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समर्पण की तीन शर्तें

समर्पण की तीन शर्तें

सन्दर्भ:- 1 कुरिन्थियों 9:24-27

मसीह के लिए जीवन जीना आसान नहीं है । यह जीवन हमेशा आनन्द और उत्साह का नहीं वरन् वास्तव में अवरोधों और विषमताओं से जूझने का जीवन है । यह जीवन पहाड़ों से टकराने का भी जीवन है । यह जीवन शद्रक , मेशक और अबेद-नगो के समान आग के भट्ठे में डाले जाने और दाऊद और यूसुफ के समान विषमताओं से गुज़रने का भी है । अपने मित्रों , प्रियों के विश्वासघात से होकर गुज़रने का भी है ।

प्रभु यीशु मसीह की राह भी आसान नहीं थी । वह जब इस संसार में आया तो एक सरल , सामान्य , आनन्द और उत्साह से भरे हुए जीवन से होकर नहीं गुज़रा । वह भूखा और प्यासा हुआ । उसे लोगों ने धोखा दिया , उससे विश्वासघात किया । लोगों ने उसके मुंह पर थूका । उसको नग्न कर दिया , उसका अपमान किया , उसको कोड़े मारे यहां तक कि एक हत्यारे की नाईं उसको क्रूस पर चढ़ा दिया । उसके साथ कचहरियों में अन्याय हुआ। उसके साथ राजाओं ने कपट किया । एक गुलाम की तरह उसको बेच दिया गया जिसकी क़ीमत तीस चांदी के सिक्के होती थी । प्रभु यीशु मसीह कहता है - कोई भी सेवक अपने मालिक से बढ़कर नहीं होता । यदि तुम मुझ में होकर जीवन जीना चाहते हो तो तुम्हें सताव सहना होगा । तुम्हारे जीवन में कलवरी की राह आएगी , कांटों के ताज की चुभन का अहसास होगा और उस पीड़ा से तुम्हें गुज़रना पड़ेगा ।

फिलिप्पियों की पत्री में एक बात लिखी है कि हमारा व्यवहार प्रभु यीशु मसीह के समान होना चाहिए जो हमारे लिए स्वर्ग का सिंहासन छोड़कर आ गया । जिसने अपने आपको शून्य कर लिया । जिसने अपने आपको दीन कर लिया । जो राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु है वह इस संसार में आया और उसने अपने चेलों के गन्दे पैरों को धोया । स्वर्ग जिसका सिंहासन और पृथ्वी जिसकी चौकी है , उसको काठ के क्रूस पर ठोंक दिया गया ।

प्रभु के समान ऐसा जीवन जीना कठिन होता है परन्तु अन्त में हमें बहुत से पुरस्कार प्राप्त होते हैं । यीशु के द्वारा हम परमेश्वर के विशिष्ट लोग हो जाते हैं । हम उसकी अपनी प्रजा हो जाते हैं , उसके परिवार के सदस्य हो जाते हैं । परमेश्वर तक हमारी सीधी पहुंच हो जाती है । अब मृत्यु का कोई भय नहीं रह जाता । मृत्यु के बाद के लिए निश्चितता मिलती है कि हम अनन्त को प्राप्त करेंगे । प्रभु यीशु मसीह ने अपने हाथों से हमारे लिये वह भवन तैयार किया है , जिसकी हमें आशा है । परन्तु जीवन में जो कुछ बहुमूल्य होता है , उसकी एक क़ीमत चुकानी पड़ती है ।

मैं यही कहना चाहता हूं कि अगर प्रभु यीशु मसीह के पीछे आपको चलना है तो आपको भी वह क़ीमत चुकानी होगी । आपको अपने सम्पूर्ण जीवन का बलिदान करना होगा । प्रभु यीशु मसीह कहता है - जो हल पर हाथ रखकर पीछे मुड़कर देखता है , वह मेरे योग्य नहीं । जो संसार में मुझसे बढ़कर किसी और को प्रिय जानता है , वह मेरे योग्य नहीं । जो अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे नहीं चल सकता , वह मेरे योग्य नहीं ।

पौलुस लिखता है कि मैं भी अपनी देह को मारता , कूटता और वश में लाता हूं कि ऐसा न हो कि हज़ारों के बीच में प्रचार करने के बाद मैं उस पुरस्कार को खो दूं । उस अनन्त जीवन को खो दूं , जो परमेश्वर ने मेरे लिये ठहराया है । पौलुस प्रेरित जैसे सन्त के लिए भी यह ज़रूरी था कि वह अपनी देह को मारे , कूटे और वश में लाए । अतः प्रभु यीशु के पीछे चलने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए तीन बातों को अपने जीवन में हमें लाना होगा ।

1. प्रभु यीशु के पीछे चलने और अनन्त जीवन को पाने के लिए हमें अपने शरीर को प्रभु यीशु मसीह को समर्पित करना पड़ेगा ।

हम मनुष्य हैं , हमारे जीवन में कामनाएं होती हैं , लालसाएं और इच्छाएं होती हैं । आज की सदी का एक प्रचलित कथन है: if it feels good then do it. अगर कोई बात हमारे शरीर को सुखद अनुभूति देती है , तो उसको हमें करना है । परन्तु प्रभु यीशु के रास्ते पर चलते हुए ऐसा सम्भव नहीं हो सकता कि हम अपनी शारीरिक संतृप्ति भी करते जाएं , ग़लत कार्य भी करते जाएं और सोचें कि प्रभु यीशु तो हमें क्षमा कर देगा । वचन में लिखा है कि बार-बार चिताये जाने के बाद भी यदि हम पाप में बने रहते हैं , हम पाप करते जाते हैं , तो फिर पापों के लिए कोई बलिदान बाकी नहीं । फिर हमारे लिये केवल नरक की मृत्यु और अनन्त की आग रहती है । परमेश्वर ने आदम और हव्वा को बनाया था । एक खूबसूरत वाटिका परमेश्वर ने बनाई थी । सब कुछ अच्छा था , सब कुछ परिपूर्ण , सुखद , खूबसूरत और सिद्ध था । तब फिर हम पाते हैं कि वहां कुछ हुआ । शैतान वहां अपना कार्य करता है , जैसे वह आज भी हमारे जीवनों में करता है । वह हव्वा को बहका देता है और उत्पत्ति की पुस्तक 3:6 में लिखा है - "सो जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा , और देखने में मनभाऊ , और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है , तब उस ने उस में से तोड़कर खाया और अपने पति को भी दिया , और उसने भी खाया ।"

हव्वा ने देखा कि फल दिखने में बड़ा आकर्षक है तथा खाने में बड़ा अच्छा और मनभाऊ है । कितनी बार पाप हमें इसी प्रकार से आकर्षित करता है । हम में शारीरिक लालसाएं होती हैं , विशेषकर युवाओं के जीवन में ये परीक्षाएं आती हैं । प्रेम की बात तो की जाती है परन्तु वास्तव में यह प्रेम नहीं बल्कि शारीरिक आकर्षण और शरीर की लालसाओं को पूरा करने की इच्छा होती है । इस प्रकार हव्वा के समान हम भी पाप में पड़ जाते हैं ।

किसी ने कहा है कि पाप करने के पहले तो बहुत सुखद होता है परन्तु करने के बाद दुखद होता है ।
बाइबिल में हम शिमशोन का उदाहरण भी देखते हैं । शिमशोन परमेश्वर का चुना हुआ जन था । उसके जन्म से पहले ही परमेश्वर ने उसको आशीषित करने की प्रतिज्ञा की थी । माता के गर्भ में उसने उसको आशीषित किया था और जब शिमशोन पैदा होता है और आगे बढ़ता है तो वह बहुत मज़बूत , बलिष्ठ और दिखने में बहुत आकर्षक होता है । वह इतना बलिष्ठ हो जाता है कि वह सिंह को भी मार डालता है परन्तु बेकाबू सिंह को तो वह समाप्त कर देता है मगर अपने शरीर पर वह नियंत्रण नहीं कर पाता । शारीरिक कामनाओं और लालसाओं में वह गिर जाता है और परमेश्वर का शाप उस पर पड़ता है । कितनी बार हमारे साथ ऐसा होता है कि हम अपने शरीर पर नियंत्रण खो देते हैं । आज के समाज में बहुत सी समस्याएं हैं । ड्रग्स , नशा तथा एड्स जैसी बीमारियां जो अनैतिक शारीरिक सम्बन्धों से होती हैं । हमारे सामने ये सारे प्रलोभन जवानी की अवस्था में बहुत ज़्यादा आते हैं ।

मेरे प्रियो , अगर हमारे पास प्रभु यीशु मसीह है तो हम में नहीं कहने की क्षमता होना चाहिए । हम में अपनी सीमाओं को समझने और उन सीमाओं में रहने की क्षमता होना चाहिए । यदि प्रभु यीशु मसीह हमारे जीवन में है , अगर उसे हमने अपने हृदय में स्वीकार किया है , तो वह आपको सामर्थ्य देगा कि जब शारीरिक परीक्षाएं सामने आएंगी तो आप कह सकेंगे - नहीं! मैं ऐसा नहीं करूंगा/ करूंगी क्योंकि यह बात प्रभु की दृष्टि में अनुचित है । इसीलिए वचन में लिखा हुआ है - अपने शरीरों को पवित्र , जीवता और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ । यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है । सबसे बड़ी आत्मिक सेवा वह होगी जब हम अपने शरीर को , अपनी सांसारिक और शारीरिक भावनाओं को अपने वश में , अपने नियंत्रण में रखेंगे ।

आपने चाहे कैसे भी अपराध किये हों । जीवन में चाहे जो शारीरिक पाप हों , उनको धोने का अवसर प्रभु यीशु मसीह देता है । वह हमसे कहता है कि अपनी शारीरिक इच्छाओं पर हमें विजय प्राप्त करना है । सारी शैतानी बातों और अभिलाषाओं को प्रभु के चरणों में , उसके क्रूस की निकटता में लाकर दफ़ना देना है । जब हम ऐसा करते हैं तो वचन कहता है कि परमेश्वर हमारे पापों को लेकर , उन्हें गहरे समुद्र में दफ़न कर देता है । इसलिए अपना जीवन प्रभु यीशु को दें और इस बात को जानें कि केवल प्रभु यीशु मसीह में ही अनन्त जीवन है। केवल उस में ही हमारी समस्याओं का निदान है । उस में ही आनन्द और शान्ति का जीवन है । उसी के द्वारा हमें वह सामर्थ्य प्राप्त होती है जिससे हम इस संसार में बढ़ते जाएं और अपने परमेश्वर की महिमा अपने शरीरों के द्वारा करते जाएं ।

एक युवती थी जो बहुत खूबसूरत गीत गाती थी और बहुत बड़ी भीड़ उसको सुनने के लिये आती थी । जब उसका नाम बढ़ा और उसको पैसा मिलने लगा , उसका यश दूर- दूर तक फैल गया , तो वह कुछ वर्षों के बाद व्यभिचार के पाप में पड़ गई । अपनी शारीरिक लालसाओं पर उसका नियंत्रण नहीं रहा । वह पाप में गिरती चली गई और पाप को ढांपने के लिये दूसरा और तीसरा पाप और चौथा पाप करती चली गई । वह उस पाप के दलदल में फंस गई । वर्षों गुज़र जाते हैं , वह गम्भीर रूप से बीमार हो जाती है । हॉस्पिटल के पास एक कलीसिया भवन में रिवाइवल मीटिंग हो रही थी । उस रिवाइवल मीटिंग में वह किसी प्रकार लकड़ी के सहारे जाती है , उस शाम वह वहां बैठती है और परमेश्वर के वचन को सुनती है । प्रभु यीशु मसीह के नियंत्रण को वह स्वीकार करती है । उस रात वह अपने जीवन , अपने शरीर , अपनी आत्मा को प्रभु यीशु मसीह के चरणों में बलिदान कर देती है । तब वह एक गीत लिखती है - जैसा मैं हूं बिन योग्यता , पर लेके आसरा लोहू का , और सुनकर तेरा नेवता मसीह , मसीह मैं आता हूं । इस युवती का नाम शार्लेट इलियट था और उसका यह गीत आज संसार भर की कलीसियाओं में गाया जाता है ।

प्रभु यीशु मसीह का आमंत्रण है कि आप संकल्प लें कि आप अपनी देह को प्रभु यीशु मसीह को सम्पूर्णता से समर्पित करते हैं । जितने दैहिक पाप आपने किये उनकी क्षमा देने के लिये प्रभु यीशु मसीह आपको बुलाता है । वह आपको सम्पूर्ण क्षमा देगा , आपको पूर्णतः शुद्ध करेगा और अपने रक्त की मुहर आपके जीवन पर लगाएगा

2. न सिर्फ़ हमें अपना शरीर बलिदान करना है , परन्तु हमें अपना मन परमेश्वर को बलिदान करना है।

यिर्मयाह 17:5 में लिखा है - "यहोवा यों कहता है , श्रापित है वह पुरुष जो मनुष्य पर भरोसा रखता है , और उसका सहारा लेता है , जिसका मन यहोवा से भटक जाता है ।"

जिसका मन यहोवा से भटक जाता है , ऐसा पुरुष श्रापित है । जिसका मन यहोवा से भटक गया तो वह मनुष्य की शरण ले लेता है । मेरे प्रियो , कितनी बार हमारे जीवन में ऐसा होता है जब हमारा मन भटक जाता है । जीवन की समस्याओं , तनाव , आकर्षणों की तरफ शैतान हमारे मन को लगा देता है । होता यह है कि जब जीवन में समस्याएं आईं तो प्रभु यीशु मसीह पर ध्यान कम हो गया । मन की ओर , उन समस्याओं की ओर हमारा ध्यान लग गया । परन्तु मेरे प्रियो , एक दिन आएगा जब हमें अपने मन का लेखा उस परमेश्वर के सामने देना पड़ेगा ।

आज बहुत सी बातें हैं जिन से शैतान हमारे मन को बहकाता है । टेलीविजन पर ऐसे कार्यक्रम आते हैं । पुस्तकों की दुकानों में आसानी से आपको अश्लील साहित्य मिल जाता है । बहुत आसानी से , बहुत सस्ती क़ीमतों पर , गली-गली में गन्दी फिल्मों की सी.डी. मिल जाती हैं । सत्यता यह भी है कि केवल जवान लोग ही इससे प्रभावित नहीं होते , परन्तु मसीही अगुवे भी प्रभावित होते हैं , बुजुर्ग भी प्रभावित होते हैं । अमेरिका में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन चल रहा था । एक बहुत ही आदरणीय जाने-माने प्रचारक प्रचार कर रहे थे । हज़ारों लोग वहां पर बैठे हुए थे । उस विशाल स्टेडियम में स्टेज पर वह प्रचारक कहते हैं - मैं जब अपने ऑफिस की टेबिल पर जाता हूं और इन्टरनेट चालू करता हूं तो मेरा मन भटकने लगता है । मुझे लगता है कि मैं उन अश्लील चित्रों को देख सकूं । उन गन्दी वेबसाइट पर चला जाऊं । तब उन्होंने कहा इस परीक्षा से गुज़रते हुए , संघर्ष करते हुए मैं थक गया । तब एक दिन मैंने अपने स्टाफ से एक बहन को बुलाया और कहा कि इस इन्टरनेट पर नैनी संयंत्र लगा दो तो वह नैनी संयंत्र सभी अश्लील वेबसाइट्स को रोक देगा । जब उस पासबान ने इस बात को हज़ारों लोगों के सामने स्वीकार किया , तो सारे लोग खड़े हो कर तालियां बजाने लगे कि उस पासबान में इतनी हिम्मत थी कि उसने सबके सामने अपने पापों का अंगीकार किया ।

प्रियो , हम में से कोई भी इन बातों से अछूता नहीं है । हम मनुष्य हैं , हमारे मन ग़लत बातों की ओर लगते हैं। आज मन को भटकाने के लिये ऐसी-ऐसी बातें हैं कि जवानों के लिये कलीसिया कम आकर्षक हो गई है , प्रभु यीशु मसीह कम आकर्षक हो गया है । वीडियोगेम्स हैं , इन्टरनेट है , ये सब चीज़ें बुरी नहीं हैं परन्तु अगर ये हमारे जीवन में प्रभु यीशु मसीह का स्थान लेती हैं , प्रार्थना का स्थान लेती हैं , आराधना का स्थान लेती हैं तो यह ग़लत है । मेरे प्रियो , हमें पश्चात्ताप करना है । हमें अपने मन को फिराना है । हमें अपने मन को भटकने से बचाना है । इसीलिए लिखा है कि तू अपने परमेश्वर से अपने सारे मन , अपने सारे प्राण , अपनी सारी बुद्धि और अपने सारे परिश्रम से प्रेम रख ।

क्या हमारा मन आज भटका हुआ है , अपने परिवार की समस्याओं में ? क्या हमारी कलीसिया में जो राजनीति आ गई है उसके कारण हमारा मन प्रभु की ओर से भटक गया है और उस राजनीति की ओर लग गया है ? क्या हमारा मन इन्टरनेट की तरफ लग गया है ? क्या हमारा मन अश्लील मूवीज़ में लग गया है ? हमें आज पश्चात्ताप करना है । परमेश्वर आपसे कह रहा है कि तुम्हें अपना मन मुझे समर्पित करना होगा और अपने मन से इस प्रकार की बातों को निकालना होगा । प्रभु यीशु आपको बुला रहा है , ताकि आपका मन जो भटक गया है , आप उसको परमेश्वर की ओर वापस लगाएं ।

फिलिप्पियों की पुस्तक 4:8 में पौलुस कहता है - "निदान , हे भाइयो , जो जो बातें सत्य हैं , और जो जो बातें आदरनीय हैं , और जो जो बातें उचित हैं , और जो जो बातें पवित्र हैं , और जो जो बातें सुहावनी हैं , और जो जो बातें मनभावनी हैं , निदान, जो जो सद्गुण और प्रशंसा की बातें हैं उन्हीं पर ध्यान लगाया करो ।" हमें अपने मन को किस तरफ फिराना है ? पौलुस कहता है कि जो बातें आदरनीय हैं । जो बातें उचित हैं । जो बातें पवित्र हैं । जो बातें सुहावनी हैं । जो मन भावनी हैं । जो सद्गुणों और प्रशंसा की बातें हैं , उन्हीं पर ध्यान लगाया करो । परमेश्वर चाहता है कि आप इन बातों पर ध्यान लगाएं जो पवित्र हैं । हमें अपने मन को जांचना है। वचन में लिखा हुआ है - सबसे बढ़कर अपने मन की रक्षा कर क्योंकि जीवन का मूल स्रोत वही है । अपने घर की रक्षा तो हम करते हैं , चार दीवारी बना देते हैं , पहरेदार भी बिठा देते हैं पर मन सब बातों में सबसे ज़्यादा भटकने वाला है । मन सब बातों में सबसे ज़्यादा ख़तरनाक है । हमें परमेश्वर को अपने मन को सम्पूर्णता से सौंपना है और कहना है कि प्रभु मैं अपने मन का सारा नियंत्रण तेरे हाथ में देता हूं ।

3. हमें अपने हृदय को प्रभु यीशु मसीह को समर्पित करना है ।

यिर्मयाह 17:9-10 में लिखा है - "मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है , उस में असाध्य रोग लगा है ; उसका भेद कौन समझ सकता है ? मैं यहोवा मन को खोजता और हृदय को जांचता हूं ताकि प्रत्येक जन को उसके चाल-चलन के अनुसार अर्थात् उसके कामों का फल दूं ।"

परमेश्वर हमारे कपड़ों , हमारी डिग्रीज़ , हम किस परिवार के हैं ; यह नहीं देखता । परमेश्वर हमारे मन को देखता है । वह हमारे हृदय को जांचता है । परमेश्वर की नज़रें जो एक्स-रे की किरणों से भी ज़्यादा तेज़ हैं , वे हमारे हृदयों को देख रही हैं । क्या देखता है परमेश्वर हमारे हृदय में ? क्या बातें दिखाई देती हैं हमारे हृदय में ? हो सकता है कि ऊपर से हम बहुत अच्छे दिखाई देते हैं , पर हमारा हृदय कैसा है ?

यिर्मयाह 5:23 में लिखा है - "पर इस प्रजा का हठीला और बलवा करने वाला मन है , इन्हों ने बलवा किया और दूर हो गए हैं ।"

बाइबिल में देखें तो एक बड़ी रोचक बात सामने आती है । उत्पत्ति से लेकर सारी पुस्तकों में देखें तो प्रारम्भ से ही मानव स्वभाव एक सा है । जब समस्याएं आती हैं , जब परमेश्वर दण्ड लाता है , हम पर ताड़ना पड़ती है तब हम सुधरने की कोशिश करने लगते हैं । जब हम सही रास्ते पर चलने लगते हैं , तब परमेश्वर की आशीषें मिलती हैं और आशीषें जब मिलती हैं तो हम फिर वैसे ही हो जाते हैं । फिर हमारा हृदय सब प्रकार का बलवा करने लगता है । बलवा का अर्थ होता है , परमेश्वर की व्यवस्था का विरोध करना । इससे पाप का जन्म होता है। पाप का प्रारम्भ कहां होता है ? पाप का प्रारम्भ हृदय से होता है । वचन में यह बात बहुत स्पष्ट लिखी हुई है । यहेजकेल 36:26 में लिखा है - "मैं तुमको नया मन दूंगा , और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूंगा ; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को मांस का हृदय दूंगा ।"

यह कार्य परमेश्वर कर सकता है , वह हमसे कह रहा है , मैं तुम्हें नया मन दूंगा , नया हृदय दूंगा । मैं तुम्हारे पत्थर के हृदय को निकालूंगा और एक नया हृदय तुम में सृजूंगा । यह परमेश्वर की सामर्थ्य से सम्भव है । मेरे प्रियो , हम अगर हृदय की सर्जरी कराकर उसे परिवर्तित भी करा लें परन्तु हमारे मन में सब प्रकार की बुराइयां हों तो कोई हमारे दिल को नहीं बदल सकता । केवल परमेश्वर हमारे हृदय को बदल सकता है , जब हम प्रभु यीशु को ग्रहण करते हैं , जब अपने हृदय में उसे स्वीकार करते हैं तो वह हमारे हृदय को सम्पूर्णता से बदल देता है ।

डॉ. बिली ग्राहम ने अपनी पुस्तक में एक घटना को लिखा है - एक कबाड़ी की दुकान थी । वह बहुत खराब और पुरानी दुकान थी । उसका रंग-रूप सब बिगड़ गया था । वहां कोई जाना भी पसन्द नहीं करता था । तब एक नया व्यक्ति आता है और उस दुकान को खरीद लेता है । वह उसका नवीनीकरण करता है और उसे खूबसूरत बनाता है । तब वह दुकान शहर की सबसे आकर्षक दुकान बन जाती है । वहां पर वह व्यक्ति बोर्ड लगा देता है - अब यह दुकान नये स्वामित्व के अन्तर्गत आ गई है । मेरे प्रियो , ऐसे ही हम भी हैं । जब प्रभु यीशु को हम अपना हृदय देते हैं तो हम नये स्वामी के अन्दर आ जाते हैं । जो हमारे हृदय की सारी बुराइयों को निकालता है। हमारे मन की सारी कलुषता को , सारे घमण्ड को वह निकालता है ।

हम नहीं जानते कि हमारे जीवन का कब अन्त हो जाएगा , हम नहीं जानते कि प्रभु यीशु मसीह कब आएगा। एक अनिश्चितता है परन्तु हम इस अनिश्चितता की स्थिति को निश्चितता में बदल सकते हैं । जब हम अपने जीवन को प्रभु यीशु को सौंपते हैं , तो हम जानते हैं कि उसके हाथों में सुरक्षा है । उसके हाथों में प्यार है । उसके हाथों में क्षमा , अनुग्रह , सामर्थ्य है । उसके हाथों में परिवर्तन करने वाली शक्ति है । उसके हाथों में अनन्त का जीवन है । प्रभु यीशु मसीह कहता है कि तुम्हें अपने हृदय को मुझे समर्पित करना होगा ।

हम में से कितने हैं जिन्होंने अधूरे मन से प्रभु यीशु को ग्रहण किया है और अपने जीवन का अधूरा समर्पण किया है । हम में से कितने हैं जो आज भी दोराहे पर चल रहे हैं । हम में से कितने हैं जो कभी सांसारिकता का जीवन जीने लगते हैं तो कभी आत्मिकता का जीवन जीने लगते हैं । एक प्राचीन लोक कथा है कि चिड़ियों और पशुओं का युद्ध चल रहा था । जब पशु जीतने लगते थे तो चमगादड़ पैदल चलने लगती थी और जब पक्षी जीतने लगते थे तो चमगादड़ उड़ने लगती थी । कभी वह पक्षियों के दल में आ जाती थी , कभी पशुओं के दल में । कहीं हमारा जीवन भी ऐसे ही चमगादड़ के समान तो नहीं हो गया है ? कभी इधर हैं , तो कभी उधर हैं , कभी पंख हिलाते हैं , तो कभी पैदल चलते हैं । कभी पशु बन जाते हैं , तो कभी पक्षी बन जाते हैं । कभी लाइन के इस तरफ चले जाते हैं , कभी उस तरफ चले जाते हैं ।

प्रभु यीशु मसीह कहता है कि तुम दो मालिकों की सेवा नहीं कर सकते हो । प्रभु यीशु कहता है यदि तुम मेरे साथ नहीं बटोरते , तो तुम मेरे साथ बिखराते हो , तुम मेरे विरोध में हो । यह प्रभु यीशु सभी को अवसर देता है कि हम सम्पूर्ण मन से , एकाग्रता से , दृढ़ता से , प्रतिबद्धता से , दृढ़ निश्चितता से एक संकल्प लें कि प्रभु आज मैं अपने तन को , अपने मन को , अपने हृदय को तेरे चरणों के पास सौंपता हूं । आज मैं अपने हृदय को तुझे सौंपती हूं । पिता परमेश्वर मेरे हृदय को ले । परमेश्वर का धन्यवाद हो , उसके वचन में प्रतिज्ञा है कि वह टूटे और पिसे हुए मन को तुच्छ नहीं जानता , परन्तु हमारा टूटा हुआ मन परमेश्वर के योग्य बलिदान है , सबसे बड़ा बलिदान है । यह परमेश्वर सबसे बढ़कर हमारे दिल को चाहता है । अभी अवसर है प्रभु यीशु की बुलाहट को सुनें ।

परमेश्वर आपको आशीष दे।