निर्णय का समय
सन्दर्भ :- 1 पतरस 4:1-7
हम एक ख़तरनाक संसार में रहते हैं , जहां शैतान का अन्धकार छाया हुआ है । उसे इस संसार का राजा कहा गया है । हम में से कई लोग कई बार ऐसी परिस्थितियों से गुज़रे होंगे जब हमें हमारे प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर नहीं मिला । इस संसार में हमें हमारे कई प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते क्योंकि यह संसार शापित है । इसीलिए बाइबिल में लिखा हुआ है कि अभी हमें धुंधला सा दिखाई देता है । परमेश्वर चाहता है कि हम अपने प्रश्नों से ऊपर उठकर अपना आत्म-मूल्यांकन करें । ऐसे कठिन समय निर्णायक साबित हो सकते हैं । हो सकता है आप ऐसे लोगों से मिले हों जिन्होंने अपने प्रिय की मृत्यु के समय उनकी क़ब्र के पास खड़े होकर अपना हृदय प्रभु यीशु को दिया । यह किसी भी व्यक्ति , परिवार या कलीसिया के लिए निर्णायक समय होता है । ऐसे समय में हम अपने आत्मिक , शारीरिक और मानसिक जीवन की समीक्षा कर सकते हैं । किसी क्रिकेट मैच का अन्तिम ओवर निर्णायक होता है । किसी छात्र के लिए परीक्षा से पहले की रात बहुत प्रमुख होती है । राजनीति में चुनाव के पूर्व का एक सप्ताह निर्णायक होता है । ऐसा समय जब हमारी ज़िन्दगियों में आता है तब हमारे पास अवसर होता है कि हम अपनी ज़िन्दगियों , परिवारों , अपनी युवा पीढ़ी , अपनी आत्मा , अपनी कलीसिया और अपने समाज की समीक्षा करें । विचार करें कि हमारी क्या ज़िम्मेदारी है ? इसीलिए 1 पतरस 4:7 में पौलुस लिखता है - "सब बातों का अन्त तुरन्त होने वाला है ; इसलिए संयमी होकर प्रार्थना के लिए सचेत रहो । और सब में श्रेष्ट बात यह है कि एक दूसरे से अधिक प्रेम रखो ; क्योंकि प्रेम अनेक पापों को ढांप देता है ।" उड़ाऊ पुत्र जब सुअरों के साथ रहकर उनका ही भोजन खाने लगा तो यह उसके लिए एक निर्णायक समय था । लूका रचित सुसमाचार के 15 वें अध्याय में यह बात लिखी है कि जब वह अपने आपे में आया तो यह उसके लिए निर्णायक समय था । उसके लिए यह ज़िन्दगी में सही दिश में जाने का समय था । सामरी स्त्री के लिए यह समय कुंए पर आया , जब उसकी मुलाकात उधरकर्त्ता और क्षमा करने वाले प्रभु यीशु से हुई । पौलुस के जीवन में यह समय तब आया , जब वह दमिश्क जा रहा था । उस से प्रभु यीशु कहते हैं - "है शाऊल ! हे शाऊल ! तू मुझे क्यों सताता है ?" तब शाऊल , पौलुस बन जाता है । जक्कई के लिए यह समय तब आया , जब प्रभु यीशु उस पेड़ के पास जिस पर जक्कई बैठा था , खड़े होकर कहते हैं - " हे जक्कई ! तू नीचे उतर आ क्योंकि मुझे तेरे घर आना आवश्यक है । 38 वर्षो से रोग से ग्रसित उस व्यक्ति के जीवन में यह समय तब आया जब बैतसेदा के कुण्ड के पास प्रभु यीशु से उसकी मुलाकात हुई और उसने उस रोगी से पूछा - "क्या तू चंगा होना चाहता है ?" प्रभु यीशु मसीह उस 38 वर्षो के रोगी से पूछते हैं कि क्या तू चंगा होना चाहता है ? क्या तू चाहता है कि तेरे पाप क्षमा हों ? कई बार हम चंगे होना ही नहीं चाहते हैं । हम दुःखी , पीड़ित और निराश ही रहना चाहते हैं । यह हमारी आदत बन जाती है और यह बात हमारे व्यवहार में भी झलकने लगती है । हम सोचने लगते हैं कि हम सब के लिए दया के पात्र बने रहें , सब हमारी दुख भरी कहानी पर ध्यान दें और हमारे लिए आंसू बहाएं और हमदर्दी जताएं । जब पतरस को प्रभु यीशु ने दूसरा मौका दिया तब उन्होंने उससे पूछा- क्या तू मुझसे प्रेम करता है ? क्या इन सबसे बढ़कर मुझसे प्यार करता है ? तब पतरस का जीवन बदल जाता है । जिसने प्रभु यीशु को नकारा था , वह उसके लिए क्रूस की मृत्यु को स्वीकार कर लेता है । 10 कोढ़ियों के जीवन में यह निर्णायक समय तब आया , जब प्रभु यीशु यरूशलेम की राह पर थे और एक गांव से होकर गुज़र रहे थे। तब वहां मौजूद कोढ़ी उसे पुकारने लगे- "हे दाऊद की सन्तान! हम पर दया कर ।" उसके आगे की घटना हमें मालूम है कि किस प्रकार उनकी ज़िन्दगी बदल गई । उनका शारीरिक , सामाजिक और आत्मिक जीवन बदल गया । हम नहीं जानते कि हमारी ज़िन्दगी का कितना समय बाकी है । हम नहीं जानते कि हम कब मिट्टी में मिल जाएंगे । क्रूस पर लटके हुए डाकू को समय मिला और उसने प्रभु यीशु को पहचाना। उसके लिए वह समय निर्णायक साबित हुआ और वह प्रभु यीशु से कहता है - "जब तू अपने राज्य में आए तो मेरी सुधि लेना ।" तब प्रभु यीशु उसके अतीत और उसके पापों को स्मरण किए बिना उससे कहते हैं - "तू आज ही मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा ।" पुराने नियम में इब्राहीम , मूसा , यशायाह , यिर्मयाह , योना , दानिय्येल , नूह और अय्यूब के जीवन में भी ऐसा निर्णायक समय आया , जब परमेश्वर से उनका आमना-सामना हुआ और उनकी ज़िन्दगी बदल गई । पतरस कहता है कि सब बातों का अन्त तुरन्त होने वाला है । उसके ऐसा लिखने के पीछे दो सम्भावित बातें हैं । पहली सम्भावना यह कि पतरस प्रभु यीशु के दूसरे आगमन की बात कर रहा है और दूसरी सम्भावना यह है कि पतरस हमारे क्षणिक जीवन की बात कह रहा है । जब वह यह पत्र लिख रहा था उस समय रोम का बादशाह नीरो था । वह मसीहियों को प्रताड़ित करता था । वह मसीहियों को अपने राजमहल के चारों तरफ बान्धकर उन्हें जला देता था ताकि उसकी महफिलें रोशन हो सकें । शायद इसीलिए पतरस लिखता है कि समय सीमित है । मुद्दे की बात यह है कि चाहे प्रभु यीशु के आगमन की बात हो , चाहे हमारी ज़िन्दगी के समापन की बात हो या फिर संसार के अन्त की बात हो ; समय कब बीत जाएगा पता भी नहीं चलेगा । इस संसार में हमें कोई याद नहीं रखेगा । ओस की बूंद के समान , खिलते हुए फूल के समान , घास के तिनके के समान हम भी भुला दिए जाएंगे । हमारे जीवन की त्रासदियां हमें स्मरण दिलाती हैं कि हमारा जीवन क्षणिक है। इसीलिए पतरस कह रहा है कि नामधारी मसीही मत बनो । परम्पराओं में मत उलझे रहो। समय समाप्त होता जा रहा है। ज़रूरी है कि हम सच्चाई से प्रभु यीशु का अनुगमन करें । हम आत्मावलोकन करें कि वास्तव में प्रभु यीशु हमारे जीवन में है कि नहीं ? वास्तव में हमारा नया जन्म हुआ है कि नहीं ? वास्तव में , उससे हमारा व्यक्तिगत सम्बन्ध है कि नहीं ? वास्तव में हम उसके रास्ते पर चल रहे हैं कि नहीं ? वास्तव में हमारा हृदय सही स्थान पर है कि नही ? ऐसा तो नहीं है कि हम सिर्फ़ दिखावा कर रहे हैं ! हम मुखौटे लगाकर केवल परम्पराएं निभा रहे हैं ! हम बातें तो बड़ी-बड़ी कर रहे हैं पर वैसी ज़िन्दगी नहीं जी रहे हैं । पतरस इस सन्दर्भ में तीन बातों की ओर हमारा ध्यान आकर्शित करना चाहता है । 1. पतरस चाहता है कि हम विचार करें कि हमारी मानसिकता कैसी है ? 1 पतरस 4:1 में लिखा है - "सो जब कि मसीह ने शरीर में होकर दुख उठाया तो तुम भी उस ही मनसा को धारण करके हथियार बान्ध् लो ।" 1 पतरस 4:7 में वह कहता है - "सचेत रहो।" इसी अध्याय की 19 वीं आयत में वह कहता है - "अपने प्राण को विश्वासयोग्य सृजनहार के हाथ में सौंप दें ।" ज़रूरी है कि हम सचेत रहे , सजग रहें , तैयार रहें , यीशु की मनसा को धारण कर लें और अपने प्राण को विश्वासयोग्य सृजनहार के हाथ में सौंप दें । बाइबिल में 'सचेत' शब्द अनेक स्थानों पर आया है । इस शब्द का इस्तेमाल मरकुस 5:15 में भी हुआ है । एक व्यक्ति जो दुष्टात्मा से ग्रसित था , क़ब्रों में रहता था और अपने आपे में नहीं था , लोग उसे ज़ंजीरों से बान्ध देते थे और उससे डरते थे । जब उस व्यक्ति को छुटकारा मिलता है और उसमें से दुष्टात्माएं निकल जाती हैं तो मरकुस 5:15 में लिखा है कि उस व्यक्ति को 'सचेत' बैठा देखकर लोग डर गए । प्रभु यीशु मसीह की शक्ति से वह अपने आपे में आ गया और उसकी मानसिकता प्रभु यीशु की मानसिकता जैसी हो गई । ऐसी ही मानसिकता की बात पतरस यहां करता है । यदि हमारी मानसिकता , हमारी प्राथमिकताएं सही हैं , यदि हमारे मनों में प्रभु की प्रभुता है , उसके प्रति आज्ञाकारिता है , और उसके लिए जीवन जीने की प्रतिबद्धता है तो चाहे कैसी भी परिस्थितियां आएं , हम पर कोई असर नहीं होगा । याकूब 1:15 में लिखा है - "यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो , तो परमेश्वर से मांगे , जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है ; और उसको दी जाएगी ।" परमेश्वर के द्वारा दी गयी बुद्धि केवल इसलिए नहीं है कि हम सांसारिक परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो जाएं परन्तु परमेश्वर के द्वारा हमें बुद्धि इसलिए दी गयी है ताकि हम सही-ग़लत , नैतिक-अनैतिक और सांसारिक -आत्मिक में अन्तर कर सकें । इसी सन्दर्भ में याकूब कहता है कि अन्त के दिनों में झूठे शिक्षक तुम्हे भरमाएंगे । जो वचन की बातों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करेंगे। जो किसी वर्ग विशेष को ही मसीही कहलाया जाना मानेंगे। परन्तु प्रभु यीशु अधर्मी , पापी , निकम्मे , नालायक और निकृश्ट लोगों के लिए इस संसार में आया । प्रभु यीशु ने अपने अनुग्रह से , उसके लहू को बहाकर हम जैसे पापियों को छुटकारा दिया है। यही हमारी आशा है । हम प्रभु यीषु के रक्त की गम्भीरता को समझते हैं । 1 पतरस 4:2 में लिखा है - "भविष्य में अपना शेष शरीरिक जीवन मनुष्यो की अभिलाशाओं के अनुसार नहीं वरन परमेश्वर की इच्छा के अनुसार व्यतीत करो ।" हमारी मानसिकता को प्रभावित करने वाली कुछ प्रमुख बातें इस प्रकार से हैं । पहली बात जो हमारी मानसिकता को प्रभावित करती है , वह है शराब । बहुत से स्थानों पर मसीही समाज में मौजूद यह एक गम्भीर समस्या है । शराब किसी व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता को क्षीण कर देती है । यह हमारी शारीरिक , आत्मिक और मानसिक क्षमता को कमज़ोर कर देती है। शराब हमारे परिवारों , हमारी युवा पीढ़ी और हमारी सेवकाई को बर्बाद कर देती है । दूसरी बात जो हमारी मानसिकता को प्रभावित करती है वह है टेलीविजन । टेलीविजन अपने आप में खराब नहीं है । टेलीविजन के माध्यम से मसीहियत का प्रचार जितनी तेज़ी से हो रहा है वह अविश्वसनीय है । टेलीविजन के माध्यम से कई लोग प्रभु यीशु मसीह को जान रहे हैं । जिन जगहों पर हम प्रचारकों को नहीं भेज सकते हैं , वैसी जगहों पर मीडिया के द्वारा अदभूत तरीके से सुसमाचार का प्रचार हो रहा है । परन्तु त्रासदी यह है कि जिस माध्यम को परमेश्वर ने अपने कार्य के लिए अभिषिक्त किया और चुना है , शैतान उसका ग़लत तरीके से इस्तेमाल करने लगता है । प्रश्न यह है कि हम और हमारे बच्चे कितना समय कौन से टेलीविजन धारावाहिकों को देखते हुए व्यतीत कर रहे हैं । जिसमें हास्य के नाम पर पिता , अधिकारी और परमेश्रर का मखौल उड़ाया जाता है । जहां फैशन के नाम पर नंगेपन को दिखाते हैं । जहां आधुनिकता के नाम पर नशे को उचित ठहराया जाता है । कई विज्ञापन भौतिकवाद को बढ़ावा देते हैं । इन सारी बातों से हमारी मानसिकता प्रभावित होती है । उन दिनों जब टेलीविजन और वीडियो गेम्स नहीं थे , बच्चे अपने दोस्तों के साथ हंसते-खेलते थे । उन दिनों में दोस्तों के साथ संगति और सहभागिता होती थी । एक अच्छी खेल भावना का निर्माण होता था । 2 पतरस 3:10-11 में लिखा है -च "परन्तु प्रभु का दिन चोर की नाईं आ जाएगा , उस दिन आकाष बड़ी हड़हड़ाहट के शब्द से जाता रहेगा , और तत्व बहुत ही तप्त होकर पिघल जाएंगे , और पृथ्वी और उस पर के काम जल जाएंगे । तो जबकि ये सब वस्तुएं , इस रीति से पिघलने वाली हैं , तो तुम्हें पवित्र चाल-चलन , और भक्ति में कैसे मनुष्य होना चाहिए ।" जब ऐसा होने वाला है तो हमारी भक्ति कैसी होनी चाहिए ? जब हम अनन्त की छाया में हैं तो हमारा ध्यान कहां होना चाहिए ? चौथी बात जो हमारी मानसिकता को प्रभावित करती है वह है संगति । भजन संहिता 1:1-2 में लिखा है - "क्या ही धन्य है वह पुरुष जो दुष्टों की युक्ति पर नहीं चलता , और न पापियों के मार्ग में खड़ा होता ; और न ठट्ठा करने वालों की मण्डली में बैठता है । परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता है ; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है ।" 1 कुरिन्थियों 15:33 में लिखा है - "धोखा न खाना, बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है ।" हमारी संगति किसके साथ है ? क्या हम विश्वासवासियों के साथ संगति करते हैं ? क्या हमारी संगति में प्रार्थना है ? क्या हमारी संगति में भावनाओं का आदान-प्रदान है ? क्या हमारी संगति में इस बात का अहसास है कि हम सब प्रभु यीशु की देह के अंग हैं ? 2. पतरस चाहता है कि हम शेष जीवन के विषय में विचार करें । 1 पतरस 4:5 में न्याय के दिन का भी ज़िक्र है , लिखा है - "पर वे उसको जो जीवतों और मरे हुओं का न्याय करने को तैयार है , लेखा देंगे।" ध्यान दें ! शेष दिन , बचे हुए दिन , न्याय का दिन और परमेश्वर को लेखा देने की बात है । प्रकाशितवाक्य 1:17-18 में यूहन्ना लिखता है - "जब मैं ने उसे देखा , तो उसके पैरों पर मुर्दा सा गिर पड़ा और उस ने मुझ पर दाहिना हाथ रखकर कहा , कि मत डर ; मैं प्रथम और अन्तिम और जीवता हूं । मैं मर गया था , और अब देख ; मैं युगानुयुग जीवता हूं ; और मृत्यु और अधोलोक की कुंजियां मेरे ही पास है ।" जब यूहन्ना ने प्रभु यीशु मसीह को सम्पूर्णता से देखा तो लिखा हुआ है कि वह उसके पैरों पर मुर्दा सा गिर गया । यशायाह लिखता है - "जिस वर्ष उजिय्याह राजा मरा मैंने प्रभु को बहुत ही ऊंचे सिंहासन पर विराजमान देखा ; और उसके वस्त्र के घेर से मन्दिर भर गया" (6:1) । यहां यशायाह परमेश्वर की पवित्रता , उसकी सम्पूर्णता और उसकी महानता का बखान कर रहा है । फिर आगे 5 वीं आयत में वह कहता है - "हाय! मैं नाश हुआ ; क्योंकि मैं अशुद्ध होंठ वाला मनुष्य हूं , और अशुद्ध होंठ वाले मनुष्यो के बीच में रहता हूं ; क्योंकि मैंने सेनाओं के यहोवा महाराजाधिराज को अपनी आंखों से देखा है ।" यूहन्ना ने प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ्य का अनुभव किया था । यदि हमने अपनी ज़िन्दगी में प्रभु यीशु मसीह की सामर्थ्य का अनुभव नहीं किया है तो हम केवल नामधारी मसीही हैं । 3. पतरस चाहता है कि हम ध्यान दें ; इन सब बातों के उस पार देखने की क्षमता के विषय में । त्रासदियों के आगे देखने की क्षमता , ज़िन्दगी , मृत्यु , अनुत्तरित प्रश्न , शंका , पीड़ा और क़ब्र के पार देखने की क्षमता के विषय में पतरस बात करता है । 1 पतरस 5:10-11 में पतरस समस्याओं के पार देखने की बात कह रहा है । हमारे जीवन में आज भी बहुत सी शंकाएं और अनुत्तरित प्रश्न हो सकते हैं । परन्तु पतरस लिखता है कि "अब परमेश्वर जो सारे अनुग्रह का दाता है , जिसने तुम्हें मसीह में अपनी अनन्त महिमा के लिए बुलाया , तुम्हारे थोड़ी देर तक दुःख उठाने के बाद आप ही तुम्हें सिद्ध और स्थिर और बलवन्त करेगा । उसी का साम्राज्य युगानुयुग रहे। आमीन !" प्रभु यीशु मसीह के जीवनकाल में 3 प्रमुखतम दिन थे । प्रत्येक विश्वासी के जीवन में भी ये तीन प्रमुखतम दिन आते हैं । हर मसीही के जीवन में शुक्रवार , शनिवार और रविवार आते हैं । शुक्रवार के दिन प्रभु यीशु को यातनाओं से गुज़रना पड़ा था । उसे क्रूस पर चढ़ाया गया और उसकी निर्मम हत्या कर दी गई थी । शुक्रवार का दिन पीड़ा , दर्द , विश्वासघात , यातनाएं , निरादर , निराशा , अन्धकार और मृत्यु की छाया का दिन था । ऐसी पीड़ा से भरे हुए दिन से शायद आप भी गुज़रे हों , या कभी न कभी गुज़रेंगे या वर्तमान में गुज़र रहे होंगे । शनिवार के दिन प्रभु यीशु की देह को क़ब्र में रख दिया गया । हमारी ज़िन्दगी में भी ऐसा समय आता है । उस समय चेले डरकर भाग गए और उनके जीवन में शंका , असमंजस और अनुत्तरित प्रश्न आ गए और अनिश्चितता का वातावरण छा गया । हो सकता है आज हमारी ज़िन्दगियों में वही शनिवार का दिन हो , हमारे मन में भी शंका हो , धुंधलका हो , असमंजस की स्थिति हो , अनुत्तरित प्रश्न हों और अनिश्चिता हो । तत्पश्चात प्रभु यीशु मसीह की ज़िन्दगी में रविवार आता है जो पुनरुत्थान का दिन है । वह दिन हमारी ज़िन्दगी में भी आने वाला है बशर्ते प्रभु यीशु हमारे हृदय में हो और हमारा उससे सही सम्बन्ध् हो । उसके पुनरुत्थान का दिन हमारे भी पुनरुत्थान का दिन है । मृत्यु पर विजय का दिन , परमेश्वर की असीमित और अनन्त सामर्थ के प्रगटीकरण का दिन , जीवन के उन्माद और अनन्त जीवन के प्रत्यक्ष दर्शन का दिन , परमेश्वर की विजय के उत्साह और जश्न का दिन । उस दिन राजा की सम्पूर्ण ताकत , सेना की ताकत , सम्पूर्ण भीड़ की ताकत और सारे विद्रोहियों की ताकत धराशायी हो गईं । वह दिन हमारे जीवनों में भी आएगा । प्रश्न यह है कि चाहे शुक्रवार हो या शनिवार ; हमारा ध्यान कहां लगा हुआ है ? हम शुक्रवार और शनिवार के आगे रविवार को देखें । हम मृत्यु के पार अनन्त जीवन को देखें। हम क़ब्र के पार उद्धार के अनन्त जीवन के द्वार को देखें । हम त्रासदियों के पार प्रभु यीशु के क्रूस को देखें । परमेश्वर हम सभों को आशीष दे।