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आलोचनाओं से आगे

आलोचनाओं से आगे

सन्दर्भ :- नहेमायाह 4:1-6

हमारे द्वारा लिया गया निर्णय किसी न किसी को प्रभावित करता है । हमारा जीवन किसी न किसी को प्रेरणा देता है । हमारे वचनों से , कथनों से लोग प्रभावित होते हैं । हो सकता है आप परिवार में अगुवाई कर रहे हों या आप किसी कक्षा के शिक्षक हों , प्रिंसिपल हों , डॉक्टर हों , मसीही संस्था में सेवा कर रहे हों । नहीं तो कम से कम अपने परिवार को आप प्रभावित कर रहे होंगे ।

प्रमुख बात यह है कि मसीहियों को प्रभु यीशु का आदेश है कि हमें इस संसार की ज्योति बनना है । हमें उस नगर के समान बनना है जो पर्वत पर है और जिसके प्रकाश से बहुतेरे प्रकाशित होते हैं । भले हम अल्पसंख्यक हों परन्तु हम उस नमक के समान हैं जो बहुत से भोजन को प्रभावित करता है और उसे स्वादिष्ट बनाता है ।

यदि हमें मसीही जीवन में आगे बढ़ते जाना है, यदि हमें लक्ष्य की तरफ दौड़ते हुए अपनी दौड़ पूरी करना है । यदि पौलुस प्रेरित के समान हमें विश्वास की अच्छी कुश्ती लड़ना है, अपने विश्वास की रखवाली करना है । यदि हमें शैतान की शक्तियों और उसकी युक्तियों का सामना करना है और जीवन के अन्तिम समय तक परमेश्वर की गवाही देना है । यदि हमें प्रभु यीशु मसीह की गवाही दृढ़ता, मज़बूती और निर्भीकता के साथ देना है तो हमें अपने जीवन में कुछ बातें सीखना होंगी । हम अपने जीवन को इस योग्य बना सकते हैं कि हम निरन्तर परमेश्वर की गवाही दे सकें ।

1. आलोचनाओं का सामना करना सीखें :- हम में से हर एक को आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है । चाहे हमारा जीवन कितना भी धार्मिक और प्रभावशाली क्यों न हो । जब आलोचनाएं होती हैं तो हमें पीड़ा होती है । ये आलोचनाएं हमारे जीवन और चिन्तन को प्रभावित करती हैं । अक्सर ये अनावश्यक और झूठी होती हैं , जो हमारे चरित्र हनन के लिए होती हैं और इनसे गुज़रना कठिन होता है । जिनसे हम प्रेम करते हैं जब वे हमारी आलोचना करते हैं तो उससे बहुत पीड़ा होती है ।

हम पाते हैं कि प्रभु यीशु की भी आलोचना की गई । उसे पेटू , पियक्कड़ , पापियों का मित्र कहा गया । उसके लिए यह कहा गया कि यह दुष्टात्माओं की सहायता से आश्चर्यकर्म करता है । उसके लिए कहा गया कि यह परमेश्वर की निन्दा और अपमान करता है । ये सारी बातें प्रभु यीशु मसीह के लिए पीड़ा देने वाली होंगी क्योंकि उस ने एक मनुष्य का जीवन भी जिया । वह सम्पूर्ण परमेश्वर था और सम्पूर्ण मानव भी। उसे भूख-प्यास लगती थी , वह थकता था , उसके आंसू बहते थे , उसके शरीर को तकलीफ होती थी । पुराने नियम में नहेमायाह का वर्णन है । यरूशलेम की शहरपनाह टूटी हुई थी और उसके फाटक जले हुए थे । उस समय नहेमायाह राजमहल में रहता था और राजा के दरबार में एक प्रतिष्ठित पद पर था । परमेश्वर उसे यरूशलेम ले जाता है और टूटी हुई शहरपनाह को बनाने की बड़ी ज़िम्मेदारी उसको सौंपता है । नहेमायाह 4:1 में लिखा है - "जब सम्बल्लत ने सुना कि यहूदी लोग शहरपनाह को बना रहे हैं , तब उस ने बुरा माना , और बहुत रिसियाकर यहूदियों को ठट्ठों में उड़ाने लगा ।"
तीसरी आयत में लिखा हुआ है - "उसके पास तो अम्मोनी तोबियाह था , और वह कहने लगा , जो कुछ वे बना रहे हैं यदि कोई गीदड़ भी उस पर चढ़े , तो वह उनकी बनाई हुई पत्थर की शहरपनाह को तोड़ देगा ।"
नहेमायाह इस बात का उदाहरण है कि परमेश्वर के पीछे चलने वालों और उसकी योजना को पूरी करने वाले लोगों को भी आलोचना का शिकार होना पड़ता है । किसी ने कहा है कि आलोचना होने पर हमारी प्रतिक्रिया , हमारे चरित्र को उजागर करती है! यह हमारे हृदय के भय को प्रगट करती है । आलोचना के द्वारा हमारे जीवन , चरित्र और विश्वास की परीक्षा होती है ।
नहेमायाह ने इस आलोचना का सामना कैसे किया ? नहेमायाह 4:5 में देखें तो पता चलता है कि नहेमायाह ने प्रार्थना की। नहेमायाह की प्रार्थना सामान्य प्रार्थना से थोड़ी सी अलग थी । अक्सर हम अपनी प्रार्थनाओं में कहते हैं कि पिता परमेश्वर इनके पापों को क्षमा कर दे , हम कहते हैं कि पिता परमेश्वर ये नहीं जानते कि ये क्या करते हैं , पिता परमेश्वर इनको सद्बुद्धि दे ।
परन्तु नहेमायाह अपनी प्रार्थना में कहता है - "हे हमारे परमेश्वर सुन ले कि हमारा अपमान हो रहा है ; और उनका किया हुआ अपमान उन्हीं के सिर पर लौटा दे , और उन्हें बंधुवाई के देश में लुटवा दे । और उनका अधर्म तू न ढांप और उनका पाप तेरे सन्मुख से न मिटाया जाए ; क्योंकि उन्होंने तुझे शहरपनाह बनाने वालों के सामने क्रोध दिलाया है ।"
नहेमायाह ने आलोचना को सुना और परमेश्वर से प्रार्थना की परन्तु उसने अपने आप को उस आलोचना से प्रभावित नहीं होने दिया क्योंकि ये आलोचनाएं ग़लत और झूठी थीं । सम्बल्लत और तोबियाह नहीं चाहते थे कि परमेश्वर की इच्छा पूरी हो । वे जलन से भरकर आलोचना कर रहे थे । आलोचना का प्रारम्भ जलन के कारण होता है । यदि आलोचना ग़लत है तो हमको उसे प्रार्थना के साथ समाप्त कर देना है । उससे हमें प्रभावित नहीं होना है । परन्तु यदि आलोचना सही है , यदि हम देखी-अनदेखी परिस्थिति में ग़लती कर रहे हैं , ग़लत बातें बोल रहे हैं , ग़लत प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं और जब इस कारण हमारी आलोचना होती है तो हम प्रार्थना करें । ग़लती स्वीकार करें और अपने जीवन को सुधार लें ।
जब आलोचना होती है तो यह आवश्यक है कि आलोचना और आलोचक दोनों को हम तौलें । क्या आलोचना हो रही है ? क्यों आलोचना हो रही है ? क्या उसमें कोई सत्यता है ? हमें अपना समय बर्बाद नहीं करना है । अनावश्यक तनाव , चिन्ता में नहीं बने रहना है बल्कि आगे बढ़ जाना है ।
नहेमायाह ने प्रार्थना की , उसने आलोचना पर ध्यान नहीं दिया और सबसे प्रमुख बात यह है कि उसने अपना कार्य जारी रखा । उसने अपनी सारी ऊर्जा और अपना सारा प्रयास परमेश्वर के कार्य में लगाया और अपने उददेश्य की ओर बढ़ता गया ।

2. हमें अनुचित तुलनाओं से बचना है :- अगर परमेश्वर की सेवा में आगे बढ़ना है और परमेश्वर की गवाही देते रहना है तो हमें अनुचित तुलनाओं से ऊपर उठना है ।
हमें यह समझना है कि परमेश्वर ने हम सभी को अलग-अलग बनाया है , सभी को अलग-अलग उद्देश्य से इस संसार में भेजा है । परमेश्वर ने हम सबको अलग-अलग योग्यताएं दी हैं और अलग-अलग स्थानों पर रखा है। परमेश्वर ने हम सब को अलग-अलग अवसर दिए हैं ।
मत्ती 25:14-30 में वर्णित तोड़ों के दृष्टान्त में - एक मालिक यात्रा पर जाने से पहले अपने तीन दासों को बुलाता है । एक को पांच , एक को दो और एक को एक तोड़ा देता है । हम कह सकते हैं कि परमेश्वर ने तो सब को एक सा बनाया है । मालिक को भेदभाव नहीं करना चाहिए था किसी को पांच, किसी को दो और किसी को एक तोड़ा नहीं देना था बल्कि सबको बराबरी से तीन-तीन तोड़े देना था । परन्तु नहीं! परमेश्वर ने हमें भिन्न-भिन्न स्थानों पर रखा है ।
बाइबिल में यदि देखें तो परमेश्वर ने किसी को अधिकारी, किसी को राजा, किसी को सेना नायक, किसी को भविष्यवक्ता होने के लिए बुलाया है । किसी को शहरपनाह बनाने के लिए, किसी को प्रचार करने के लिए, किसी को चंगाई देने के लिए बुलाया है । हमें अपने ट्रैक पर दौड़ना है और विश्वासयोग्य बने रहकर अपनी दौड़ पूरी करना है । यदि मुझे एक बच्चे की देखरेख करना है तो मेरे लिए वही बात, परमेश्वर की योजना को पूरा करना है ।
रोमियों 12:6 और उसके आगे हम पाते हैं कि पौलुस कहता है कि हम एक देह के समान हैं । देह के विभिन्न अंग होते हैं और सब अंगों का काम एक सा नहीं होता । कोई सेवा करने वाला है, कोई सिखाने वाला है, कोई उपदेश देने वाला है, कोई अगुवाई करने वाला है, कोई स्रोत जुटाने वाला है, कोई दान देने वाला है । परन्तु जब हम अनुचित तुलनाएं करते हैं तो इससे केवल निराशा, पीड़ा, जलन, घुटन और असन्तोष उत्पन्न होता है ।
बचपन से अक्सर हमें सिखाया जाता है कि बेटा तुम्हें फर्स्ट आना है । तुम्हें जीतना है दूसरों को हराना है । तुम्हें सबसे आगे निकलना है, सबसे अच्छे दिखना है , बस जीतना है । नहीं जीतोगे तो तुम्हारी पहचान ख़त्म हो जाएगी ।
इस सम्बन्ध में दो बहुत प्रमुख सन्दर्भ हम बाइबिल में पाते हैं ।
फिलिप्पियों 4:11 में पौलुस प्रेरित कहता है - "यह नहीं कि मैं अपनी घटी के कारण यह कहता हूं; क्योंकि मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में मैं हूं उसी में सन्तोष करूं ।"
पौलुस आगे कहता है कि मैंने अधिकार को भी देखा है और अभाव को भी । मैंने सम्मान को भी देखा है और पीड़ा को भी । मेरी प्रशंसा भी हुई है और अपमान भी परन्तु मैं जिस भी दशा में हूं मैंने यह बात सीखी है कि उसी दशा में सन्तोष करूं । क्योंकि सन्तोष सहित भक्ति सबसे बड़ी कमाई है ।
मत्ती 19:30 - "परन्तु बहुतेरे जो पहिले हैं पिछले होंगे और जो पिछले हैं वे पहले होंगे ।"
प्रभु यीशु कहते हैं कि तुम इस संसार में रहकर जीत और हार का फैसला नहीं कर सकते । तुम इस संसार में रहकर यह नहीं कह सकते कि फलां आगे निकल गया या फलां पीछे रह गया । न्याय का दिन आने दो , जो पिछले हैं वे आगे हो जाएंगे और जो आगे हैं वे पीछे हो जाएंगे । क्योंकि न्याय के दिन सफलता से बड़ी बात विश्वासयोग्यता होगी , गर्व से बड़ी बात विनम्रता होगी , ख्याति से बड़ी बात खराई की होगी , नोबल पुरस्कार से बड़ी बात जीवन की पुस्तक में नाम की होगी । न्याय के दिन अधिकार से बड़ी बात सेवकाई की होगी ।
इसीलिए प्रभु यीशु कहते हैं कि यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त कर ले और अपनी आत्मा की हानि उठाए तो उसे क्या लाभ होगा ।

3. हमें इस नकारात्मक संसार में सकारात्मक बने रहना है :- हर दिन हमारा सामना नकारात्मक परिस्थितियों , नकारात्मक लोगों और अनापेक्षित बातों से होता है जिससे हमें चोट लगती है , मानसिक रूप से हम निराश होते हैं । यह संसार सिद्ध नहीं है , यह हमारा घर नहीं है । यह तो एक युद्ध क्षेत्र है और हमें एक योद्धा के समान आगे बढ़ना है ।

फिलिप्पियों की पत्री में हम पाते हैं कि पौलुस बुजुर्गी की अवस्था में जेल में क़ैद है और वह कहता है कि कई लोग तो मेरे विरोध के कारण सेवकाई करते हैं , और कई लोग इस कारण प्रचार करते हैं कि मुझको जलन हो और मेरी पीड़ा बढ़ जाए । पहले अध्याय की 18 वीं आयत में पौलुस कहता है- क्या हुआ ? मैं आनन्दित हूं और आगे भी आनन्दित रहूंगा । क्योंकि किसी भी परिस्थिति में मसीह की कथा तो सुनाई जाती है चाहे द्वेष से , चाहे विरोध से और मैं आनन्दित हूं । दूसरे अध्याय की 17वीं और 18वीं आयत में पौलुस एक प्रमुख बात कहता है- चाहे मुझे बलिदान होना पड़े या लहू बहाना पड़े तौभी मैं इस सेवकाई में आनन्दित हूं । तुम जो मसीही हो और मेरे साथ सेवकाई में लगे हो , तुम भी आनन्दित रहो ।

1 तीमुथियुस 6:18 में लिखा है - "धनवानो को आज्ञा दें कि भला करें , उदार बनें , सहायता देने में तत्पर हों । अशुद्ध बकवाद , विरोध की बातों से बचे रहें क्योंकि कितने ऐसा करके विश्वास से भटक गए । इसीलिए भलाई करने , उदारता करने , प्रोत्साहित करने और सहायता करने में तत्पर रहो ।"

हमारे मसीही जीवन में आनन्द , उद्धार , उमंग , जुनून बना रहना चाहिए ।
आज टेलीविजन के किसी भी चैनल में राजनीतिज्ञों को देख लें , ऐसा लगता है कि उनके चेहरे से मानो मुस्कुराहट और हंसी गायब हो गई है । परन्तु हम मसीहियों के जीवन में उद्धार का आनन्द है और इसलिए यदि हम प्रभु यीशु से प्यार करते हैं तो वह आनन्द हम में दिखाई देना चाहिए ।

2 तीमुथियुस 4:16-18 वीं आयत में पौलुस ने लिखा है - "मेरे पहले प्रतिउत्तर करने के समय में किसी ने भी मेरा साथ नहीं दिया । बरन् सबने मुझे छोड़ दिया । भला हो कि इसका उनको लेखा न देना पड़े परन्तु प्रभु मेरा सहायक रहा । और मुझे सामर्थ्य दी ताकि मेरे द्वारा पूरा-पूरा प्रचार हो और अन्य जाति सुन लें मैं तो सिंहों के मुंह से छुड़ाया गया हूं । और प्रभु मुझे हर एक बुरे काम से छुड़ाएगा और अपने स्वर्गीय राज्य में उद्धार करके पहुंचाएगा । उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे ।"
कितनी पीड़ा की बात होगी पौलुस के लिए! इतने विरोध और सताव के बाद किसी ने उसका साथ नहीं दिया ।
वह कहता है कि सबने मुझे छोड़ दिया है तो क्या हुआ! मेरा प्रभु मेरे साथ है ।
मत्ती 5:12 के अनुसार - "मनुष्य जब मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें , सताएं , झूठ बोल बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बातें कहें , आनन्दित और मगन होना ।"
ज़िन्दगी के आनन्द के गीत को मत खोना क्योंकि इसके लिए स्वर्ग में तुम्हारे लिए बड़ा फल है ।
प्रभु यीशु यूहन्ना 16:33 में कहते हैं - इस संसार में तुम्हें क्लेश होगा । पर ढ़ाढस बांधो मैंने संसार को जीत लिया है ।
2 कुरिन्थियों 11:12 में पौलुस लिखता है - मैं जो कर रहा हूं करता रहूंगा । लोग जो मुझे फंसाने के दांव ढूंढ़ते हैं भले ही वे ढूंढ़ते रहें ।
हमें आलोचनाओं का सामना करना है , अनुचित तुलनाओं से बचना है , नकारात्मक संसार में सकारात्मक बने रहना है और ज़िन्दगी के गीत को हमें नहीं खोना है ।

4. सही मार्ग पर चलना अथक परिश्रम और प्रयास करने की बात है :- यदि हम यह सोचें कि हम अपने आप सही मार्ग पर चलते रहेंगे , ऐसा करना तो बड़ा आसान है , तो ऐसी बात नहीं है। हमें प्रभु यीशु मसीह के मार्ग पर चलने के लिए सतत् और अथक प्रयास करना पड़ेगा ।
इसीलिए पौलुस 1 कुरिन्थियों 9:27 में कहता है - मैं अपनी देह को मारता , कूटता और वश में लाता हूं कि औरों को प्रचार करके मैं आप ही निकम्मा न ठहरूं ।
पौलुस प्रेरित जैसा परमेश्वर का महान सेवक कहता है कि मैं जो नहीं करना चाहता वो ही करता हूं और जो मुझे करना चाहिए वह मैं नहीं करता हूं । इस द्वंद्व से मैं गुज़र रहा हूं ।
प्रभु यीशु मसीह गतसमनी बाग में प्रार्थना करते हैं - हो सके तो यह प्याला हट जाए । पर जैसा मैं चाहता हूं वैसा नहीं पर परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो (मत्ती 26:39) ।
प्रकाशितवाक्य 7:14 में यूहन्ना प्रश्न करता है कि ये श्वेत वस्त्र पहने हुए लोग कौन हैं ? उसे प्रश्न का उत्तर मिलता है कि ये वे लोग हैं जो क्लेश से निकल कर आए हैं और उसके आगे लिखा है - इन्होंने अपने वस्त्र मेम्ने के लहू में धोकर श्वेत किए हैं ।
मेम्ने ने तो अपना लहू बहाया है परन्तु इन लोगों ने अपने वस्त्रों को मेम्ने के लहू में धोया है । इन्होंने प्रयास किया और उस रास्ते पर चलते हुए इन्होंने क्लेश सहा है ।
इसीलिए पौलुस फिलिप्पियों 1:20 में कहता है - मैं तो यही हार्दिक लालसा और आशा रखता हूं कि मैं किसी बात में लज्जित न होऊं , पर जैसे मेरे प्रबल साहस के कारण मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है , वैसा ही अब भी हो चाहे मैं जीवित रहूं या मर जाऊं ।
परमेश्वर के मार्ग पर चलने की बात आसान नहीं है । हमें प्रण करना पड़ेगा और प्रतिबद्ध होना होगा ।
दानिय्येल 1:8 में लिखा है कि दानिय्येल ने अपने मन में ठान लिया कि वह राजा का भोजन नहीं खाएगा और न ही उसका दाखमधु पीकर अपवित्र होगा ।
यह संकल्प लेने , प्रतिज्ञा करने , वचनबद्ध होने और प्रतिबद्धता की बात है ।
एस्तेर रानी राजा के पास अपनी क़ौम को बचाने के लिए जाती है । उसकी ज़िन्दगी को वहां पर ख़तरा है परन्तु वह कहती है कि मुझे ऐसे ही समय के लिए चुना गया है ।
एस्तेर 4:16 में रानी एस्तेर का कथन है कि ऐसी दशा में मैं राजा के पास भीतर जाऊंगी और यदि नाश हो गई तो हो गई ।
मसीही जीवन और सेवकाई का रास्ता आसान नहीं है । परन्तु परमेश्वर चाहता है कि हम योद्धा के समान आगे बढ़ते जाएं और शैतान की शक्तियों का सामना करते हुए उसको परास्त करते जाएं और अन्तिम समय तक विश्वासयोग्य बने रहें ।
प्रभु यीशु कहते हैं कि प्राण देने तक विश्वासयोग्य रह तो मैं तुझे जीवन का मुकुट दूंगा ।
अन्त की बात ; पौलुस कहता है , मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूं , मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है , मैंने विश्वास की रखवाली की है और प्रभु मुझे धर्म का मुकुट देगा । केवल मुझे नहीं परन्तु उनको भी जिन्होंने विश्वासयोग्यता से अपनी दौड़ पूरी कर ली है ।

परमेश्वर आपको आशीष दे।