पुनरुत्थान का महत्व
संदर्भ: 1 कुरिन्थियों 15ः12-17
परिचयः- लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व यीशु मसीह का पुनरुत्थान हुआ। विश्व की आज तक की सबसे महत्वपूर्ण घटना घटी। आज क्या महत्व है, दो हज़ार वर्ष पूर्व घटी इस घटना का? क्यों इतना अधिक महत्व दिया जाता है पुनरुत्थान की बात को, बाइबिल में और मसीहियों में भी? आज इसका क्या अर्थ है? क्या प्रासंगिकता और प्रमुखता है? पुनरुत्थान की प्रासंगिकता आज भी है क्योंकि मेरा यह विश्वास है कि, यह हमारे जीवन की प्रमुखतम आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। कलीसिया के इतिहास में मसीही प्रचार का यह प्रमुख विषय था। चेलों की गवाही का यह प्रमुख केन्द्र बिन्दु था। मसीही विश्वास और कलीसिया की आधारशिला पुनरुत्थान है। पौलुस अथेने में यीशु और पुनरुत्थान के विषय में प्रचार करता है। पतरस पिन्तेकुस्त के दिन पुनरुत्थान की गवाही देता है। यूहन्ना अपनी गवाही में इसे प्रमुखता देता है। पौलुस कहता है कि “यदि मसीह का पुनरुत्थान नहीं हुआ तो तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ है” (1 कुरिन्थियों 15ः14)। आज के सन्दर्भ में पुनरुत्थान के महत्व को सही अर्थों में जानने के लिए हमें समझना है कि.... पुनरुत्थान का अर्थ मात्र प्रभु यीशु मसीह का बच जाना ही नहीं है कि, वह इतने तीव्रतम विरोध, मार, क्रूस के बावजूद बच गया। पुनरुत्थान का अर्थ यह भी नहीं है कि प्रभु यीशु मसीह आज जीवित है सिर्फ़ अपने आदर्शों, शिक्षाओं में। ठीक उसी प्रकार जैसे लोग कहते हैं कि ‘अमुक व्यक्ति अमर है’, ‘अमर शहीद’ आदि। पुनरुत्थान का अर्थ पुनर्जीवन भी नहीं है, सिर्फ़ इतना ही पर्याप्त नहीं कि कोई एक बार फिर मृत्यु को प्राप्त करने के लिए मृत्यु के बाद फिर से जीवित हो जाए। यीशु के सन्दर्भ में पुनरुत्थान का अर्थ है कि परमेश्वर ने एक आश्चर्यकर्म किया कि उसने प्रभु मसीह की देह को सड़ने और बर्बाद होने से बचाकर उसे मृत्यु से उठाकर जीवित और फिर कभी न मरने के लिए तेजोमय देह में परिवर्तित किया। ऐसा पुनरुत्थान न पहले कभी हुआ था, न उसके बाद कभी हुआ। आज प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान का क्या महत्व, क्या प्रासंगिकता है; इसे हम तीन बातों को समझकर जान सकते हैं कि आज हमारे जीवन से प्रभु यीशु का पुनरुत्थान कैसे जुड़ा हुआ है? हमारे जीवनों में इसका क्या महत्व है? 1. पुनरुत्थान हमें परमेश्वर की क्षमा की निश्चिता दिलाता है:- क्षमा आज हमें परमेश्वर द्वारा प्रदान अमूल्य भेंट के रूप में प्राप्त है। एक मनोचिकित्सक अपनी पुस्तक में लिखता है कि मेरे पास आने वाले आधे से ज़्यादा मनोरोगी शीघ्र ठीक हो सकते हैं, यदि वे इस बात को समझें कि परमेश्वर क्षमा करने वाला है। हम में से प्रत्येक के जीवन में कुछ ऐसी बातें हैं, जो सबसे छुपी हुई हैं। गुज़रा हुआ अतीत है, गुप्त पाप हैं, जिनसे हम शर्मिन्दा होते हैं। गुज़री बुराइयां हैं, जो कहीं न कहीं हमारे विवेक में किसी फांस की तरह चुभती हैं। परन्तु यीशु मसीह का जो शुभ सन्देश है, उसका प्रारम्भ यही है कि परमेश्वर हमें क्षमा करता है। यीशु ने अपनी सेवकाई के दौरान अनेक बार कहा, “तेरे पाप क्षमा हुए”। अन्तिम ब्यारी के समय उसने अपने शिष्यों को कटोरा देते हुए कहा, कि “यह मेरा लहू है जो तुम्हारे पापों की क्षमा के लिए बहाया जाता है”। उसके कहने का अर्थ है कि वह हमारे पापों के लिए बलिदान होने जाता है कि हमारे पापों की क्षमा हमें प्राप्त हो सके। परन्तु यह कैसे जानें कि प्रभु यीशु मसीह का बलिदान परमेश्वर की योजना के अनुसार था अथवा परमेश्वर ने उसके बलिदान को ग्रहण किया या यह कि वास्तव में वह हमारे पापों के लिए परमेश्वर की ओर से भेजा गया था। यदि प्रभु यीशु मसीह मृत ही रहता तो हम यह नहीं कह सकते थे कि उसके द्वारा हमें पापों की क्षमा प्राप्त हुई है। 1 कुरिन्थियों 15ः14-15 में पौलुस लिखता है, “यदि मसीह नहीं जी उठा तो हमारा प्रचार करना भी व्यर्थ है, और तुम्हारा विश्वास भी व्यर्थ है, वरन् हम परमेश्वर के झूठे गवाह ठहरे”। “सचमुच मसीह मृतकों में से जी उठा है”। उसने सचमुच हमारे पापों की क़ीमत चुकाई है, परमेश्वर ने उसके बलिदान को स्वीकार किया है। पुनरुत्थान यीशु के बलिदान पर मोहर लगाता है। आज यीशु मसीह का पुनरुत्थान ही हमें इस बात की निश्चितता दिलाता है कि परमेश्वर हमारे पापों को क्षमा करता है। 2. पुनरुत्थान हमें परमेश्वर की सामर्थ्य की निश्चितता दिलाता है:- हमें नये जीवन को पाने के लिए क्षमा की आवश्यकता है और परमेश्वर की सामर्थ्य की आवश्यकता है, नये जीवन में आगे बढ़ने के लिए। - परन्तु क्या परमेश्वर व्यक्ति के स्वभाव को बदल सकता है? - क्या सम्भव है कि स्वार्थी लोग निःस्वार्थी हो जाएं? - क्या सम्भव है कि पाप के गुलाम बने हुए लोग पवित्र हो जाएं? परमेश्वर की सामर्थ्य के उदाहरण हमें बाइबिल में मिलते हैं; उसकी सामर्थ्य से, मूसा जो कि अयोग्य व हकलाने वाला व्यक्ति था, लाखों लोगों की अगुवाई करता है। परन्तु मानव इतिहास में परमेश्वर की सामर्थ्य का सबसे बड़ा उदाहरण प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान है। परमेश्वर की जिस सामर्थ्य ने यीशु को मृतकों में से जिलाया, आज उसकी वही सामर्थ्य हमारे लिए भी मौजूद है। वह हमें पापों की मृत्यु से निकालकर धार्मिकता में ज़िन्दा कर सकता है। वह हमें निर्बलता और अनैतिकता की मृत्यु से निकालकर सामर्थ्य से भरी ज़िन्दगी दे सकता है। कभी-कभी हम मसीही होने की बात को बड़ा साधारण सा समझ लेते हैं। हम सोचते हैं कि मसीही होने का अर्थ जीवन में मात्र चन्द सुधार कर लेना है, थोड़ा सा धार्मिक हो जाना है। जब हम बपतिस्मा लेते हैं, तब भी हम में ऊपरी रूप से थोड़ा-सा कुछ परिवर्तन आता है पर भीतर से हृदय में हम वैसे ही बने रहते हैं। परन्तु मसीही होना वास्तव में यह नहीं। हमारे जीवन में मूलभूत परिवर्तन होना चाहिए। जीवन में आमूल परिवर्तन आना चाहिए। जड़ से जीवन के हर आयाम में परिवर्तन हो, जैसे वास्तव में जीवन में पुनरुत्थान हुआ हो, एक नया जन्म हुआ हो। परमेश्वर ऐसा कर सकता है। पुनरुत्थान की सामर्थ्य से उसने जिस प्रकार प्रभु यीशु को मरे हुओं में से जिलाया, वैसे ही वह हमको बदल सकता है। पुनरुत्थान न केवल हमें परमेश्वर की क्षमा की निश्चितता दिलाता है, वरन हमें उसकी सामर्थ्य की निश्चितता भी दिलाता है। 3. पुनरुत्थान हमें परमेश्वर की विजय की निश्चितता प्रदान करता है:- संसार में विभिन्न धर्मों एवं मतों में जो मूलभूत अन्तर है, वह मनुष्य के भविष्य के विषय में है। कुछ मत हैं जिनमें भविष्य में कोई भी, किसी भी आशा की बात ही नहीं की गई है। एक और विचारधारा के अनुसार जन्म, मृत्यु और पुर्नजन्म, फिर मृत्यु व फिर पुर्नजन्म है; जो क्रम से चलता है। परन्तु तीसरी बात है जिसे हम मसीही लोग मानते हैं कि प्रभु यीशु मसीह फिर से आने वाला है। दीन-हीन और निरीह बालक के समान नहीं, जैसे वह पहले आया था बल्कि सामर्थी और तेजोमय रूप में। उसका आगमन ऐसा महिमामय होगा, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। मृतक जी उठेंगे और वह सब कुछ नया कर देगा। नया संसार, नया आकाश, नयी देह। यही मसीही आशा है, जो अनन्त जीवन की आशा है। मगर लोग आज प्रश्न करते हैं कि मसीह कहलाने वाले लोगों, यीशु के दूसरे आगमन और तुम्हारी इन सब बातों का कोई आधार, कोई प्रमाण है तुम्हारे पास कि, सब कुछ नया हो जाएगा? हां, मसीहियों के पास इस प्रश्न का उत्तर है। इस आशा की बुनियाद है हमारे पास। इसका प्रमाण और इसका आधार है, प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान। उसका पुनरुत्थान ही हमारे पुनरुत्थान का भी प्रमाण है, निश्चितता है, आधार है। वचन में लिखा है, “हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, जिसने यीशु मसीह के मरे हुओं में से जी उठने के द्वारा अपनी बड़ी दया से हमें जीवित आशा के लिए नया जन्म दिया” (1 पतरस 1ः3)। निष्कर्षः- प्रभु यीशु का पुनरुत्थान हमारे विश्वास की नींव है, उसका पुनरुत्थान हमारे लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि; - यीशु का पुनरुत्थान, हमें परमेश्वर की क्षमा की निश्चितता दिलाता है। - उसका पुनरुत्थान हमें परमेश्वर की सामर्थ्य की निश्चितता दिलाता है। - पुनरुत्थान, हमें परमेश्वर की विजय की निश्चितता प्रदान करता है। मेरी प्रार्थना है कि हम में से हर एक परमेश्वर की क्षमा, उसकी सामर्थ्य और विजय पर विश्वास करते हुए पुनरुत्थान के सहभागी हों। परमेश्वर आपको आशीष दे।