समझदार , नासमझ और दुष्ट
सन्दर्भ:- नीतिवचन 9:7-9
इस संसार में बहुत से लोग हमारी ज़िन्दगियों में आते हैं । बहुत सी परिस्थितियों का हमें हर दिन सामना करना पड़ता है परन्तु हम मसीहियों को उनकी मसीहियत के आधार पर किन्हीं श्रेणियों में नहीं बांटते । हम यह मानते हैं कि कोई ऊंचा नहीं , कोई नीचा नहीं , कोई बड़ा नहीं , कोई छोटा नहीं; सब लोग बराबर हैं । श्रेणियों में लोगों को बांटना शायद अच्छी बात भी नहीं परन्तु यदि हम परमेश्वर के वचन के आधार पर देखें तो लोगों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है । यह वर्गीकरण सांसारिक बातों , सांसारिक मापदण्डों और परिभाषाओं से बिल्कुल भिन्न है । नीतिवचन में तीन श्रेणियों को व्यक्त किया गया है । जब हम इन तीन श्रेणियों को देखते हैं तो न सिर्फ़ इस बात पर ध्यान दें कि इनमें से किस श्रेणी के लोग हमारे जीवनों में आते हैं , किस श्रेणी के लोग हमारे परिवारों में हैं ? परन्तु इस बात पर भी ध्यान दें कि हम किस श्रेणी में पाए जाते हैं ? एक मसीही होने के नाते इन भिन्न-भिन्न लोगों के साथ हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए ? परमेश्वर का वचन तीन श्रेणियों में मनुष्यों को बांटता है - 1. समझदार 2. नासमझ या निर्बुद्धि 3. दुष्ट । पहली श्रेणी - समझदार समझदारों की श्रेणी की बात करें तो सांसारिक रूप से समझदार कौन कहलाएगा ? अगर छात्रों की बात करें तो कहा जाएगा कि जो बुद्धिमान है, जो परीक्षा में टॉप करता है , जो फ़र्स्ट डिवीजन में आता है, जिसका आई.क्यू. लेवल अधिक है, जो कॉम्पीटीटिव एग्ज़ाम्स में आगे निकल जाता है; वह समझदार है । संसार उनको समझदार कहेगा जिनमें बहुत सी योग्यताएं हैं और जिनके पास बहुत सी डिग्रीज़ हैं । परन्तु यदि वचन के आधार पर देखें तो जो लोग बुद्धिमान होते हैं, उनकी एक बड़ी सीधी-सरल सी पहचान है । उनकी समझदारी का मापदण्ड यह है कि जब उनका परमेश्वर के वचन से सामना होता है, जब उनका परमेश्वरत्व से सामना होता है तो वे उस वचन के आधार पर अपने आप को परिवर्तित कर लेते हैं । जब उन्हें परमेश्वर के वचन से चेतावनी मिलती है, जब वे परमेश्वर के वचन का अध्ययन करते हैं , तो उसके अनुसार अपने आपको ढालने की कोशिश करते हैं । वे अपनी ग़लतियों को देखते हैं एवं उन्हें स्वीकार करते हैं । इसीलिए हम कहते हैं कि परमेश्वर का वचन दर्पण के समान है । उसमें हमें हमारा वास्तविक चेहरा दिखाई देता है । सिर्फ़ शारीरिक रूप से ही नहीं परन्तु आत्मिक रूप से भी । जो व्यक्ति परमेश्वर के वचन को सुनता है, समझता है, जो व्यक्ति पश्चाताप करता है, अपनी ग़लतियों को सुधारता है तथा वचन के अनुसार अपने जीवन को ढालता है, उसे हम बुद्धिमान कहते हैं । नीतिवचन 9:8-9 में लिखा है - ठट्ठा करनेवाले को न डांट ऐसा न हो कि वह तुझ से बैर रखे, बुद्धिमान को डांट, वह तो तुझ से प्रेम रखेगा । बुद्धिमान को शिक्षा दे , वह अधिक बुद्धिमान होगा; धर्मी को चिता दे , वह अपनी विद्या बढ़ाएगा । मत्ती 7:24-25 में प्रभु यीशु बताते हैं कि बुद्धिमान कौन है और निर्बुद्धि कौन ? लिखा हुआ है - इसलिये जो कोई मेरी ये बातें सुनकर उन्हें मानता है वह उस बुद्धिमान मनुष्य की नाईं ठहरेगा जिस ने अपना घर चट्टान पर बनाया । और मेंह बरसा और बाढ़ें आईं, और आन्धियां चलीं, और उस घर पर टक्करें लगीं, परन्तु वह नहीं गिरा , क्योंकि उस की नेव चट्टान पर डाली गई थी । मानव होने के नाते हम सब कमज़ोर हैं । हम सभी में कुछ बुराइयां हैं । अच्छाइयों को तो सीखना पड़ता है, उनके लिए अभ्यास करना पड़ता है । उनके लिए जीवन को व्यवस्थित करना पड़ता है । उनके लिए हमें अपने आपको अनुशासित करना पड़ता है; परन्तु बुराई बहुत आसानी से हमारे मन में , हमारी ज़िन्दगियों में आ जाती है । यहां पर प्रभु यीशु कह रहे हैं कि जो वचन को सुनता है और उसको मानता है वह उस व्यक्ति के समान है जिसने अपना घर चट्टान के ऊपर बनाया; वह एक बुद्धिमान मनुष्य है । पुराने नियम में योना के तीसरे अध्याय में नीनवे नगर के लोगों के विषय में लिखा हुआ है । वहां के लोग सब प्रकार की बुराइयों में पड़े हुए थे, पाप बढ़ गया था । तब परमेश्वर ने उस नगर में योना को भेजा और योना 3:5 में लिखा है - तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा । वह नीनवे नगर, जहां अपराध था, जहां बुराई बढ़ गई थी, जहां के लोग परमेश्वर की दृष्टि से दूर चले गए थे, जो अन्धकार में जी रहे थे । जब उन्होंने योना नबी के द्वारा परमेश्वर की बातों को सुना तो सबने पश्चाताप किया, उन्होंने टाट ओढ़ा और परमेश्वर के वचन की प्रतीति की । इससे यह स्पष्ट होता है कि उस नगर के लोग बुद्धिमान थे । हम जक्कई के विषय में देखते हैं । वह एक भ्रष्ट व्यक्ति था परन्तु जब उसका आमना-सामना प्रभु यीशु मसीह से हुआ, जब प्रभु यीशु उसके घर और उसके हृदय में आते हैं, तो जक्कई के विषय में प्रभु यीशु का कथन है कि आज इस घर में उद्धार आया है । जक्कई का जीवन बदल गया, उसका व्यवहार बदल गया , उसने अपनी ग़लतियों को मान लिया , उसने जो भ्रष्टाचार किया था उसको सबके सामने स्वीकार कर लिया । अपने जीवन में हमारे लिए ऐसा करना बड़ा कठिन होता है । अक्सर हम अपनी ग़लती के लिए, अपनी कमज़ोरी के लिए दूसरे के ऊपर आसानी से उंगली उठाते हैं । परन्तु अपनी ग़लतियों को स्वीकार करना, अपनी कमियों को स्वीकार करना; यह बड़ा कठिन काम होता है । यहेजकेल 33:18-19 में लिखा है - जब धर्मी अपने धर्म से फिरकर कुटिल काम करने लगे । तब निश्चय वह उन में फंसा हुआ मर जाएगा । और जब दुष्ट अपनी दुष्टता से फिरकर न्याय और धर्म के काम करने लगे, तब वह उनके कारण जीवित रहेगा । जब व्यक्ति कुटिलता के काम और दुष्टता से फिरकर न्याय और धर्म के कामों की ओर जाएगा तो लिखा है कि तब वह उनके कारण जीवित रहेगा । इसलिए इस सन्दर्भ में हमारी क्या ज़िम्मेदारी है ? पहली बात - हम इस बात को पक्का कर लें कि क्या हम परमेश्वर की दृष्टि में बुद्धिमान हैं ? क्या हम उसने वचन को मात्र सुनने वाले भर हैं, उसके वचन को स्वीकार करने वाले लोग नहीं हैं ? या फिर हम ऐसे लोगों में हैं जो उसके वचन को सुनकर वास्तव में उस पर चलने का निरन्तर प्रयास करते हैं ? इसलिए ऐसे लोग जो हमारे इर्द-गिर्द आते हैं, उनके साथ सम्वाद करते रहना, उनके साथ बातचीत करते रहना, उनके साथ अच्छा उदाहरण बने रहना, उनको मसीही जीवन में आगे बढ़ने की चुनौती देना; मसीही होने के नाते हमारा यही काम होना चाहिए । यह हमारी प्रतिक्रिया होना चाहिए । यह हमारा कार्य होना चाहिए कि हम निरन्तर बुद्धिमान बनें और ऐसे लोग जो बुद्धिमान नहीं हैं, उनको बुद्धिमत्ता की बातें सिखाएं क्योंकि जब मूर्ख, अज्ञानी, अधर्मी व्यक्ति भी इन बातों को सुनकर परमेश्वर की ओर फिरता है तो वह परमेश्वर की ओर से जीवन पाता है । दूसरी श्रेणी - निर्बुद्धि व्यक्ति । हम में से हर एक के जीवन में परमेश्वर की एक योजना है परन्तु ऐसे लोग भी हैं जो कहीं न कहीं आपके लिए इस योजना को पूरा करने में रोड़ा बनते हैं । किसी भी कलीसिया में आप चले जाएं तो ऐसे व्यक्ति के बारे में बात होगी । किसी परिवार में चले जाएं तो वहां भी कोई न कोई व्यक्ति ऐसा ज़रूर होगा । किसी व्यक्ति से आप चर्चा कीजिए तो ऐसे व्यक्ति के विषय में बात ज़रूर होगी जो आपको निराश करता है , जिसने आपको चोट पहुंचाई है । जिसके साथ बातचीत करना भी आप ठीक नहीं समझते, जिसने आपके साथ अन्याय किया है , जिसने आपको पीड़ा पहुंचाई है । हमें इस बात को सीखना है कि हमें ऐसे लोगों के साथ कैसे व्यवहार करना है । ऐसे लोगों को हमें परमेश्वर की योजना पूरा करने में अपनी ज़िन्दगी में रोड़ा नहीं बनने देना है । तो निर्बुद्धि कौन है ? निर्बुद्धि वे लोग हो सकते हैं जो शायद संसार की दृष्टि में होशियार हों, जो अपने अध्ययन में टॉप करने वाले हों, जो बहुत योग्य हों, जिन्हें देखकर ऐसा लगता हो कि परमेश्वर ने किसी मिनिस्ट्री के लिए इनका अभिषेक किया है । हो सकता है ये लोग बहुत आकर्षक हों, उनमें योग्यताएं हों परन्तु ऐसे लोग भी निर्बुद्धि हो सकते हैं । टॉप करने वाले जीनियस लोग , बड़ी-बड़ी सेवाओं में चुने जाने वाले लोग, बड़ी-बड़ी डिग्री प्राप्त करने वाले लोग, दुनिया में जाकर प्रवचन सुनाने वाले लोग; परमेश्वर की दृष्टि में निर्बुद्धि हो सकते हैं! परमेश्वर की दृष्टि में निर्बुद्धि वे हैं जो सत्य को सुनकर स्वीकार नहीं करते । जो सत्य को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करते हैं । जो सत्य के विरोध में तर्क रखते हैं; जो सत्य को स्वीकार करने की ज़िम्मेदारी नहीं लेते हैं, जो बहाने बनाने वाले होते हैं, जो सत्य को प्रकाशित करने वालों पर उंगली उठाते हैं। ऐसे लोग आरोप लगाने वाले, दोषी ठहराने वाले, क्रोध से भरे हुए और पीठ पीछे बुराई करने वाले होते हैं । वे विभाजित करने वाले लोग होते हैं, वे कलीसिया में डाह और फूट डालने वाले लोग होते हैं । वे झूठे शिक्षक होते हैं, जो कलीसिया के लोगों को बहकाते हैं, जो परमेश्वर के नाम से झूठ बोलते हैं, जो प्रभु यीशु मसीह के नाम से आपको ग़लत दिशा में ले जाते हैं । ये लोग सांसारिक दृष्टि से कितने भी सफल क्यों न हों, या फिर वे कितने भी बड़े पद पर क्यों न हों; प्रत्येक वह व्यक्ति जो परमेश्वर के सत्य को सुनकर स्वीकार नहीं करता, वह परमेश्वर की दृष्टि में मूर्ख है । परमेश्वर की दृष्टि में वह निर्बुद्धि है । नीतिवचन 9:7 में लिखा है कि - जो ठट्ठा करनेवाले को शिक्षा देता है , सो अपमानित होता है , और जो दुष्ट जन को डांटता है वह कलंकित होता है । यूहन्ना 18:37-38 में लिखा है कि - पीलातुस ने उस से कहा, तो क्या तू राजा है ? यीशु ने उत्तर दिया, कि तू कहता है, क्योंकि मैं राजा हूं; मैंने इसलिये जन्म लिया , और इसलिये जगत में आया हूं कि सत्य पर गवाही दूं जो कोई सत्य का है, वह मेरा शब्द सुनता है । पीलातुस ने उस से कहा, सत्य क्या है ? इस सन्दर्भ में हम देखते हैं कि पीलातुस के सामने प्रभु यीशु की पेशी हो रही है । पीलातुस उस से बात कर रहा है , वह सब कुछ समझ रहा है, फिर भी वह प्रभु यीशु से पूछता है कि सत्य क्या है ? सत्य तो स्वयं उसके सामने खड़ा है , जिसने कहा सत्य मैं हूं, मार्ग मैं हूं, जीवन मैं हूं । सत्य की गवाही हो रही है, सत्य से आमना-सामना हो रहा है परन्तु सत्य को स्वीकार नहीं कर रहे हैं । हमारे साथ भी ऐसा ही होता है । बचपन से सत्य को सुनते हैं, सत्य हमारे सामने होता है, हम सत्य की निकटता में होते हैं परन्तु सत्य को हम स्वीकारते नहीं हैं । लूका 18:22-23 में धनी युवा प्रशासक की घटना का वर्णन है । लिखा हुआ है - यह सुन , यीशु ने उस से कहा , तुझ में अब भी एक बात की घटी है, अपना सब कुछ बेचकर कंगालों को बांट दे; और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा , और आकर मेरे पीछे हो ले । वह यह सुनकर बहुत उदास हुआ , क्योंकि वह बहुत धनी था । यह व्यक्ति धनवान था , युवा था , प्रशासक था और उसके हाथ में अधिकार था । इस प्रकार संसार की दृष्टि में तो वह बड़ा बुद्धिमान था , आदर के योग्य था परन्तु प्रभु यीशु की दृष्टि में वह मूर्ख था । मूर्ख किसान के दृष्टान्त में भी हम उस किसान का वर्णन पाते हैं , जो बहुत होशियार था । उसके खेत में अच्छी फसल हुई । वह फसल को बढ़ाना जानता था , वह अपने व्यापार को बढ़ाना जानता था । वह कहता है कि मैं और बड़े गोदाम बनाऊंगा और ज़्यादा अच्छी उपज पैदा होगी । मैं और धनवान हो जाऊंगा , मैं आराम से रहूंगा , चैन से रहूंगा । इस व्यक्ति ने अपनी ज़िन्दगी की तो तैयारी कर ली थी परन्तु मृत्यु की तैयारी नहीं की थी । तभी उसको आवाज़ आती है कि हे मूर्ख! आज ही रात को तेरा प्राण तुझसे ले लिया जाएगा । तब जो कुछ तूने इकट्ठा किया है , उसका क्या होगा ? वह व्यक्ति मूर्ख है जो सत्य को नहीं स्वीकारता । इसी से जुड़ी एक और बात है कि न सिर्फ़ सत्य को स्वीकार कर लेना परन्तु इस युवा के समान तटस्थ बने रहना । वह धनवान युवा प्रशासक प्रभु यीशु के पास से वापस चला गया और उसने अनन्त मृत्यु की ओर अपने कदम बढ़ा लिए । यहेजकेल 33:31-32 में लिखा है - वे प्रजा की नाईं तेरे पास आते और तेरे वचन सुनते हैं , परन्तु वे उन पर चलते नहीं; मुंह से तो वे बहुत प्रेम दिखाते हैं , परन्तु उनका मन लालच ही में लगा रहता है । और तू उनकी दृष्टि में प्रेम के मधुर गीत गानेवाले और अच्छे बजानेवाले का सा ठहरा है , क्योंकि वे तेरे वचन सुनते तो हैं , परन्तु उन पर चलते नहीं । ऐसे लोगों को सुनना बड़ा अच्छा लगता है । जो कहते हैं कि आपने बड़ा अच्छा सन्देश दिया परन्तु आपने और मैंने कितना अपने जीवन में उसे स्वीकार किया ? वे अपने आपको परमेश्वर की प्रजा तो कहते हैं , जो सुनते तो हैं , गाने-बजाने के समान उनको परमेश्वर का वचन लगता है परन्तु वे उस पर चलते नहीं हैं । 1 कुरिन्थियों 15:19 में लिखा है - यदि हम केवल इसी जीवन में आशा रखते हैं तो हम सब मनुष्यों से अधिक अभागे हैं । बात सिर्फ़ उस धनवान मूर्ख किसान की ही नहीं है वरन् बात इस तथ्य की भी है कि हमने मृत्यु की तैयारी नहीं की है । हमने ज़िन्दगी की तैयारी तो कर ली है , बच्चों की पढ़ाई की तैयारी तो कर ली है , अपने रिटायरमेन्ट की तैयारी कर ली है , अच्छी नौकरी ढूंढ़ ली है , हमें अच्छी सैलरी मिलती है , हम अच्छे पद पर पहुंच गए हैं; यह बहुत अच्छी बात है परन्तु परमेश्वर ने चाहे हमें किसी भी स्थान पर रखा हो; शासकीय सेवा हो या प्राइवेट , चाहे मिशन की सेवा हो , चाहे आप शिक्षक हों , चाहे आप डॉक्टर हों , परन्तु मसीही होने के नाते क्या आपने और मैंने अपनी मृत्यु की तैयारी की है या नहीं ? यदि हम इस संसार में रहते हुए मसीह से मात्र यह आशा रखते हैं कि हमें इस संसार में अच्छा स्वास्थ्य मिलेगा , बहुत सी आशीषें मिलेंगी परन्तु यदि हमने मृत्यु की तैयारी नहीं की तो हम मूर्ख हैं । इसीलिए परमेश्वर ने उस किसान से कहा कि हे मूर्ख! तेरा प्राण आज ही रात तुझसे ले लिया जाएगा । क्या किया जाए ऐसे लोगों के साथ ? कुछ मसीही मनोवैज्ञानिकों और विद्वानों ने इस विषय में सलाह दी है । उनका कहना है कि ऐसे लोग जो सुनते नहीं , जो ध्यान नहीं देते , जो निर्बुद्धि हो गए हैं , जो बार-बार बताने के बाद भी नहीं समझते; ऐसे लोगों के साथ हमें अपने सम्बन्धों को सीमित कर लेना है और उन्हें यह भी बता देना है कि वे परमेश्वर के साथ जिस प्रकार से चल रहे हैं और जब वे इसी संसार में आशीषें पाना चाहते हैं तो इसके क्या घातक परिणाम होंगे! अपने जीवन में हम सभी के कुछ लक्ष्य होते हैं । कुछ शॉर्ट टर्म गोल्स होते हैं कि आज हमें क्या करना है , इस सप्ताह में मुझे क्या करना है , अपने परिवार के लिए आने वाले माह में क्या करना है ? परन्तु हमारे जीवन का लाँग टर्म गोल क्या है ? क्या यह कि अनन्त के परिप्रेक्ष्य में हमारा नाम जीवन की पुस्तक में लिखा हो । जब हम इस संसार से जाएं तो हम स्वर्ग में जाएं , उस नरक की आग से बच जाएं । जो कुछ हम इस संसार में कर रहे हैं उसका परिणाम हमें वहां पर भुगतना पड़ेगा । परमेश्वर के न्याय का सामना हमें करना पड़ेगा । किसी विचारक ने बहुत अच्छी बात लिखी है कि लोग अगर यह समझ जाएं कि अनन्त मृत्यु की पीड़ा की तुलना में इस संसार में अपने आपको परिवर्तित करने की पीड़ा तो बहुत थोड़ी होगी । उस पीड़ा की तुलना में तो यह बहुत कम समय की होगी । इसीलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम ऐसे लोगों को समझाएं कि पश्चाताप नहीं तो क्षमा नहीं , क्षमा नहीं तो उद्धार नहीं , उद्धार नहीं तो अनन्त जीवन नहीं । तीसरी श्रेणी - दुष्ट लोग । ये दुष्ट लोग कौन हैं ? ऐसे लोग जिनका उद्देश्य विध्वंस करना और विनाश करना है । हम कितनी आतंकवादी घटनाओं के विषय में सुनते हैं! लोगों को पकड़कर उनके गले काट दिए जाते हैं । बमों से चर्च बिल्डिंग्स को उड़ा दिया जा रहा है , स्कूल्स में बम फोड़े जा रहे हैं , सिनेमा हॉल्स में विस्फोट हो रहे हैं , शॉपिंग सेन्टर्स में विस्फोट हो रहे हैं , स्कूल जाते बच्चों को मार डाला जा रहा है । जो टूरिस्ट कहीं घूमने गए उनको पकड़कर उनका गला काट दिया जा रहा है । इस से होना क्या है ? यह तो उनका दिमाग है जिनके दिमाग में विध्वंस है , विनाश है और दुष्टता भरी हुई है । 1 कुरिन्थियों 6:9-10 ऐसे लोगों की स्पष्ट परिभाषा बताता है । पौलुस लिखता है - ‘क्या तुम नहीं जानते’ । अक्सर जब आप अपने बच्चों को कोई आधारभूत बात समझाते हैं और वे समझते नहीं तो हम त्रस्त होकर कहते हैं कि क्या तुम नहीं समझते ? इतनी आधारभूत बात तुम नहीं समझते ? इसी प्रकार यहां पर पौलुस कहता है कि क्या तुम नहीं जानते कि अन्यायी लोग परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे । फिर वह कहता है कि धोखा न खाओ । अपने आपको धोखे में मत रखो , यह मत सोचो कि अन्यायी लोग परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे । इसके बाद वह एक सूची बताता है कि दुष्ट कौन है ? न वेश्यागामी , न मूर्तिपूजक , न परस्त्रीगामी , न लुच्चे , न पुरुषगामी , न चोर , न लोभी , न पियक्कड़ , न गाली देने वाले , न अन्धेर करने वाले; परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे । पौलुस स्पष्ट कहता है कि क्या तुम नहीं जानते ? धोखा न खाओ! ऐसे लोग परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे । इस श्रेणी में कहीं मैं और आप तो नहीं आते ? तीतुस 3:10-11 में लिखा है - किसी पाखण्डी को एक दो बार समझा बुझाकर उस से अलग रह । यह जानकर कि ऐसा मनुष्य भटक गया है , और अपने आप को दोषी ठहराकर पाप करता रहता है । नीतिवचन 14:32 में लिखा है - दुष्ट मनुष्य बुराई करता हुआ नाश हो जाता है , परन्तु धर्मी को मृत्यु के समय भी शरण मिलती है । इसीलिए लिखा हुआ है कि किसी धर्मी की मृत्यु परमेश्वर की दृष्टि में अनमोल है । भजन संहिता 1:4-6 में लिखा है - दुष्ट लोग ऐसे नहीं होते , वे उस भूसी के समान होते हैं , जो पवन से उड़ाई जाती है । इस कारण दुष्ट लोग अदालत में स्थिर न रह सकेंगे , और न पापी धर्मियों की मण्डली में ठहरेंगे; क्योंकि यहोवा धर्मियों का मार्ग जानता है , परन्तु दुष्टों का मार्ग नाश हो जाएगा । ऐसे लोग संसार में हैं , ऐसे लोग मसीही संस्थाओं में हैं , ऐसे लोग हमारी कलीसियाओं में हैं । हम भी ऐसे लोगों में हो सकते हैं ? हम अपने हृदय को टटोलें कि कहीं ऐसे हम ही तो नहीं हैं ? हमें ऐसे लोगों से बचना है , ऐसे लोगों से लोगों को बचाना है , और ऐसे लोगों को भी बचाना है । परमेश्वर ने हम में से हर एक के जीवन में एक योजना बनाई है और हमें इस संसार में रहते हुए बुद्धिमानों का , निर्बुद्धि का और दुष्टों का सामना करना है । इफिसियों 5:15-17 में लिखा है - इसलिए ध्यान से देखो , कि कैसी चाल चलते हो; निर्बुद्धियों की नाईं नहीं पर बुद्धिमानों की नाईं चलो । और अवसर को बहुमोल समझो , क्योंकि दिन बुरे हैं । इस कारण निर्बुद्धि न हो , पर ध्यान से समझो , कि प्रभु की इच्छा क्या है ? इन बातों का निष्कर्ष यह है कि दिन बुरे हैं , दिन थोड़े हैं , दिन सीमित किए गए हैं । इसलिए निर्बुद्धियों की नाईं नहीं परन्तु बुद्धिमानों की नाईं चलो । अवसर को बहुमूल्य समझो । आज का जो यह समय है , जो यह अवसर आराधना का है , वह बहुत बहुमूल्य है । प्रभु यीशु हमें बुला रहा है । वह हमें अवसर दे रहा है । चाहे हम निर्बुद्धि हों , चाहे हमने अब तक वचन को स्वीकार न किया हो और चाहे हम दुष्टों की श्रेणी में आते हों। अंग्रेज़ी की एक बहुत प्रसिद्ध पुस्तक है , जिसका नाम ‘बर्निंग हार्ट्स’ है । इस पुस्तक में एक सच्ची घटना का वर्णन है । एक युवा आतंकवादी था , लम्बा कद , हट्टा-कट्टा । उसने बहुत हाई लेवल की ट्रेनिंग ली थी । चाहे समुद्र में फेंक दिया जाए , चाहे हवाई जहाज़ से फेंक दिया जाए , वह अपने आपको बचा सकता था । उसने बहुत से कैम्प्स में शिक्षा प्राप्त की थी । जिस आतंकवादी संगठन से वह जुड़ा था उसने उसे इंग्लैण्ड की एक रेल में जो फ्रांस से होकर गुज़रती थी , विस्फोट करने के लिए भेजा । उसके पास जो विस्फोटक सामग्री थी वह आसानी से डिटेक्ट नहीं हो सकती थी । वह उस ट्रेन को उड़ाने के मकसद से उसमें बैठ गया , अगले स्स्टेशन पर उसे उतरना था । ट्रेन चली जा रही थी , लोग ट्रेन में बैठे हुए थे और यह आतंकवादी भी वहां था। अचानक से उसके बाजू में बैठे वृद्ध आदमी को हार्ट अटैक आया । उसका सिर इस आतंकवादी की गोद में आ गया । उस वृद्ध के शरीर से पसीना बह रहा था । नाक से खून निकल रहा था । ट्रेन में बैठे डॉक्टर और नर्सेस उठकर उस वृद्ध आदमी के पास आ गईं और वे लोग उसको बचाने की कोशिश करने लगे । किसी डॉक्टर्स के पास कोई उपकरण था जिससे वह उसको बचाने की कोशिश कर रहा था , कोई उसे कृत्रिम श्वास दे रहा था , कोई उसके सीने का मसाज कर रहा था । करीब 15-20 लोग लग गए और जैसे-तैसे उस बुजुर्ग को बचा लिया गया । इस सब में करीब आधा घण्टा लगा । ट्रेन रुकने में अभी 10 मिनिट का समय बाकी था। उस वृद्ध ने अपना सिर इस आतंकवादी के कन्धे पर टिका लिया , वह गहरी सांसें ले रहा था । तब उस आतंकवादी ने निर्णय किया कि मैं इतने लोगों को नहीं मारूंगा , भले ही मैं अपने मिशन में असफल हो जाऊं परन्तु मैं इस ट्रेन में विस्फोट नहीं करूंगा । कुछ समय के बाद कहीं पर एक इन्टरव्यू के दौरान उससे पूछा गया कि ऐसी कौन सी बात थी जिसने तुम्हारे निर्णय को बदल दिया ? जवाब में जो कुछ उसने कहा , उसका अनुवाद कुछ इस प्रकार है । इस युवा आतंकवादी ने कहा - जहां घृणा का प्रेम से सामना होता है , वहां प्रेम की जीत होती है और घृणा हार जाती है । जहां क्रोध का दया से सामना होता है , वहां दया की जीत होती है और क्रोध पराजित हो जाता है । जहां प्रतिशोध का क्षमा से सामना होता है , वहां क्षमा की जीत होती है और प्रतिशोध हार जाता है । जहां विद्वेष का अपनत्व से सामना होता है , वहां अपनत्व की जीत होती है और विद्वेष हार जाता है । जहां आक्रोश का आशीष से सामना होता है , वहां आशीष की जीत होती है और आक्रोश हार जाता है । और जहां मौत का ज़िन्दगी के स्रोत से सामना होता है , वहां मौत हार जाती है । उस ज़िन्दगी और मौत के परिप्रेक्ष्य में मैंने जब खुद को देखा तो ज़िन्दगी का अर्थ समझ गया और मैंने मौत की राह छोड़ दी , विध्वंस की राह छोड़ दी और जीवन की राह को मैंने पहचान लिया । मुझे यह तो नहीं मालूम कि वह युवा मसीही हुआ कि नहीं! परन्तु मैं अपने आप से और आप से प्रश्न करता हूं कि क्या हमारा क्रूस से सामना हुआ है ? क्या हमारा वास्तव में प्रभु यीशु मसीह से सामना हुआ है ? हमारे हृदय में क्रोध है, हमारे हृदय में विद्वेष है , हमारे हृदय में जलन है , हमारे हृदय में कटुता है , हमारे हृदय में घृणा है । क्या इनको लेकर हम क़ब्र में जाएंगे ? हम अपने आप को मसीही तो कहते हैं लेकिन क्या हमारा प्रभु यीशु से सामना हुआ है ? उसके क्रूस के मर्म को हमने समझा है ? क्या उसके क्रूस के बलिदान के सामने हमने अपने जीवन को रखा है ? क्या उसके प्रेम के सामने हमने अपने जीवन के हठ , कुकर्म , अधार्मिकता , अपने जीवन के निकम्मेपन और लालच को; प्रभु यीशु के त्याग के सामने कभी हमने नापा है ? कभी तौला है ? यदि मेरा और आपका उस प्रभु यीशु के क्रूस से सामना हुआ है और अभी तक हमारी जीत हुई है और उस क्रूस की हार हमारे जीवन में हुई है तो हमें सोचना है! सबसे अच्छी बात यह है कि हमारी मृत्यु के पूर्व अथवा प्रभु यीशु के दूसरे आगमन के पूर्व; चाहे निर्बुद्धि हों , चाहे दुष्ट हों , हर एक के लिए अवसर है । एक डाकू के लिए भी अवसर है , एक व्यभिचारिणी के लिए भी अवसर है । अगर हमारा हृदय सही स्थान पर न हो तो आज हमारा सामना क्रूस से हो सकता है और अगर हमारा हृदय सही स्थान पर है तो काश! हम दूसरों को बता सकें कि एक तरफ ज़िन्दगी है और एक तरफ मौत! एक ओर विनाश है और दूसरी तरफ अनन्त जीवन! निर्णय आपके हाथ में है । परमेश्वर आपको आशीष दे।