं देख सकता हूं परन्तु यह सब कुछ कैसे होता है , यह मैं नहीं बता सकता ।
मैं भी अपने सेलफोन में जब मैं कॉल का बटन दबाता हूं तो 10 हज़ार मील दूर मेरे बेटे और बेटी के फोन में घण्टी बजती है , और वे फोन उठाकर मुझसे पूछते हैं कि डैडी आप कैसे हैं ? मैं नहीं जानता कि कैसे यह पूरी प्रक्रिया संचालित होती है ? परन्तु ऐसा होता है । इसको हम देख नहीं सकते , उसका विवरण नहीं दे सकते , उसका विश्लेषण नहीं कर सकते पर ऐसा होता है ।
वैसे ही हमारी प्रार्थनाएं हैं , जब हम प्रार्थना करते हैं तो उस प्रार्थना का प्रभाव उस परमेश्वर तक होता है ।
बाइबिल में कई ऐसी घटनाएं हैं जहां परमेश्वर की इच्छा बदल गई । विश्वासी की प्रार्थना में इतनी सामर्थ्य है , कि परमेश्वर की योजना बदल जाती है । यह विशिष्ट वरदान केवल विश्वासियों को प्राप्त है । क्या हम उस प्रभु यीशु मसीह से कनेक्टेड हैं ? उससे जुड़े हुए हैं ?
किसी ने कहा है कि प्रार्थना के तीन स्तर होते हैं ।
पहला स्तर - सार्वजनिक प्रार्थना का होता है ।
प्रभु यीशु ने ऐसी प्रार्थनाएं कीं । जब 5 रोटी और 2 मछली से प्रभु यीशु ने हज़ारों लोगों को खिला दिया तो प्रभु यीशु ने सार्वजनिक प्रार्थना की । बहुत से ऐसे उदाहरण हैं जब प्रभु यीशु ने सार्वजनिक प्रार्थना की । जब प्रभु यीशु ने लाजर से कहा - हे लाजर निकल आ! तो प्रभु यीशु ने सार्वजनिक प्रार्थना की । वहां बहुत से लोग मौजूद थे । हम भी सार्वजनिक प्रार्थना करते हैं और यह बहुत प्रमुख होती है । भीड़ में , आराधना में , लोगों की अन्तिम क्रिया में , विवाह के अवसर पर , जन्मदिन के अवसर पर , पारिवारिक संगति में जब मिलते हैं तो अनेक अवसर पर सार्वजनिक प्रार्थना करते हैं ।
दूसरा स्तर - एकान्त की प्रार्थना ।
प्रभु यीशु ने अकेले में प्रार्थना की । कई सन्दर्भों में हम पाते हैं कि प्रभु यीशु अपने चेलों को छोड़कर चला गया । किसी विशिष्ट आश्चर्यकर्म को करने के बाद प्रभु यीशु बियाबान में , एकान्त में चला गया । वहां प्रभु यीशु ने एकान्त में जाकर प्रार्थना की । जब हम एकान्त में प्रार्थना करते हैं तो हम दिल की गहराइयों से प्रार्थना करते हैं । हमारे जीवन में जो कुछ घट रहा है , जो अच्छा हो रहा है , जो बुरा हो रहा है , जो संघर्ष हमारे सामने हैं , ऐसी बातें जो हम लोगों के सामने नहीं कह सकते; उन्हें हम एकान्त में प्रार्थना करते समय अपने परमेश्वर पिता के चरणों पर रख सकते हैं । हमारे हृदय की चोटें , हमारे हृदय के जो प्रश्न हैं , हमारी जो कुण्ठाएं हैं , हमारी जो शंकाएं हैं , उन सबकी चर्चा हम प्रभु से एकान्त में कर सकते हैं ।
तीसरा स्तर - प्रार्थना का सबसे गहराई का स्तर ।
पहले और दूसरे स्तर को छोड़ने की बात नहीं है परन्तु जो तीसरा स्तर है वह बहुत महत्वपूर्ण है । तीसरा स्तर वह है कि जब प्रार्थना हमारे जीवन का स्वभाव बन जाती है , हमारे व्यवहार का अंग बन जाती है । हमारी जीवन शैली बन जाती है । जिसके लिए कोई स्थान नियत नहीं होता , जिसके लिए कोई समय तय नहीं किया जाता । जिसके लिए किसी एकान्त की बात नहीं होती , जिसके लिए हमें किसी अवसर के लिए नहीं ठहरना पड़ता । जिसके लिए हमें कोई पूर्व योजना नहीं बनानी पड़ती , जिसके लिए हमें कोई पूर्व चिन्तन नहीं करना होता । सृष्टिकर्ता से बात मात्र नहीं , उस सर्वज्ञानी , सर्वव्यापी , सर्वसामर्थी परमेश्वर से सम्वाद मात्र नहीं परन्तु वह परमेश्वर जो हमारे साथ-साथ चलता है , जो हमारे दाहिने हाथ से भी निकट रहता है , जो हमारे दिल में रहता है , उससे ऐसा सतत् सम्वाद , ऐसी निरन्तर प्रार्थना जो ज़िन्दगी से निकलती है । जब प्रार्थना ही हमारी ज़िन्दगी बन जाती है । यही बात प्रमुख है कि प्रार्थना हमारे जीवन , हमारी दिनचर्या और हमारी ज़िन्दगी का स्वभाव बन जाना चाहिए । इसी कारण प्रार्थना विश्वासियों को परमेश्वर के द्वारा दिया गया एक विशिष्ट वरदान है ।
2. एक विशिष्ट समस्या ।
प्रार्थना के सम्बन्ध में एक विशिष्ट समस्या भी जुड़ी हुई है जिसका अहसास हम सभी ने किया है । वचन में लिखा हुआ है कि - मांगो तो तुम्हें दिया जाएगा , ढूंढोगे तो तुम पाओगे , खटखटाओगे तो खोला जाएगा ।
परन्तु हम इस संसार में ऐसे लोगों को भी देखते हैं जिन्हें बिना प्रार्थना के सब कुछ मिल गया । बहुत से ऐसे किसान हैं जिनकी बहुत अच्छी फसल हुई , लेकिन जिन्होंने कभी प्रार्थना नहीं की । बहुत से व्यापारी हैं जो बहुत सफल हैं , उन्होंने कभी प्रार्थना नहीं की । ऐसे लोग हैं जो बुढ़ापे में भी स्वस्थ हैं , उन्होंने कभी प्रार्थना नहीं की । कितने हैं जिनके बड़े-बड़े घर हैं, प्रॉपर्टीज़ हैं , संसार की दृष्टि में वे सफल हैं , व्यवसायी हैं , बड़े-बड़े पदों पर हैं , बड़े-बड़े अधिकार जिनके पास हैं परन्तु उन्होंने कभी प्रार्थना नहीं की ।
इसके लिए हमें यह समझना है कि परमेश्वर संसार में लोगों को दो प्रकार से देता है । एक तो यह कि वह सबका पिता है । शायद आपको यह मानने में कठिनाई हो कि बहुत से ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर को पिता नहीं मानते । वे यह नहीं मानते कि एक ही पिता है और प्रभु यीशु ही मार्ग , सत्य और जीवन है । परन्तु उनके न मानने से यह तो नहीं होगा कि परमेश्वर उनका पिता न हुआ । यदि कोई यह कहे कि मैं नहीं मानता कि महात्मा गांधी राष्ट्रपिता हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह राष्ट्रपिता नहीं हैं । आपके मानने या न मानने से क्या होता है! उसी रीति से परमेश्वर भी सबका पिता है ।
मत्ती 4:45 में लिखा हुआ है - "जिस से तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भले और बुरे दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है , और धर्मी और अधर्मी दोनों पर मेंह बरसाता है ।"
हम जानते हैं कि वह हमें वायु देता है , यह भी लिखा है कि हर एक पर मेंह बरसाता है । सब पर सूर्य उदय करता है , ऋतुओं से आशीषित करता है क्योंकि वह हमारा पिता है । वह हमें भोजन देता है , पानी देता है , श्वास लेने के लिए ऑक्सीजन देता है; यह सब वह हमें एक पिता होने के नाते देता है । परन्तु परमेश्वर उद्धारकर्ता भी है और यह उद्धार की भेंट उसी को प्राप्त होती है जो उसको पहचानता है , जो उसको मांगता है , जो खटखटाता है , जो खोजता है , जो प्रयास करता है । उसी को यह आत्मिक भेंटें मिलती हैं , जो परमेश्वर को , प्रभु यीशु को अपना उद्धारकर्ता करके स्वीकार कर लेता है । ये आत्मिक भेंटें सांसारिकता से भिन्न हैं । ये आत्मिक भेंटें क्या हैं ? जब हमने विश्वास किया , बपतिस्मा लिया तो हमारा उद्धार हो गया । परन्तु हमें हर दिन क्षमा मिल रही है , हर दिन उसका अनुग्रह हमारे जीवन में बना हुआ है , हर दिन उसकी उपस्थिति का अहसास हमारे जीवन में बना हुआ है; यहां तक कि जब हमारे प्रिय की मृत्यु होती है तब भी हम धन्यवाद की प्रार्थना करते हैं और यही उद्धार का आनन्द है । यह आनन्द परमेश्वर हमें देता है । इन आत्मिक भेंटों को प्राप्त करने के लिए हमें प्रार्थना करना है , पश्चाताप करना है , यीशु को पाना है , उससे जुड़ना है और उससे सम्पर्क बनाए रखना है ।
कई लोग यह भी कहते हैं कि बिना शर्त सब कुछ मिल जाएगा क्योंकि परमेश्वर की भेंटों को प्राप्त करने के लिए कोई शर्त नहीं है । किसी प्रयास को करने की ज़रूरत नहीं , बस कह दो और हो जाएगा । यदि ऐसी बात है तो फिर अलादीन के काल्पनिक चिराग और हमारी प्रार्थना में क्या अन्तर है ? परन्तु जब हम यह कहते हैं कि प्रभु यीशु ही उद्धारकर्ता है । उसके अलावा आकाश के नीचे और पृथ्वी के ऊपर कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिससे हम उद्धार पा सकें । जब हम यह कहते हैं कि वही राह है , वही मन्ज़िल है , वही जीवन है , वही मार्ग है , वही सत्य है , वही ज़िन्दगी का स्रोत है तो फिर उस एक मार्ग पर तो हमें चलना होगा । एक ही दिशा में हमें जाना होगा , एक ही उद्धारकर्ता का तो अनुगमन करना होगा । जो वायदे हमने किए हैं , उन्हें निभाना होगा ।
यदि कोई कहता है कि कोई मापदण्ड निर्धारित नहीं किया परमेश्वर ने , परमेश्वर की हमसे कोई अपेक्षा नहीं है , उसकी कोई शर्त नहीं है , तो क्या हम परमेश्वर के पुत्र प्रभु यीशु के लहू और उसके बलिदान को सस्ता समझने लगे हैं ? क्या हम यह सोचने लगे हैं कि जितना चाहे पाप करें , परमेश्वर तो उद्धारकर्ता है , वह तो अनुग्रह करने वाला है , वह तो क्षमा करने वाला है । इसलिए चाहे जानबूझकर भी पाप करते रहें , उसका अनुग्रह हम पर बना रहेगा ।
वचन में यह बात स्पष्ट लिखी है कि ऐसा नहीं है कि हम पाप करते जाएं और हम पर अनुग्रह हो । यह बुलाहट बिना शर्त नहीं है । प्रभु यीशु ने हमारे उद्धार का मूल्य चुकाया है और उस मूल्य को हमें स्मरण रखना है । इसीलिए प्रभु यीशु कहते हैं कि जो अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे न आए , वह मेरे योग्य नहीं ।
3. यह विशिष्ट प्रतिज्ञा है ।
मत्ती 7:9-11 में लिखा है - "तुम में से ऐसा कौन मनुष्य है , कि यदि उसका पुत्र उससे रोटी मांगे , तो वह उसे पत्थर दे ? या मछली मांगे , तो उसे सांप दे ? अतः जब तुम बुरे होकर , अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो , तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा ?" सर्वोत्तम और अच्छे के विषय में हमारी परिभाषा और नज़रिया फ़र्क हो सकता है परन्तु परमेश्वर का नज़रिया फ़र्क होता है ।
1 कुरिन्थियों 2:9 में लिखा है - "जो बातें आंख ने नहीं देखीं और कान ने नहीं सुनीं , और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं , वे ही हैं जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिए तैयार की हैं।"
यिर्मयाह 29:11 में लिखा है - "क्योंकि यहोवा की यह वाणी है , कि जो कल्पनाएं मैं तुम्हारे विषय करता हूं उन्हें मैं जानता हूं , वे हानि की नहीं , वरन् कुशल ही की हैं , और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूंगा ।"
परमेश्वर कहता है कि जो कल्पनाएं मैंने तुम्हारे लिए की हैं , उन्हें तुम नहीं जानते । यह ठीक वैसे ही है जैसे एक पिता इलाज के लिए अपने बेटे को लेकर किसी चिकित्सक के पास जाता है और इस बच्चे को चिकित्सा की पीड़ा से , उस इंजेक्शन की पीड़ा से , ब्लड टेस्ट की पीड़ा से , सर्जरी की पीड़ा से गुज़रना पड़ता है । तब यह बच्चा नहीं समझता कि कैसा है पिता का प्यार!
इसी प्रकार हम भी बच्चे के समान कई बार नहीं समझते कि दर्द हमारे लिए आशीष का कारण है । दर्द से परमेश्वर हमारी दिशा बदलना चाहता है , हमारी मानसिकता बदलना चाहता है । मृत्यु की छाया में भी कुछ ऐसी बातें हैं जो परमेश्वर हमें सिखाना चाहता है , वे बातें जो हम ज़िन्दगी में नहीं सीख पाए ।
लिखा हुआ है - अन्त में! यह अन्त परमेश्वर की दृष्टि में समापन नहीं वरन् अनन्त की बात है । परमेश्वर कहता है अन्त में मैं तुम्हारी इच्छा को पूरी करूंगा ।
1 कुरिन्थियों 13:10-12 में लिखा है - "परन्तु जब सर्वसिद्ध आएगा , तो अधूरा मिट जाएगा । जब मैं बालक था , तो मैं बालकों के समान बोलता था , बालकों का सा मन था , बालकों की सी समझ थी; परन्तु जब सियाना हो गया तो बालकों की बातें छोड़ दीं । अभी हमें दर्पण में धुंधला सा दिखाई देता है , परन्तु उस समय आमने-सामने देखेंगे; इस समय मेरा ज्ञान अधूरा है , परन्तु उस समय ऐसी पूरी रीति से पहिचानूंगा , जैसा मैं पहिचाना गया हूं ।"
अभी हो सकता है कि हमारे मनों में बहुत से प्रश्न हों परन्तु जो बात है वह यह कि हमें आज्ञाकारी बने रहना है , विश्वास में बने रहना है , प्रार्थना में उसके साथ-साथ चलते रहना है । भले ही अभी हमें दर्पण में धुंधला दिखाई देता है पर वह समय आएगा जब हम आमने-सामने देखेंगे , जब बालकों की सी समझ पीछे छूट जाएगी और हम परिपक्वता के देश में होंगे , हम सिद्धता के देश में होंगे ।
इस संसार में तो घृणा है परन्तु पिता के घर में प्यार मिलेगा । इस संसार में तो धोखा है , वहां खराई मिलेगी । यहां तो विश्वासघात है , वहां विश्वासियों का देश होगा । यह तो शापित संसार है , वह तो आशीषित स्थान होगा । यह संसार तो कुछ देर का है , वह स्वर्ग तो अनन्त का होगा ।
इसीलिए प्रार्थना के माध्यम से हम उसके साथ-साथ चलते हैं । हमारा यह सम्बन्ध उसके साथ-साथ चलने का है , जो हमारे दाहिने हाथ से भी निकट है , जो हमारे हृदय में निवास करता है , वह जो हमारा पिता है , जो हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है , चाहे वे आत्मिक हों , चाहे वे मानसिक हों । जब हम पापी ही थे , तब मसीह हमारे लिए मारा गया और इस प्रकार परमेश्वर ने अपने प्रेम को हम पर प्रगट किया । उसी मसीह के लहू से हमारी पहचान है कि हम उसकी सन्तान हैं और अनन्तकाल में अनन्त जीवन हमारा है । वही हमारा दृढ़ गढ़ है । वही हमारे इस जीवन का उजाला है । वही हमारा उद्धार है । वही जीवन है । इसीलिए इस संसार में मैं किस से डरूं ? किसका भय खाऊं ? उसके उजाले से मुझे अन्धेरे में भी दिखाई देने लगता है । जब संकट आता है तो मैं जानता हूं कि उस चट्टान में , उस दृढ़ गढ़ में मैं छिप सकता हूं । वह मेरे साथ अनन्त तक चलने वाला है । वह इस संसार की राह में हमें ले चलता है और इस संसार में जब हमारा समय पूरा होता है तो हमारा हाथ थामकर हमें अपने आग़ोश में ले लेता है । तभी प्रार्थनाओं की परिपूर्णता हमें मिलती है । तभी दर्पण में हमें स्पष्ट दिखाई देगा , वैसे तब दर्पण की भी आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि फिर तो हम आमने-सामने देख सकेंगे ।
प्रार्थना हमारे विश्वास की गवाही है । प्रार्थना हमारे जीवन में परमेश्वर से हमारे सम्बन्धों की अभिव्यक्ति है । प्रार्थना हमारे विश्वास की पहचान है और प्रार्थना हर परिस्थिति में , हर सन्देह में , हर प्रश्न चिन्हों के स्थान पर उस परमेश्वर के साथ दृढ़ता से और निश्चितता से चलने की बात है ।

परमेश्वर आपको आशीष दे।