परमेश्वर के प्रति गम्भीरता
सन्दर्भ :- यहेजकेल 33:30-33
जिस संसार में हम रहते हैं वहां सब कुछ बहुत तेज़ी से बदल रहा है । जिन बातों की कभी हमने कल्पना भी नहीं की थी आज उन्हें हम घटित होते हुए देख रहे हैं । बदलता हुआ समाज है , बदलता हुआ समय है , बदलते हुए मूल्य , बदलती हुई प्राथमिकताएं और परिभाषाएं हैं । कुछ समय पहले अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया कि पुरुष का पुरुष और स्त्री का स्त्री से विवाह हो सकता है । आयरलैण्ड के एक कस्बे में तीन लोगों को विवाह में जोड़ा गया। उनका कहना था कि दो ही लोग क्यों विवाह में जुड़ें , तीन लोग भी तो जुड़ सकते हें ? जब दो का विवाह हो सकता है तो तीन का विवाह क्यों नहीं हो सकता ? कई पश्चिमि देशों में हाई स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे आजकल सर्जरी कराने लगे हैं । जो लड़के हैं , वे लड़कियां बनना चाहते हैं और जो लड़कियां हैं वे लड़का बनना चाहती हैं । उनके माता-पिता इस बात पर आपत्ति भी नहीं कर सकते क्योंकि उन बच्चों को कोर्ट का संरक्षण प्राप्त है । ऐसे-ऐसे वीडियोज़ सामने आ रहे हैं , जिन्हें देखकर कलेजा कांप जाता है । आतंकवादी संगठनों के द्वारा जो कुछ किया जा रहा है उसके वीडियोज़ दुनिया के कोने-कोने में भेजे जा रहे हैं । जिससे आतंक और भय का माहौल पैदा किया जा सके। जवानों और बच्चों का चाकू से गला काटते हुए दिखाया जा रहा है , जैसे किसी जानवर को हलाल करते हैं । हवाई दुर्घटना होने के बाद पता चलता है कि उसके लिए पायलट ही ज़िम्मेदार था । वही प्लेन को उस दिशा में ले गया जहां प्लेन दुर्घटनाग्रस्त हो जाए । वह पायलट जिसे प्लेन सम्भालना था , जिसे आपातकालीन स्थिति में भी प्लेन को सही होने में ले जाना था , वही कई लोगों के जीवन के विनाश का कारण बन गया । भारत में ही नहीं किन्तु संसार के अनेक देशों में ऐसे शासक आ रहे हैं , जो मसीहियत को समाप्त करने का दावा करते हैं । असामाजिक तत्व सड़कों पर उपद्रव कर रहे हैं तथा उन पर कोई भी कार्यवाही नहीं हो रही । कलीसियाई स्तर पर हम देखें तो यह का प्रयास है मसीहियत को कमज़ोर करने के लिए। परमेश्वर ने आधार के रूप में जो वचन दिया है उसे तोड़ने का प्रयास है । इसके साथ ही कलीसिया के भीतर से भी शैतान का हमला जारी है; कलीसियाओं को तोड़ने के द्वारा , मसीहियों को बर्बाद करने और परिवारों का विनाश करने के लिए । हम पाते हैं कि झूठे शिक्षक कलीसिया को तोड़ रहे हैं । इन्हें हम अपनी कलीसिया और हमारे आसपास के क्षेत्रों में देख सकते हैं । पिछले दिनों में कई कलीसिया भवनों को तोड़ा गया , हत्याएं की गईं । इन घटनाओं की जांच के लिए टीमें गठित की गईं परन्तु कोई निष्कर्ष नहीं निकला । जिन लोगों ने चर्च भवनों को तोड़ा वे आज भी खुलेआम घूम रहे हैं , डंके की चोट पर बयान दे रहे हैं । दूसरी ओर , कलीसिया के भीतर देखें तो अगुवों का पतन हो रहा है । पास्टर्स पाप के दलदल में फंसते जा रहे हैं । अनैतिकता के दायरे में आते जा रहे हैं । परमेश्वर के द्वारा स्थापित सीमाओं को कलीसिया और संस्था के अगुवे तोड़ते जा रहे हैं । उनके प्रचार और जीवन शैली में विरोधाभास , उनकी कथनी-करनी में अन्तर है । कलीसिया के बच्चों और जवानों को कलीसिया के ही परिवारों और विश्वासियों से ठोकर लगती है । क्या किया जाए ऐसी परिस्थितियों में ? हमारा क्या दायित्व होना चाहिए ? कैसे इन कमियों को दूर किया जाए ? कैसे एक बेदाग , झुर्री रहित , निष्कलंक कलीसिया जो प्रभु यीशु मसीह की दुल्हन है उसे तैयार किया जाए ? ऐसी कलीसिया जो जीवन्त हो , जो आत्माओं को बचाने में लगी रहे , जो प्रभु के पुनरुत्थान की गवाही दे , जो प्रभु यीशु के अन्तिम आदेश को पूरा करने के लिए सब कुछ करने को तैयार हो और के परमेश्वर वचन की कसौटी पर खरी उतरे । क्या कर रहे हैं हम ऐसी कलीसिया बनाने के लिए ? यहेजकेल 33:30-33 में लिखा है - "और हे मनुष्य के सन्तान , तेरे लोग भीतों के पास और घरों के द्वारों में तेरे विषय में बातें करते और एक दूसरे से कहते हैं , आओ , सुनो , कि यहोवा की ओर से कौन सा वचन निकलता है । वे प्रजा की नाईं तेरे पास आते और तेरी प्रजा बनकर तेरे साम्हने बैठकर तेरे वचन सुनते हैं , परन्तु वे उन पर चलते नहीं ; मुंह से तो वे बहुत प्रेम दिखाते हैं , परन्तु उनका मन लालच ही में लगा रहता है । और तू उनकी दृष्टि में प्रेम के मधुर गीत गानेवाले और अच्छे बजानेवाले का सा ठहरा है , क्योंकि वे तेरे वचन सुनते तो हैं , परन्तु उन पर चलते नहीं । सो जब यह बात घटेगी , और वह निश्यच घटेगी ! तब वे जान लेंगे कि हमारे बीच एक भविष्यद्वक्ता आया था ।" जिस समय यहेजकेल ने यह बात कही वह युवा था । उसे बन्धुवाई में बाबुल नगर लाया गया था । बाबुल शहर की शहरपनाह और उसकी सैन्य शक्ति अत्यन्त थी , वहां धन-सम्पत्ति बहुतायत से थी । यह शहर संसार के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य की राजधानी था । उस स्थान पर यहेजकेल प्रचार कर रहा था । 14 अगस्त 586 बी.सी. की बात है जब के यरूशलेम शहर में बाबुल की सेना ने आग लगा दी । सा यरूशलेम को जला दिया और इसके ठीक 5 महीने बाद 8 जनवरी 585 बी.सी. को बाबुल की सेना ने यरूशलेम के मन्दिर को तोड़ दिया । व्यवस्थाविवरण 18:20-22 के अध्ययन से हमें यह पता चलता है कि नबी को परमेश्वर की ओर से भेजा जाता था । जो वह कहता था वह परमेश्वर की आवाज़ होती थी । यदि उसकी भविष्यवाणी पूरी नहीं होती थी तो लोग उसे मार भी डालते थे । इसके बावजूद यहेजकेल नबी डंके की चोट पर बिना किसी भय के भविष्यवाणी करता है । यहेजकेल की पुस्तक में 3 प्रमुख भाग हैं । पहले भाग में सारे यरूशलेम के लिए परमेश्वर की चेतावनी है । दूसरे भाग में परमेश्वर की चेतावनी, यरूशलेम के आसपास के सारे क्षेत्रों के लिए भी थी । तीसरे भाग में भविष्यवाणी थी कि सारे यहूदी जिन्हें बन्धुवाई में ले जाया गया है, वे एकजुट होंगे, वे फिर वापस यरूशलेम आएंगे । यहेजकेल 33:30-33 में आज के सन्दर्भ में हमारे जीवन और हमारी कलीसिया के लिए चार बातें मिलती हैं । 1. हमें कलीसिया के विषय में गम्भीर होना है :- अब यह समय है कि हम परमेश्वर को गम्भीरता से लें , हम कलीसिया को गम्भीरता से लें । यदि आप 31 वीं आयत में देखेंगे तो लिखा हुआ है - ये लोग तेरे पास आते हैं - लोग परमेश्वर के पास आते थे । ये तेरे सामने बैठते हैं - अर्थात् ये मन्दिर में बैठते थे। ये तेरा वचन सुनते थे और लोगों को लाते थे कि चलो हम परमेश्वर के वचन को सुनेंगे । वे जानते तो थे कि क्या घटित होने वाला है परन्तु उसके लिए जो तैयारी होनी चाहिए , वह नहीं थी। 30 वीं और 32 वीं आयत में कहा गया है कि वे तेरे वचन सुनते तो हैं , पर उस पर चलते नहीं हैं । यह एक बहुत बड़ी समस्या है कि वे मन्दिर में आ रहे हैं , कलीसिया में आराधना कर रहे हैं , परमेश्वर की प्रजा के स्वरूप में बैठे हैं, वचन सुन रहे हैं परन्तु उस पर चलते नहीं हैं । कलीसिया में बहुत कुछ प्रचार किया जाता है और शिक्षाएँ दी जाती हैं परन्तु कितनी बार ऐसा होता है कि उसे हम अपने हृदय में ग्रहण करते हैं और उसके अनुसार जीवन जीने लगते हैं ? कलीसिया हमारे लिए महत्वहीन और सस्ती हो गई है । आजकल कलीसिया पर कोई भी दोष लगा देता है, कोई भी उंगली उठा देता है । कलीसिया की बहुमूल्यता हमने समझी नहीं है । जिस कलीसिया के लिए प्रभु यीशु इस संसार मे आया, जिसके लिए उसने दुख उठाया, जिसके लिए उसने अपने प्राण दे दिए, जिस कलीसिया की स्थापना के लिए परमेश्वर को अपने बेटे का बलिदान करना पड़ा; वह कलीसिया हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण होनी चाहिए ? हमारे जीवन में कलीसिया किस स्थान पर है ? प्रभु यीशु ने कहा - अधोलोक के फाटक भी इस कलीसिया पर प्रबल नहीं होंगे । ये जो बचाए हुए और अनन्त जीवन प्राप्त किए हुए लोग हैं, ये ही स्वर्ग जाएंगे और परमेश्वर के राज्य में प्रवेष करेंगे । यह कलीसिया ही प्रभु यीशु की दुल्हन और उसकी देह है । ये उसके ख़ून से खरीदे हुए लोग हैं । प्रेरितों के काम 2:42 में जहां प्रारम्भिक कलीसिया का वर्णन है, लिखा है - "और वे प्रेरितों से शिक्षा पाने , और संगति रखने में और रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन रहे ।" प्रथम पीढ़ी के विश्वासी , चाहे कितनी भी समस्या आए , प्रचार करने में लगे रहते थे। बाइबिल में लिखा हुआ है कि उनकी सब वस्तुएं साझे की होती थीं । यदि किसी को कोई कमी होती थी तो जिसके पास ज़्यादा होता था वह दूसरे के साथ बांट लेता था । इस कलीसिया के लिए चेलों ने अपनी जान दे दी । प्रभु यीशु ने कलीसिया को अपने ख़ून से सींचा है । इसीलिए लिखा हुआ है कि जैसे एक देह के बहुत से अंग होते हैं , वैसे ही तुम भी प्रभु की देह के भिन्न-भिन्न अंग हो । तुम में से हर एक का भिन्न-भिन्न काम है । हर एक को भिन्न-भिन्न योग्यताएं दी गई हैं । परन्तु जैसे देह के बहुत से अंग मिलकर सामंजस्य के साथ काम करते हैं , वैसे ही हमें भी सामंजस्यता और एकता के साथ कार्य करना है । इसीलिए प्रभु यीशु क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले प्रार्थना करते हैं कि हे पिता , यह कलीसिया एक हो क्योंकि जब यह एकजुट होगी तो शक्तिशाली बनेगी और जयवन्त होगी तथा शैतान से लड़ पाएगी । वास्तव में होता यह है कि किसी बात पर थोड़ी सी असंतुष्टि हुई तो कलीसिया छोड़कर चले गए , हमारी नहीं सुनी गई तो अगुवों को कचहरी में खड़ा कर दिया । हम प्रभु की देह को तोड़ रहे हैं , उसके विरुद्ध लात उठा रहे हैं और सोचते हैं कि हम बच जाएंगे । प्रभु यीशु मसीह की देह पर अत्याचार करके हम बच नहीं सकते। इसीलिए इफिसुस की कलीसिया को प्रभु यीशु मसीह पत्र लिखते हैं और कहते हैं चेत जा ! अभी भी सुधरने का समय है । याद रख कि तू कहां से गिरा है । जिसका अर्थ है कि याद रख तू पहले कहां पर था ? याद करें अपने बाप-दादों को जिन्हें अस्पतालों में छोड़ दिया गया था । जिन्हें नदी-नालों में फेंक दिया गया था । उन्हें लोग उठाकर लाए , उनको पाला , उनको बढ़ाया , उनको सम्भाला। परन्तु प्रभु यीशु मसीह कहते हैं - तूने अपना पहला सा प्रेम छोड़ दिया है । इसीलिए मैं कहता हूं कि तू चेत जा ! मन फिरा नहीं तो मैं तेरी दीवट को उस स्थान से हटा दूंगा । क्या हम कलीसिया के प्रति गम्भीर हैं ? 2. हमें परमेश्वर के वचन के प्रति गम्भीर होना है :- परमेश्वर के जीवित वचन के द्वारा क्या हमारे जीवनों में कोई परिवर्तन आया है ? क्या वह परिवर्तन दूसरों को दिखाई देता है ? हम अपने जीवन की गवाही देने में घबराते हैं , क्योंकि वास्तव में हम कहते कुछ हैं और लोग हमारे जीवन में देखते कुछ और हैं । क्या हम एक बेहतर पति हैं ? क्या एक बेहतर पिता हैं ? क्या एक बेहतर सेवक या सेविका हैं ? क्या हमारा हृदय क्षमा करने वाला हृदय है ? वे आदतें जिनमें हम फंसे थे और जो हमारे शरीर और आत्मा को नरक की ओर ले जा रही थीं, क्या हमने उन आदतों को छोड़ दिया है ? याकूब 1:22 में लिखा है - "परन्तु वचन पर चलने वाले बनो , और केवल सुनने वाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं ।" यदि हम मानेंगे ही नहीं कि हम बीमार हैं तो ठीक कैसे होंगे ? यदि हम अपनी ग़लती नहीं मान रहे हैं तो ऐसा करके हम अपने आप को धोखा दे रहे हैं । मत्ती 12:46-49 में वर्णन है कि प्रभु यीशु प्रचार कर रहे हैं और एक बड़ी भीड़ बाहर खड़ी है । तब एक व्यक्ति आकर प्रभु यीशु से कहता है कि तेरी माता और तेरे भाई बाहर खड़े हैं और तुझसे मिलना चाहते हैं । प्रभु यीशु उनसे कहते हैं कि कौन है मेरी माता और कौन हैं मेरे भाई ? तब प्रभु यीशु अपने चेलों की ओर अपनी उंगली उठाते हैं और कहते हैं - "देखो , मेरी माता और मेरे भाई क्योंकि जो मेरे पिता की आज्ञा को मानते हैं , वे ही मेरी माता और वे ही मेरे भाई हैं ।" वे ही मेरे परिवार के लोग और वे ही मेरी कलीसिया हैं । इब्राहीम को जब परमेश्वर ने बुलाया तो उसने अपना घर और अपने लोगों को छोड़ दिया । वह ऐसे दोश की ओर चल पड़ा जिसे वह जानता भी नहीं था और उसने परमेश्वर से पूछा भी नहीं कि कहां जाना है । मूसा , मिस्र की ओर अकेला चला गया ताकि इस्राएलियों को बन्धुवाई से छुड़ाए । वह राजा के सामने जाकर कहता है - मेरे लोगों को जाने दे। तब वह इस स्वतन्त्रता संग्राम में लाखों लोगों की अगुवाई करता है और उन्हें बन्धुवाई से निकालकर वाचा के देश में ले आता है । स्तिफनुस प्रचार कर रहा था। लोग उससे कहते हैं कि यह प्रचार करना बन्द कर दे । वह कहता है , जो सच है वह मैं बोलूंगा । तब लोग उस पर पत्थरवाह करते हैं और उसकी हत्या कर देते हैं । एडोरनेम जैडसन 18 वीं सदी में भारत में मिशनरी बनकर आए थे । उस समय अंग्रेज़ों का राज था फिर भी उनको भारत से निकाल दिया गया । तब वे बर्मा चले गए और वहां जाकर प्रचार करना प्रारम्भ किया। वहां उन्हें जेल में डाल दिया गया और 6 वर्ष बाद बड़ी मुश्किल से उन्हें जेल से बाहर निकाला गया । लेकिन कुछ समय बाद उन्हें मृत्युदण्ड दे दिया गया । तब उनकी पत्नी ने दया याचिका की जो स्वीकार कर ली गई । उसके बाद 6 साल तक प्रचार करने के बाद पहला व्यक्ति सामने आया , जिसने प्रभु को ग्रहण किया। 62 वर्ष की उम्र में 12 अप्रैल 1850 को एडोरनेम जैडसम की मृत्यु हो गई परन्तु उनकी मृत्यु से पहले बर्मा में 2 लाख 10 हज़ार लोग मसीही बन चुके थे । जब हम परमेश्वर के कार्य को करने के लिए तैयार होते हैं , तब वह हमारे जीवनों से कार्य करता है । 3. हमारी प्राथमिकता क्या है ? :- यहेजकेल 33:33 में लिखा है ; "तू उनके सामने मधुर गीत गाने वाला और अच्छा बजानेवाला ठहरा है ।" कलीसिया लोगों के लिए मानो मनोरंजन का साधन हो गई है । जैसे कोई मधुर गीत गा रहा है और उनका मनोरंजन हो रहा है , इसलिए वे बैठे हैं । इतनी विषम परिस्थितियों में यहेजकेल कह रहा है कि ये जो सुन रहे हैं , इन्हीं से तो आशा है । इनमें से कोई तो धीरज से सुनेगा , किसी न किसी की तो आंखें खुलेंगी । कई बार ग़ैर मसीही लोग इस बात को लेकर आलोचना करते हैं कि मसीही लोग कलीसिया से तभी जुड़ते हैं जब उनका कोई व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध होता है । कई स्थानों पर कलीसियाओं में कार्यक्रमों के दौरान इसलिए भोज का आयोजन करना पड़ता है ताकि लोग आ सकें । क्या हम प्रभु यीशु की देह से बिना किसी स्वार्थ के जुड़े हैं ? या हम अपनी इच्छा और योजना के पूरे होने तक ही कलीसिया के साथ हैं ? जिस कलीसिया ने हमारे पूर्वजों को बचाया , बनाया , बढ़ाया , आशीषित किया ; क्या उसके प्रति कोई आभार है ? मेरे एक सहकर्मी भाई संस्था की ओर से नेपाल के भूकम्प ग्रस्त क्षेत्र में सहायता के लिए गए । वहां उन्होंने एक आराधना में भाग लिया । लौटकर आने पर उन्होंने कहा कि मैंने जो देखा मैं उस पर विश्वास नहीं कर पाया । सभी गांव बर्बाद हो चुके थे । वहां एक भी घर नहीं बचा था। बहुतों के बच्चे मर गए , किसी की पत्नी मर गई , किसी का पति मर गया , कितनों के मां-बाप मर गए । पर उस रविवार की आराधना में उनका उत्साह देखने लायक था । वे ऐसे गीत गा रहे थे , मानो वे जीत गए हों। जैसे उनको नोबल पुरस्कार मिल गया हो । वे ऐसे गीत गा रहे थे जैसे वे स्वर्ग पहुंच गए हों । उनके गीतों , प्रार्थना और उत्साह के उदाहरण ने मेरे दिल को झकझोर कर रख दिया । ऐसी है एक सच्ची कलीसिया जिसे भूकम्प भी हिला नहीं सका । 4. हमें अपनी मृत्यु के विषय में गम्भीर होना है :- प्रभु वाटिका में बनी अगली क़ब्र में कौन जाएगा ? उस अगले ताबूत में किसे रखा जाएगा ? किसके लिए कहा जाएगा कि धूल को धूल , मिट्टी को मिट्टी और राख को राख ? जो घटित होना है , वह होकर रहेगा। परन्तु हम ऐसे जीते हैं जैसे कुछ नहीं होगा । हमें समझना है कि समय बहुत तेज़ी से बीत रहा है । कैसे हमारे प्रिय लोग गुज़र जाते हैं , पता ही नहीं चलता । हमारा समय भी एक दिन आना है । लूका 9:25 में लिखा है - "यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपना प्राण खो दे, या उस की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा ?" एक बार मैं अमेरिका में आयोजित एक प्रमुख मसीही सम्मेलन में प्रचार कर रहा था । वहां मेरे प्रचार का विषय आशा था । उस प्रचार के दौरान कही गई बात से ही अपनी बात को समाप्त करूंगा । मेरे पिता कैंसर और न्यूरोलॉजी के दर्द में छटपटाते हुए मरे । लेकिन वह पीड़ा उनकी आशा और उनके विश्वास को नहीं तोड़ पाई । वह पीड़ा उनको प्रभु यीशु से दूर नहीं कर पाई । उस पीड़ा ने उनको इस बात के लिए प्रेरणा नहीं दी कि परमेश्वर पर उंगली उठाएं वरन् वे अनन्त की एक निश्चित आशा में इस संसार को छोड़कर चले गए । विश्व विजेता सिकन्दर ने मरने से पहले अपने अधिकारियों से बोल दिया था कि जब मेरा जनाज़ा निकले तो मेरे दोनों खाली हाथ कफ़न से बाहर रखना । ताकि लोग जान सकें कि आधी से ज़्यादा दुनिया में विजय पताका फहराने वाला , दुनिया का बेताज बादशाह , जिसके पास नाम , पद , इज़्ज़त , मान-मर्यादा सब कुछ था , वह इस दुनिया से ख़ाली हाथ ही गया । हमें परमेश्वर , कलीसिया , वचन , अपनी प्राथमिकताओं और अपनी मृत्यु के प्रति गम्भीर होना है । समय आ चुका है । अगर अब हम चूक गए तो हमारी आत्मा का , अनन्त मृत्यु और नर्क की आग निश्चित है । हमें अपनी कलीसिया को मज़बूत बनाना है । जो लोग परमेश्वर से दूर चले गए हैं , उन्हें वापस लाना है । यह परमेश्वर की इच्छा और योजना है । पिता परमेश्वर हम पर अपनी दया करे , अपनी सामर्थ्य दे और अपनी पवित्र आत्मा की अगुवाई दे । परमेश्वर आपको आशीष दे।