परमेश्वर के लिए बलिदान
सन्दर्भ: निर्गमन 20:22-24
पुराने नियम में यदि हम देखें तो बहुत से स्थानों पर वेदियों का वर्णन है । बहुत से स्थान हैं जहां पर परमेश्वर के लोगों ने परमेश्वर के लिए वेदी बनाई । बहुत से स्थल ऐसे भी हैं जहां पर स्वयं परमेश्वर ने अपने लोगों को आज्ञा दी कि तुम मेरे लिए वेदी बनाओ और परमेश्वर ने यह भी बहुत स्पष्ट आज्ञा दी कि किस प्रकार से वह वेदी तुम्हें बनाना है । उसकी ऊंचाई कितनी हो , उसकी लम्बाई कितनी हो , उसकी चौड़ाई कितनी हो , उसमें कैसे पत्थर लगना है , किस प्रकार से उन पत्थरों को तुम्हें लगाना है; परमेश्वर ने बड़ी बारीकी से लोगों को यह निर्देश दिए । निर्गमन की पुस्तक की इस घटना में हम पाते हैं कि परमेश्वर ने मूसा और इस्राएलियों को आज्ञा दी । ये वे इस्राएली लोग थे जो मूर्ति पूजा की ओर फिर गए थे और उन्होंने सोने और चांदी को ढालकर अपने लिए प्रतिमा बना ली थी और उसकी उपासना करने लगे थे , और परमेश्वर का क्रोध उन पर भड़का । परमेश्वर उनसे कहता है कि तुम्हें इस प्रकार की प्रतिमाओं को नहीं बनाना है परन्तु इसके बदले तुम्हें मेरे लिए एक वेदी बनाना है । परमेश्वर उन्हें बताता है कि इस वेदी पर तुम बलिदान चढ़ा सकोगे । जब तुम पश्चाताप करोगे , जब तुम त्याग करोगे , जब तुम अपना दान परमेश्वर को दोगे तो इस वेदी पर तुम बलिदान चढ़ाओगे । इस वेदी का दूसरा उद्देश्य यह था कि परमेश्वर उनसे कहता है कि जब तुम इस वेदी को देखोगे तो यह वेदी तुम्हें मेरा स्मरण दिलाएगी । यह एक दृश्य वस्तु होगी जो परमेश्वर का स्मरण लोगों को कराएगी । इसके बाद 24 वें पद के अन्तिम भाग में तीसरी बात यह हम देखते हैं कि परमेश्वर के अनुसार इस वेदी पर उसकी विशेष उपस्थिति होगी । ठीक वैसे ही जैसे परमेश्वर के मन्दिर में उसकी विशेष उपस्थिति हुआ करती थी । उसके बाद चौथी बात हम पाते हैं कि परमेश्वर कहता है - यहां पर मैं तुम्हें आशीष दूंगा । इस प्रकार यह वेदी बलिदान का स्थान होगी , यह मेरे स्मरण का स्थान होगी , मेरी उपस्थिति का स्थान होगी और यह एक ऐसा स्थान होगा जहां मैं तुम्हें आशीष दूंगा । इसके बाद 25 वें पद में परमेश्वर कहता है कि तुम इस वेदी को पत्थरों से बनाना । इसके साथ वह एक निर्देश और देता है कि ये पत्थर तराशे हुए नहीं होने चाहिए । इन पत्थरों में किसी भी प्रकार का औज़ार नहीं होना चाहिए क्योंकि अगर औज़ार लगा दोगे तो वह प्रतिमा बन जाएगी । पत्थरों की वेदी बनाना है जिसमें औज़ार न लगा हो । व्यवस्थाविवरण 27:8 में लिखा है - और उन पत्थरों पर इस व्यवस्था के सब वचनों को शुद्ध रीति से लिख देना । यहोशू 8:30-35 में भी इस बात का वर्णन मिलता है कि यहोशू ने भी एक वेदी बनाई । इब्राहीम ने भी , जिसका पहले नाम अब्राहम था परमेश्वर के लिए वेदी बनाई । यदि हम वचन में देखें तो पाएंगे कि कम से कम तीन वेदियां इब्राहीम ने परमेश्वर के लिए बनाईं । 1. विश्वास की वेदी:- उत्पत्ति 12:7 में पहली वेदी का वर्णन है । यह पहली वेदी विश्वास की वेदी है । लिखा है - तब यहोवा ने अब्राम को दर्शन देकर कहा , यह देश मैं तेरे वंश को दूंगा: और उस ने वहां यहोवा के लिये जिस ने उसे दर्शन दिया था , एक वेदी बनाई । उसके बाद उत्पत्ति 12 वें अध्याय में पर परमेश्वर अब्राम से कहता है कि तू ऊर को छोड़कर हारान को चला जा । तू अपने स्थान को छोड़कर एक अन्जान स्थान की ओर चला जा । आराम के स्थान को छोड़कर एक कठिनाई भरे स्थान को चला जा । एक निश्चितता के स्थान को छोड़कर अनिश्चितता के स्थान की ओर चला जा । अपने लोगों , अपने परिवार , अपने सम्बन्धियों को छोड़ दे , जिनके साथ तू बढ़ा-पला है , उन्हें छोड़ दे , अपने घर-बार को छोड़ दे और यहां से तू एक अन्जानी जगह में चला जा । उस समय इब्राहीम की उम्र 75 वर्ष की थी । कल्पना कीजिए कि 75 वर्ष की उम्र में परमेश्वर आपको निर्देश देता है कि अपने निवास स्थान को , अपने प्रियो , अपनी जन्मभूमि और अपने पिता के घर को छोड़कर उस अन्जान देश में चला जा , जहां जाने की आज्ञा मैं तुम्हें देता हूं । कल्पना कीजिए कि आपकी क्या स्थिति होगी । उत्पत्ति 12:4-5 में लिखा हुआ है कि इब्राहीम अपनी पत्नी , अपने भतीजे , अपने धन और उसके पास जितने पशु थे , उन सबको लेकर कनान देश की ओर चला गया । इब्राहीम ने कहा कि परमेश्वर ने जो आज्ञा दी है उसे मुझे मानना है । यह उसके लिए बड़ी पीड़ा की बात रही होगी । जब हम अपने घरों को , अपने परिवार और अपने लोगों को छोड़कर कुछ समय के लिए कहीं जाते हैं तो हमारे लिए यह बड़ी कठिन बात होती है । हमें लगता है कि हम कब वापिस आ जाएं परन्तु इब्राहीम को नहीं मालूम था कि उसे कहां जाना है । परमेश्वर ने उस से कहा कि सब कुछ छोड़ दे , ऊर को छोड़ दे , हारान को चला जा , एक अन्जान देश को चला जा और इब्राहीम परमेश्वर की आज्ञा मानकर सब कुछ छोड़कर चल दिया । जब इब्राहीम कनान देश पहुंचा तब उत्पत्ति 12:7 में हम पाते हैं कि परमेश्वर ने उसे दर्शन दिया । परमेश्वर उसके विश्वास को आशीषित करता है और उस से कहता है कि मैं यह दे तेरे वंश को दूंगा । मैं तुझे बहुतायत से आशीषित करूंगा । मैं तुझे बहुत बड़े साम्राज्य का वारिस बनाऊंगा । उसके बाद हम पाते हैं कि इब्राहीम वहां पर परमेश्वर के लिए एक वेदी बनाता है - ‘विश्वास की वेदी’ । इब्राहीम परमेश्वर की दृष्टि में विश्वासयोग्य रहा । अक्सर हमारे लिए बहुत सरल होता है परमेश्वर से प्रेम करना , परमेश्वर के लिए दान देना , जो कुछ हमने कमाया है उसमें का कुछ भाग परमेश्वर को दे देना । हो सकता हमारे लिए प्रार्थना करना सरल बात हो , हो सकता है वचन का पठन करना हमारे लिए एक सरल बात हो परन्तु परमेश्वर के प्रति अपने जीवन में , उसकी आज्ञाओं के प्रति , उसके निर्देशों के प्रति विश्वासयोग्य रहना; कठिन काम है । यह चुनौती से भरा हुआ काम है । नीतिवचन 3:5-6 में परमेश्वर यहोवा कहता है - तू अपनी समझ का सहारा न लेना , वरन सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना । उसी को स्मरण करके सब काम करना , तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा । हमारे जीवनों में की परख होती है । परमेश्वर के वचन में पुराने नियम से लेकर नये नियम तक यदि देखें तो हम पाते हैं कि जो परमेश्वर के लोग थे , जिन्होंने महान काम किए , जो भविष्यवक्ता हुए , जिन्होंने परमेश्वर की योजनाओं को पूरा किया; उन सबके विश्वास की परख हुई । इब्राहीम को विश्वास का पिता यूं ही नहीं कह दिया गया । उसके विश्वास की परख हुई जब वह एक अन्जान देश को चला गया । उसके बाद उसके विश्वास की परख हुई जब उसको अपने बेटे को बलिदान करने को कहा गया । जब वह इस परख में उतरा तो उसे विश्वास का पिता कहा गया । अय्यूब भी कठिनाइयों से हो कर गुज़रा और उसके विश्वास की परख हुई । एलिय्याह करीत के नाले के पास ठहरा रहा , यहां तक कि नाला सूख गया । न भोजन था , न पानी था , न आवश्यकता की वस्तुएं थीं , न किसी प्रकार का बिस्तर था परन्तु वह करीत के नाले के पास ढाई वर्षों तक रुका रहा । प्रतिदिन परमेश्वर के निर्देश की बाट जोहता रहा और विश्वास की परख में खरा उतरा । हम पाते हैं कि यूसुफ के विश्वास की परख हुई , दानिय्येल के विश्वास की परख हुई । शद्रक , मेशक और अबेद-नगो के विश्वास की परीक्षा हुई । इब्रानियों का 11 वां अध्याय ऐसे बहुत से उदाहरणों से भरा हुआ है । हमारे जीवनों में भी विश्वास की परख होती है । विश्वास की परख हमारे जीवन में तब होती है जब हमें परमेश्वर पर विश्वास करना कठिन होता है । जब हमें आगे कुछ दिखाई नहीं देता , जब हमें कुछ समझ में नहीं आता , जब हम कहते हैं कि परमेश्वर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ! ऐसे समय में हमारे विश्वास की परख होती है । न सिर्फ़ हमारे विश्वास की परख होती है परन्तु ऐसे समय में जब हम विश्वासयोग्य बने रहते हैं तो उस से हमारे जीवन की गवाही होती है । सबसे ज़्यादा पीड़ा के क्षणों में विश्वास की परख होती है और सबसे अधिक पीड़ा के क्षणों में ही विश्वास की गवाही होती है । वही सबसे प्रभावशाली गवाही होती है । जब अचानक त्रासदी आ जाए , तब विश्वास की परख होती है । जब ला-इलाज बीमारी से संघर्ष करना पड़े , तब विश्वास की परख होती है । जब धर्मीजन उठा लिया जाता है और अधर्मी वर्षों स्वस्थ रहकर जीता है , तब हमारे विश्वास की परख होती है । जब हमारे सामने एक तरफ लाभ का रास्ता होता है और दूसरी तरफ हमारे विश्वास का रास्ता और हम अगर तब विश्वास के उस रास्ते बढ़ते हुए सब प्रकार की हानि सहने के लिए तैयार होते हैं , तब हमारे विश्वास की परख होती है । हमारे जीवन में छोटी-छोटी बातों में प्रतिदिन विश्वास की परख होती है कि कहीं हम संसार से समझौता न कर लें । उत्तरी अफ्रीका में बन्दरों को पकड़ना बड़ा रुचिकर है । वहां बन्दरों को पकड़ने के लिए कोई जाल नहीं बिछाया जाता , कोई फन्दा नहीं लगाया जाता । बन्दरों को पकड़ने के लिए एक सुराही रख दी जाती है जिसकी पतली , लम्बी गर्दन होती है । उसमें इतनी जगह होती है कि बन्दर का हाथ उसमें चला जाए । उस सुराही में कुछ दूर तक रेत भरी जाती है और फिर बहुत से बादाम भर दिए जाते हैं । बन्दर जाकर उस सुराही में हाथ डालते हैं , जब उन्हें उसमें बादाम मिलते हैं तो वे बादाम को पकड़कर मुट्ठी बन्द कर लेते हैं और उनका हाथ बाहर नहीं आ पाता । ये सुराहियां बन्धी होती हैं और भारी होती हैं । जब शिकारी बन्दर को पकड़ने के लिए आता है तब बन्दर अपना हाथ छोड़ना नहीं मांगता । वह अपनी मुट्ठी खोलना नहीं मांगता , वह उन बादामों को छोड़ना नहीं मांगता और होता यह है कि उसे पकड़ लिया जाता है , उसका शिकार हो जाता है , वह शिकारी के हाथ में चला जाता है । हमारे साथ भी ऐसा ही होता है । शैतान की परीक्षाओं में पड़कर उस बादाम की मुट्ठी को हम खोलना नहीं मांगते , छोड़ना नहीं मांगते । अपने स्थान , अपने पद , अपनी प्रतिष्ठा और अपने थोड़े से लाभ को हम छोड़ना नहीं मांगते । थोड़े से लाभ के लिए हम अपने विश्वास से समझौता कर लेते हैं । परमेश्वर हमसे कहता है कि हमें इब्राहीम के समान अपने हृदय में विश्वास की वेदी बनाना है । हमें अंगीकार करना है कि परमेश्वर मैंने तुझ से विश्वासघात किया है । परमेश्वर मैंने छोटी-छोटी बातों में समझौते किए हैं । पिता परमेश्वर मैं अपने हृदय में इस विश्वास की एक वेदी बनाना चाहता हूं और यह कहना चाहता हूं कि मेरे लिए जीना मसीह है और मर जाना लाभ है । यह कहना चाहता हूं कि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे और अपने प्राण की हानि उठाए , अपनी आत्मा की हानि उठाए तो उसे क्या लाभ होगा । परमेश्वर चाहता है कि हम विश्वास की वेदी बनाएं और परमेश्वर इस विश्वास को आशीषित करे । 2. अन्तरंगता की वेदी :- इब्राहीम द्वारा बनाई गई दूसरी वेदी का वर्णन उत्पत्ति 12:8-9 में पाया जाता है , लिखा है - फिर वहां से कूच करके , वह उस पहाड़ पर आया , जो बेतेल के पूर्व की ओर है; और अपना तम्बू उस स्थान में खड़ा किया जिसकी पच्छिम की ओर तो बेतेल , और पूर्व की ओर ऐ है; और वहां भी उस ने यहोवा के लिये एक वेदी बनाई: और यहोवा से प्रार्थना की और अब्राम कूच करके दक्खिन देश की ओर चला गया । यह वह दूसरी वेदी है जो इब्राहीम ने बनाई । यह अन्तरंगता की वेदी है , यह घनिष्ठता की वेदी है । इब्राहीम ने सोचा कि बहुत दूर तक यात्रा कर ली । अपने जानवरों और अपने परिवार को लेकर बहुत आगे निकल आया मैं । दुश्मन का सामना करते हुए , परदेशियों का सामना करते हुए अपनी यात्रा में मैं आगे बढ़ता गया । अब समय आ गया है कि परमेश्वर के साथ अन्तरंगता हो सके । इब्राहीम कहता है कि पश्चिम की तरफ तो बेतेल शहर है और पूर्व की तरफ ऐ शहर है । इन शहर में नहीं परन्तु इस बियाबान में , इस जंगल में मुझे परमेश्वर की वेदी बनाना है और वहां जाकर उस से प्रार्थना करना है । परमेश्वर के साथ अपने अन्तरंग सम्बन्ध को फिर से स्थापित करना है । परिवार की देख-रेख करना है , यात्रा की व्यवस्था करना है परन्तु इन सबसे बढ़कर इस बात की आवश्यकता है कि एकान्त में परमेश्वर के साथ व्यक्तिगत सम्बन्धों की एक वेदी बनाई जा सके । इब्राहीम इस अन्तरंगता की वेदी को बनाता है और वहां जाकर प्रार्थना करता है । प्रभु यीशु मसीह ने भी अपने जीवन में इस बात को प्राथमिकता दी कि परमेश्वर के साथ उसका अन्तरंग सम्बन्ध बना रहे । घनिष्ठता और आत्मा का सम्बन्ध बना रहे । इसीलिए हम पाते हैं कि प्रभु यीशु प्रार्थना करने के लिए बार-बार एकान्त में चला जाता था । जैतून पर्वत पर प्रार्थना करने के लिए वह चला जाया करता था । दिन निकलने के पहले , उजाला होने के पहले , उस शान्त वातावरण में , उस सुबह के धुन्धलके में परमेश्वर के साथ अन्तरंगता का अनुभव , अपनेपन का अनुभव , एक पिता और बेटे का अनुभव , दिल से दिल मिलाने का अनुभव , आत्मा से आत्मा को जोड़ देने का अनुभव! वह आंसुओं से भरी प्रार्थना का अनुभव , वह परमेश्वर के अदृश्य हाथों के स्पर्श का अनुभव! जब प्रभु यीशु को इसकी इतनी ज़रूरत थी तो हमारे लिए यह कितनी बड़ी ज़रूरत की बात होगी! अपनी दिनचर्या में क्या हमने यह अन्तरंगता की वेदी बनाई है ? क्या आप तैयार हैं कि परमेश्वर मैं अपने दिन भर के समय में से कम से कम 10 मिनिट का समय अपनी आत्मा के लिए निकालूंगा । 1440 मिनिट होते हैं एक दिन में और परमेश्वर यह 10 मिनिट का समय आपके लिए है । जब मैं तुझसे बातचीत करूंगा । जब अपने दिल को तेरे सामने खोलूंगा । जब दिल से दिल की बातें होंगी और आत्मा का आत्मा से मिलन होगा । जब संसार की बातें और कार्य की योजना और व्यस्तता; इन सब बातों को एक तरफ रखकर मैं तेरे चरणों के पास बैठकर तुझसे बात करूंगा , तेरी आवाज़ को सुनूंगा । हम सबको ज़रूरत है कि हम इस अन्तरंगता की वेदी को बनाएं। जीवन में , दिनचर्या में प्रार्थना को , वचन के पठन को स्थान दें । एक आदत बनाएं , अपने आपको करें अनुशासित करे और ऐसा करने से परमेश्वर हमें आशीष देगा । हम पाते हैं कि मूसा चालीस दिनों तक पर्वत शिखर पर रहा ताकि परमेश्वर से उसका अन्तरंग सम्बन्ध हो सके । हम दानिय्येल के विषय में पाते हैं जो उपरौठी कोठी में जाकर तीन बार प्रतिदिन प्रार्थना करता था । दानिय्येल 6:10 में लिखा है - जब दानिय्येल को मालूम हुआ कि उस पत्र पर हस्ताक्षर किया गया है , तब वह अपने घर में गया जिसकी उपरौठी कोठरी की खिड़कियां यरूशलेम के सामने खुली रहती थीं , और अपनी रीति के अनुसार जैसा वह दिन में तीन बार अपने परमेश्वर के साम्हने घुटने टेककर प्रार्थना और धन्यवाद करता था , वैसा ही तब भी करता रहा । हमारे जीवनों में क्या ऐसा समय है कि हम अपनी आत्मा के लिए , जो अनन्त जीवन की है , परमेश्वर के पास जाते हैं ? उससे प्रार्थना करते हैं ? उससे उस अन्तरंगता का अनुभव करते हैं जो एक बेटे और एक पिता का होता है । जहां सम्वाद नहीं होता वहां सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं । इंग्लैण्ड के एक विश्वविद्यालय में एक बहुत बड़े विद्वान लेक्चर दे रहे थे । उनके पास बहुत बड़ी-बड़ी डिग्रियां थीं । लगभग साढे़ चार हज़ार विद्यार्थी बैठे हुए उनका लेक्चर सुन रहे थे । यह विद्वान अनीश्वरवादी थे। उनकी सारी बातें और तर्क इस बात को इंगित करते थे कि ईश्वर नहीं है । अपने लेक्चर में उन्होंने कहा कि ईश्वर अगर है तो पीड़ा क्यों होती है ? अगर ईश्वर है तो आश्चर्य कर्म क्यों नहीं होते ? ईश्वर अगर है तो जो अपने आपको धर्मी कहते हैं वे क्यों सताए जाते हैं ? अपनी सारी बातें और तर्कों को प्रस्तुत करने के बाद उन्होंने अन्त में यह कहा - इस यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों , मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि ईश्वर नाम की कोई चीज़ नहीं है । हमें अनीश्वरवादी बनना है , तभी जीवन की सच्चाई से हमारा आमना-सामना होगा और हम अपने जीवन में सफल होंगे । उनका लेक्चर लगभग डेढ़ घण्टे तक चलता रहा । जब लेक्चर समाप्त हो गया तो उन्होंने कहा कि किसी को कोई प्रश्न पूछना है ? पीछे बैठे एक छात्र ने हाथ उठाकर कहा कि मुझे एक प्रश्न पूछना है । उस विद्वान ने कहा बिल्कुल पूछिए । उस छात्र ने अपनी जेब से एक सेब निकाला और उसे चबाकर खाते हुए उसने कहा आपने बहुत अच्छा सन्देश दिया । उसके बाद फिर उसने उस सेब को दो-चार बार काटा और चबाते हुए बोला आपके तर्क बहुत अच्छे थे । उसके बाद फिर उसने सेब को काटा , चबाकर गुटका और कहा - आपकी भाषा शैली की कितनी भी तारीफ की जाए कम है । फिर उसने सेब निकाला उसको काटा और चबाकर खा लिया । इस विद्वान दार्शनिक ने पूछा कि यह सब तो ठीक है लेकिन तुम्हारा प्रश्न क्या है ? उस विद्यार्थी ने कहा कि सर मैं आपसे यह पूछना चाहता हूं कि जो सेब का फल मैं खा रहा हूं , वह मीठा है कि खट्टा है ? इस विद्वान दार्शनिक ने कहा कि तुमने उसको चखा है , तुम ही बता सकते हो कि वह मीठा है कि खट्टा , मैंने तो नहीं चखा , इसलिए मैं नहीं बता सकता । वह विद्यार्थी मुस्कुराया और बोला - उसी प्रकार आपने परमेश्वर को नहीं चखा इसलिए आपको परमेश्वर के विषय में बात करने का कोई हक़ नहीं है । इसीलिए परमेश्वर के वचन में लिखा है - चखकर देखो , यहोवा कैसा भला है । परमेश्वर कहता है - ऐसा करके तुम मुझे परखो । मुझे परख कर तो देखो , मुझे चखकर तो देखो । मैं कितना भला हूं! कि मैं तुम पर आकाश और स्वर्ग के झरोखों को खोलकर तुम पर अपरम्पार आशीषों की वर्षा करता हूं कि नहीं । पहले परमेश्वर धर्म और राज्य की खोज तो करो फिर सारी वस्तुएं तुम्हें मिल जाएंगी । अन्तरंगता का सम्बन्ध तो बनाओ , मुझे चखकर तो देखो , अपने हृदय में तो उतारो । यह परमेश्वर मुझसे और आपसे कह रहा है कि हमें यह अन्तरंगता की वेदी अपने हृदय में बनाना है । उसके साथ अन्तरंगता बनाने के लिए समय हमें निकालना है । 3. पुर्नस्थापना की वेदी :- उसके बाद उत्पत्ति 13:18 में लिखा है कि इसके पश्चात् अब्राम अपना तम्बू उखाड़कर , मम्रे के बांजों के बीच जो हेब्रोन में थे जाकर रहने लगा , और वहां भी यहोवा की एक वेदी बनाई । यह वेदी पुर्नस्थापना की वेदी है , पश्चाताप की वेदी है । उत्पत्ति के 12 वें अध्याय में हम देखते हैं कि इब्राहीम ने बहुत से पाप किए । उसकी पत्नी बहुत खूबसूरत थी और उसे डर था कि कहीं कोई दुर्घटना न घट जाए । इसलिए इब्राहीम ने झूठ बोला , उसने अपनी पत्नी को अपनी बहन कह दिया । उसके बाद दूसरा पाप इब्राहीम ने यह किया कि उसने लालच किया । अपनी पत्नी की सुन्दरता का लाभ लेते हुए उसने राजा फिरौन से भेड़-बकरियां , गाय-बैल , ऊंट और दास- दासियां प्राप्त कर लीं । उसने अपनी खूबसूरत पत्नी को अपनी बहन बताकर राजा के महल में रख दिया । जब उसकी खूबसूरती की चर्चा हुई तो राजा ने उसको बुलाया और कहा कि उसे मेरे साथ मेरी रानी के समान रहने दो । इब्राहीम के कहने पर वह जाकर महल में रहने लगी । हम पाते हैं इब्राहीम ने झूठ बोला , लालच किया । वह स्वार्थी हो गया और उसने व्यभिचार को मौका दिया । परन्तु उसके बाद इब्राहीम जब अपने स्थान पर वापस लौटा जहां पर उसे रहना था तब वहां उसने एक वेदी बनाई । उसने पश्चाताप की , पुर्नस्थापना की वेदी बनाई । उसने परमेश्वर से कहा - मैं तुझसे सम्बन्ध को पुर्नस्थापित करना चाहता हूं । मैं फिसल गया था , मैं दूर चला गया था , मैं पाप में पड़ गया था । मैंने तेरी व्यवस्था को ठुकरा दिया है । मैं तुझसे फिर से सम्बन्ध बनाना चाहता हूं । मैं पश्चाताप करना चाहता हूं और तब वह पुर्नस्थापना की वेदी बनाता है । दाऊद ने बतशेबा के साथ व्यभिचार किया । उसके बाद परमेश्वर की ओर से नातान नबी दाऊद के पास आता है और उससे कहता है - तू ने यहोवा की आज्ञा तुच्छ जानकर क्यों वह काम किया , जो उसकी दृष्टि में बुरा है ? हित्ती ऊरिय्याह को तू ने तलवार से घात किया , और उसकी पत्नी को अपनी कर लिया है , और ऊरिय्याह को अम्मोनियों की तलवार से मरवा डाला है । (2 शमूएल 12:9) भजन संहिता 51:10-12 में हम दाऊद के पश्चाताप को पाते हैं । वह कहता है - हे परमेश्वर , मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर , और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर । मुझे अपने साम्हने से निकाल न दे , और अपने पवित्र आत्मा को मुझ से अलग न कर । अपने किए हुए उद्धार का हर्ष मुझे फिर से दे , और उदार आत्मा देकर मुझे सम्भाल । 2 शमूएल 12:13 में लिखा है - तब दाऊद ने नातान से कहा , मैं ने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है । नातान ने दाऊद से कहा , यहोवा ने तेरे पाप को दूर किया है। परमेश्वर ने क्यों दाऊद के पाप को दूर किया ? क्योंकि दाऊद परमेश्वर के सामने आया , उसने कोई बहाने नहीं बनाए । उसने स्वीकार किया कि मैंने परमेश्वर यहोवा के विरोध में पाप किया है । यहां पर दाऊद द्वारा परमेश्वर के साथ सम्बन्धों की पुर्नस्थापना की बात है । जब योना ने परमेश्वर की आज्ञा तोड़कर नीनवे के बजाय तर्शीश जाने का निर्णय लिया , समुद्र में तूफान की लहरों के बीच जब उसे पानी में फेंक दिया गया , जब उसे मगरमच्छ ने निगल लिया तब वहां उसने प्रार्थना की । उसकी प्रार्थना बहुत विशिष्ट है । उसकी प्रार्थना हमारी प्रार्थनाओं से भिन्न है । वह यह नहीं प्रार्थना करता कि परमेश्वर यहां कहां तूने मुझे डाल दिया है । मुझे इस मगरमच्छ के पेट से निकाल । वह ऐसी प्रार्थना नहीं करता परन्तु लिखा है कि - तब मैं ने कहा , मैं तेरे साम्हने से निकाल दिया गया हूं; तौभी तेरे पवित्र मन्दिर की ओर फिर ताकूंगा । (योना 2:4) योना 2:9 में लिखा है - परन्तु मैं ऊंचे शब्द से धन्यवाद करके तुझे बलिदान चढ़ाऊंगा; जो मन्नत मैं ने मानी , उसको पूरी करूंगा । उद्धार यहोवा ही से होता है । योना को तो मालूम था कि वह मगरमच्छ के पेट में है , कुछ ही देर में वह मरने वाला है परन्तु वह कहता है कि मैं ऊंचे शब्द से तुझे धन्यवाद करूंगा । मैं तेरे लिए बलिदान चढ़ाऊंगा । मगरमच्छ के पेट से वह कहता है - उद्धार केवल यहोवा की ओर से ही होता है । योना ने परमेश्वर से अपना सम्बन्ध फिर से बना लिया । पतरस ने अपना सम्बन्ध परमेश्वर से फिर से बना लिया । परमेश्वर ने मूसा को , जो हत्यारा था क्षमा किया । परमेश्वर ने दाऊद को जो व्यभिचारी था , हत्यारा था , उसे क्षमा किया । परमश्वर वेश्याओं के लिए कहता है कि तुम से पहले ये वेश्याएं और महसूल लेने वाले स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे । प्रभु यीशु वेश्याओं को क्षमा करता है । परमेश्वर चाहता है कि हम उसके पास जाएं और उससे कहें कि मुझे क्षमा कर । मैंने तेरे विरोध में पाप किया है । हे परमेश्वर मुझे वह उद्धार का आनन्द एक बार फिर से लौटा दे । एक बार फिर से अपने मुख का प्रकाश मुझ पर चमका । एक बार उस उद्धार के हर्ष से मुझको परिपूर्ण कर दे । परमेश्वर चाहता है कि हम पुर्नस्थापना की वेदी अपने दिलों में बनाएं । परमेश्वर हमें क्षमा करने के लिए तैयार है । वेदी पत्थरों से बनती है । हमारे जीवन में हमें बहुत सी चोटें लगती हैं , बहुत से पत्थर हमें लगते हैं; हो सकता है आत्मिक रूप से, हो सकता है भावनात्मक रूप से । एक बात जो बहुत कठिन होती है वह यह कि इन चोटों को अपने हृदय , अपनी आत्मा और भावनाओं से भुलाना आसान नहीं होता । अक्सर अतीत की चोटों से हम उबर नहीं पाते । कई बार उनके दर्द के अहसास से हम गुज़रते हैं । चाहे हम कितने परिपक्व मसीही क्यों न हों , जो पत्थर हम पर चलाए गए हैं , उन पत्थरों के जख़्मों को भुलाना आसान नहीं होता । किसी ने कहा है कि जो पत्थर आप पर चलाए गए हैं , उन पत्थरों से आप तीन काम कर सकते हैं । पहली बात - जिन्होंने आपको पत्थर मारे हैं उन्हीं पत्थरों से हम उन्हें मारें । यही बदले की बात फिल्मों में भी दिखाई जाती है । बदला लेने की बात , हमारे साथ बुरा हुआ तो हम भी बुरा करेंगे । हमें धोखा दिया गया तो हम भी धोखा देंगे । हम पर क्रोध किया गया , हम पर अन्याय किया गया , हम भी अन्याय करेंगे । उस बदले की भावना से हम जीवन भर जलते रहते हैं और ताक में रहते हैं कि कब उन पत्थरों को जो हम पर चलाए गए हैं , हम उन पर चला दें जिन्होंने वे पत्थर हमें मारे हैं । दूसरी बात - आप उन पत्थरों का बोझ ख़ामोशी से ढोते रहें । विश्वासघात के पत्थर , क्रोध के पत्थर , जो लोगों ने आप से किया । झूठे आरोपों के पत्थर , जिनसे आपको नीचा दिखाया गया , आपकी आलोचना की गई , आपका अपमान किया गया , आपका तिरस्कार किया गया , आपसे अपशब्द कहे गए , आपसे घृणा की गई । उन पत्थरों को जीवन भर हम अपने ऊपर लादकर घूमते रहें , उन पत्थरों का बोझ जीवन ढोते रहें और अपनी आत्मा में , अपने मन में उस पीड़ा का अहसास करते रहें । परन्तु मेरे प्रियो , एक तीसरा विकल्प है कि इन सारे पत्थरों को लेकर हम परमेश्वर की एक वेदी बनाएं और उसके सामने जाएं । परमेश्वर , जो चाहता है कि हम उस पर विश्वास करें । वह परमेश्वर , जो हमें क्षमा करने के लिए तैयार है । वह परमेश्वर , जो चाहता है कि एक बेटे और बेटी की तरह हमारा उस से घनिष्ठता का सम्बन्ध हो सके । हम उन पत्थरों की वेदी परमेश्वर के लिए बनाएं ताकि वे पत्थर जो हमें लगे हैं , वे हमारे लिए परमेश्वर की गवाही बन जाएं । परमेश्वर आपको आशीष दे।