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गौशाले का सन्देश

गौशाले का सन्देश

संदर्भ: लूका 2ः1-7

लूका रचित सुसमाचार 2ः1-7 में लिखा है- “उन दिनों में औगूस्तुस कैसर की ओर से आज्ञा निकली, कि सारे जगत के लोगों के नाम लिखे जाएं। यह पहिली नाम लिखाई उस समय हुई, जब क्विरिनियुस सूरिया का हाकिम था। और सब लोग नाम लिखवाने के लिए अपने अपने नगर को गए। सो यूसुफ भी इसलिए कि वह दाऊद के घराने और वंश का था, गलील के नासरत नगर से यहूदिया में दाऊद के नगर बैतलहम को गया कि अपनी मंगेतर मरियम के साथ जो गर्भवती थी नाम लिखवाए। उन के वहां रहते हुए उसके जनने के दिन पूरे हुए। और वह अपना पहिलौठा पुत्र जनी और उसे कपड़े में लपेटकर चरनी में रखा, क्योंकि उनके लिए सराय में जगह न थी”।

दिसम्बर माह आता है और हमारा ध्यान क्रिसमस की ओर लग जाता है। हमारे परिवारों में, कलीसिया में क्रिसमस की तैयारी प्रारम्भ हो जाती है। योजनाएं बनने लगती हैं और हमारे हृदय आनन्द से भर जाते हैं। हम उस समय को स्मरण करते हैं, जब प्रभु यीशु इस संसार में आया, जब उसने स्वर्ग का सिंहासन छोड़ा। जब उसने अपने आपको इस प्रकार से शून्य किया कि इस संसार में आकर एक दास का स्वरूप धारण करे और उसके द्वारा परमेश्वर के उद्वार की योजना का प्रारम्भ हो सके। हम उस समय को याद करते हैं जब औगूस्तुस कैसर ने यह आज्ञा निकाली कि सब लोगों के नाम लिखे जाएं और यूसुफ मरियम को लेकर दाऊद के नगर बैतलहम गया। वचन में लिखा हुआ कि वहां रहते हुए उसके जनने के दिन पूरे हुए और मरियम ने अपने पहिलौठे पुत्र को जन्म दिया और उसे कपड़े में लपेटकर चरनी में रखा क्योंकि उनके लिए सराय में जगह न थी।

हम इस बात पर विचार करेंगे कि परमेश्वर के पुत्र का जन्म जब इस संसार में हुआ, तो उसका जन्म किसी राजमहल, किसी शहन्शाह की छत्र छाया में न होकर चरनी में क्यों हुआ? प्रश्न है कि चरनी में प्रभु यीशु का जन्म क्यों हुआ? इस चरनी और इस गौशाले से हम क्या सीख सकते हैं।

1. प्रभु यीशु का जन्म गौशाले में इसलिए हुआ ताकि हम समझ सकें कि परमेश्वर की योजना और मनुष्य की योजना में अन्तर होता है।

परमेश्वर की सोच और मनुष्य की सोच में अन्तर होता है, परमेश्वर की कार्यप्रणाली और मनुष्य की कार्यप्रणाली में अन्तर होता है। हम सांसारिक मापदण्डों के अनुसार अपनी योजनाओं को बनाते हैं। उन्हीं के अनुसार हम अपेक्षाएं करते हैं परन्तु परमेश्वर की सोच और उसके कार्य करने का तरीका बिल्कुल भिन्न है और इसी कारण वे बातें हमारी समझ से परे होती हैं।

यशायाह 55ः8-9 में लिखा है “क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं हैं, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है”। परमेश्वर कहता है कि तुम्हारे सोचने के ढंग, तुम्हारे कार्य करने के ढंग, तुम्हारी गति में और मेरी गति में ज़मीन आसमान का अन्तर है। एक ऐसा अन्तर है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती, जिसे नापा नहीं जा सकता। वास्तव में परमेश्वर के बड़े-बड़े कार्यों का प्रारम्भ छोटी-छोटी बातों से होता है, जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

प्रभु यीशु मसीह का जन्म गौशाले में हुआ, क्योंकि सराय में मरियम और यूसुफ को जगह नहीं मिली। जगत का उद्धारकत्र्ता, त्राणकत्र्ता, सृष्टिकत्र्ता एक बालक के रूप में इस संसार में आया। यदि परमेश्वर चाहता तो प्रभु यीशु मसीह तुरही के बड़े स्वर के साथ आकाश से उतर सकता था। वह अपने सम्पूर्ण तेजोमय विकसित रूप में इस संसार में आ सकता था ताकि संसार की हर एक आंख उसे देख सके। उसके बाद एक भविष्यवाणी होती, एक बड़ा शब्द सुनाई देता कि यह मेरा पुत्र है जिसे तुम्हारे पापों को हरने के लिए इस संसार में मैंने भेजा है। अगर हम यीशु के जन्म की योजना बनाते तो कुछ ऐसा ही करते परन्तु परमेश्वर ने तो मनुष्य के उद्धार की यह महानतम योजना सृष्टि की सृजना से पहले ही तैयार कर ली थी।

उसकी योजना का प्रारम्भ हुआ; एक छोटे से बालक से, एक गौशाले से, एक चरनी से, एक साधारण-सी कुंवारी युवती से, बैतलहम जैसे एक छोटे गांव से। उस छोटे से गांव के गौशाले की चरनी में परमेश्वर की महानतम योजना को पूरा करने के लिए परमेश्वर का पुत्र एक बालक के रूप में जन्म लेता है। जब ज्योतिषी राजा हेरोदेस के पास पहुंचे और उसे बताया कि एक राजा का जन्म हुआ है तब उसके विद्वानों ने शास्त्रों के पन्ने पलटे। उन्होंने राजा हेरोदेस को बताया कि एक ऐसा राजा जन्मा है जिसका राज्य सारे संसार पर होगा। तब राजा बहुत क्रोधित हो गया। उसने आज्ञा निकाली कि 2 वर्ष और उससे छोटे जितने बच्चे हैं, उन्हें मार डाला जाए। एक तरफ राजा है, उसकी सेना है और उसका अधिकार है। वहीं दूसरी तरफ एक छोटा-सा गौशाला है, जिसकी छोटी-सी चरनी है, जहां एक छोटे से बालक ने जन्म लिया है। परमेश्वर का महान कार्य ऐसी ही छोटी-छोटी बातों से प्रारम्भ होता है।

परमेश्वर ने इब्राहीम की धार्मिकता के कारण उसे चुना और उससे प्रतिज्ञा की कि मैं तेरे वंश को रेत के किनकों की नाईं बढ़ाऊंगा। सारे संसार में तेरा वंश छा जाएगा। इब्राहीम की आयु उस समय 99 वर्ष थी। सांसारिक मापदण्डों के आधार पर तो यह समझ में नहीं आता कि यह कैसे सम्भव होगा। यह कैसे होगा कि इस वृद्धावस्था में इब्राहीम और सारा के सन्तान उत्पन्न हो। उनका वंश सारी पृथ्वी पर फैल जाए। परन्तु हम पाते हैं कि मनुष्यों के द्वारा देखी और सोची गई एक असम्भव स्थिति में परमेश्वर ने अपनी सामर्थ्य से इस बात को सम्भव किया। इसहाक के रूप में उन्हें एक सन्तान दी।

पलिश्तियों की सेना शिमशोन के सामने है और उसके पास एक गदहे का जबड़ा उनका सामना करने के लिए है। मानवीय सोच से तो यह असम्भव है कि शिमशोन कैसे पलिश्तियों की सेना से निपटेगा। परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य से शिमशोन उस सूखी हुई हड्डी से पलिश्तियों को नाश करता है और परमेश्वर की सामर्थ्य की गवाही प्रकट होती है।

मूसा हकलाता है, ठीक से बोल नहीं सकता और परमेश्वर उससे कहता है कि इस्राएलियों को मिस्र की बन्धुवाई से छुड़ा कर ला। मूसा कहता है, मैं कैसे यह कर पाऊंगा, बीस लाख लोग हैं, मिस्र का राजा है, उसकी सेना है; मैं साधारण-सा व्यक्ति जिससे बोलते भी नहीं बनता कैसे यह कार्य करूंगा। परन्तु परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार मूसा परमेश्वर की सामर्थ्य से भर कर राजा के सामने खड़ा होता है और फिरौन से कहता है कि मेरे लोगों को जाने दे। एक साधारण से व्यक्ति के माध्यम से परमेश्वर के कार्यों का प्रगटीकरण होता है और वह साधारण-सा व्यक्ति मूसा; बीस लाख इस्राएलियों का नेतृत्व करता है।

दाऊद एक छोटा-सा बालक है। वह गोलियत की पुकार सुनता है, गोलियत द्वारा परमेश्वर की निन्दा सुनता है और तब वह राजा के पास जाता है। राजा गोलियत से लड़ने के लिए दाऊद को अपनी बुद्धि के अनुसार सारे अस्त्र -शस्त्रों से लैस करता है परन्तु दाऊद से उन्हें पहनकर चलते नहीं बनता। वह उन्हें उतार कर अलग कर देता है, नाले में जाकर पांच छोटे-छोटे पत्थर उठाता है और अपना गोफन लेकर गोलियत से लड़ने के लिए जाता है। मनुष्यों की दृष्टि से तो यह असम्भव है कि पांच पत्थर, एक गोफन और एक छोटा सा बालक कैसे गोलियत को समाप्त कर सकते हैं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य से यह सम्भव है।

1 कुरिन्थियों 1ः25 में लिखा है, “क्योंकि परमेश्वर की मूर्खता मनुष्यों के ज्ञान से ज्ञानवान है; और परमेश्वर की निर्बलता मनुष्यों के बल से बहुत बलवान है”।

हमारे जीवनों में जब हम निराश होते हैं, जब ऐसा लगता है कि हमारी योजना के अनुसार कार्य नहीं हो रहा, जब हमें लगता है बहुत से अवरोध आ गए हैं। जब हमें ऐसा लगता है कि हम तो परमेश्वर के पीछे चलने वाले हैं फिर हमारे जीवनों में ये कठिनाइयां क्यों, ये समस्याएं क्यों? ऐसे समय में याद रखना है कि परमेश्वर हमारी बुद्धि के अनुसार, हमारी योजना के अनुसार नहीं परन्तु अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है। हमें विजय के लिए शायद ज़रूरत होती है बड़े-बड़े हथियारों की परन्तु परमेश्वर पांच पत्थरों से ही अपना कार्य कर देता है। हमें ज़रूरत होती है राजा के जन्म के लिए महल की परन्तु परमेश्वर अपना कार्य गौशाले में ही कर लेता है। इसी कारण, जब हम मसीही जीवन और सेवा में आगे बढ़ते हैं तो हमें किसी भी प्रकार से निराश नहीं होना चाहिए। गौशाले से हमें यही शिक्षा मिलती है कि परमेश्वर के कार्य करने का तरीका, उसके विचार, उसकी योजनाएं हमारी सोच से भिन्न हैं। इसी लिए हम परमेश्वर को अपने जीवन में, अपने परिवार में, अपने बच्चों के जीवन में, अपनी कलीसियाओं में कार्य करने दें।

2. प्रभु यीशु मसीह का जन्म गौशाले में हुआ ताकि हम समझ सकें कि वह बलिदान का मेम्ना होकर आया।

प्रभु यीशु मसीह इस संसार में राज्य करने के लिए नहीं आया, वह किसी सेना का नेतृत्व करने नहीं आया। वह किसी सिंहासन पर बैठने के लिए नहीं आया था। वह सिकन्दर के समान संसार में विजय पताका फहराने के लिए नहीं आया था। वह इसलिए आया था कि संसार के समस्त लोगों के पापों की क़ीमत चुका सके। पाप की बन्धुवाई से हमें मुक्त करा सके। प्रभु यीशु मसीह इस संसार में बलिदान का मेम्ना होकर आया। उसका गौशाले में पैदा होना इस बात का सूचक है कि गौशाले का गुलगुता से कोई सम्बन्ध है, इस चरनी का क्रूस से कोई सम्बन्ध है।

यूहन्ना रचित सुसमाचार में हम पाते हैं कि प्रभु यीशु 70 मील पैदल चलकर यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के पास जाता है। जब यूहन्ना यीशु को बपतिस्मा लेने के लिए अपने पास आते देखता है तो कहता है कि मैं तुझे बपतिस्मा देने के योग्य नहीं। तब प्रभु यीशु कहता है, अब तो इसी रीति से सारी धार्मिकता को पूरा होने दे। उसके बाद दूसरे दिन जब यूहन्ना ने यीशु को अपनी ओर आते देखा तो कहा, देखो! यह परमेश्वर का मेम्ना है जो जगत का पाप उठा ले जाता है।

पुराने नियम में यदि हम देखें तो मेलबलि, अन्नबलि आदि बहुत से पर्वों का वर्णन है। लोग अपने पापों से प्रायश्चित्त करने के लिए मेम्ने को बलिदान करते थे। परन्तु संसार में जब पाप इतना बढ़ गया कि क़ीमत चुकाने में हम सक्षम नहीं रहे तब परमेश्वर ने इस संसार में अपने पुत्र को भेजा कि वह संसार के लोगों को उनके पापों से मुक्त कराए, उनके पापों की क़ीमत क्रूस पर चुकाए। इसीलिए नया नियम में कई स्थानों पर प्रभु यीशु को मेम्ना कहा गया है।

प्रकाशितवाक्य 7ः9,10 में लिखा है - “एक ऐसी भीड़, जिसे कोई गिन नहीं सकता था श्वेत वस्त्र पहिने और अपने हाथों में खजूर की डालियां लिए हुए सिंहासन के साम्हने और मेम्ने के साम्हने खड़ी है। और बड़े शब्द से पुकार कर कहती है, कि उद्धार के लिए हमारे परमेश्वर का जो सिंहासन पर बैठा है, और मेम्ने का जयजयकार हो”। इसके आगे 17 वीं आयत में लिखा है - “क्योंकि मेम्ना जो सिंहासन के बीच में है उनकी रखवाली करेगा; और उन्हें जीवन रूपी जल के सोतों के पास ले जाया करेगा, और परमेश्वर उनकी आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा”।

जो चरवाहे का काम है वह मेम्ना कर रहा है। यह मेम्ना बलिदान का मेम्ना भी है और चरवाहा भी है। प्रभु यीशु मसीह इस संसार में हमारे पापों के लिए बलिदान होने आया था। इसलिए यशायाह 53ः3 से 7 में लिखा है, “वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्य का त्यागा हुआ था; वह दुखी पुरुष था, रोग से उसकी जान पहिचान थी; और लोग उससे मुख फेर लेते थे। वह तुच्छ जाना गया, और हमारे ही दुखों को उठा लिया; तौभी हम ने उसे परमेश्वर का मारा-कूटा और दुर्दशा में पड़ा हुआ समझा। परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों हेतु कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिए उस पर ताड़ना पड़ी, कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएं। हम तो सब के सब भेड़ों की नाईं भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना-अपना मार्ग लिया; और यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया। वह सताया गया, तौभी वह सहता रहा और अपना मुंह न खोला; जिस प्रकार भेड़ वध होने के समय व भेड़ी ऊन कतरने के समय चुपचाप शान्त रहती है, वैसे ही उसने भी अपना मुंह न खोला”।

प्रभु यीशु इस संसार में एक मेम्ने की नाईं आया और उसका गौशाले में पैदा होना इस बात को प्रदर्शित करता है कि वह हमारे पापों को उठाने के लिए परमेश्वर का मेम्ना बनकर इस संसार में आया।

3. प्रभु यीशु मसीह का जन्म गौशाले में हुआ ताकि हम समझ सकें कि वह इस संसार के हरेक व्यक्ति के लिए आया।

किसी टीकाकार ने लिखा है कि प्रभु यीशु मसीह गौशाले में इस लिए पैदा हुआ क्योंकि गौशाले में कोई द्वार नहीं होता। गौशाले में कोई द्वारपाल नहीं होता। गौशाले में जाने के लिए मापदण्ड नहीं होता, किसी की आज्ञा की आवश्यकता नहीं होती। गौशाले में जाने के लिए आपको ठहरना नहीं पड़ता। गौशाला एक ऐसी जगह है जो हर किसी के लिए खुली हुई है।

वह इस संसार में गरीबों के लिए, अनाथों के लिए, अपंगों के लिए, विधवाओं के लिए आया था। वह दर्शनशास्त्रियों के लिए आया था, ज्ञानवानों के लिए, बुद्धिमानों के लिए, राजाओं के लिए, सेनापतियों के लिए आया था। इसीलिए इस बात को प्रदर्शित करने के लिए कि वह संसार में हर एक के लिए आया था, प्रभु यीशु का जन्म गौशाले में हुआ। जहां न द्वार होते हैं न द्वारपाल, जहां न कोई अवरोध होता है और न ही आगन्तुकों के लिए मापदण्ड होते हैं। गौशाला जो सबके लिए ज़रूरी है, जो शहर में भी है और गांव में भी।

यूहन्ना 6ः37 में यीशु ने कहा, “जो कुछ पिता मुझे देता है, वह सब मेरे पास आएगा, और जो कोई मेरे पास आएगा, उसे मैं कभी न निकालूंगा”।

जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूंगा, यह शब्द बहुत प्रमुख है। परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि अपना इकलौता पुत्र दे दिया ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। इसीलिए हर एक के लिए सम्भावना है, हर एक के लिए आशा है। हर एक के लिए द्वार खुला हुआ है। उद्धार केवल उन्हीं के लिए उपलब्ध नहीं है जो मसीही परिवारों में पैदा हुए परन्तु हर एक के लिए यह उपलब्ध है। कोई ऊंचा या नीचा नहीं, कोई अछूत नहीं, कोई बड़ी या नीची जाति का नहीं। प्रभु यीशु ने संसार के इन सारे मापदण्डों को तोड़ दिया ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए। वह कहता है जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूंगा। चाहे ज्ञानवान नीकुदेमुस हो, चाहे पापों से भरी हुई सामरी स्त्री हो, चाहे क्रूस पर सज़ा पा रहा डाकू हो; चाहे कोई कैसा ही रहा हो, यदि कोई उसके पास आता है तो वह हमारे पापों को लेकर गहरे समुद्र में डाल देता है।

मत्ती रचित सुसमाचार 18ः4 में लिखा है - “मैं तुम से सच सच कहता हूं यदि तुम न फिरो और बालकों के समान न बनो तो स्वर्ग राज्य में प्रवेश करने न पाओगे। जो कोई अपने आप को इस बालक के समान छोटा करेगा, वह स्वर्ग के राज्य में बड़ा किया जाएगा”। गौशाला सरलता, विनम्रता और दीनता का प्रतीक है।

फिलिप्पियों 2ः6-7 में लिखा है- “जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन् अपने आपको ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया”।

जो सब कुछ था उसने अपने आपको शून्य कर लिया। जो सृष्टिकत्र्ता था वह सृष्टि का दास बन गया। उसने अपने आप को ख़ाली कर दिया। उसके दास बनने पर शून्य होने की प्रक्रिया इस गौशाले से प्रारम्भ हो गई थी। गौशाला इस बात का प्रतीक है कि उसने अपने आपको शून्य कर दिया। स्वर्ग का सिंहासन, स्वर्गदूतों की महिमा छोड़कर वह गौशाले में पैदा हुआ। इसलिए यदि हमें परमेश्वर के पास जाना है तो ऐसे जाना होगा जैसे गौशाले को जाना है। अपने आपको ख़ाली करके विनम्रता से, दीनता से परमेश्वर के पास जाना है। उस गौशाले में ही हमारा मिलन परमेश्वर के साथ सम्भव है और इसीलिए परमेश्वर का पुत्र उस गौशाले में पैदा हुआ कि हम उस स्थान पर मिल सकें।

किसी ने लिखा है कि हमारा हृदय और जीवन गौशाले के समान होना चाहिए न कि किसी राजमहल के समान और तब ही प्रभु यीशु का जन्म हमारे जीवनों में होगा।

यदि हमारे हृदय महल के समान हैं, तो हमें उसे गौशाले के समान बनाना है। यदि हमारे जीवन में अहंकार है तो हमें विनम्रता लाना है। यदि दिलों में बदले की भावना है तो हमें क्षमा करना है और यदि हमारे जीवन में घमण्ड है तो हमें उसे आंसुओं से धोना है। तब ही हम उस गौशाले में पहुंच सकेंगे, जहां प्रभु यीशु का दर्शन सम्भव है।

गौशाला इस बात का प्रतीक है कि परमेश्वर की योजना अद्भुत है। परमेश्वर की योजना छोटी-छोटी जगहों से, छोटी-छोटी बातों, छोटे-छोटे लोगों से प्रारम्भ होती है। गौशाला दर्शाता है कि प्रभु यीशु मसीह हमारे पापों की क्षमा के लिए इस संसार में परमेश्वर का मेम्ना बन कर आया था। गौशाला ही वह स्थान है जो सबके लिए है और जहां प्रभु से हमारा मिलन सम्भव है।

परमेश्वर आपको आशीष दे।