प्रार्थना की प्राथमिकता
सन्दर्भ:- मत्ती 6:5-8; लूका 18:9-14
जब प्रार्थना की बात होती है तो अभी भी मैं बहुत बातें नहीं समझ पाता । प्रार्थना का विषय इतना वृहद और गहरा है कि मैं सब बातें समझ नहीं पाता । बहुत से प्रश्न दिमाग में आते हैं । प्रार्थना करने की आवश्यकता क्यों है ? बाइबिल में तो लिखा है कि तुम्हारे मांगने से पहले ही वह जानता है कि तुम्हें किन बातों की आवश्यकता है ? तो फिर प्रार्थना की आवश्यकता क्या है ? कई बार मैं इस बात पर विचार करता हूं और चिन्तन करता हूं । प्रार्थना के विषय में जो कुछ अध्ययन मैंने किया है और जितना चिन्तन मैंने किया है , उसी के आधार पर कुछ बातें हम सभी के लिए रखना चाहूंगा । पहली बात , जब हम प्रार्थना करते हैं तो यह इस बात को दर्शाता है कि हमारी निर्भरता किस पर है ? हम याचना उसी से करते हैं जिस पर हमारी निर्भरता होती है । जो शक्तिशाली होता है । जो कुछ देने की क्षमता रखता है और सबसे बढ़कर जो बात होती है वह यह कि जिस पर हमारा विश्वास होता है । हम उस से याचना और प्रार्थना नहीं करते जिस पर हमारा विश्वास न हो , जो कमज़ोर हो , जिस से कुछ मिलने की अपेक्षा न हो । परन्तु हम उसी से प्रार्थना करते हैं जो सर्वशक्तिमान हो । जब हम प्रार्थना करते हैं तो निश्चित रूप से हमें इस बात का अहसास भी होता है कि हम कमज़ोर हैं , हमारी अपनी सीमाएं हैं , हमारे जीवन में बहुत सी कमज़ोरियां हैं । हमारे जीवन में बहुत सी बुराइयां हैं , भले ऊपर से वे न दिखें । हमारे व्यवहार में बहुत सी कमियां हैं । हमें परमेश्वर की आवश्यकता है । जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं तो हमारी निर्भरता उस पर प्रदर्शित होती है । तब परमेश्वर यह देखता है कि हां , इसकी निर्भरता मुझ पर है । आप कल्पना कीजिए कि यदि आपका बच्चा भूखा हो , यदि उसे किसी चीज़ की आवश्यकता हो, या आपकी पत्नी को किसी चीज़ की आवश्यकता हो और देने में सक्षम हों और वह जाकर पड़ोस के किसी व्यक्ति से उस बात चीज़ को मांगे तो आपको कैसा लगेगा ? आपके पास क्षमता है , आप दे सकते हैं , आपके पड़ोसी से कहीं ज़्यादा क्षमता आपके पास है और उसके बाद भी यदि आपका बच्चा या आपकी पत्नी जाकर उस से याचना करें तो आपको तकलीफ तो होगी । जब हम अपने स्रोतों पर भरोसा करते हैं, अपनी ताकत पर भरोसा करते हैं, अपने धन और अपने राजनैतिक मित्रों पर भरोसा करते हैं, तब परमेश्वर पर हमारा भरोसा प्राथमिक नहीं रह जाता । परमेश्वर जिसके पास सब कुछ है, जो सर्वशक्तिमान है, जिसने हमें बनाया है, जो हमसे कहता है कि मांगो तो तुम्हें दिया जाएगा । सहज कल्पना की जा सकती है कि उसे कैसा लगता होगा ? क्योंकि हम उस से नहीं मांगते हैं, क्योंकि हम अपनी निर्भरता उस पर प्रदर्शित नहीं करते हैं । इसलिए यह बात बड़ी स्पष्ट है कि जब हम परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं तो यह प्रदर्शित होता है कि हमारी निर्भरता उस पर है, वह देख सकता है कि वह हमारा स्वामी है और हम विश्वास करते हैं कि उसके पास सब कुछ है । अतः जब हम प्रार्थना करते हैं तो यह इस बात को दर्शाता है कि हमारी निर्भरता किस पर है । दूसरी बात , यह परमेश्वर की अपेक्षा है कि हम उस से मांगें । जब हमारे बच्चे उम्र में बढ़ते हैं और वे अपने जीवन में कुछ निर्णय लेना चाहते हैं तो हमारी अपेक्षा होती है कि वे हमसे बात करें क्योंकि आप उसके पिता हैं । आप चाहते हैं कि आप उन्हें बताएं कि उन्हें किस रास्ते पर जाना है , कौन से विषय लेना है , किस क्षेत्र में आगे बढ़ना है । जब प्रभु यीशु ने अपने चेलों को प्रार्थना करना सिखाया तो उस ने कहा कि प्रार्थना में यह कहो कि हमारे दिन भर की रोटी तू आज हमें दे । इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर हमसे अपेक्षा करता है कि हम उस से मांगें । परमेश्वर की यह अपेक्षा है कि हम उसकी निकटता में जाएं । बहुत बार हमें मिलता नहीं क्योंकि हम मांगते नहीं । अगर मैं आपसे कहूं कि ऐसी पांच बातों की लिस्ट बनाएं जिनकी आपको आवश्यकता है । हो सकता है आपको आवश्यकता हो बेहतर भौतिक वस्तुओं की । हो सकता है आपको आवश्यकता हो कि अपने जीवन-साथी से आपके जो सम्बन्ध अच्छे नहीं हैं वे ठीक हो सकें । हो सकता है कि आपको आवश्यकता हो कि आपके जीवन में जो एक बुरी आदत है , जिसके कारण आपको मानसिक रूप से तनाव होता है , वह दूर हो । बहुत सी आवश्यकता हो सकती हैं । अनुचित व्यवहार , जल्दी क्रोध आ जाना , बुरे विचार , ग़लत भावनाएं ; बहुत सी समस्याएं हो सकती हैं । मानव होने के नाते हम इनसे अछूते नहीं हैं । यदि हम से हमारे जीवन की पांच प्राथमिक आवश्यकताओं की सूची बनाने को कहा जाए ; चाहे वे शारीरिक हों , मानसिक हों या आत्मिक! विचार करिए कि उस लिस्ट में कितनी ऐसी बातें हैं जिनके लिए आपने परमेश्वर से मांगा है ? शायद पहली बात यही होगी कि उस बात को लेकर हम परमेश्वर के पास नहीं गए । हमें मालूम है कि आवश्यकता तो है पर हमने परमेश्वर से मांगा नहीं । परमेश्वर का वचन कहता है कि मांगो तो तुम्हें दिया जाएगा , ढूंढोगे तो पाओगे । बात यही है कि न सिर्फ़ हमें मांगना है बल्कि ढूंढना भी है , प्रयास भी करना है । प्रार्थना करके आलसी होकर पड़े नहीं रह जाना है । प्लेट में खाना रखा हो और हम प्रार्थना करके कहें कि हमारा पेट भर जाए , तो ऐसा सम्भव नहीं है । हम प्रार्थना करें परीक्षा में सफल होने के लिए और पढ़ाई न करें तो फिर कुछ होने वाला नहीं है । इसीलिए परमेश्वर का वचन कहता है कि मांगो तो तुम्हें दिया जाएगा, ढूंढोगे तो पाओगे । हमें ढूंढना है , परिश्रम भी करना है । प्रार्थना के साथ जो बात अनिवार्य है वह परिश्रम की है । मात्र प्रार्थना करने से कुछ नहीं होगा । क्या हम प्रार्थना का उत्तर स्वयं बनने के लिए तैयार हैं ? इसके बाद वचन में लिखा हुआ है कि खटखटाओ तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा । कभी-कभी हमें बार-बार याचना करनी पड़ती है । हम खटखटाते कब हैं ? जब हमें लगता है कि हमारी मांग सुनी नहीं जा रही है । जब हम किसी के घर जाते हैं तो जाकर दरवाज़ा भड़भड़ाने नहीं लगते बल्कि आवाज़ देते हैं , कालबेल दबाते हैं , आहिस्ता से दरवाज़ा खटखटाते हैं । प्रभु यीशु ने अपने एक दृष्टान्त में एक व्यक्ति का वर्णन किया जो अपने पड़ोसी के घर रात में उस से रोटी मांगने जाता है । वह पड़ोसी का दरवाज़ा खटखटाता है , बार-बार मांगता है । जब वह बार-बार याचना करता है तो फिर उसका पड़ोसी उठता है और उसकी मदद करता है । इसलिए हमें निरन्तर प्रार्थना करते रहना है । मेरे विचार से सबसे बड़ी शक्ति जो हमारे पास है वह प्रार्थना की शक्ति है । हमारी जीवनों में हमें प्रार्थना को प्राथमिकता देना है । अपने परिवारों में जब हम अपने बच्चों के साथ प्रार्थना में समय बिताते हैं तो वास्तव में हम उन्हें यह सिखाते हैं कि हम तो तुम्हारे माता-पिता हैं परन्तु हम हमेशा तुम्हारे साथ नहीं हैं । तुम्हारा जो वास्तविक पिता है वह स्वर्ग में है , उसी पर निर्भर होना है , उसी पर विश्वास रखना है , उसी से मांगना है , उसी से आशा करना है । प्रार्थना के द्वारा हमारी निर्भरता परमेश्वर पर प्रकट होती है और परमेश्वर की भी हमसे यही अपेक्षा है कि हम उस से प्रार्थना के माध्यम से निवेदन करें परन्तु प्रार्थना के विषय में कुछ और बातें भी हैं जिनके बारे में हमें सतर्क रहना है । ये वे बातें हैं जिनका ध्यान हमें प्रार्थना करते समय रखना है । इस सम्बन्ध में कुछ बातों को हम देखेंगे । पहली बात , कभी दूसरों को प्रभावित करने के लिए हमें प्रार्थना नहीं करना है । अक्सर जब हम बहुत से लोगों के बीच में होते हैं , चाहे वह किसी के जन्म दिवस का अवसर हो , किसी की मृत्यु का अवसर हो या फिर किसी को सम्मानित करने का अवसर हो । ऐसे समय में जब हम प्रार्थना करते हैं तो अक्सर ऐसा लगता है कि जैसे हम प्रार्थना में उस व्यक्ति के जीवन का परिचय दे रहे हैं , उस व्यक्ति या उसके परिवार के लोगों को सुनाने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं । यह बात बिल्कुल ग़लत है । प्रार्थना परमेश्वर से हमारा सीधा वार्तालाप है और जब हम समूह में प्रार्थना करते हैं तो हम समूह के सभी लोगों की भावनाओं का , उनकी याचनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं , उनको प्रभावित करने के लिए प्रार्थना नहीं करते। मत्ती 6:5 में लिखा है - जब तू प्रार्थना करे , तो कपटियों के समान न हो क्योंकि लोगों को दिखाने के लिए सभाओं में और सड़कों के मोड़ों पर खड़े होकर प्रार्थना करना उनको अच्छा लगता है ; मैं तुमसे सच कहता हूं कि वे अपना पूरा प्रतिफल पा चुके । हम इसलिए प्रार्थना न करें कि लोग हम से कहें कि आपने बहुत अच्छी प्रार्थना की , आपने हर एक का नाम लिया , आपने अपनी प्रार्थना के द्वारा दूसरों को प्रोत्साहित किया । प्रार्थना का उद्देश्य यह नहीं होता । लूका 20:47 में लिखा है - वे विधवाओं के घर खा जाते हैं , और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हैं : ये बहुत ही दण्ड पाएंगे । जो लोग दिखाने के लिए लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएं करते हैं उन्हें अधिक दण्ड मिलेगा । इसलिए सीधी स्पष्ट सी बात यह है कि जब हम प्रार्थना करते हैं तो हम परमेश्वर से बातचीत करते हैं इसलिए हमारा सारा ध्यान , हमारे विचारों का केन्द्र परमेश्वर होना चाहिए । व्यक्ति को प्रभावित करने के लिए , समूह को प्रभावित करने के लिए प्रार्थना करना निरर्थक है और ऐसी प्रार्थना का कोई परिणाम नहीं मिलता । इस बात से हमें बचना है कि दूसरों को प्रभावित करने के लिए हमें प्रार्थना नहीं करना है । दूसरी बात , अपनी प्रार्थना में हमें परम्परागत शब्दावली का दोहराव नहीं करना है । कई ऐसे शब्द होते हैं जिन्हें हम बार-बार सुनते हैं , जिन्हें हम बार-बार दोहराते हैं परन्तु उन बातों का वास्तव में कोई अर्थ नहीं होता । मत्ती 6:7-8 में लिखा है - प्रार्थना करते समय अन्यजातियों की नाईं बक बक न करो ; क्योंकि वे समझते हैं कि उनके बहुत बोलने से उन की सुनी जाएगी । सो तुम उन की नाईं न बनो , क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हारे मांगने से पहिले ही जानता है , कि तुम्हारी क्या-क्या आवश्यकता है । प्रभु यीशु कहते हैं कि जब हम प्रार्थना करें तो अर्थहीन बातें न दोहराएं क्योंकि ऐसा करने वाले सोचते हैं कि उनके अधिक बोलने से उनकी सुनी जाएगी । इसलिए उनके सदृश्य न बनना क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हारे मांगने से पूर्व तुम्हारी आवश्यकता को जानता है । कई बार हम सोचते हैं कि हमारे बहुत बोलने से हमारी सुनी जाएगी परन्तु एक ही प्रकार की बातों का दोहराव करना और अनावश्यक लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएं करना उचित नहीं है । तीसरी बात , निरन्तर प्रार्थना करने से हमें निराश नहीं होना है । हमें निरन्तर प्रार्थना करते रहना है , जैसा कि बाइबिल में लिखा है कि ढूंढना है , खटखटाना है और मांगना है । हम निरन्तर परमेश्वर से याचना करते रहें । निरन्तर हमारा हृदय शुद्धता से उससे याचना करता रहे क्योंकि यह परमेश्वर को भाता है । इसलिए बहुत जल्दी हमें प्रार्थना से निराश नहीं होना है । अक्सर हम कहते हैं कि अरे! हमने इसके लिए प्रार्थना की थी परन्तु कुछ हुआ नहीं और हम निराश हो जाते हैं । परमेश्वर के समय और हमारे समय में अन्तर होता है । हम जैसा उत्तर चाहते हैं वैसा उत्तर परमेश्वर हमें नहीं देता । परमेश्वर के उत्तर देने का तरीका भिन्न होता है । वह भविष्य जानता है और वह जानता है कि हमारे लिए भला क्या है। इसलिए यदि हम प्रार्थना करके यह अपेक्षा करें कि जैसा उत्तर हम चाह रहे हैं वैसा ही उत्तर परमेश्वर हमें दे तो यह सम्भव नहीं । परमेश्वर जादू की पुड़िया या अलादीन का चिराग नहीं है । हमारी और परमेश्वर की सोच में बहुत बड़ा अन्तर है । परमेश्वर हमारे लिए क्या सर्वोत्कृष्ट है , इसे जानता है और अपने समय के अनुसार तथा अपने तरीके से वह हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देता है । हम कभी-कभी जैसा उत्तर चाहते हैं जब वैसा उत्तर नहीं मिलता तो हम निराश हो जाते हैं परन्तु अपनी प्रार्थनाओं को करते समय हमें निराश नहीं होना है । निरन्तर प्रयास करना है , खटखटाते रहना है । चौथी बात , हमें इस भावना से प्रार्थना नहीं करना है कि हम बहुत धार्मिक व्यक्ति हैं । स्वधार्मिकता के भाव से हमें प्रार्थना नहीं करना है । लूका रचित सुसमाचार के 18 वें अध्याय में फरीसी और कर वसूलने वाले की प्रार्थना का वर्णन है । लिखा है - और उस ने कितनों से जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे , कि हम धर्मी हैं , और औरों को तुच्छ जानते थे , यह दृष्टान्त कहा । कि दो मनुष्य मन्दिर में प्रार्थना करने के लिये गए ; एक फरीसी था और दूसरा चुंगी लेनेवाला । फरीसी खड़ा होकर अपने मन में यों प्रार्थना करने लगा , कि हे परमेश्वर , मैं तेरा धन्यवाद करता हूं , कि मैं और मनुष्यों की नाईं अन्धेर करनेवाला , अन्यायी और व्यभिचारी नहीं , और न इस चुंगी लेनेवाले के समान हूं । मैं सप्ताह में दो बार उपवास करता हूं ; मैं अपनी सब कमाई का दसवां अंश भी देता हूं । परन्तु चुंगी लेनेवाले ने दूर खड़े होकर , स्वर्ग की ओर आंख उठाना भी न चाहा , बरन अपनी छाती पीट-पीटकर कहा ; हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर । प्रभु यीशु ने कहा कि उस फरीसी की नहीं वरन् इस चुंगी लेने वाले की प्रार्थना सुनी गई क्योंकि उसने अपने पापों का अहसास किया । उसने स्वधार्मिकता से भरकर प्रार्थना नहीं की । जब हम परमेश्वर के सामने खड़े होते हैं तो हम इस बात का अहसास होना चाहिए कि हम कुछ भी नहीं हैं। हम परमेश्वर के सामने यदि अपनी धार्मिकता का ढिंढ़ोरा पीटेंगे , या परमेश्वर के सामने यह सोचकर खड़े होंगे कि हम तो परमेश्वर के सेवक हैं । हमने बड़े-बड़े काम किए हैं । हमें परमेश्वर के वचन का ज्ञान है तो परमेश्वर हमारी प्रार्थना नहीं परमेश्वर सुनेगा । कुछ लोग जब प्रार्थना करते हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे वे परमेश्वर को डांट रहे हों , या परमेश्वर से अधिकार से मांग रहे हों । कभी किसी की प्रार्थना को सुनकर ऐसा लगता है जैसे हम परमेश्वर को बता रहे हैं कि ऐसी-ऐसी समस्या है और तुझे इस समस्या को सुलझाने के लिए ऐसा करना है। जब हम परमेश्वर के सामने खड़े हों तो विनम्रता के भाव से अपने आपको खाली करते हुए , शून्यता के भाव से उससे प्रार्थना करें । इस भाव से प्रार्थना करें कि हम पापी हैं और परमेश्वर के अनुग्रह के कारण हम पर दया हुई है । उसके अनुग्रह के कारण हमारा उद्धार हुआ है । जो कुछ किया है उसने किया है , अपने पुत्र का बलिदान उसने मेरे और आपके खातिर किया है । हमारी क्या हस्ती , हमारी क्या औक़ात है ! जब हम उसके सामने खड़े हों तो शून्यता से , विनम्रता से , दरिद्रता के भाव से उसके सामने प्रार्थना करें । हम ध्यान रखें कि हमारी प्रार्थना इस बात को दर्शाती है कि हमारी निर्भरता किस पर है । परमेश्वर की हमसे यह अपेक्षा है कि हम उस से मांगें । साथ ही साथ हम सतर्क रहें कि हमें दूसरों को प्रभावित करने के लिए प्रार्थना नहीं करना है । हमें अपनी प्रार्थना में परम्परागत शब्दावली का दोहराव नहीं करना है । प्रार्थना करने में हमें निराश नहीं होना है और स्वधार्मिकता के भाव से भरकर प्रार्थना नहीं करना है बल्कि दीनता और नम्रता के साथ , सम्पूर्ण समर्पण के साथ परमेश्वर के पास आना है । परमेश्वर आपको आशीष दे।