पुनरुत्थान का प्रभाव
संदर्भ: 1 कुरिन्थियों 15ः12-22
प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान मसीही जीवन का आधार है। पुनरुत्थान एक ऐसी घटना है जो प्रभु यीशु मसीह को दुनिया के किसी भी महापुरुष, अवतार, अगुवों से सबसे अधिक विशिष्ट बनाता है। पुनरुत्थान हमारे प्रचार का केन्द्र बिन्दु है, इसी नींव पर हमारा विश्वास बना हुआ है। इसीलिए पौलुस प्रेरित जब कुरिन्थियों की कलीसिया को अपना पहला पत्र लिखता है तो लिखता है “यदि मसीह नहीं जी उठा तो हमारा प्रचार करना भी व्यर्थ है और तुम्हारा विश्वास करना भी व्यर्थ है” (15ः14)। यदि प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान नहीं हुआ तो हमारा जीवन, हमारी सेवा, हमारा प्रचार, हमारा सब प्रकार का अपमान सहना और जोखिमों को उठाना; सब कुछ व्यर्थ है और तुम्हारा विश्वास भी व्यर्थ है। वास्तव में, यदि प्रभु यीशु मसीह जी नहीं उठा तो मसीहियत महज़ एक नाटक है, आधारहीन और बेबुनियाद बात है। यहां तक कि पौलुस कहता है-वरन हम परमेश्वर के झूठे गवाह ठहरे। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो कि हमारा विश्वास खोखला नहीं है। इसी अध्याय के 20 वें पद में पौलुस लिखता है- “परन्तु सचमुच मसीह मृतकों में से जी उठा है और जो सो गये हैं उनमें पहला फल हुआ”। प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान की प्रमुखता का अन्दाज़ हमें इस से भी लगता है कि चारों सुसमाचारों में इस प्रमुखतम घटना का वर्णन है। बाइबिल में पुराने नियम में प्रभु यीशु के पुनरुत्थान की भविष्यवाणियां की गईं हैं। नये नियम में प्रेरितों के काम नामक पुस्तक में हम पाते हैं कि चेलों के प्रचार का केन्द्र बिन्दु प्रभु यीशु का पुनरुत्थान था। सुसमाचारों और प्रेरितों के काम के प्रारम्भिक अध्यायों में इस बात का वर्णन है कि प्रभु यीशु अपने जी उठने के बाद बहुत सारे लोगों को दिखाई दिया, उसने उनसे बात-चीत की और लोगों ने पाया कि उसका सशरीर पुनरुत्थान हुआ है। यदि आप किसी बड़ी लायब्रेरी में जाएंगे तो पाएंगे कि प्रभु यीशु के पुनरुत्थान का वर्णन इतिहासकार भी करते हैं और जो सबसे प्रमुख बात है वह यह कि ग़ैर मसीही इतिहासकार भी अपनी लेखनी में प्रभु यीशु मसीह का वर्णन करते हैं। जिन दिनों मैं बाइबिल काॅलेज में अध्ययन कर रहा था, मुझे एक शोध करना था और शोध का विषय यह था कि ग़ैर मसीही इतिहासकारों की लेखनी को ढूंढकर यह संग्रह करना था कि उन्होंने प्रभु यीशु मसीह के जीवन की घटनाओं का क्या वर्णन किया है। मैं यह जानकर आश्चर्य से भर गया कि ग़ैर मसीही इतिहासकारों ने अपनी लेखनी में पुनरुत्थान के सन्दर्भ में सबसे ज्य़ादा बातें लिखी हैं। वल्र्ड बुक इनसाइक्लोपीडिया में पुनरुत्थान का वर्णन प्रमाणों सहित किया गया है। प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान कोई मन गढ़न्त बात नहीं है, कोई कपोल कल्पना नहीं वरन् एक ऐतिहासिक सत्य है। एक ऐसा सत्य जिसकी बुनियाद पर आज हमारी कलीसिया जीवित है। अब प्रश्न यह उठता है कि 2000 साल पुरानी इस घटना से हमारा क्या सम्बन्ध है, इस बात का हमारे लिए क्या महत्व है? पुनरुत्थान मेरे और आपके लिए क्या शिक्षा लाता है? इस सम्बन्ध में मैं चार बातें कहना चाहूंगा कि पुनरुत्थान का क्या प्रभाव हमारे जीवनों से प्रगट होना चाहिए। 1. हमें परमेश्वर की सामथ्र्य पर विश्वास करना चाहिए:- यदि आप देखें तो पाएंगे कि प्रभु यीशु मसीह के खिलाफ या उसके विरोध में चार प्रकार की शक्तियां थीं। पहली बात, हम पाते हैं कि सारी धार्मिक शक्तियां प्रभु यीशु मसीह के विरोध में थीं। बार-बार हम इस बात का वर्णन पाते हैं कि शास्त्री और पुरनिए और महायाजक व फरीसी यीशु के विरोध में थे, वे उसे मार डालने का षड़यंत्र रच रहे थे क्योंकि प्रभु यीशु मसीह ने उनकी भ्रष्टता को चैराहों पर उजागर कर दिया था। दूसरी बात, न सिर्फ धार्मिक शक्तियां प्रभुु यीशु के खि़लाफ थीं परन्तु शासन की शक्ति, सम्राट की शक्ति भी प्रभु यीशु मसीह के ख़िलाफ थी। हम पाते हैं प्रभु यीशु को पीलातुस के पास, हेरोदस के पास ले जाया गया। हेरोदेस ने अपने सिपाहियों के साथ यीशु का अपमान किया, उसका मज़ाक उड़ाया। शासन घबराया हुआ था क्योंकि लोग प्रभु यीशु मसीह को राजा बनाना चाहते थे। लोग सोचते थे कि जब इस का राज्य आवेगा तो कोई भूखा न होगा क्योंकि उन्होंने उसे पांच रोटी और दो मछली से हज़ारों की भीड़ की भूख शान्त करते हुए देखा था। लोग सोचते थे कि इसका राज्य आएगा तो कोई बीमार नहीं होगा क्योंकि यह चंगाई देता है। लोग सोचते थे कि इसका राज्य आएगा तो कोई मरेगा नहीं क्योंकि यह तो मृतकों को जिला देता है। प्रभु यीशु मसीह का प्रभाव लोगों में बढ़ता जा रहा था और इस कारण शासन घबराया हुआ था और शासन की शक्ति यीशु के विरोध में हो गई थी। तीसरी बात, हम देखते हैं कि न सिर्फ धार्मिक शक्तियां, न सिर्फ शासन की शक्ति उसके विरोध में थी बल्कि न्याय-पालिका की शक्ति भी उसके विरोध में थी। अक्सर हम कहते हैं कि हमें अपनी न्याय-पालिका पर विश्वास है क्योंकि हमें ऐसा लगता है कि कम से कम अदालत में तो नाइंसाफी नहीं होगी। परन्तु हम पाते हैं कि न्यायपालिका की शक्ति भी प्रभु यीशु मसीह के विरोध में थी। यीशु को पीलातुस की अदालत में खड़ा कर दिया गया। लूका रचित सुसमाचार के 23 वें अध्याय में इस घटना का वर्णन है। लूका 23ः1-4 और उसके बाद लूका 23ः13-25 में प्रभु यीशु मसीह पर तीन आरोप लगाये जाते हैं। पीलातुस की अदालत में उस पर झूठे आरोप लगाये जाते हैं और तब पीलातुस कहता है कि मैं तो इस मनुष्य में कोई दोष नहीं पाता और उसे हेरोदस के पास भेज दिया जाता है, जहां हेरोदेस उसका अपमान करता है। वहां से वापस प्रभु यीशु मसीह को पीलातुस की अदालत में लाकर खड़ा कर दिया जाता है। भीड़ ने नारे लगाये कि उसे क्रूस पर चढ़ाओ। तब हम पाते हैं कि भीड़ के सामने पीलातुस विवश हो जाता है। न्याय की शक्ति, न्याय-पालिका की शक्ति कमज़ोर हो जाती है और पीलातुस प्रभु यीशु मसीह को लोगों की इच्छा के अनुसार छोड़ देता है। चौथी बात, हम देखते हैं कि भीड़ की शक्ति प्रभु यीशु मसीह के विरोध में थी। भीड़ के नारों, भीड़ की चिल्लाहट, भीड़ के प्रभाव ने न्यायाधीश को अपना न्याय बदलने पर मजबूर कर दिया। इसे क्रूस पर चढ़ाओ, हमारे लिए बरअब्बा को छोड़ दो, इसका लहू हमारी सन्तानों पर हो परन्तु इसका काम तमाम करो; के नारों ने पीलातुस को भी ग़लत न्याय करने पर मजबूर कर दिया। भीड़ की शक्ति प्रभु यीशु मसीह के खिलाफ थी। हम पाते हैं कि अपनी सारी शक्तियों के साथ शैतान ने पूरी ताकत से प्रभु यीशु मसीह पर वार किया। सांसारिक रूप से यदि देखें तो हम पाते हैं कि इन शक्तियों ने मिलकर वही किया जो सबसे बुरा हो सकता था, जो सबसे बद्तर हो सकता था; उन्होंने प्रभु यीशु मसीह की हत्या कर दी, उसे सूली पर चढ़ाकर मार डाला। परन्तु फिर रविवार का दिन आता है और हम पाते हैं कि परमेश्वर की शक्ति ने सारी शक्तियों को परास्त कर दिया। पहरेदारों का पता नहीं चला, रोमी सरकार की मुहर का पता नहीं चला, राजा की शक्ति का पता नहीं चला, न्याय-पालिका की शक्ति का पता नहीं चला। वे कांटे, वह थूक, वे थप्पड़, वे कीलें, वह कांटों का ताज सब व्यर्थ हो गया। भीड़ का चिल्लाना व्यर्थ हो गया, यहूदा का विश्वासघात व्यर्थ हो गया। महायाजकों और शास्त्रियों का षड़यंत्र व्यर्थ हो गया यहां तक कि मृत्यु भी पराजित हो गई। परमेश्वर की शक्ति विजयी हुई। प्रभु यीशु मसीह ने मृत्यु को पराजित कर दिया। इसीलिए जब हम प्रभु यीशु के पुनरुत्थान पर विश्वास करते हैं तो हमारा विश्वास परमेश्वर की शक्ति पर, उसकी सामर्थ्य पर होना चाहिए। जब हम अपने जीवनों में निराश होते हैं तो परमेश्वर हम को आशा देता है कि हम कभी निराश न हों, कभी पराजित न हों। धैर्य रखें, परमेश्वर पर हमारा अटल विश्वास बना रहे। संसार की कोई भी शक्ति परमेश्वर की शक्ति से महान नहीं और जब परमेश्वर हमारे साथ है तो संसार की कोई भी शक्ति हमको पराजित नहीं कर सकती। हमारी विजय स्थगित ज़रूर हो सकती है, विजय में थोड़ी देरी ज़रूर हो सकती है परन्तु अन्तिम विजय हमारी है क्योंकि हम परमेश्वर के लोग हैं। हमें परमेश्वर की सामर्थ्य पर विश्वास करना चाहिए। 2. हमारा विश्वास परमेश्वर के वचन पर होना चाहिए:- यीशु ने अपने जीवन काल में बार-बार अपने पुनरुत्थान की भविष्यवाणी की। नये नियम में कई ऐसे सन्दर्भ हैं जहां प्रभु यीशु मसीह ने अपनी मृत्यु और उसके बाद अपने पुनरुत्थान के बारे में चेलों को बताया। अगर पुनरुत्थान नहीं होता तो प्रभु यीशु मसीह झूठा हो जाता, अगर पुनरुत्थान न होता तो परमेश्वर का वचन कलंकित हो जाता। यदि पुनरुत्थान न होता तो परमेश्वर के वायदे, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएं व्यर्थ हो जातीं, यदि पुनरुत्थान न होता तो स्वर्गदूतों की उद्घोषणा व्यर्थ हो जाती। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो कि प्रभु यीशु मसीह की भविष्यवाणियों के अनुसार, परमेश्वर के वचन के अनुसार प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान हुआ। उसने मृत्यु पर विजय प्राप्त की और वचन में लिखी एक-एक बात अक्षरशः सत्य साबित हुई। इसलिये जब प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि मैं और मेरा पिता एक हैं तो हो सकता है हम इस बात को न समझ पाएं परन्तु हमको विश्वास करना है। जब प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि पिता, पुत्र और पवित्रात्मा एक है, और परमेश्वर का वचन भी यही कहता है तो हमें विश्वास करना है। जब प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि तुमने मुझे देखा तो पिता को देखा तो हमें विश्वास करना है। जब प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि जगत के अन्त तक मैं सदैव तुम्हारे संग हूं तो हमें इस बात पर विश्वास करना है। जब प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि आकाश और पृथ्वी टल जाएं लेकिन मेरी बातें कभी न टलेंगी, हमें विश्वास करना है। मात्र विश्वास करना पर्याप्त नहीं वरन् देखें कि हमारे जीवनों में कौन-सी कमियां हैं, और उन कमियों को दूर करके इस वचन के अनुसार हम अपने जीवन को बनाएं। मात्र विश्वास करना पर्याप्त नहीं है वरन् वचन के दर्पण में अपने परिवार को देखें और अपने पारिवारिक सम्बन्धों को इस प्रकार से बनाएं, जैसा परमेश्वर चाहता है। हम अपनी कलीसियाओं को देखें और उन परम्पराओं को बदलें जो परमेश्वर के वचन से मेल नहीं खातीं। हम अपनी संस्थाओं को देखें और ढूंढें कि कौन-सी कमियां हमारी संस्थाओं में हैं? क्या हम परमेश्वर की गवाही दे रहे हैं? क्या हम उसके वचन का प्रचार कर रहे हैं? क्या हम अन्धकार में बैठे लोगों तक पहुंच रहे हैं? प्रभु यीशु मसीह कहता है, जाओ, जाकर सारे जगत के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र और पवित्रात्मा के नाम से बपतिस्मा दो। उन्हें वे सारी बातें मानना सिखाओ जो मैंने तुम्हें सिखाई हैं। प्रभु यीशु मसीह का यह आदेश हमारे जीवन, हमारी कलीसियाओं और हमारी संस्थाओं की प्राथमिकता होना चाहिए क्योंकि परमेश्वर का वचन अटल है, प्रभु यीशु मसीह की प्रतिज्ञा दृढ़ और सच्ची है। 3. हम में भय नहीं होना चाहिए:- ‘निश्चय वह जी उठा है’, इन पांच शब्दों ने सारे संसार में क्रान्ति ला दी, संसार को उल्टा-पुल्टा कर दिया, इतिहास की धारा को बदल दिया। लोगों के जीवनों को, उनके नैतिक मूल्यों को झकझोर दिया। निश्चय वह जी उठा है। जहां भय था, हम पाते हैं कि वहां निडरता आ गई, जहां निराशा थी वहां आशा आ गई। जो चेले भय के कारण अपने आप को दरवाज़ों के पीछे बन्द कर चुके थे, पुनरुत्थान का अनुभव होने के बाद, जीवित प्रभु को देखने के बाद वे यरूशलेम के चैराहों पर निकल आते हैं और परमेश्वर के वचन का प्रचार डंके की चोट पर करते हैं। पतरस जो मुकर गया था, जो डर गया था, जो दूर चला गया था, जिसने कह दिया था कि मैं तो इस पुरुष को जानता भी नहीं; वही पतरस जब इस पुनरुत्थित प्रभु को देखता है तो जिस यरूशलेम में यीशु पर मुक़दमा चलाया गया था, जिस स्थान पर रोमी सिपाहियों के बूटों की आवाज़ लोगों को आतंकित करती थी; उसी स्थान पर निर्भीकता से खड़ा हो जाता है और कहता है कि सचमुच प्रभु यीशु मसीह जीवित हो उठा है। जिसको तुमने मार डाला था, उसको परमेश्वर की सामर्थ्य ने ज़िन्दा कर दिया है। डंके की चोट पर पतरस प्रचार करता है और हम पाते हैं कि पतरस के प्रचार से लोगों के दिल छिद जाते हैं। लिखा हुआ है कि वे लोग पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे तो हम क्या करें, तब उसने कहा मन फिराओ और तुम में से हर एक अपने-अपने पापों की क्षमा के लिए प्रभु यीशु मसीह के नाम का बपतिस्मा ले तो तुम उद्धार पाओगे। तब कलीसिया की स्थापना होती है और तीन हज़ार लोग प्रभु में मिलाए जाते हैं क्योंकि पतरस में भय नहीं था, उसने निर्भीकता से लोगों को उनके पाप के बारे में बताया था। वचन बताता है कि प्रभु यीशु मसीह के परिवार के लोग भी उस पर विश्वास नहीं करते थे। यूहन्ना रचित सुसमाचार में लिखा हुआ है कि उसके भाई भी उस पर विश्वास नहीं करते थे (7ः5)। उसके बाद 1 कुरिन्थियों 1ः7 में पौलुस लिखता है कि पुर्नजीवित मसीह याकूब को दिखाई दिया। याकूब जो यीशु का भाई था और जब यीशु के पुनरुत्थान का अहसास याकूब को हुआ तो उसका जीवन बदल गया। प्रेरितों के काम के पहले अध्याय में लिखा हुआ है कि यीशु की माता और उसके भाई प्रार्थना करने में लग गये। याकूब, चेलों के बीच में आदर का पात्र बन गया। जब पतरस की हत्या कर दी गई तो उसके बाद याकूब दल का अगुवा बना और जोसेफस इतिहासकार लिखता है- फिसेतुस के मरने के बाद हन्ना महायाजक ने यहूदियों की महासभा सिनहैड्रिन के न्यायियों को एकत्र किया और याकूब पर दोष लगा कर उस पर पत्थरवाह कर के उसको मरवा डाला। अब मौत का भय नहीं है, पत्थरों की मार का भय नहीं है। अब संसार के तिरस्कार का भय नहीं है। अब किसी बात का भय नहीं है। उन का भय नहीं है जो शरीर को नाश कर सकते हैं क्योंकि अब प्रभु ने मृत्यु को पराजित कर दिया है और अनन्त जीवन का मार्ग खोल दिया है। स्तिफनुस पर पत्थरवाह होता है और वह घुटने टेककर प्रार्थना करता है कि हे प्रभु, यह दोष उन पर मत लगा। बाइबिल में 365 बार यह शब्द आया है, मत डरो....। एक वर्ष में भी 365 दिन होते हैं और किसी टीकाकार ने कहा है कि ऐसा लगता है जैसे परमेश्वर का वचन अपने लोगों के लिए प्रतिदिन कह रहा है मत डरो, मत डरो, मत डरो...। 365 दिनों में हर दिन के लिए सन्देश है, मत डरो। इस कारण, मैं आप से कहना चाहता हूं कि हम में भय नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रभु यीशु मसीह ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की है और अन्तिम विजय हमारी है। 4. हमें ज़िन्दा लोग होना चाहिए:- हमें ज़िन्दा क़ौम होना चाहिए। हमारी कलीसियाएं ज़िन्दा कलीसियाएं होना चाहिए। कलीसिया, प्रभु यीशु मसीह की देह है और प्रभु की देह मरी हुई नहीं है, उसकी देह सड़ी और गली हुई नहीं है, ऐसी नहीं है जो स्थिर हो गई हो, जो बढ़ नहीं सकती। प्रभु यीशु मसीह की देह तो तेजोमय, पवित्र, निष्कलंक और जीवित देह है; इसलिए हमारी कलीसियाओं को जीवित होना चाहिए। हमारी कलीसियाओं में मृत्यु के काम नहीं होना चाहिए। अन्धेरे के काम नहीं होना चाहिए जैसे- पाप, झूठ, जलन, ईष्र्या, झगड़े, स्वार्थ, आलोचना और बुराई, टूट-फूट और व्यभिचार। ये शैतान की बातें हैं, ये तो कलीसिया नहीं वरन् संसार की बातें हैं। कलीसिया में तो ज़िन्दगी के काम होना चाहिए, क्योंकि यह तो प्रभु यीशु मसीह की जीवित देह है, जिसके हम अंग हैं, सदस्य हैं। ज़िन्दगी के काम यानी एक दूसरे की सहायता, एक दूसरे के प्रति सहानुभूति, सद्भावना, त्याग, प्रेम, क्षमा, भलाई, विश्वास, नम्रता, धीरज, संयम, शान्ति। ये बातें कलीसिया में होनी चाहिए, ये बातें हमारे जीवनों में होना चाहिए। रोमियों 8ः11 में पौलुस लिखता है- “जिसने मसीह को मृतकों में से जिलाया, वही तुम्हारी मरनहार देहों को भी अपनी आत्मा के द्वारा जिलायेगा”। जिस मसीह को परमेश्वर ने मृतकों में से जिलाया, उसी सामर्थ्य से वह हमारे जीवन जो मृतक हो गये हैं, उनको जिला सकता है। हमारे परिवारों को जिला सकता है। वे सारी बातें जो असम्भव दिखाई देती हैं, उनको सम्भव बना सकता है। बन्द दरवाज़ों को खोल सकता है, हमारी समस्याओं का समाधान कर सकता है। जहां अशान्ति है वहां शान्ति मिल सकती है क्योंकि प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान की सामर्थ्य जब हम में काम करती है तो हमारे मुर्दा जीवन भी जीवन प्राप्त कर लेते हैं। हमारी कलीसिया एक ज़िन्दा, सामर्थी, तेजस्वी, ओजस्वी, प्रखर, मुखर, निडर और निर्भीक कलीसिया होना चाहिए। प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कारण जो चार बातें हमें अपने जीवन में लाना हैं वे यह कि; हमें परमेश्वर की सामर्थ्य पर विश्वास करना चाहिए। उसके वचन पर हमारा विश्वास होना चाहिए। उसके वचन के अनुसार हमें अपने जीवनों, परिवारों, अपनी कलीसियाओं और अपनी संस्थाओं को बनाना चाहिए। हम में भय नहीं होना चाहिए। हमें ज़िन्दा क़ौम होना चाहिए। हमारी कलीसिया से, हमारे जीवनों से ज़िन्दगी के काम होना चाहिए। प्रेरितों के काम 17ः32-34 में वर्णन है उस घटना का, जब पौलुस अथेने में था। लिखा हुआ है कि पौलुस जब अथेने में आया तो उसने शहर में बहुत-सी मूरतों को देखा और लिखा हुआ है कि उसका जी जल गया। इसके बाद वह वहां पर प्रचार करता है और लोगों को पुनरुत्थान के बारे में बताता है। तब प्रेरितोें के काम 17ः32-34 में हम पाते हैं कि पुनरुत्थान की बात सुनकर तीन प्रतिक्रियाएं हुईं। पहली प्रतिक्रिया- लिखा हुआ है कि कितने तो ठट्ठा करने लगे। ऐसे लोग जिन्होंने पुनरुत्थान के सत्य को नकार दिया, जो मज़ाक करने लगे कि अरे! यह क्या बात है, क्या कोई मर के जीवित हो सकता है? कोई मृत्यु को परास्त कर सकता है? दूसरे प्रकार के लोगों के विषय में लिखा हुआ है- कि कितनों ने तो मुझ से कहा कि यह बात हम तुझ से फिर सुन लेंगे। बड़ी आसानी से उन्होंने बात को टाल दिया। तीसरी जो प्रतिक्रिया थी उसके बारे में लिखा हुआ है कि- कितनों ने तो विश्वास किया और उन में मिल गये। मेरे प्रियो, पुनरुत्थान का सत्य ऐतिहासिक सत्य है, ऐतिहासिक तथ्य है। हमारे मसीही विश्वास, मसीही जीवन, हमारी मसीही कलीसिया और परमेश्वर के वचन का आधार है पुनरुत्थान। पुनरुत्थान के प्रति हमारी क्या प्रतिक्रिया है? पुनरुत्थान के सत्य को क्या हम एक परम्परा के रूप में आराधना में आकर और मनाकर चले जाएंगे और कोई परिवर्तन हमारे जीवनों में आएगा नहीं। या हम कहेंगे कि ख़ैर अभी तो बहुत समय है हमारे जीवन के लिये। मैं आप से कहना चाहूंगा कि हो सकता है कि मेरे और आपके लिये यह अन्तिम पुनरुत्थान पर्व हो। कितने लोग जो पिछले वर्ष हमारे साथ आराधना कर रहे थे लेकिन आज हमारे मध्य नहीं हैं। कितने लोग जो आपके पास बैठे थे वे आज प्रभु के पास चले गये। हो सकता है कि हमारी ज़िन्दगी का यह अन्तिम ईस्टर हो क्योंकि मृत्यु का उम्र से कोई सम्बन्ध नहीं होता, कोई सरोकार नहीं होता। परन्तु कितनों ने तो उस पर विश्वास किया, उसे स्वीकार किया और उसके अनुरूप जीवन जिया। क्या आज हम उन लोगों के समान हैं जो पुनरुत्थान के सत्य को, उसके तथ्य को स्वीकारते हैं? परमेश्वर की सामर्थ्य पर विश्वास करते हैं? उसके वचन के अनुसार अपने आप को बनाते हैं? अपने हृदय से सारे भय को निकालते हैं और निर्भीकता से उसके काम में लग जाते हैं? ज़िन्दगी के काम हमारे जीवनों से, हमारी कलीसियाओं से, हमारे परिवारों से होते हैं? हमारे जीवन दूसरों के लिए आशीष का कारण ठहरते हैं? मेरी प्रार्थना है प्रियो कि पुनरुत्थान पर्व का मनाना एक परम्परा न हो परन्तु परमेश्वर की एक व्यवस्था हो, परमेश्वर की एक योजना हो। परमेश्वर की एक पुकार हो, परमेश्वर का दिया एक अवसर हो और इसलिये इसे हम गम्भीरता से मनाएं और पुनरुत्थान की सामर्थ्य को अपने जीवन में काम करने दें। परमेश्वर हमारे जीवनों को बदलेगा, हमारे चिन्तन को बदलेगा, हमारे व्यवहार को बदलेगा। हमारे जीवन, जो पत्थर से हो गए हैं, उनको तोड़ेगा और हमारे पत्थर के हृदयों को तोड़कर वह हाड़ और मांस का हृदय, शरीर हमको देगा और अपनी महिमा के लिए हमको इस्तेमाल करेगा। काश! हमारे जीवनों से ज़िन्दगी के काम हों, काश! हमारी कलीसियाओं से उसके वचन का प्रचार हो और काश! हमारी संस्थाओं से प्रभु यीशु का नाम संसार के कोने-कोने तक फैलाया जाए। मैं, आप को पुनरुत्थान पर्व की बधाई देता हूं और प्रार्थना करता हूं कि इस पुनरुत्थान की सामर्थ्य का अनुभव आप में से प्रत्येक अपने जीवन में करेंगे। परमेश्वर आपको आशीष दे।