जीवन की पुस्तक
सन्दर्भ:- प्रकाशितवाक्य 13:8-9
अगर आज मुझसे या आपसे परमेश्वर पूछे कि वह एक बात कौन सी है जो तुम्हारी सबसे प्रमुख इच्छा है ? वह कौन सी बात है जो तुम्हारे लिए सबसे अहम है ? या फिर वह यूं पूछे कि तुम्हारी अन्तिम इच्छा क्या है ? वह कौन सी एक बात है जो तुम्हारे लिए सबसे प्राथमिक और महत्वपूर्ण है ? तो हमारा क्या उत्तर होगा ? हो सकता है कि शायद कोई कहे कि काश! हमारे पास संसार में सबसे अधिकाधिक धन सम्पदा हो जाए । हो सकता है कोई कहे कि संसार में सबसे अधिकाधिक बुद्धिमान हो जाएं । कोई यह भी कह सकता है कि हमारे जीवन में शान्ति और आनन्द भर जाए , हमारे परिवार में अमुक बहुत बड़ी समस्या है और वह समस्या दूर हो जाए । परन्तु ऐसी कौन सी बात है जो हमारे लिए सबसे अहम और महत्वपूर्ण होगी । जो हमारे जीवन और हमारी मृत्यु का सबसे बड़ा लक्ष्य होगा । जो स्वर्ग और धरती के परिप्रेक्ष्य में , संसार के जीवन और अनन्त के परिप्रेक्ष्य में हमारे लिए सबसे अहम बात होगी । मेरा सोचना यह है कि हमारे लिए सबसे प्रमुख बात यह होगी कि परमेश्वर , मेरी तुझसे यह प्रार्थना है कि जब मेरा समय इस संसार से पूरा हो तो मेरा नाम उस जीवन की पुस्तक में लिखा हो। यह हमारे जीवनों के लिए सबसे प्रमुख बात है! इस जीवन की पुस्तक के सम्बन्ध कुछ बातों पर हम विचार करेंगे । 1. जीवन की पुस्तक सबसे पुरानी पुस्तक है । वर्तमान , भविष्य और अतीत के परिप्रेक्ष्य में , जीवन और मृत्यु के परिप्रेक्ष्य में , अन्त और अनन्त के परिप्रेक्ष्य में यह सबसे पुरानी किताब है । निर्गमन 32:33में लिखा हुआ है - यहोवा ने मूसा से कहा , जिस ने मेरे विरुद्ध पाप किया है उसका नाम मैं अपनी पुस्तक में से काट दूंगा । यह हज़ारों वर्षों पूर्व निर्गमन के समय की बात है । जब परमेश्वर ने मूसा कहा कि जिसने मेरे विरुद्ध पाप किया है , उसका नाम मैं अपनी पुस्तक में से काट दूंगा । परमेश्वर ने जब मनुष्य को बचाने की योजना बनाई , जब उसने मनुष्य के उद्धार की योजना बनाई । परमेश्वर ने जब मानव को इस पाप के गर्त से बचाकर अपने पुत्र के लहू से धोने की योजना बनाई ; उस समय से परमेश्वर के पास जीवन की एक पुस्तक है । भजन संहिता 69:28 में लिखा है - उसका नाम जीवन की पुस्तक में से काटा जाए , और धर्मियों के संग लिखा न जाए । कोई अपने दुश्मनों के लिए जो अधिकतम पीड़ा मांग सकता है , जो अधिकतम बदला मांग सकता है , उसके अनुसार उसके दुश्मनों के लिए सबसे त्रासदीपूर्ण बात यह होगी कि उनका नाम जीवन की पुस्तक में से काट दिया जाए । इससे ज़्यादा दुःखद, त्रासदीपूर्ण और विनाशकारी , कोई दूसरी बात नहीं होगी कि जीवन की पुस्तक से उनका नाम काट दिया जाए । इसलिए जीवन की पुस्तक के सम्बन्ध में जो सबसे प्रमुख बात है वह यह कि जीवन की पुस्तक सबसे पुरानी पुस्तक है । 2. यह न सिर्फ़ सबसे पुरानी पुस्तक है परन्तु यह सबसे प्रमुख विषय पर लिखी गई पुस्तक है । इस पुस्तक में लिखा हुआ है कि किसने अनन्त जीवन पाया है , किसका छुटकारा हुआ है , कौन परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करेगा , कौन अनन्त का जीवन परमेश्वर के साथ बिताएगा । दानिय्येल ने अन्त के समय के लिए भविष्यवाणी की है - 12:1 ब - परन्तु उस समय तेरे लोगों में से जितनों के नाम परमेश्वर की पुस्तक में लिखे हुए हैं , वे बच निकलेंगे । प्रकाशितवाक्य 5:2-3 में लिखा है - फिर मैं ने एक बलवन्त स्वर्गदूत को देखा जो ऊंचे शब्द से यह प्रचार करता था कि इस पुस्तक के खोलने और उस की मुहरें तोड़ने के योग्य कौन है ? और न स्वर्ग में , न पृथ्वी के नीचे कोई उस पुस्तक को खोलने या उस पर दृष्टि डालने के योग्य निकला । उस पुस्तक को खोलने की बात तो छोड़ दीजिए , उस पर दृष्टि डालने के योग्य भी कोई नहीं निकला । प्रकाशितवाक्य 5:9 में लिखा है - और वे यह नया गीत गाने लगे , कि तू इस पुस्तक के लेने , और उस की मुहरें खोलने के योग्य है; क्योंकि तू ने वध होकर अपने लोहू से हर एक कुल , और भाषा , और लोग , और जाति में से परमेश्वर के लिये लोगों को मोल लिया है । केवल प्रभु यीशु है जो इस पुस्तक को खोलने के योग्य है क्योंकि उसने वध होकर अपने लहू से हर एक कुल , हर एक भाषा , हर एक जाति , हर एक व्यक्ति को परमेश्वर के लिए मोल लिया है । इसलिए केवल प्रभु यीशु मसीह ही इस पुस्तक को खोलने के योग्य है । किस पर उस प्रभु यीशु के लहू की मुहर लगी है; यह उस पुस्तक का विषय है । 3. जितनी पुस्तकें अभी तक लिखी गई हैं, उनमें यह सबसे बड़ी पुस्तक भी है । निर्गमन 32:33 में लिखा है - यहोवा ने मूसा से कहा, जिस ने मेरे विरुद्ध पाप किया है उसी का नाम मैं अपनी पुस्तक में से काट दूंगा । इसका अर्थ यह है कि इसमें सबके नाम लिखे हुए हैं । इसका दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि इस पुस्तक में उन लोगों का नाम भी लिखा है जिन्होंने प्रभु को ग्रहण तो किया फिर वे छोड़कर चले गए और उनका नाम कट गया । आप कल्पना कीजिए कि आज तक इतिहास में , सदियों में जितने लोग हुए और जितने लोग आज हैं तथा जितने लोग प्रभु यीशु के दूसरे आगमन तक होंगे , सबके नाम इस जीवन की पुस्तक में लिखे हैं । इसलिए यह संसार की सबसे बड़ी पुस्तक है । 4. इस पुस्तक को सबसे महान लेखक ने लिखा है । इसका लेखक सबसे महान है । यदि मैं आपसे कहूं कि हमारे अतीत और भविष्य के सन्दर्भ में एक और पुस्तक है जो बाइबिल से भी अधिक अहमियत रखती है तो आप कहेंगे कि मैं कैसी अजीब बात कर रहा हूं । बाइबिल से भी अधिक अहमियत रखने वाली पुस्तक और दूसरी पुस्तक कौन सी हो सकती है ? परन्तु बाइबिल के अलावा भी एक पुस्तक है जिसे परमेश्वर ने लिखा है और किसी विशेष सन्दर्भ में यह हमारे भविष्य और हमारे अनन्त के लिए सबसे अहम पुस्तक है । जब हम स्कूल जाते हैं तो अध्ययन के दौरान हमारे पास एक लिखने की किताब होती है । जो हमें सिखाती है, जो हमें उस विषय के बारे में जानकारी देती है । जब हमारा टेस्ट होता है, जब हमारा फाइनल एग्ज़ाम होता है, तब भी हमें एक पुस्तिका मिलती है, जिसमें हमारे ग्रेड्स होते हैं, जो हमने हर एग्ज़ाम में प्राप्त किए हैं । जब हम उसमें पास हो जाते हैं तो फिर हम आगे बढ़ जाते हैं । इसी प्रकार इस संसार में जीवन जीने के लिए परमेश्वर ने हमारे लिए जो बात की है वह यह कि हमें किस प्रकार अनन्त जीवन के लिए अपने जीवनों की तैयारी करना है ? इन सब बातों की जानकारी परमेश्वर के वचन में है और उससे बड़ी , अहम और प्राथमिक पुस्तक और दूसरी नहीं है । परन्तु हमारे अनन्त के लिए एक ऐसी पुस्तक है जिसे परमेश्वर ने स्वयं लिखा है । यह हमारे लिए कितनी महान बात होगी कि उस पुस्तक में हमारा नाम हो । निर्गमन 32:32 में लिखा है - तौभी अब तू उनका पाप क्षमा कर-नहीं तो अपनी लिखी हुई पुस्तक में से मेरे नाम को काट दे । मूसा यहोवा से कह रहा है कि तू मेहरबानी से सबके पाप क्षमा कर , नहीं तो मेरा नाम भी अपनी लिखी हुई पुस्तक में से काट दे । इस पुस्तक को सृष्टिकर्ता परमेश्वर ने स्वयं लिखा है । किसी पुस्तक में लेखन विशिष्ट नहीं होता परन्तु लेखन से विशिष्ट लेखक होता है । हम कहते हैं कि सृष्टिकर्ता प्रमुख है और उसके बाद सृष्टि आती है क्योंकि सृष्टिकर्ता ने सृष्टि को सृजा है । हम जब यह कहते हैं कि किसी प्रतिमा की उपासना नहीं करना है तो वह इसलिए क्योंकि हमें सृष्टि की नहीं वरन् सृष्टिकर्ता की उपासना करना है । वैसे ही पुस्तक के सम्बन्ध में भी यह बात है कि जो लेखक होता है वह प्राथमिक होता है । वह विशिष्ट , प्रमुख और प्राथमिक होता है । बाइबिल इसलिए अहम है क्योंकि यह परमेश्वर का वचन है । यह परमेश्वर के द्वारा श्वासी पुस्तक है , यह परमेश्वर के द्वारा लिखी हुई पुस्तक है । इसका एक-एक शब्द , इसका एक-एक पूर्ण विराम; सब कुछ परमेश्वर की प्रेरणा से लिखा गया है और इसीलिए यह दुनिया की सबसे अहम पुस्तक है । परन्तु एक पुस्तक और है जो और भी पहले से लिखी जा रही है और जिसका लिखने वाला स्वयं परमेश्वर है । 5. यह पुस्तक हम में से हर एक मनुष्य के लिए , हमारे जीवन, हमारी मृत्यु और हमारे अनन्त के लिए सबसे अहम पुस्तक है । इस पुस्तक में हमारे न्याय की बात लिखी है । इसमें हमारे अनन्त की बात लिखी हुई है , इसमें हमारा अन्तिम न्याय लिखा हुआ है । इसमें यह लिखा हुआ है कि मैं स्वर्ग जाऊंगा अथवा नहीं! प्रकाशितवाक्य 20:15 के अनुसार - और जिस किसी का नाम जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ न मिला , वह आग की झील में डाला गया । प्रकाशितवाक्य 21:27 में लिखा है - और उस में कोई अपवित्र वस्तु या घृणित काम करनेवाला , या झूठ का गढ़नेवाला , किसी रीति से प्रवेश न करेगा; पर केवल वे लोग जिन के नाम मेम्ने के जीवन की पुस्तक में लिखे हैं । प्रकाशितवाक्य 13:8-9 में लिखा है - और पृथ्वी के वे सब रहनेवाले जिन के नाम उस मेम्ने की जीवन की पुस्तक में लिखे नहीं गए , जो जगत की उत्पत्ति के समय से घात हुआ है, उस पशु की पूजा करेंगे । जिस के कान हो वह सुने । जिस को क़ैद में पड़ना है , वह क़ैद में पड़ेगा , जो तलवार से मारेगा , अवश्य है कि वह तलवार से मारा जाएगा , पवित्र लोगों का धीरज और विश्वास इसी में है । 1 कुरिन्थियों 6:9-11 में लिखा है - क्या तुम नहीं जानते , कि अन्यायी लोग परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे ? धोखा न खाओ , न वेश्यागामी , न मूर्तिपूजक , न परस्त्रीगामी , न लुच्चे , न पुरुषगामी । न चोर , न लोभी , न पिय्यकड़ , न गाली देने वाले , न अंधेर करने वाले परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे । और तुम में से कितने ऐसे ही थे , परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए , और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे । इस सन्दर्भ में पौलुस बार-बार एक ही बात को दोहरा रहा है कि क्या तुम नहीं जानते ? 16 वीं आयत में लिखा है - क्या तुम नहीं जानते । 19 वीं आयत में - क्या तुम नहीं जानते । 9 वीं आयत में - क्या तुम नहीं जानते । तीसरी आयत में - क्या तुम नहीं जानते । बार-बार एक ही वाक्य को दोहराया गया है । पौलुस प्रेरित कुरिन्थ की कलीसिया से कह रहा है कि इतनी मूलभूत बात , इतनी प्रमुख बात , इतनी बुनियादी बात को क्या तुम नहीं जानते ? और उसके बाद वह ठहर नहीं जाता । वह लिखता है - धोखा न खाओ । धोखे में मत रहना! न वेश्यागामी , न मूर्तिपूजक , न लोभी , न पिय्यकड़ , न गाली देने वाले , न अन्धेर करने वाले परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे । क्या तुम नहीं जानते! कि ऐसे लोग परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे । इन लोगों के नाम जीवन की पुस्तक में होंगे ही नहीं । काश! हमारे मन में यह बात हो कि चाहे संसार की किताबों में हमारा नाम हो या न हो , चाहे किसी दीवार के पत्थर पर हमारा नाम हो या न हो , चाहे इस संसार में हमारा नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा गया हो या न हो , चाहे इतिहास में हमारा नाम हो या न हो , चाहे हमारी मौत दुर्घटना में हो जाए और हमारा शरीर किसी को न मिले , न हमें क़ब्र नसीब हो , गुमनाम होकर हम मर जाएं परन्तु जो प्रमुख बात है वह यह कि हमारा नाम जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ हो । मेरी प्रार्थना यह है कि हम सबके हृदय में इस बात की निश्चितता हो कि हमारा नाम जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ है । कैसे होगा हमारा नाम जीवन की पुस्तक में ? केवल एक मूलभूत बात की आवश्यकता है कि यदि हमारे जीवन का प्रभु , हमारे जीवन का स्वामी प्रभु यीशु मसीह है , यदि उसके रक्त की मुहर हमारे दिल पर लग गई है तो हमारे नाम जीवन की पुस्तक में होंगे । यदि हमारी प्राथमिकता यीशु है , यदि हमारे जीवन का आधार यीशु है । यदि हमारा मापदण्ड यीशु है , यदि हमारा आदर्श यीशु है , यदि हमारा चिन्तन यीशु है , यदि हमारा व्यवहार यीशु है । यदि हमारी जीवन शैली यीशु है , यदि हमारे जीवन की प्रणाली यीशु है , यदि हमारी आशा यीशु है , यदि हमारा विश्वास यीशु है , यदि हमारे लिए जीना यीशु है , यदि हमारे लिए मरना यीशु है तो निश्चित रूप से जीवन की पुस्तक में हमारा नाम लिखा हुआ होगा । वचन में यह बात स्पष्ट है कि जिसके पास पुत्र है उसके पास पिता भी है । पुत्र , जो स्वर्ग का सिंहासन छोड़कर इस धरती पर आ जाता है और दास का स्वरूप धारण करता है । घुटने टेकता है और मेरे और आप जैसे लोगों के पैर धोता है । जो सृष्टिकर्ता है वह स्वयं सृष्टि बन जाता है , जो असीमित से सीमित बन जाता है । केवल यीशु में ही सब कुछ सम्भव है । हमारे लिए याद रखने की बात यह है कि हम प्राण देने तक विश्वासी बने रहें , कहीं ऐसा न हो कि जीवन की पुस्तक से हमारा नाम कट जाए । एक और प्रमुख बात यह है कि परमेश्वर के वचन में हमेशा आशा है और इसीलिए इसे सुसमाचार कहा गया है , जिसका अर्थ होता है - अच्छा समाचार । 1 कुरिन्थियों 6 अध्याय में हम देखते हैं कि ये लोग परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं करेंगे - वेश्यागामी , मूर्तिपूजक , लोभी , पिय्यकड़ , गाली देने वाले , चोर , अंधेर करने वाले । हम कहेंगे कि हम भी इसमें आते हैं क्योंकि हम ने भी कहीं न कहीं कुछ तो किया है । इसीलिए लिखा है कि धोखा न खाओ , क्या तुम नहीं जानते! परन्तु 1 कुरिन्थियों 6:11 में लिखा है - और तुम में से कितने ऐसे ही थे , परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए , और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे । कितने तो लुच्चे-लफंगे थे , कितने तो शराबी थे , कितने तो वेश्यागामी और पुरुषगामी और अन्धेर करने वाले और धोखा देने वाले और गाली देने वाले थे परन्तु तुम प्रभु यीशु के नाम से , हमारे परमेश्वर की आत्मा से , उसके रुधिर से धोए गए , पवित्र किए गए और धर्मी ठहरे । हम सब अपने गिरेबानों में झांकें तो हम सबका नाम तो उसी सूची में है , जिसमें हमारे लिए कोई आशा नहीं परन्तु जब हम प्रभु यीशु को स्वीकार करते हैं तो हम धोए जाते हैं , हम शुद्ध किए जाते हैं , हम पवित्र किए जाते हैं , हम धर्मी ठहरते हैं और हमारा नाम जीवन की पुस्तक में लिखा जाता है । हम प्रार्थना करें कि प्रभु , जब इस संसार से हमारा समय पूरा हो तो केवल एक ही प्रार्थना है , इतनी दया करना कि हमारा नाम तेरी जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ हो । क्योंकि मनुष्य यदि सारे जगत को प्राप्त करे और अपनी आत्मा की हानि उठाए तो उसे क्या लाभ ? परमेश्वर आपको आशीष दे।