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हमारे शब्दों का प्रभाव - आज और अनन्त तक

हमारे शब्दों का प्रभाव - आज और अनन्त तक

सन्दर्भ :- मत्ती 12:36

हमारी बातचीत बहुत महत्वपूर्ण होती है। कई बार हम बिना सोचे समझे जो भी मन में आता है , कह देते हैं । ऐसा व्यवहार हमारे जीवन , सम्बन्धों और हमारी नियति के लिए ख़तरनाक हो सकता है ।
वचन में लिखा हुआ है - अच्छा वृक्ष अच्छा फल देता है और बुरा वृक्ष बुरा फल देता है। हमारी बातचीत से ही पता चलता है हम किस की सन्तान हैं , परमेश्वर की सन्तान या शैतान की ?
हम किस वृक्ष के फल हैं ? हमारा पिता कौन है ? हमारी बातचीत कैसी होना चाहिए और हमारी बातचीत का क्या प्रभाव होता है ? इन बातों पर हम विचार करेंगे ।

नीतिवचन 18:7, 21-22 में लिखा है - "मूर्ख का विनाश उसकी बातों से होता है और उसके वचन उसके लिए फन्दे होते हैं । जीभ के वश में मृत्यु और जीवन दोनों होते हैं ।" नीतिवचन का लेखक यहां पर हमारी शारीरिक मृत्यु नहीं बल्कि अनन्त मृत्यु की बात कर रहा है । वह स्वर्ग और नरक की बात कर रहा है । मृत्यु और जीवन जीभ के वश में होते हैं और जो उसे जिस रीति से काम में लाता है , वह उसका वैसा ही फल भोगेगा ।

बातचीत के विषय में हम कुछ बातें देखेंगे ।

1. हमारी बातचीत हमारे सम्बन्धों को प्रभावित करती है :- हम उन लोगों के पास जाना पसन्द करते हैं जिनके पास हमें सुपरामर्श मिल सके , जिनके पास हमें क्षमा की वाणी मिल सके । हम उन लोगों के पास जाना चाहते हैं जो हमसे गलती होने पर भी हमें समझाएं , हमसे प्रेम से बात करें, जिनकी बातों को सुनकर हमें प्रोत्साहन मिले । हम ऐसे लोगों के पास जाना नहीं चाहते जो दिल में चुभने वाली बात करते हैं , नकारात्मक बातें करते हैं ।
याकूब 3:5-6 में लिखा है - "जीभ भी एक छोटा सा अंग है और बड़ी-बड़ी डींगे मारती है । देखो , थोड़ी सी आग से कितने बड़े वन में आग लग जाती है । जीभ भी एक आग है ; जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है , और सारी देह पर कलंक लगाती है , और भवचक्र में आग लगा देती है और नरक कुण्ड की आग से जलती रहती है ।"
हमारे सम्बन्धों को ये बातें ही जोड़ती या तोड़ती हैं। छोटी सी बातों से घनिष्ठ सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं , परिवार टूट जाते हैं । यह जो जीभ परमेश्वर ने हमें दी है , यह आग है और इस आग का इस्तेमाल सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी । हमारी कटु वाणी हमारे व्यक्तिगत सम्बन्धों को जला सकती है , बर्बाद कर सकती है । न सिर्फ़ इतना ही परन्तु परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध को भी यह जीभ बर्बाद कर सकती है ।
गिनती 11:1 में लिखा है - "फिर वे लोग बड़बड़ाते और यहोवा के सुनते बुरा कहने लगे । निदान यहोवा ने सुना और उसका कोप भड़क उठा । और यहोवा की आग उनके मध्य में जल उठी और छावनी को एक किनारे से भस्म करने लगी ।"
इस्राएली लोग बड़बड़ाते, बकबक करते और आलोचना करते थे। उनका स्वर हमेशा शिकायती होता था । तब लिखा है कि उनके बड़बड़ाने से परमेश्वर का क्रोध भड़क गया और उनके मध्य में आग जल उठी और छावनी को एक कोने से भस्म करने लगी ।
गिनती 21:5-6 में लिखा है - "सो वे परमेश्वर के विरुद्ध बात करने लगे , और मूसा से कहा , तुम लोग हम को मिस्र से जंगल में मरने के लिए क्यों ले आए हो ? यहां न तो रोटी है , और न पानी , और हमारे प्राण इस निकम्मी रोटी से दुखित हैं । सो यहोवा ने उन लोगों में तेज विषवाले सांप भेजे , जो उनको डसने लगे और बहुत से इस्राएली मर गए ।"
परमेश्वर ने इस्राएलियों को मन्ना खिलाया , उनके वस्त्र कभी ख़राब नहीं होने दिए । परमेश्वर ने लाल समुद्र को दो भागों में बांट दिया परन्तु इसके साथ ही परमेश्वर ने तेज विश वाले सांप भी भेजे जिससे बहुत से इस्राएली मर भी गए क्योंकि वे बड़बड़ाते और कुड़कुड़ाते थे ।
हमारे शिकायती व्यवहार से परमेश्वर का क्रोध भड़कता है और परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्धों पर बुरा प्रभाव पड़ता है ।

2. हमारी बातचीत, हमारी आत्मिक परिपक्वता को प्रगट करती है :- पौलुस अपने जीवन के अन्तिम समय में अपने शिष्य तीमुथियुस को पत्र लिखता है - "कोई तेरी जवानी को तुच्छ न समझने पाए । विश्वासियों के लिए आदर्श बन जा" (1 तीमुथियुस 4:12) ।
सबसे पहली बात वह कहता है कि वचन में सिद्ध हो जिससे तेरा चाल-चलन सिद्ध हो , जब चाल-चलन अच्छा होगा तब तू प्रेम में परिपक्व होगा और तेरा विश्वास मजबूत होगा और तब तू विश्वासियों के लिए आदर्श बन सकेगा । हमारे शब्द किसी के लिए दवा के समान हो सकते हैं और ज़हर के समान भी । हमारे शब्द किसी के दिल में शान्ति भी ला सकते हैं और किसी के मन में तनाव भी उत्पन्न कर सकते हैं । हमारे शब्द किसी टूटे-बिखरे व्यक्ति को जोड़ सकते हैं और हमारे कटु शब्द किसी मजबूत व्यक्ति को तोड़ भी सकते हैं । हमारी आत्मिक परिपक्वता का मापदण्ड हमारे शब्द होते हैं ।

3. हमारी बातचीत हमारी नियति और हमारे अनन्त को प्रभावित करती है :- मत्ती 12:36 में लिखा है - "और मैं तुम से कहता हूं जो-जो निकम्मी बातें मनुष्य कहेंगे न्याय के दिन हर एक बात का लेखा देंगे । क्योंकि तू अपनी बातों के कारण निर्दोष और अपनी बातों के ही कारण दोशी ठहराया जाएगा ।" न्याय के दिन हमारी कही हुई निकम्मी बातों के द्वारा ही हम दोषी ठहराए जाएंगे ।

4. हमारी बातचीत हमारी मानसिकता को प्रगट करती है :- जिस व्यक्ति की मानसिकता सकारात्मक और सोच आत्मिक है वह व्यक्ति वैसी ही बातें करता है । उसके स्वभाव में प्रेम , अनुग्रह और क्षमाशीलता होती है ।

मत्ती 12:34-35 में लिखा है - "हे सांप के बच्चों , तुम बुरे होकर क्योंकर अच्छी बातें कह सकते हो ? क्योंकि जो मन में भरा है , वही मुंह पर आता है। भला , मनुष्य मन से भले भंडार की भली बातें निकालता है और बुरा मनुष्य बुरे भंडार से बुरी बातें निकालता है ।"
मत्ती 15:18 में लिखा है - "परन्तु जो कुछ मुंह से निकलता है वही मन से निकलता है और वही मनुश्य को अशुद्ध करता है ।" जो मन में होता है वही मुंह से निकलता है और वही मनुष्य को अशुद्ध करता है । यहां अशुद्ध होने का अर्थ शारीरिक अशुद्धता नहीं है । परन्तु इससे हमारा शरीर कलंकित होता है और हमारी आत्मा अशुद्ध होती है । बातचीत हमारी मानसिकता को प्रगट करती है ।

5. याकूब 3:8 में लिखा है - "पर जीभ को में मनुष्य से कोई वश में नहीं कर सकता । यह एक ऐसी बला है जो कभी रुकती नहीं ।" याकूब लिखता है कि जीभ को मनुष्य में से कोई वश में नहीं कर सकता । हम अगर चाहे कि स्वयं अपनी शक्ति से अपनी जीभ को वश में ले आएं तो ऐसा अत्यन्त कठिन है । यहां पर जो शब्द आया है ‘वश’ उसके लिए ग्रीक और अंग्रेजी भाषा के शब्द का अर्थ है- 'जिसे स्वयं भी वश न किया जा सके' । जैसे दहाड़ता हुआ क्रोध से भरा सिंह । न वह अपने आपको वश में कर सकता है और न कोई दूसरा उसको वश में कर सकता है । यहां पर एक जंगली पागल हाथी से इस शब्द की तुलना की गई है । परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य से , उसके नियंत्रण में रहने से , उस के निर्देशों का पालन करने और उस के प्रति समर्पण से ही हम जीभ पर नियंत्रण कर सकते हैं ।

स्वयं पर नियंत्रण रखने के सम्बन्ध में कुछ बातें

1. क्रोधित होकर अनियंत्रित होने से पहले यह करना है कि हमें ख़ामोश रहना है ।

भजन संहिता 39:1 में लिखा है - "मैंने कहा मैं अपनी चाल-चलन में चौकसी करूंगा ताकि मेरी जीभ से पाप न हो । जब तक मे दुष्ट मेरे सामने है तब तक मैं लगाम लगाए अपना मुंह बंद किए रहूंगा ।"
जब हम अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाते और यदि कोई दुष्ट व्यक्ति हमारे सामने खड़ा होता है तो हम अपना रिमोट कंट्रोल मानो उसके हाथ में दे देते हैं ।
वचन में लिखा है - चुप हो जाओ और जान लो कि मैं ही परमेश्वर हूं । जब हम ख़ामोश हो जाते हैं और जान लेते हैं कि परमेश्वर हमारे साथ है तब हम उसकी सामर्थ्य को काम करने देते हैं ।
यशायाह 53:7 में लिखा है - "वह सताया गया तौभी वह सहता रहा और उसने अपना मुंह न खोला । जिस प्रकार भेड़ वध होने के समय व भेड़ी ऊन कतरने के समय शान्त रहती है वैसे ही उसने भी अपना मुंह न खोला ।"
मरकुस 14:7,61 में लिखा है - "तब महायाजक ने बीच में खड़े होकर यीशु से पूछा; कि तू कोई उत्तर नहीं देता ? ये लोग तेरे विरोध में क्या गवाही देते हैं ?"
महायाजक प्रभु यीशु से कहता है कि लोग तुझे मार रहे हैं , पीट रहे हैं , तेरे मुंह पर थूक रहे हैं , तुझे निर्वस्त्र कर रहे हैं , तेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं पर तू कोई उत्तर नहीं देता । इस पर भी यीशु मौन साधे रहा और उसने कुछ उत्तर न दिया ।
सभोपदेशक 3:7 में लिखा है - "बोलने का समय है और ख़ामोश रहने का भी समय है ।"
यदि हमें खुद को नियंत्रण में रखना है तो ख़ामोश रहना सीखना होगा । जब क्रोध आए तो ख़ामोश रहने का प्रयास करें । क्रोध आने पर दूसरे कमरे में चले जाएं या गाड़ी उठाकर घूमने चले जाएं । थोड़ी देर के लिए अपने आप को उस परिस्थिति से अलग कर लें। जाकर संगीत सुनने लगें ।

2. चुन लें कि हम शैतान को अवसर देंगे या परमेश्वर को ।

जब तनाव और क्रोध का समय हो तो यह बहुत प्रमुख क्षण है , हमें निर्णय करना है कि हम किसको अवसर देंगे ; परमेश्वर को या शैतान को !
इफिसियों 4:26-27 - "क्रोध तो करो पर पाप मत करो । सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे और न शैतान को अवसर दो ।"
कभी कभी हमारे निकटतम लोगों के कारण ही ऐसी परिस्थिति निर्मित हो जाती है । जब प्रभु यीशु मसीह बता रहे थे कि मेरे मरने का समय आ गया है । तब पतरस यीशु को एक तरफ ले जाकर कहने लगा, तू क्या बात कर रहा है, ऐसा कभी भी ना हो । तब प्रभु यीशु ने पतरस को झिड़कते हुए कहा - "हे शैतान मेरे सामने से दूर हो जा" (मत्ती 16:22-23) ।
यीशु ने शैतान को कार्य करने का अवसर नहीं दिया । अगर हम परमेश्वर को कार्य करने का अवसर देंगे तो हमारे परिवार बर्बाद होने से बचेंगे । हमारे सम्बन्ध समाप्त होने से बचेंगे । हमारा चरित्र विघटित होने से बचेगा।

3. हमें याद रखना है कि बुराई को बुराई से नहीं जीता जा सकता ।

संसार तो बदला लेना सिखाता है । परन्तु क्या बुराई से बुराई को जीता जा सकता है ? क्या इस प्रकार से कोई समस्या दूर होगी ? आरोप लगाने वाले से विवाद करके क्या हम उससे हमारे सम्बन्धों को सुधार सकते हैं ? क्या विवाद को समाप्त कर सकते हैं ? नहीं !
यदि प्रभु यीशु मसीह के जीवन को देखें तो उस ने अपने साथ बुरा करने वालों के साथ भी भलाई की । जो लोग प्रेम करने के योग्य नहीं थे जिनसे संसार घृणा करता था , उनसे भी प्रभु यीशु ने प्रेम किया । जिन्होंने उसको मारा-पीटा, उस पर थूका, उसका अपमान किया, उसकी हत्या करनी चाही; उन्हें भी उस ने क्षमा किया । उसके पास तो सारा अधिकार है, वह कहता तो स्वर्गदूतों की सेनाएं आ जातीं और सब को नाश कर देतीं । फिर कहां होता हेरोदेस ? कौन पीलातुस ? कौन सेनापति ? कौन सिपाही? कौन सी रोमी सल्तनत? प्रभु यीशु के एक इशारे पर सब के सब समाप्त हो जाते । परन्तु उसने उस अपमान, पीड़ा और क्रूस की दर्दनाक मौत को ख़ामोशी से सहा ।
इन सब बातों को सहते हुए प्रभु यीशु ने हमारे लिए उद्धार का रास्ता निकाला । अगर प्रभु यीशु बुराई से बुराई को जीतने का रास्ता निकालते तो मैं और आप इस संसार में न होते और न हमें अनन्त जीवन की आशा होती । प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि यदि तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान कहलाना चाहते हो तो उसके लिए यह ज़रूरी है कि तुम अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिए प्रार्थना करो ।
जब हम ऐसा करते हैं तो इन कठिन परिस्थितियों में परमेश्वर की सामर्थ्य को कार्य करने का अवसर देते हैं ।
जब हम अनियंत्रण की स्थिति का क्रोध , तनाव , विषमताओं का सामना स्वयं अपनी ताकत से करने की कोशिश करते हैं तब हम बुरी तरह से विफल हो जाते हैं । इसीलिए पौलुस कहता है जब भी मैं कमज़ोर होता हूं तभी परमेश्वर की सामर्थ्य मेरे जीवन में काम करती है । जब हम अपने अहं का त्याग कर देते हैं तब परमेश्वर की सामर्थ्य काम करती है । तब उसकी योजना हमारे जीवनों में पूरी होती है और उसकी गवाही होती है ।

अन्त में, यह बात कि हमारी बातचीत कैसी होनी चाहिए ?

पहली बात - फिलिप्पियों 4:8 में लिखा है - "निदान , हे भाइयों , जो जो बातें सत्य हैं , और जो जो बातें आदरणीय हैं , और जो जो बातें उचित हैं , और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं , और जो जो बातें मनभावनी हैं , हे , निदान , जो जो और प्रशंसा की बातें हैं । उन्हीं पर ध्यान लगाया करो ।" इस आयत में खास बात यह है कि हमें अच्छी और पवित्र बातों की ओर ध्यान लगाना है । किसी की बुराई , नकारात्मक पक्ष , कमज़ोरी पर नहीं परन्तु अच्छी बातों पर जो कि आदरणीय, उचित, पवित्र, सुहावनी, सदभावनी, सदगुण और प्रशंसा की बातें हैं, उन पर चिन्तन करना है ।

दूसरी बात - याकूब 5:12 में लिखा है - "तुम्हारी बातचीत हां की हां और ना की ना हो कि तुम दण्ड के योग्य न ठहरो ।"

एक मसीही के रूप में हमारी बातों में खराई हो , हमारी हां की हां और न की न हो , अगर इसके विपरीत हुआ तो हम दण्ड के योग्य ठहरेंगे ।

तीसरी बात - कुलुस्सियों 4:6 में लिखा है - "तुम्हारा वचन सदा अनुग्रह सहित हो ।"

यह बहुत प्रमुख बात है कि हमारा वचन सलोना हो । हमें हर मनुष्य को उचित रीति से उत्तर देना है । पौलुस कहता है कि तुम्हारा वचन अनुग्रह के साथ हो । अनुग्रह में दो तत्व प्रमुख हैं । क्षमा है और प्रेम । हमारा वचन अनुग्रह के साथ क्यों होना चाहिए ? क्योंकि हम पर परमेश्वर का अनुग्रह हुआ है । हमसे परमेश्वर ने प्रेम किया है । प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें क्षमा मिली है । केवल यीशु के अनुग्रह के द्वारा हम स्वर्ग में जा सकते हैं । हमें अपने विरोधी से भी अनुग्रह से भरी हुई बात करनी है ।

चैथी बात - इफिसियों 4:29 में लिखा है - "कोई गंदी बात तुम्हारे मुंह से न निकले , पर आवश्यकता के अनुसार वही जो उन्नति के लिये उत्तम हो , ताकि उस से सुननेवालों पर अनुग्रह हो ।"

क्या हमारी बात आवश्यकता के अनुसार होती है ? या हम थोड़ी ज़्यादा ही सलाह दे देते हैं । वही कहें जो दूसरों की उन्नति के लिए उत्तम हो ताकि उससे सुनने वालों पर अनुग्रह हो । सुनने वालों को इस बात का अहसास हो कि आपके साथ गलत व्यवहार करने के बावजूद भी आपकी वाणी में उनके लिये प्रेम और क्षमा है ।
जो बिना सोचे समझे बक-बक करते, आलोचना करते , नकारात्मक बातें और अपशब्द कहते हैं उनको लेखा देना पड़ेगा । इन बातों से परमेश्वर का क्रोध भड़कता है । परन्तु यदि हमारी बातचीत के द्वारा हम शैतान को अवसर न दें तो हम बुराई को भलाई से जीत लेंगे । हमारा ध्यान उन बातों पर लगा रहे जो परमेश्वर की दॄष्टि में उचित हैं । हमारी बातचीत दूसरों के लिए उन्नति का कारण हो ताकि वे प्रभु यीशु के पास आ सकें । यह बात उतनी मायने नहीं रखती कि यदि कोई कहे कि आपने हमसे बड़ी अच्छी बात कही और हमें अच्छी नौकरी मिल गई ; आपने हमारा अच्छा मार्गदर्शन किया । उन्नति तो तब होगी जब वे प्रभु यीशु मसीह के पास आएंगे और अनन्त जीवन के भागी होंगे । परमेश्वर ने हमारे लिए सब कुछ किया है । उसने हम पर दया की है। उसने हमसे प्रेम किया है और उसका अनुग्रह हमारे साथ है ।

काश ! इन बातों की गवाही हमारी बातचीत में हो और आज से हम ठान लें कि कभी अपशब्द नहीं कहेंगे । आज से जो भी हमारा वचन होगा वह अनुग्रह से भरा हुआ होगा ।

परमेश्वर आपको आशीष दे।