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हमारी भेंटें और भावना

हमारी भेंटें और भावना

सन्दर्भ:- मरकुस 12:41-44

जब हम आराधना में भाग लेते हैं तो अपनी भेंटें भी अर्पित करते हैं और यह आराधना का एक भाग है । यह हमारी आराधना है परमेश्वर के प्रति । वह परमेश्वर , जिसने अपना सब कुछ हमारे लिए दे दिया । जिसने सबसे बहुमूल्य जो उसके पास था , हमारे लिए दे दिया । प्रभु यीशु जिसने अपने प्राण हमारे लिए दे दिए । जिसने अनन्त जीवन का रास्ता हमारे लिए खो़ल दिया । प्रभु यीशु जिसने सबसे बड़ी समस्या जो पाप की थी , उसका समाधान किया । प्रभु यीशु ने शैतान के सिर को कुचल दिया , मृत्यु के बन्धनों को तोड़ दिया और हमारे अन्तिम शत्रु पर विजय प्राप्त की ।

जब हम अपनी भेंटें देते हैं तो हम परमेश्वर को धन्यवाद के साथ , आदर के साथ , आनन्द से देते हैं , यही बात हमें वचन में बताई गई है । हमारी भेंटों का मूल कारण परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और जो कुछ उसने हमारे लिए किया उसके प्रति धन्यवाद है । हम किसी कार्यक्रम के लिए चन्दा नहीं देते , हम दान इसलिए नहीं देते कि किसी को वेतन मिल सके । हम सरकार को टैक्स देने के लिए दान नहीं देते परन्तु यहां भेंटें अर्पित करने का एक अलग अर्थ है । इन भेंटों से जुड़ी बात यह है कि परमेश्वर चाहता है कि हम त्याग के साथ दें । अगर हमारी भेंटों में त्याग नहीं है , इन भेंटों में अगर प्रभु यीशु के प्रति धन्यवाद ज़ाहिर नहीं होता , हमारी भेंटें अगर हमारे प्रेम को प्रदर्शित नहीं करतीं तो फिर हमारी भेंटों का कोई अर्थ नहीं ।

मरकुस रचित सुसमाचार के 12 वें अध्याय में वर्णित यह घटना हम सभी के लिए बहुत जानी-पहचानी है । हम देखते हैं कि मन्दिर के सामने प्रभु यीशु बैठे हैं । लोग आते जा रहे हैं और दान की पेटी में बड़ी-बड़ी रकम डाल रहे हैं । इसके बाद लिखा हुआ है कि एक कंगाल विधवा वहां आती है और कोष में दो छोटे सिक्के डाल देती है । तब प्रभु यीशु अपने चेलों से कहते हैं कि कोष में डालने वालों में इस विधवा ने सबसे बढ़कर डाला है क्योंकि दूसरों ने तो अपनी बढ़त में से डाला है परन्तु इसने तो अपनी दरिद्रता में से जो कुछ उसका था सारी जीविका दे दी । इसीलिए किसी ने कहा है कि दान कितना दिया गया है इससे नहीं नापा जाता बल्कि जो भेंटें परमेश्वर को देते हैं , उसे इससे नापा जाता है कि हमारे पास बच कितना गया है ।

सांसारिक रूप से दान देना और परमेश्वर को भेंटें देने में एक बहुत बड़ा अन्तर है । जब दान की बात हम करते हैं , जब हम बलिदान की बात हम करते हैं , जब त्याग सहित देने की बात हम करते हैं तो उसमें चार बातें निहित होती हैं । हम सबकी शिक्षा के लिए इन चार बातों पर हम विचार करेंगे ।

1. हमारा हृदय ।

अगर हमारा हृदय ही परमेश्वर का नहीं हुआ , यदि हमारे हृदय में प्रभु यीशु नहीं है , अगर हमारा हृदय ही सही स्थान पर नहीं है तो फिर बाकी सारी बातें भी ठीक नहीं होंगी । जब हमारा सम्बन्ध ही सही नहीं होगा , तो फिर जो कुछ हम देंगे वह मात्र औपचारिकता पूरी करने के लिए देंगे , परम्परा को निभाने के लिए देंगे । इसलिए देंगे कि कलीसिया के रजिस्टर में हमारा नाम बना रहे ताकि बच्चों की शादी के समय या फ्यूनरल के समय हमारी सदस्यता पर कोई प्रश्न चिन्ह न उठे ।

मकिदुनिया की कलीसिया के सम्बन्ध में 2 कुरिन्थियों 8:1-5 में बड़ी विचित्र बात लिखी हुई है - हे भाइयों , अब हम तुम्हें परमेश्वर के उस अनुग्रह के विषय में बताना चाहते हैं । जो मैसीडोनिया की कलीसियाओं पर हुआ है । संकटों की कठिन परीक्षा में उनके अपार आनन्द और घोर दरिद्रता के फलस्वरूप उनकी उदारता उमड़ पडी । मैं साक्षी देता हूं कि उन्होंने अपनी शक्ति के अनुसार , वरन् क्षमता से भी अधिक , अपनी इच्छा से दिया । और सन्तों की सहायता करने में सहयोग देने के लिए हमसे बार बार अनुनय विनय की , और उन्होंने हमारी आशा से परे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अपने आपको पहले प्रभु को , फिर हमें भी दे दिया ।

यह परमेश्वर का अनुग्रह है कि हम उदारता से दे सकें । हम परमेश्वर पर कोई उपकार नहीं कर रहे वरन् यह परमेश्वर का अनुग्रह है कि हम अपना धन स्वर्ग में जमा कर सकते हैं , जहां हमें अनन्त बिताना है ।

मकिदुनिया की कलीसिया के लिए लिखा है कि उनकी उदारता उमड़ पड़ी । पहले उन्होंने अपने आप को प्रभु को दे दिया और जब सम्पूर्ण हृदय प्रभु का हो गया तो फिर उनकी उदारता बढ़ गयी । कई बार हम दान नहीं देते हैं क्योंकि वास्तव में हमने अपना दिल प्रभु को नहीं दिया ।

रोमियों 12:1-2 में लिखा है - अतः हे भाइयो , मैं परमेश्वर की दया का स्मरण दिलाकर तुमसे अनुग्रह करता हूं कि तुम अपने शरीरो को जीवित पवित्र और ग्रहणयोग्य बलिदान कर के परमेश्वर को समर्पित कर दो । यही तुम्हारी आत्मिक आराधना है । इस संसार के अनुरूप न बनो , परन्तु अपने मन के नए हो जाने से तुम परिवर्तित हो जाओ कि परमेश्वर की भली , ग्रहणयोग्य और सिद्ध इच्छा को तुम अनुभव से मालूम करते रहो ।

यहां पर इस सन्दर्भ की शुरुआत ‘अतः’ शब्द से होती है । दूसरे अनुवाद में शब्द आया है ‘इसलिए’ क्योंकि इससे पहले रोमियों 11 वें अध्याय में पौलुस प्रेरित इस बात का वर्णन करता है कि परमेश्वर ने हमारे लिए क्या किया । वह वर्णन करता है परमेश्वर के अनुग्रह का , उसके बलिदान का । पहले अध्याय से 11 वें अध्याय तक वह इन सब बातों का वर्णन करता है और तब 12 वें अध्याय में वह कहता है ‘अतः’ । यह सब कुछ जो परमेश्वर ने किया है उसका वर्णन कर दिया अब तुम्हारा काम बाकी है ।

पौलुस बताता है कि पुराने नियम में तो होमबलि और मेलबलि चढ़ाना होती थी लेकिन वह कहता है कि अब वह बात नहीं रही । अब अन्तर आ गया क्योंकि प्रभु यीशु ने स्वयं अपने आपको तुम्हारे लिए बलिदान कर दिया । तुम्हारे सामने यह बात घटित हुई इसलिए अब तुम परमेश्वर से यह प्रश्न मत करो कि तुम्हें क्या मिलेगा ? प्रश्न यह है कि तुम क्या दोगे ? इसके बाद वह कहता है कि अपने शरीरो को जीवित! अब बलिदान के लिए मृतक पशुओं की ज़रूरत नहीं है । बलिदान तो परमेश्वर के पुत्र का हो गया । अब तुम्हारा काम है कि अपने शरीरो को जीवित , पवित्र और ग्रहणयोग्य करके बलिदान करके चढ़ाओ , यही तुम्हारी आत्मिक आराधना है और जब हम शरीर की बात करते हैं तो उसमें हृदय भी शामिल है ।

भजन संहिता 51:17 में लिखा है - टूटा मन परमेश्वर के योग्य बलिदान है; हे परमेश्वर , तू टूटे और पिसे हुए हृदय को तुच्छ नहीं जानता ।
परमेश्वर के योग्य बलिदान क्या है ? टूटा और पिसा हुआ मन! क्या हमारा हृदय टूटा है हमारे पापों के कारण , हमारे अतीत के कारण , इस कारण कि हम प्रभु यीशु से फिरकर दूसरे मार्ग पर चलते रहे ? प्रभु यीशु को ग्रहण करने के बाद सबसे पहले हमें अपने टूटे और पिसे हुए हृदय को परमेश्वर को चढ़ाना है क्योंकि यही चढ़ाने योग्य बलिदान है । अगर अभी तक हमने अपना हृदय परमेश्वर को नहीं चढ़ाया तो फिर हमारे दान और भेंटों का कोई औचित्य नहीं ।

1 शमूएल 15:22 में लिखा है - तब शमूएल ने कहा , क्या यहोवा होमबलि और बलिदानों से उतना प्रसन्न होता है जितना अपनी आज्ञाओं के माने जाने से ? सुन , आज्ञा पालन बलिदान से बढ़कर और ध्यान देना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है ।
पशुओं के बलिदान से और मेढ़ों की चर्बी से उत्तम और कुछ भी है ? वह उत्तम बात क्या है ? वह है , परमेश्वर के वचन पर ध्यान देना और उसकी आज्ञाओं का पालन करना । इसके द्वारा हम परमेश्वर को अपना हृदय अर्पित करते हैं।
इसलिए यदि त्याग सहित देना है तो पहले जांच लें कि हमने अपने हृदय को समर्पित किया है अथवा नहीं ? अगर हृदय सही जगह है तो सब बातें सही होंगी परन्तु यदि हृदय ही सही नहीं है तो फिर परिवर्तन सम्भव नहीं है ।

2. हमारी त्याग सहित भेंटों से जुड़ी दूसरी बात यह है कि यह प्रारम्भ में कष्टप्रद लगती हैं परन्तु अन्त में आशीषमय ।

उत्पत्ति 22:1-2 में लिखा है - इन बातों के पश्चात ऐसा हुआ कि परमेश्वर ने इब्राहीम की परीक्षा ली और उस से कहा , "हे इब्राहीम ।" उसने कहा , "देख , मैं यहां हूं ।" और उसने कहा "अपने पुत्र , हां , अपने एकलौते पुत्र इसहाक को , जिस से तू प्रेम करता है , साथ लेकर मोरिय्याह देश को जा; वहां एक पहाड़ पर , जिसे मैं तुझे बताऊंगा , उसे होमबलि करके चढ़ाना ।"
जब परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा कि अपने पुत्र , हां अपने एकलौते पुत्र , और फिर उसका नाम भी लिया गया है इसहाक को । जिससे तू प्रेम करता है उस इसहाक को लेकर मोरिय्याह देश को जा । आप कल्पना कीजिए कि इब्राहीम के लिए , इस पूरी प्रक्रिया से , इस पूरी परिस्थिति से गुज़रना कितना कष्टप्रद रहा होगा । इस आदेश को सुनना और इस आदेश को पूरा करने के लिए मोरिय्याह तक की यात्रा करना उसके लिये कितना कष्टप्रद रहा होगा ।
परन्तु अक्सर हमें मोरिय्याह तक की यात्रा करने में कठिनाई होती है क्योंकि हमें परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी होना कठिन लगता है , इसलिए हम मोरिय्याह की यात्रा नहीं करते । इसी वजह से हम परमेश्वर की आशीषों से वंचित रह जाते हैं । परमेश्वर ने जो आदेश दिया था वह कठिन था , पीड़ादायक था परन्तु वहीं से आशीषें प्रारम्भ होती हैं ।

उत्पत्ति 22:16-18 में लिखा है - यहोवा यह कहता हैः क्योंकि तू ने यह काम किया है कि अपने पुत्र वरन् अपने एकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा , इस कारण मैं अपनी शपथ खाकर कहता हूं कि मैं तुझे निश्चय ही बड़ी आशीष दूंगा । मैं तेरे वंशजों को आकाश के तारागण और समुद्रतट के रेत-कणों के समान असंख्य कर दूंगा , और तेरे वंशज अपने शत्रुओं के नगरों पर अधिकार कर लेंगे । और तेरे वंशजों के कारण पृथ्वी की सारी जातियां आशीष पाएंगी: क्योंकि तू ने मेरी आज्ञा का पालन किया है । ये आशीषें पीढ़ियों तक रहेंगी , आशीषों का माध्यम बन जाएंगी , तू आशीषों का स्रोत बन जाएगा , क्यों ? क्योंकि तू ने आज्ञा का पालन किया है ।
हमसे कहा जाता है कि सारे दसमांश भंडार में ले आओ परन्तु हमें बड़ी दिक्कत होती है , हम उस प्रक्रिया तक पहुंच नहीं पाते । यह बात दिमाग तक तो आ जाती है परन्तु दिल तक नहीं आ पाती । जबकि परमेश्वर यह कहता है कि ऐसा करके मुझे परखो ।

मत्ती 19:27-29 में लिखा है - इस पर पतरस ने कहा , "देख , हम तो सब कुछ छोड़कर तेरे पीछे चल पड़े हैं । हमें क्या मिलेगा ? यीशु ने उनसे कहा , "मैं तुम से सच कहता हूं कि तुम जो मेरे पीछे चले आए हो उस समय जब सब कुछ फिर नया हो जाएगा और मनुष्य का पुत्र अपने महिमामय सिंहासन पर बैठेगा तो तुम भी बारह सिंहासनों पर बैठकर इस्राएल के बारह गोत्रों का न्याय करोगे । और प्रत्येक जिसने मेरे नाम के लिए घरों , या भाइयों , या बहिनों , या पिता या माता , या बच्चों , या खेतों को छोड़ दिया है , वह इस से कई गुना अधिक पाएगा और अनन्त जीवन का उत्तराधिकारी होगा ।
चेले तो सोचते होंगे कि यह कैसी आशीष है । वे तो मार डाले गए , उनको क़ैद में डाला गया , किसी को क्रूस पर उल्टा लटका दिया गया परन्तु यीशु का वास्तव में कहना यह है कि नहीं! यहीं सब कुछ नहीं मिलेगा! स्वर्ग में जब मैं अपने सिंहासन पर बैठूंगा तो तुम न्याय करोगे इस्राएल के 12 गोत्रों का । तुम्हें पद मिलेगा , तुम्हें प्रतिष्ठा मिलेगी परन्तु मात्र चार दिन की नहीं वरन् अनन्त जीवन में । जो कोई मेरे पीछे आएगा , जो कोई अपना सब कुछ छोड़ेगा उसे कई गुना मिलेगा और उसी के साथ वह अनन्त जीवन का भी अधिकारी होगा ।
में त्याग सहित देना कष्टप्रद लगता है परन्तु यह परमेश्वर की हमसे अपेक्षा है क्योंकि उसके बाद ही उसकी आशीषों की प्रतिज्ञा है ।

3. त्याग सहित देने की बात में यह बात है कि उस मूल्यवान वस्तु को जो हमें प्रिय लगती है , उससे और भी अधिक मूल्यवान के लिए दे देना है ।

जब युद्ध में सैनिक जाते हैं तो वे अपनी जान को हथेली पर रखकर जाते हैं और उनमें से कई सैनिक शहीद भी हो जाते हैं । अधिकांश चेलों के साथ भी वही हुआ । सेना में सैनिक क्यों जाता है ? क्योंकि वह अपने प्राणों को तो प्रिय समझता है परन्तु उसके प्राण से प्रिय उसका देश होता है । इसलिए हम उन्हें सलाम करते हैं । इसलिए हम उनका अभिनन्दन करते हैं । इसलिए हम उनकी महिमा के गीत गाते हैं । इसलिए हम स्वतन्त्रता दिवस पर उन्हें सलामी देते हैं । इसीलिए हम अमर शहीदों के लिए अमर ज्वाला जलाते हैं । गलियों से लेकर संसद भवन तक , गली-कूचों से लेकर , राजपथ तक उन शहीदों को स्मरण किया जाता है , क्यों ? क्योंकि उन्होंने जो उनके लिए प्रिय था वह दे दिया उसके लिए जो और भी ज़्यादा बहुमूल्य है; देश के लिए ।

2 कुरिन्थियों 12:15(अ) में लिखा है - मैं बड़े हर्ष से तुम्हारी आत्माओं के लिए खर्च करूंगा और खर्च हो जाऊंगा ।
पौलुस कहता है कि मैं तो अर्ध की नाई उंडेला जाता हूं । वह कहता है कि मैं तो अपने आप को तुम्हारी आत्माओं के लिए खर्च कर दूंगा । मुझे अपना जीवन प्रिय है , मुझे अपनी सेवकाई प्रिय है परन्तु मैं अपने आप को खर्च करने के लिए तैयार हूं । मैं अपने आप को शून्य करने के लिए , समाप्त करने के लिए तैयार हूं , क्यों ? तुम्हारी आत्माओं के लिए! तुम्हारी आत्माएं मुझे अपनी ज़िन्दगी से ज़्यादा प्रिय हैं क्योंकि परमेश्वर को भी तुम्हारी आत्माएं तुम्हारी ज़िन्दगी से ज़्यादा प्रिय हैं ।

यूहन्ना 12:3 में वर्णन है - तब मरियम ने जटामांसी का आधा किलो बहुमूल्य और असली इत्र लेकर यीशु के पैरों पर मला और अपने बालों से उसके पैर पोंछे और इत्र की सुगन्ध से घर सुगन्धित हो गया ।
मरियम के दिल में आभार था क्योंकि उसके भाई को प्रभु यीशु ने मृतकों में से जिलाया था । उससे एक विशेष सम्बन्ध था और अपना आदर , अपना सम्मान , अपना प्यार दिखाने के लिए वह अपने घर जाकर उस जटामांसी के इत्र को लेती है जिसकी क़ीमत वर्ष भर की आमदनी के बराबर थी । उन दिनों में यह इत्र रखना बहुमूल्य माना जाता था । जिस प्रकार से आज लोग सोना खरीदते हैं , उन दिनों में वैसा ही जटामांसी के इत्र को माना जाता था । किसी बहुमूल्य धरोहर के समान मानकर उसे घर में सजाया जाता था । परन्तु मरियम ने उस पात्र को प्रभु यीशु के चरणों में तोड़ दिया , अपने बालों से उसके पैर पोंछे । प्रभु यीशु कहते हैं कि जब तक वचन का प्रचार होगा इस घटना का उल्लेख किया जाएगा ।

2 कुरिन्थियों 5:8 में लिखा है - अतः हम पूर्णतः साहस रखते हैं तथा देह से अलग होकर प्रभु के साथ रहना और भी उत्तम समझते हैं । देह तो प्रिय है , संसार भी प्रिय है परन्तु इससे कहीं अधिक उत्तम प्रभु के साथ रहना है । क्या हमारे जीवन में कोई ऐसी वस्तु है जो हमें प्रिय है ? क्या हम उसे प्रभु यीशु को देने के लिए तैयार हैं ? तभी वह वास्तव में त्यागपूर्ण भेंट होगी ।

4. त्याग सहित बलिदान में गवाही होनी चाहिए ।

इस विधवा के दान में जो बात है वह यह कि उसके इस कार्य से गवाही हुई । प्रभु यीशु ने देखा , उसके चेलों ने देखा । यह दिखाई दिया कि उसने अपना सब कुछ वहां पर डाल दिया है ।

मरकुस 12:44-45 में लिखा है - इतने में एक कंगाल विधवा ने आकर तांबे के दो छोटे छोटे सिक्के डाले जिनका मूल्य लगभग एक पैसे के बराबर होता है । तब यीशु ने अपने चेलों को पास बुलाकर उनसे कहा , "मैं तुम से सच कहता हूं , कि कोष में डालने वालों में से इस कंगाल विधवा ने सब से बढ़कर डाला है; क्योंकि अन्य सब ने अपनी बहुतायत में से डाला है , परन्तु इसने अपनी दरिद्रता में से जो कुछ उसका था अर्थात् अपनी सारी जीविका डाल दी है ।
जब मरियम ने पात्र तोड़कर जटामांसी का इत्र प्रभु यीशु के पैरों में डालकर उसे बालों से पोंछा तो मरकुस 14:9 में प्रभु यीशु कहते हैं - मैं तुम से सच कहता हूं , कि समस्त संसार में जहां कहीं सुसमाचार का प्रचार होगा , वहां इस स्त्री के इस कार्य का वर्णन भी इसकी स्मृति में किया जाएगा ।
प्रभु यीशु द्वारा अपने चेलों के साथ उपरौठी कोठरी में अन्तिम ब्यारी लेने के बाद की यह घटना है । अन्तिम ब्यारी के समय प्रभु यीशु कहते हैं कि जब-जब ऐसा करते हो मुझे स्मरण करना । यह मेरी देह है , यह मेरा रुधिर है जो तुम्हारे लिए बहाया जाता है । उसके बाद यहां पर प्रभु यीशु कहते हैं कि इसकी स्मृति में इस कार्य का वर्णन किया जाएगा । यह भी याद की जाएगी क्योंकि इस स्त्री ने जिस प्रकार से अपना प्रेम दर्शाया है , वह इसकी गवाही बन गई है ।

गलातियों 6:14 में पौलुस लिखता है - परन्तु ऐसा कभी न हो कि मैं किसी अन्य बात पर गर्व करूं , सिवाय प्रभु यीशु मसीह के क्रूस के , जिसके द्वारा संसार मेरी दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया जा चुका है , और मैं संसार की दृष्टि में ।
जब हम अपनी भेंटें देते हैं , तो क्या उस क्रूस को स्मरण करते हैं ? क्या हमारी भेंटें उस क्रूस के परिप्रेक्ष्य में होती हैं ? या फिर हम औपचारिकता मात्र को पूरा करने के लिए अपना दान देते हैं ? क्या क्रूस के बलिदान के परिप्रेक्ष्य में हमारा दान सम्माननीय होता है ? हमारी भेंटें सम्मानजनक होती हैं ? यदि ऐसा है तभी हमारी भेंटों में हमारी गवाही दिखाई देगी ।

2 शमूएल 23:14-17 में लिखा है - और दाऊद गढ़ में था जबकि पलिश्तियों की टुकड़ी बैतलहम में तैनात थी । दाऊद ने लालायित होकर कहा , "काश , कोई बैतलहम के उस कुएं से मुझे पानी पीने को देता जो फाटक के पास है! अतः उन तीनों वीरों ने पलिश्तियों की छावनी में बलपूर्वक प्रवेश करके बैतलहम के उस कुएं में से पानी निकाला जो फाटक के पास था , फिर वे पानी लेकर दाऊद के पास आए । पर दाऊद ने उसे पीने से इनकार किया , और उसे यहोवा के सामने अर्घ करके उण्डेल दिया । उसने कहा , "हे यहोवा , यह मुझ से दूर रहे कि मैं ऐसा करूं । क्या मैं उन पुरुषो का रक्त पीऊं जो अपने प्राण हथेली पर रख कर गए ?" इसलिए उसने उसे पीने से इनकार किया । इन तीनों वीरों ने ऐसे ऐसे काम किए ।

यह घटना उस समय की है पलिश्तियों और इस्राएलियों का युद्ध चल रहा था । पलिश्तियों ने अपनी चौकी बैतलहम के दरवाज़े को बनाया था । दाऊद इस्राएलियों की अगुवाई कर रहा था और वह कहता है कि काश! कोई बैतलहम के कुएं से मुझे पानी पीने को देता जो फाटक के पास है । बड़ी विचित्र सी बात है कि दाऊद कह रहा है कि मुझे प्यास लगी है और मुझे उस कुंए से पानी पीना है जो उस फाटक के पास है । तब वहां तीन वीर थे जिन्होंने कहा कि ठीक है! जैसा राजा ने कहा है , वैसा हम करेंगे । हम अपने राजा के लिए पानी लेकर आएंगे । वे जाकर पलिश्तियों की छावनी में प्रवेश करते हैं और बैतलहम के कुएं से पानी निकालकर दाऊद के पास लेकर आते हैं । आते-जाते में कई लोगों का खून बहा , एक वीर ने 300 लोगों को मारा और जब वे पानी लेकर आए तो दाऊद ने उनके त्याग , उनके प्रेम , उनके बलिदान को देखा और उस पानी को पीने से इन्कार किया । उसने उस पानी को यहोवा के सामने अर्घ करके उण्डेल दिया । दाऊद ने कहा , हे यहोवा! यह मुझसे दूर रहे कि मैं ऐसा करूं । क्या मैं उन पुरुषो का रक्त पीऊं जो अपने प्राण हथेली पर रखकर गए । इसलिए उसने पानी को पीने से इन्कार किया । वह कहता है कि मैं इस पानी को पीने के योग्य नहीं हूं । ये वीर अपनी जान की बाज़ी लगाकर , विरोधियों के खेमे तक जाकर उस पानी को लेकर आए , मैं हे यहोवा इस पानी को तुझे समर्पित करता हूं क्योंकि मैं इस पानी को पीने के योग्य नहीं हूं ।

हो सकता है , ऐसे पानी के मटके हमारे पास भी हों । किसी बैंक के किसी लॉकर में । पर जब हम प्रभु यीशु के बलिदान को देखते हैं तो हमें विचार करना है कि उसके बलिदान के सामने ये सब क्या क़ीमत रखते हैं ? क्या हम योग्य हैं कि इन चीज़ों को हम रखे रहें और ईश्वर को न समर्पित करें!

5 अप्रैल 2016 की घटना है । वेस्टइण्डीज़ की टीम ने 20-20 क्रिकेट टूर्नामेंट का फायनल मैच जीता । टीम उस समय कोलकाता में थी । टीम के मैनेजर रॉल लेविस अपनी टीम के साथ मदर टेरेसा के आश्रम में पहुंचे और जीत की राशि , वहां उन्होंने दान में दे दी । वह सारी राशि उन्होंने कोढ़ियों , एड्स के रोगियों , अनाथों , विधवाओं और अपंगों की मदद के लिए दे दी । टीम के कप्तान ने अपनी स्पीच में कहा - हम लोगों ने जब इस यात्रा को प्रारम्भ किया था , तब हमारे पास कुछ नहीं था । हमारी बोर्ड हमारे विरोध में थी , हमारे अधिकारियों का कहना था कि ये बेकार खिलाड़ी हैं , जो खेलने जा रहे हैं । हमारे पास इतना पैसा भी नहीं था कि हम खुद अपनी जर्सी और किट इस सीरीज़ के लिए खरीद सकें । अपनी स्पीच में उन्होंने एक बात और कही कि हमारी टीम प्रार्थना करने वाली टीम है , हमारी टीम के साथ एक पास्टर भी रहते हैं , जो निरन्तर प्रार्थना करते रहते हैं । इसलिए हम सारी महिमा परमेश्वर को देते हैं । ऐसे खिलाड़ी जो साधारण गरीब घरों से थे परन्तु मसीही थे , उन्होंने अपनी जीत की सारी राशि कोलकाता में मिशनरीज़ ऑफ़ चैरेटीज़ में दे दी ।

एक बहुत प्रमुख अखबार ने इस समाचार को छापा और हेडलाईन्स में लिखा कि वेस्टइण्डीज़ के खिलाड़ी न सिर्फ़ खेल के मैदान में चैम्पियन्स हैं परन्तु खेल के मैदान के बाहर भी चैम्पियन्स हैं क्योंकि उन्होंने देखा कि चैम्पियन्स ट्रॉफी से बढ़कर भी कुछ और है । कुछ है जो इस सम्मान से भी बढ़कर है । वे कोढ़ से ग्रसित लोग , एड्स से पीड़ित बच्चे , अनाथ और अपंग लोग , वे विधवाएं जिनकी कोई सुधि नहीं लेता । हम जाकर यह राशि उनकी मदद के लिए देंगे क्योंकि वह परमेश्वर का कार्य है । एक ऐसा कार्य है जिसका समापन इस संसार में नहीं होगा । चैम्पियन्स ट्रॉफी की चमक तो मिट जाएगी , ये पैसे तो खर्च हो जाएंगे परन्तु प्रभु यीशु के लिए किए गए इस कार्य की चमक बरकरार रहेगी ।

क्या वह प्रभु यीशु हमारे दिल में है ? अगर उस प्रभु का वास हमारे दिल में है तो फिर हम देना सीखेंगे , त्याग से देना सीखेंगे , बहुतायत से देना सीखेंगे और जो हमें प्रिय है उसे भी देना सीखेंगे , जो हमारी दृष्टि में और संसार की दृष्टि में मूल्यवान है , उसको भी देना सीखेंगे; उसके लिए जो सबसे मूल्यवान है । जिसने अपना सबसे बहुमूल्य , अपना पुत्र हमारे लिए दे दिया और उसका लहू हमारे लिए बहा दिया ।

परमेश्वर आपको आशीष दे।