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क्रिसमस से पूर्व का दृश्य

क्रिसमस से पूर्व का दृश्य

संदर्भ: लूका 1ः26-38

क्रिसमस, अर्थात् प्रभु यीशु मसीह के इस संसार में आगमन का पर्व। इस पहले क्रिसमस से पूर्व का चित्र देखें तो उस चित्र में मरियम और यूसुफ को पाते हैं। प्रभु का दूत आकर उन दोनों को परमेश्वर की योजना का सन्देश देता है। हम पाते हैं कि यूसुफ और मरियम, दोनों ही भयभीत होते हैं, घबराते हैं कि अब क्या होगा और उसके बाद सारा घटनाक्रम घटित होता है। क्रिसमस की घटना से पूर्व के दृश्य, परिस्थितियों और चरित्रों के माध्यम से हमारे लिए मिलने वाली शिक्षाओं पर हम विचार करेंगे।

1. परमेश्वर अपनी महान योजना को पूरा करने के लिए साधारण मनुष्यों को चुनता है:-परमेश्वर अपनी असाधारण योजना को पूरा करने के लिए साधारण मनुष्यों को चुनता है, उन्हें बुलाता है, उनको दर्शन देता है। उनको इस्तेमाल करता है। मत्ती 1ः20 में यूसुफ के विषय में लिखा है कि - “जब वह इन बातों के सोच ही में था तो प्रभु का स्वर्गदूत उसे स्वप्न में दिखाई देकर कहने लगा; हे यूसुफ दाऊद की सन्तान, तू अपनी पत्नी मरियम को अपने यहां ले आने से मत डर; क्योंकि जो उसके गर्भ में है, वह पवित्र आत्मा की ओर से है”। उसके बाद लूका 1ः26 में हम पाते हैं कि “छठवें महीने में परमेश्वर की ओर से जिब्राईल स्वर्गदूत गलील के नासरत नगर में एक कुंवारी के पास भेजा गया”।

यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के माता-पिता के पास दूत आता है। यूहन्ना का जन्म होता है कि वह प्रभु यीशु के आगमन की उद्घोषणा करे, उसका मार्ग प्रशस्त करे। परमेश्वर गड़ेरियों को चुनता है कि प्रभु यीशु के जन्म का सन्देश दूसरों तक प्रगट करें, जैसा लिखा है कि “गड़ेरियों ने आपस में कहा, आओ, हम बैतलहम जाकर यह बात जो हुई है, और जिसे प्रभु ने हमें बताया है, देखें” (लूका 2ः15)। परमेश्वर गड़ेरियों जैसे सामान्य लोगों को चुनता है।

परमेश्वर यूसुफ को चुनता है जो एक बढ़ई था परन्तु उसके विषय में लिखा हुआ है कि वह एक धर्मी मनुष्य था। परमेश्वर मरियम को चुनता है, जो एक साधारण-सी महिला थी, जिसकी कोई विशिष्ट पहचान नहीं थी। परमेश्वर चुनता है ऊंट के रोम का वस्त्र पहनने वाले यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले को कि परमेश्वर के पुत्र के आगमन का प्रचार करे। इसी रीति से परमेश्वर हम में से हर एक को चुनता है। हम में से हर एक के लिए परमेश्वर की एक योजना है।

अक्सर हम कहते हैं कि परमेश्वर ने फलां व्यक्ति को चुना है, इसका अर्थ यह है कि इसे प्रचार करना है, इसे पास्टर बनना है, परन्तु ऐसी बात नहीं। परमेश्वर भिन्न-भिन्न योजनाओं के लिए भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को चुनता है। बाइबिल में हम पाते हैं कि परमेश्वर ने मूसा को चुना कि वह एक स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई करे और बीस लाख इस्राएलियों को मिस्र की गुलामी से छुटकारा दिलाए। दाऊद को परमेश्वर ने चुना कि वह इस्राएल का राजा बन सके। नूह को परमेश्वर ने चुना कि वह एक बहुत बड़ा जहाज़ तकनीकी रूप से, बहुत खूबसूरती से बना सके। यूसुफ को चुना कि वह मिस्र का प्रधानमंत्री बन सके। परमेश्वर ने गिदोन को चुना कि वह एक सेना का प्रमुख हो सके। नहेम्याह को चुना कि वह निर्माण का कार्य करा सके, वह यरूशलेम की ध्वस्त शहरपनाह बना सके। दानिय्येल को परमेश्वर ने चुना देश का अधिकारी होने के लिए। भिन्न-भिन्न कार्यों को करने के लिए परमेश्वर भिन्न-भिन्न लोगों को अपनी बुलाहट देता है।

हम में से प्रत्येक को परमेश्वर ने चुना है और हमारे लिए एक योजना बनाई है। हमारे जीवन के लिए परमेश्वर की एक इच्छा है, जिसे हमें पूरा करना है। हो सकता है, परमेश्वर ने एक शिक्षक के रूप में आपको चुना हो ताकि जब आप कक्षा में विद्यार्थियों के जीवनों को तैयार करते हैं तो आप उन्हें प्रभु यीशु मसीह के विषय में बता सकें। जब यह बात आपके सामने आती है कि विज्ञान के दृष्टिकोण से छात्रों को बताएं कि किस प्रकार सृष्टि की सृजना हुई तो साथ ही साथ आप यह भी बता सकें कि परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य से सृष्टि की सृजना की। आप वहां एक प्रमुख तरीके से प्रभु यीशु मसीह की गवाही दे सकें। हो सकता है परमेश्वर ने आपको एक चिकित्सक के रूप में चुना हो। आपके लिए यह अवसर है कि अपनी सेवा के द्वारा आप प्रभु यीशु मसीह की गवाही दे सकें। आप अपने जीवन, अपनी सच्चाई और ईमानदारी के साथ अपनी सेवा के द्वारा प्रभु यीशु की गवाही दे सकते हैं। हो सकता है परमेश्वर ने आपको चुना हो, इन्जीनियर होने के लिए। हो सकता है परमेश्वर ने आपको राजनीतिज्ञ होने के लिए चुना हो। हो सकता है परमेश्वर ने आपको चुना हो एक अधिवक्ता के रूप में ताकि आप उसकी गवाही दे सकें।

परमेश्वर हमारे बाहरी स्वरूप को नहीं देखता, वह हमारे ऊंचे खानदान को नहीं देखता परन्तु वह हमारे हृदय को देखता है। यूसुफ की धार्मिकता को परमेश्वर ने देखा, मरियम की सहजता और विनम्रता को परमेश्वर ने देखा। वह स्वर्गदूत से कहती है - “मैं प्रभु की दासी हूं, मुझे तेरे वचन के अनुसार हो” (लूका 1ः38)।

परमेश्वर ने जक्कई को चुना जो लोगों की दृष्टि में घृणित था। परमेश्वर ने महसूल लेने वाले मत्ती को चुना। परमेश्वर ने मछुआरों को चुना, सामरी स्त्री को चुना। परमेश्वर ने शाऊल को चुना। परमेश्वर क्रूस पर लटके डाकू को चुनता है कि वह अनन्त जीवन को प्राप्त कर सके।

रोमियों 12ः4 में लिखा है, “क्योंकि जैसे हमारी एक देह में बहुत से अंग हैं, और सब अंगों का एक ही सा काम नहीं”। परमेश्वर ने हमें अपनी देह के विभिन्न अंगों के रूप में चुना है और भिन्न-भिन्न दायित्व परमेश्वर ने हमें दिए हैं।

हाॅकी या फुटबाॅल की टीम में गोलकीपर होता है, बैक पर खेलने वाला होता है तो कोई सेन्टर फाॅरवर्ड होता है। राइट आउट होता है तो कोई लेफ्ट आउट। कोई मैनेजर होता है तो कोई कोच होता है परन्तु जब सेन्टर फाॅरवर्ड गोल मारता है तो वह गोलकीपर की जीत होती है, और सम्पूर्ण टीम की भी जीत होती है। सम्पूर्ण टीम मिलकर अपने उद्देश्यों को अन्जाम देती है। इसी रीति से परमेश्वर ने हमको चुना है, बुलाया है, योग्यताएं दी हैं ताकि मसीह की देह उन्नति पाए। परमेश्वर अपना असाधारण कार्य करने के लिए साधारण लोगों को चुनता है।

2. परमेश्वर कठिन परिस्थितियों में अपने लोगों को प्रशिक्षित करता है:-परमेश्वर का प्रशिक्षण आसान नहीं होता। यह प्रशिक्षण आरामदेह नहीं होता। कई बार तो हो सकता है कि वह बहुत रुचिकर भी न हो परन्तु परमेश्वर अपने लोगों को बुलाता है और वह उन्हें कठिन परिस्थितियों से गुज़ारता है, तब परमेश्वर का प्रशिक्षण हमारे जीवन में होता है। यह बहुत प्रमुख बात है जो हमको सीखना है।

मरियम को परमेश्वर ने चुना और वह पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से गर्भवती पाई गई। मरियम के लिए यह एक कठिन परिस्थिति थी, क्योंकि व्यवस्था के अनुसार यदि कोई स्त्री विवाह से पहले गर्भवती हो जाती थी तो उसका पत्थरवाह कर दिया जाता था। यूसुफ के साथ भी यही परिस्थिति थी क्योंकि व्यवस्थाविवरण के 22वें अध्याय में जो बातें लिखी हुई हैं, उसमें यह बात भी है कि यदि कोई व्यक्ति, ऐसी स्त्री को जो विवाह से पूर्व गर्भवती हो गई हो, यदि स्वीकार करता था तो उसे भी मृत्युदण्ड दिया जा सकता था। मरियम के साथ यूसुफ को भी मार डाला जा सकता था। वह बदनाम हो सकता था, उस पर झूठे आरोप लगाए जा सकते थे। वे दोनों सब प्रकार की नकारात्मक परिस्थितियों से गुज़रे। जब प्रभु यीशु मसीह के जन्म के बाद हेरोदेस ने आज्ञा निकाल दी कि यरूशलेम, बैतलहम और आस-पास के क्षेत्रों में दो साल और उससे कम आयु के जितने बालक हैं, उनकी हत्या करा दी जाए। इस कठिन परिस्थिति से परमेश्वर ने उन दोनों को गुज़रा। मत्ती 2ः13,14 में हम पाते हैं कि यूसुफ को स्वप्न में चितौनी प्राप्त हुई कि इस बच्चे को लेकर तुम मिस्र को चले जाओ क्योंकि यहां उसको हेरोदेस मार डालना चाहता है।

कल्पना कीजिए, उस समय की कड़ाके की ठण्ड की। छोटा-सा बालक, उसकी माता मरियम और यूसुफ। उन दिनों में पैदल यात्रा करना पड़ती थी। हम कहेंगे, परमेश्वर तूने हेरोदेस को क्यों नहीं मार डाला, अच्छा होता कि तू हेरोदेस का प्राण ले लेता, तेरे लिए तो एक सेकेण्ड का काम था। परन्तु नहीं, यह परमेश्वर कीे योजना है कि वे इस पीड़ा से गुज़रें, इस प्रशिक्षण से वे गुज़रें। इस लम्बी कठिन यात्रा को वे करें। अपने बच्चे को लेकर वे उस अन्जान देश में जाकर तब तक ठहरे रहें, जब तक परमेश्वर का निर्देश उन्हें प्राप्त न हो। परमेश्वर ने उनको प्रशिक्षित किया कि वे इन कठिनाइयों से गुज़र सके।

पुराने नियम में हम यूसुफ को देखें। उसे गड़हे में डाल दिया गया, उसे गुलाम बनाकर दो बार बेच दिया गया। झूठे आरोप लगाकर जेल में डाल दिया गया परन्तु यह उसका प्रशिक्षण काल था कि वह मिस्र का प्रधानमंत्री बन सके। एलिय्याह के विषय में हम पाते हैं कि रानी इज़ेबेल उसका प्राण लेने पर है, उसे धमकी देती है और एलिय्याह को भागना पड़ता है। वह कभी करीत के नाले में पड़ा है, दो वर्ष का ख़ामोशी से भरा इन्तज़ार है। कभी वह गुफा में जाकर छिपा हुआ है और कहता है कि - हे परमेश्वर, बहुत हो गया, अब मेरा प्राण मुझ से ले ले। इब्राहीम के जीवन में एक ऐसा समय आता है, जब परमेश्वर उस से कहता है कि जा, अपने एकलौते बेटे को मोरिय्याह पर्वत पर ले जाकर उसका बलिदान चढ़ा दे। हम कल्पना नहीं कर सकते उस पीड़ा की, कि कोई पिता अपने बेटे को लेकर भारी मन से उस पर्वत पर चढ़ रहा है। वह जानता है कि उस पर्वत पर जाकर, उसे अपने बेटे का बलिदान करना है। हम उस दर्द की कल्पना भी नहीं कर सकते। दानिय्येल भी, जब युवा ही था, उसे गुलाम बनाकर दूसरे देश ले जाया गया। उस पर दबाव डाले गए और उसे समस्याओं से, कठिनाइयों से होकर गुज़रना पड़ा।

पौलुस जब तक शाऊल था तो सब कुछ ठीक था, उसके सामने समस्याएं नहीं थीं परन्तु जब परमेश्वर की योजना में शामिल हो गया तो कठिन परिस्थितियों से गुज़रना पड़ा।

प्रेरितों के काम के 18 वें अध्याय में पौलुस पर जो सताव आए, उनका वर्णन है। उसके बाद 19ः11, 12 में लिखा है - “और परमेश्वर पौलुस के हाथों से सामर्थ्य के अनोखे काम दिखाता था। यहां तक कि रूमाल और अंगौछे उस की देह से छुलवाकर बीमारों पर डालते थे, और उन की बीमारियां जाती रहती थीं; और दुष्टात्माएं उन में से निकल जाया करती थीं”। परन्तु इससे पहले पौलुस पीड़ा से गुज़रा। परमेश्वर का प्रशिक्षण इन पीड़ाओं, संघर्षों और तनावों से होकर गुज़रने पर ही पूरा होता है। संघर्ष से गुज़रकर ही विजय प्राप्त होती है।

आज यदि हम निराश हैं, तनाव में हैं, यदि हमारे सामने ऐसी परिस्थिति है कि कोई रास्ता दिखाई न देता हो। किसी लाइलाज बीमारी से हम गुज़र रहे हों तो इस बात को निश्चित जानें कि परमेश्वर आपके हृदय को किसी विशेष योजना के लिए प्रशिक्षित कर रहा है। जब आप इस पीड़ा, सताव और तनाव से गुज़र रहे हैं तो अवश्य ही परमेश्वर का कोई आश्चर्यकर्म आपके जीवन में होने वाला है। परमेश्वर अपने लोगों को कठिन परिस्थितियों में डालकर उनके हृदय और उनके जीवन को प्रशिक्षित करता है और तब उनके जीवन से और उनके जीवन में आश्चर्यकर्म होता है।

3. परमेश्वर के बड़े-बड़े कार्यों का प्रारम्भ बहुत छोटे रूप में होता है:-परमेश्वर की योजना का प्रारम्भ बहुत छोटे रूप में होता है, महत्वहीन-सा होता है। प्रभु यीशु का जन्म परमेश्वर की उद्धार की योजना है। यह सम्पूर्ण मानव-जाति को उसके पापों से छुड़ाने की योजना है, उन्हें अनन्त जीवन देने की योजना है। परन्तु सृष्टि की सबसे बड़ी योजना का प्रारम्भ कहां से होता है! साधारण से लोग हैं, साधारण से गांव की गौशाला है और एक चरनी है। छोटा-सा बालक है, गड़ेरियों का सन्देश है, बढ़ई का परिवार है।

परमेश्वर का कार्य बहुत छोटे-छोटे स्थानों पर, छोटे से रूप में प्रारम्भ होता है और आगे बढ़ता जाता है। यदि आज हम अपने आप को बहुत छोटा समझते हैं। यदि हमें लगता है कि हम बहुत छोटे से स्थान पर हैं, हमारी बहुत छोटी-सी सेवा है तो यह जान लें कि यदि हम अपने जीवन में विश्वासयोग्य बने रहेंगे तो परमेश्वर हमारे जीवनों में बड़े-बड़े कार्य करेगा। परमेश्वर के कार्य का प्रारम्भ चरनी से होता है, विनम्रता में होता है। छोटे लोगों से, टूटे हुए दिलों से, छोटे से रूप में परमेश्वर की योजना प्रारम्भ होती है।

4. अन्तिम विजय परमेश्वर की होती है:-यह बात निश्चित है कि अन्तिम विजय परमेश्वर और उसके लोगों की है। चाहे क्रिसमस से पहले का दृश्य हो, चाहे क्रिसमस के बाद का। चाहे ईस्टर के अवसर पर पुनरुत्थान से पहले का दृश्य हो, चाहे पुनरुत्थान के बाद का दृश्य। हम पाते हैं कि सब में परमेश्वर की इच्छा पूरी होती है। उसकी योजना पूरी होती है। चाहे हेरोदेस और उसकी सेनाएं हों, चाहे पीलातुस हो, रोमी सल्तनत हो, यहूदा का षड़यंत्र हो और चाहे कैसर का आदेश हो। आज के सन्दर्भ में यदि कहें तो चाहे कोई भी दल हो, कैसा भी शक्तिशाली नेता हो, चाहे कोई भी व्यक्ति शासन के उच्च पदों पर बैठा हो; प्रभु यीशु के कार्य को, उसके सुसमाचार प्रचार को कोई नहीं रोक सकता, कोई समाप्त नहीं कर सकता। अन्तिम विजय परमेश्वर की है।

यूहन्ना को पतमुस के टापू पर दर्शन होता है - “फिर मैं ने सिंहासन देखे और उन पर लोग बैठ गए, और उन को न्याय करने का अधिकार दिया गया; और उन की आत्माओं को भी देखा, जिन के सिर यीशु की गवाही देने और परमेश्वर के वचन के कारण काट गए थे; और जिन्हों ने न उस पशु की, और न उस की मूरत की पूजा की थी, और न उसकी छाप अपने माथे और हाथों पर ली थी; वे जीवित होकर मसीह के साथ हज़ार वर्ष तक राज्य करते रहे” (प्रकाशित वाक्य 20ः4)।

ग्राहम स्टेन्स को उनके बेटों के साथ ज़िन्दा जला दिया गया, उन के जीवन का समापन हो गया परन्तु मेरे प्रियो, जब प्रभु यीशु मसीह उस दृश्य में है, जब परमेश्वर उस दृश्य में है तो संसार समापन नहीं है। इस संसार के पार एक बेहतर संसार है। उस देह के पार एक बेहतर देह है। इस संसार के पार संसार में एक सिंहासन है और ऐसे लोग जो पीड़ाओं से गुज़रते हैं, संसार में जिनका अन्त निराशाजनक होता है। वे लोग परमेश्वर के साथ हज़ारों-हज़ारों वर्ष तक सिंहासन पर बैठकर न्याय करेंगे। मेरे प्रियो, जो कहानी है, वह इस संसार में ख़त्म नहीं होगी। प्रकाशितवाक्य 7ः13-17 में लिखा है - “इस पर प्राचीनों में से एक ने मुझ से कहा; ये श्वेत वस्त्र पहिने हुए कौन हैं? और कहां से आए हैं? मैं ने उस से कहा; हे स्वामी, तू ही जानता है: उस ने मुझ से कहा; ये वे हैं, जो उस बड़े क्लेश में से निकलकर आए हैं; इन्हों ने अपने अपने वस्त्र मेम्ने के लोहू में धोकर श्वेत किये हैं। इसी कारण वे परमेश्वर के सिंहासन के साम्हने हैं और उसके मन्दिर में दिन रात उसकी सेवा करते हैं; और जो सिंहासन पर बैठा है, वह उन के ऊपर अपना तम्बू तानेगा। वे फिर भूखे और प्यासे न होंगे: और न उन पर धूप, न कोई तपन पड़ेगी। क्योंकि मेम्ना जो सिंहासन के बीच में है, उन की रखवाली करेगा; और उन्हें जीवन रूपी जल के सोतों के पास ले जाया करेगा, और परमेश्वर उन की आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा”।

प्रथम क्रिसमस का पर्व एक दुखद पर्व था। आत्मिक रूप से आज हम मानते हैं कि वह सुखद पर्व था परन्तु आप कल्पना कीजिए उन माताओं की पीड़ा का, जिनके दो वर्ष या उस से कम उम्र के बच्चों के सिर हेरोदेस ने कटवा दिए। उन परिवारों की क्या स्थिति रही होगी?

आज अगर हमारे जीवन में आंसू हैं। आज अगर बीमारियों ने हमें घेर रखा है। आज अगर हमारे जीवन में तनाव है, हृदय में दबी हुई पीड़ाएं हैं। अगर आज हमारे जीवन में अनुत्तरित प्रश्न हैं कि प्रभु मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? यदि ऐसा है तो इस क्रिसमस के अवसर पर हमें सीखना है कि जीवन की हर निराशा में हमें आशान्वित रहना है क्योंकि उद्धार का दिन आने वाला है। अनन्त जीवन का दिन आने वाला है। यदि हम इस संसार में अपने आपको छोटा और तिरस्कृत महसूस करते हैं, जब हम तनाव, पीड़ाओं और दुखों से गुज़रते हैं तो हमें याद रखना है कि अब वह समय आ गया है, जब हमारे जीवन में परमेश्वर का आश्चर्यकर्म हो। परमेश्वर का आश्चर्यकर्म हमारे जीवन में तब होगा जब हम विश्वासयोग्य बने रहेंगे। हमें स्मरण रखना है कि यह संसार ही सब कुछ नहीं है, इस संसार के पार हमारा स्थान निश्चित हो।

अब्राहम लिंकन जब अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो वह बहुत मानसिक तनाव से गुज़रे क्योंकि उस समय अमेरिका गृह युद्ध से होकर गुज़र रहा था। उस गृह युद्ध में हज़ारों लोग मारे गए थे। राष्ट्रपति बनने के बाद अब्राहम लिंकन सप्ताह में तीन घण्टे अस्पताल में उन लोगों से मिलने जाते थे जिन्हें आई सी यू में रखा गया होता था। ये ऐसे लोग होते थे जिनके बचने की कोई सम्भावना नहीं रहती थी। अब्राहम लिंकन ऐसे लोगों के पास जाकर उनके साथ समय बिताते थे। इन में से बहुत से लोग यह नहीं जानते थे कि वे अमेरिका के राष्ट्रपति हैं। अपनी आत्मकथा में उन्होंने एक घटना का वर्णन किया है। वे एक ऐसे सैनिक के पास पहुंचे जो युद्ध में गम्भीर रूप से घायल हो गया था। उसके शरीर में 68 फ्रैक्चर थे और उसके बचने की कोई आशा नहीं थी। अब्राहम लिंकन ने उससे पूछा कि मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं? उस सैनिक ने कहा कि मैं अपनी मां को चिठ्ठी लिखना चाहता हूं मैं बोल तो सकता हूं पर अपने हाथ से लिख नहीं पाऊंगा, क्या आप मेरी मां को मेरी तरफ से चिठ्ठी लिख देंगे? अब्राहम लिंकन ने कहा - तुम बोलो, मैं लिखता हूं। उस सैनिक ने जो चिठ्ठी लिखवाई, वह कुछ इस प्रकार से थी - मेरी प्यारी मां, मैं अपने कत्र्तव्य को पूरा करते समय गोलियों का शिकार हो गया हूं। मेरा बचना अब सम्भव नहीं। तुम मेरे लिए दुख मत करना। मेरी प्रार्थना तुम्हारे और पापा के साथ है। ईश्वर तुम्हें और पापा को आशीष दे। मैरी और जाॅन को भी मेरी ओर से प्यार देना। तुम्हारा-गैरी।

खराब हालत की वजह से वह सैनिक हस्ताक्षर नहीं कर सका। पत्र में नीचे अब्राहम लिंकन ने हस्ताक्षर किये और लिखा, आपके बेटे ने लिखवाया, लिखने वाला अब्राहम लिंकन। सैनिक ने उस पत्र को पढ़ा तो वह चैंक गया। उसने कहा कि क्या आप सचमुच अब्राहम लिंकन हैं, अमेरिका के राष्ट्रपति ! उन्होंने कहा - हां, मैं अब्राहम लिंकन हूं। उस सैनिक ने कहा कि मेरी अन्तिम इच्छा है कि आप मेरे हाथ को पकड़ लें, मेरा हाथ अपने हाथ में ले लें। अब्राहम लिंकन ने उसका हाथ थाम लिया और अपने प्रेम का इज़हार किया। फिर उन्होंने कहा - मैं तुमसे एक बात कहता हूं कि मैंने तो तुम्हारा हाथ थाम लिया है मगर तुम उसका हाथ थाम लो जो मृत्यु के बाद तुम्हें अनन्त जीवन दे सकता है, और वह प्रभु यीशु मसीह है। अब्राहम लिंकन की उस गवाही से, मृत्यु शैय्या पर पड़े उस सैनिक ने उसी दिन प्रभु यीशु को अपने जीवन में स्वीकार कर लिया।

क्रिसमस से पूर्व के दृश्य से हमारे लिए सन्देश है कि परमेश्वर हम सभों को चुनता है, अलग-अलग कार्य के लिए हमें तैयार करता है कि हम उसकी गवाही दें, जिससे उसकी कलीसिया, मसीह की देह उन्नत हो सके। परमेश्वर हमें कठिनाइयों से गुज़ारता है, हमारा प्रशिक्षण करता है तकि हम और भी मज़बूती से उसका कार्य कर सकें। क्रिसमस के पूर्व का दृश्य हमें स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर के महान कार्य छोटे-छोटे साधारण स्थानों से, छोटे-छोटे लोगों से पूरे होते हैं। परमेश्वर हमें स्मरण दिलाता है कि अन्तिम विजय परमेश्वर की होगी। चाहे इस संसार में हमें कैसी भी परिस्थितियों से गुज़रना पड़े, अन्तिम विजय उसके लोगों की होगी। मेरी और आपकी होगी, जो प्रभु यीशु पर विश्वास करते हैं, जो लड़खड़ाते हुए ही सही मगर उसके साथ चलने का प्रयास करते हैं।

परमेश्वर हम सभों को आशीष दे।