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प्रेरणापूर्ण जीवन

प्रेरणापूर्ण जीवन

संदर्भ: नीतिवचन 23ः7; फिलिप्पियों 2ः1-4

हम सभी के जीवन में हमें प्रेरणा की आवश्यकता होती है कि कोई हमें प्रेरित करे, प्रोत्साहित करे, जिससे हमें कुछ प्रेरणा मिले। आज टेलीविजन पर देखें तो लोगों के चेहरे, ख़ासतौर से राजनीतिज्ञों के चेहरे ऐसे मुर्झाए हुए हैं, ऐसे तनाव में हैं कि लगता है जैसे लोग हंसना भूल गए हैं।

सबके जीवन में तनाव आते हैं, सबकी अलग अलग कठिनाइयां हैं, सबकी अपनी परेशानियां हैं परन्तु ऐसा लगता है कि जीवन में कोई प्रेरणा नहीं है। कुछ भला कर सकने की, दूसरे के हित का कुछ प्रयास करने की कोई इच्छा नहीं रह गई। कितनी बार ऐसा हुआ है कि हमने अपने प्रिय के कन्धे पर हाथ रख कर यह पूछा हो कि क्या हाल चाल है? सभोपदेशक की पुस्तक का लेखक लिखता है कि जो हुआ है वही होना है, वैसे ही वायु चलना है, वैसे ही दुनिया चलती रहेगी।

पिछले सप्ताह मैं एक पुस्तक पढ़ रहा था जिसमें लिखा था कि जैसे यह दुनिया गोल है वैसे ही सब कुछ गोल है। हम यहां आते हैं, जाते हैं। हवा चलती है, रात होती है, दिन होता है। माह बीतते हैं, ऋतुएं बदलती हैं। हम इस संसार से चले जाएंगे, फिर सब कुछ वैसा ही चलता रहेगा। कोई थोड़े दिन दुख मनाएगा, फिर उसके बाद कोई याद भी नहीं करेगा। आज से 100 साल बाद मुझे और आपको संसार में कोई याद करने वाला भी नहीं होगा। सौ साल बाद हमारी क़ब्र पर जाने वाला भी कोई नहीं होगा क्योंकि हम एक बिल्कुल अलग संसार में जी रहे हैं।

मैं आपसे और स्वयं से एक प्रश्न करना चाहता हूं कि जीवन में हम प्रेरित कैसे रहें? अक्सर यह कहा जाता है कि एक व्यक्ति बहुत बड़ा अन्तर ला देता है। महात्मा गांधी, महात्मा गांधी क्यों हुए? हम, हम क्यों हैं? मदर टेरेसा, मदर टेरेसा क्यों हुईं? अब्राहम लिंकन, अब्राहम लिंकन क्यों हुए? मार्टिन लूथर मार्टिन लूथर क्यों हुए? वे क्यों वे हुए, हम हम क्यों हैं? क्या बात है एक व्यक्ति में?

परमेश्वर ने व्यक्ति को इतनी ऊर्जा दी है कि एक व्यक्ति भारी अन्तर ला सकता है। किसी को नोबल पुरस्कार क्यों मिलता है? किसी को पद्मश्री क्यों मिलती है? क्या कारण है? ये बातें आती कहां से हैं? यदि हम इसके मूलभूत कारण में जाएं तो नीतिवचन की पुस्तक में लिखा हुआ है “क्योंकि जैसा मनुष्य अपने मन में विचार करता है, वैसा वह आप है” (23ः7अ)।

जैसा मनुष्य का हृदय होता है, वैसा ही उसका ही व्यवहार होता है। जैसा हमारा चिन्तन होता है, वैसा ही हमारा स्वभाव होता है। जैसी हमारी सोच होती है, वैसे ही हमारे जीवन में हमारा व्यवहार होता है।

मेरे पिता कहा करते थे कि लोग अपने जो लक्ष्य बना लेते हैं, उनसे ऊपर बहुत कम लोग आ पाते हैं। क्योंकि वे लक्ष्य बहुत सीमित बनाते हैं। इसीलिए हमें अपने लक्ष्य बहुत ऊंचे बनाना चाहिए। जो व्यक्ति जैसा मन में सोच लेता है, जैसा मन में ठान लेता है, वैसा वह स्वयं बन जाता है। एक क्रिकेट टीम के कोच का इन्टरव्यू आ रहा था और उससे पूछा गया कि जो कोचिंग आप करते हैं, अपने क्रिकेटर्स को जो व्यायाम करवाते हैं, उन्हें सिखाते हैं कि उन्हें कैसे खेलना है, कैसे खड़े होना है तो क्या उद्देश्य है आपकी कोचिंग का? उस कोच का जवाब था कि मेरी जो भावना है, वही खिलाड़ियों में भी आ जाए और जिस दिन उन में यह भावना आ जाएगी, उस दिन मेरा कार्य सफल हो जाएगा।

एक सेनानायक सुबह से उठता है, अनुशासन की बात करता है, व्यायाम करता है। बाधाओं का लांघना, ऊंची छलांग लगाना आदि बातों को सिखाता है। वह कहता है कि मेरा उद्देश्य यह है कि यह जो भावना है, यह जो उत्साह है, उसे मैं दूसरों तक पहुंचा सकूं। यह बात बहुत प्रमुख है।

कल्पना कीजिए कि अगर हमारे राष्ट्र के सब लोग प्रेरित और प्रोत्साहित हो जाएं, अपने-अपने कार्य में प्रेरणा से पूर्ण हो जाएं तो क्या होगा? हम अपने देश का नक्शा बदल देंगे।

यदि बाइबिल में देखें तो बहुत से वर्णन हैं कि जब परमेश्वर को अपना काम करवाना था तो उसने भीड़ से अपने काम नहीं करवाए। परमेश्वर ने थोड़े से लोगों को चुना, उसने अपने कार्य के लिए बहुत कम लोगों को चुना।

प्रभु यीशु मसीह संसार में आए थे कि ख़बर फैल जाए कि सबकी आत्मा का उद्धार करने के लिए उद्धारकत्र्ता आया है। सबको शान्ति देने के लिए, सबको मृत्यु के बाद अनन्त जीवन देने के लिए, सबको स्वर्ग राज्य की निश्चितता देने के लिए मसीहा आया है। परन्तु सारे संसार में यह ख़बर फैले, उसके लिए, अपनी मृत्यु के बाद प्रभु यीशु ने सिर्फ 12 लोगों को छोड़ा। मात्र 12 लोगों को प्रचार करने के लिए छोड़ा। परन्तु प्रभु यीशु मसीह की प्रेरणा से भरपूर इन 12 लोगों ने संसार को बदल कर रख दिया।

हमारी संस्था के हाॅस्पिटल में सेवारत एक वरिष्ठ डाॅक्टर कहते हैं कि अमुक व्यक्ति अगर अस्पताल में न हो तो बहुत अन्तर आ जाएगा। एक व्यक्ति के रहने से किसी संस्था की कार्यक्षमता में बड़ा अन्तर आ जाता है और कई बार ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति अपना स्थान नहीं बना पाता और वह चला जाता है तो भी संस्था की कार्य क्षमता में कोई अन्तर नहीं आता।

प्रश्न है कि क्या हमारे जीवनों में, क्या हमारे हृदयों में वह प्रेरणा है? क्या वह प्रोत्साहन हमारे जीवनों में है? प्रश्न उठता है कि प्रेरणा और प्रोत्साहन में क्या अन्तर है? प्रोत्साहित तो हम गाना सुनकर या कविता पढ़कर भी हो जाते हैं परन्तु प्रेरणा मूल रूप से हमें अपने लक्ष्य और उद्देश्य की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है।

परमेश्वर ने हमको इस संसार में परिवर्तन लाने के लिए भेजा है। हम जिस स्थान पर हैं उसके चारों तरफ परिवर्तन लाने के लिए परमेश्वर ने हमें भेजा है। इसके लिए हमें कुछ करना है, हमें प्रोत्साहित रहना है, हमें प्रेरित रहना है। इस सन्दर्भ में कुछ बातों को हम देखेंगे।

1. प्रेरित अथवा प्रोत्साहित रहना हमारी स्वयं की ज़िम्मेदारी है:- 1 शमूएल 30ः6 में लिखा है “और दाऊद बड़े संकट में पड़ा क्योंकि लोग अपने बेटे बेटियों के कारण बहुत शोकित होकर उस पर पत्थरवाह करने की सोच रहे थे। परन्तु दाऊद ने अपने परमेश्वर को स्मरण करके हियाव बान्धा”। English में लिखा है - He encouraged himself. उसने अपने आपको प्रेरित किया, परमेश्वर की ओर अपनी दृष्टि की। परिस्थितियां नकारात्मक थीं, भयपूर्ण थीं परन्तु दाऊद ने स्वयं अपना ध्यान परमेश्वर की ओर लगाकर अपने आपको प्रोत्साहित किया।

अगर हमें प्रोत्साहित रहना है तो यह किसी और की नहीं वरन् स्वयं हमारी ज़िम्मेदारी है। यदि हम जीवन के हर एक दिन में, हर परिस्थिति के चित्र में परमेश्वर को देखेंगे तो हम अपने आप से प्रोत्साहित रहेंगे। यदि हमारे सामने समस्या है और उस समस्या के चित्र में परमेश्वर नहीं है तो हम निराश हो जाएंगे। परन्तु यदि उस समस्या के चित्र में हम परमेश्वर को देखेंगे तो हमें एक आशा प्राप्त होगी। हम स्वयं को प्रोत्साहित अनुभव करेंगे क्योंकि तब हम देखेंगे कि परमेश्वर ने हमको चुना है, एक विशेष उद्देश्य से इस संसार में भेजा है। दुनिया का कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसको परमेश्वर ने कोई योग्यता न दी हो। हमें यह देखना है कि परमेश्वर ने हमें क्या योग्यता दी है और क्या हम उसे परमेश्वर के लिए लगा रहे हैं? क्या हमारे कार्य से परमेश्वर प्रसन्न है? अगर हमारे इन प्रश्नों का जवाब हां में है, अगर हम अपनी योग्यता को परमेश्वर के भय में उसकी महिमा के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं तो हमारे जीवन में बड़ी शान्ति रहेगी। हमें यह दृढ़ता रहेगी, कि परमेश्वर ने मुझे जिस योजना के लिए भेजा है, मैं उसे पूरा कर रहा हूं, फिर चाहे मेरा काम संसार की दृष्टि में कितना भी छोटा क्यों न हो।

मैं एक जेलर के विषय में पढ़ रहा था। उनकी यह ज़िम्मेदारी थी कि वह अपनी जेल के तीन सौ क़ैदियों को व्यस्त रखें। वह बड़े परेशान थे कि इतने सारे कै़दियों को एक साथ आठ घण्टे कैसे व्यस्त रखा जाए और वह भी इतना व्यस्त रखना कि वे थक जाएं। अन्त में उन्होंने एक युक्ति सोची। जेल के बीच में एक मैदान था, उन्होंने कई ट्रक मिट्टी मैदान के एक कोने पर डलवा दी। उसके बाद उन्होंने कै़दियों से कहा कि तुमको इस मिट्टी को टोकनियों में भर कर मैदान के दूसरे कोने पर पहुंचाना है और यह काम तुम्हें जल्दी जल्दी करना है। जब इन कै़दियों ने मिट्टी टोकनियों में रख कर, दौड़ लगा कर बड़ी मेहनत से दूसरे स्थान पर पहुंचा दी तब जेलर ने कहा, अब तुम्हारा काम है कि इस मिट्टी को उस स्थान पर वापस रखो जहां से इसे लाए थे। इस प्रकार से वह उन तीन सौ क़ैदियों को व्यस्त रखने लगे।

कितनी बार अपने जीवन में हमें लगता है कि हम भी बस वही काम कर रहे हैं। वही काम की भागदौड़ है क्योंकि पैसा कमाना है, बच्चों को पालना है और मात्र यंत्रवत हम अपने कार्य को कर रहे हैं। नहीं! यह उद्देश्य ग़लत है, परमेश्वर ने जो कुछ दिया है, उस योग्यता का हमें भरपूरी से इस्तेमाल करना है। न सिर्फ अपनी योग्यता का इस्तेमाल करना है बल्कि उसे बढ़ाना भी है और उसे विस्तार भी देना है। जब ऐसा करेंगे तो फिर इस बात का अहसास नहीं लगेगा कि मात्र मिट्टी को ढोते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान और दूसरे स्थान से फिर वापस पहले स्थान पर ले जा रहे हैं।

2. यदि हमें प्रेरित रहना है तो ऐसे लोगों के साथ रहने का प्रयास करें जिनसे हमें कुछ प्रेरणा प्राप्त हो सके:- हमें ऐसे लोगों के साथ समय बिताने का प्रयास करना है, जिनसे हमें कुछ प्रोत्साहन मिल सकता है। आप स्वयं अपने दिल से पूछें, वे ही लोग हमें अच्छे लगते हैं जिनसे हमें प्रेम मिलता है, जिनके बीच में रहकर खुशी महसूस होती है। जिनके पास जब हम जाते हैं तो वह मुस्कराकर, हंसते हुए हमें स्वीकार करते हैं। जिनके जीवन से आनन्द छलकता है ऐसे लोग ही हमें अच्छे लगते हैं, ऐसे लोगों से अपनेपन का अहसास होता है।

कई बार ऐसा होता है कि जब मैं आॅफिस से काफी थका हुआ घर लौटता हूं। मेरे दिमाग में दस समस्याएं चल रही होती हैं, सोच रहा होता हूं कि इस समस्या का समाधान आज नहीं हो पाया कल कैसे इसे सुलझाऊंगा? कल के लिए फलां काम बचा है। सोचा था आज यह काम हो जाएगा मगर हो नहीं पाया। फलां व्यक्ति नाराज़ होकर चला गया। सरकार से फलां नोटिस आ गया। बहुत सारी बातें दिमाग में चल रही होती हैं परन्तु जब घर पहुंचता हूं तो देखता हूं मेरी छोटी बेटी सारिका उछलते-कूदते हुए डैडी....डैडी कहकर मेरी गोद में आ जाती है। अपनी खुशी दिखाती है और उसकी खुशी देख कर, उसके उत्साह को देखकर मेरी चिन्ता काफी हद तक दूर हो जाती है।

क्या आप अपना समय ऐसे लोगों के साथ बिता रहे हैं जो आपको और निराश कर रहे हैं? जो आपको ग़लत बातें बता रहे हैं, जो आपको और ग़लत युक्तियां सुझा रहे हैं? या फिर आप अपना समय उन लोगों के साथ बिता रहे हैं जो आपको प्रोत्साहित कर सकते हैं? जिनसे मिलकर ऐसा लगता है कि उनसे आपका दिल मिला हुआ है, जिनके साथ आप अपनी खुशियां और ग़म बांट सकते हैं। यह बहुत प्रमुख बात है कि यदि हमें अपने जीवन में प्रोत्साहित रहना है तो ऐसे लोगों के साथ समय बिताना है जो हमें प्रोत्साहित कर सकते हैं।

इस सम्बन्ध में सबसे प्रमुख बात यह है कि इस संसार के व्यक्तियों से भी बढ़कर एक व्यक्ति ऐसा है जो हमें सदैव प्रोत्साहित कर सकता है और वह प्रभु यीशु मसीह है। प्रभु यीशु मसीह अपने वचन में कहते हैं कि मैं तुम्हारा मित्र हूं, मैं तुम्हारे साथ हूं। इस संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढस बान्धो क्योंकि मैंने संसार को जीत लिया है। मेरी बातें सुनो, मेरे वचनों से तुम्हें प्रेरणा मिलेगी। मेरे वचनों से तुम्हारी निराशा दूर होगी, तुम्हारे दुखों का अन्त होगा। मेरे वचनों से तुम्हारे पाप की समस्या दूर होगी।

मैं आपको प्रभु यीशु मसीह के समीप जाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहता हूं। उनके जीवन का अध्ययन कीजिए, आपको प्रेरणा प्राप्त होगी। ऐसा हो नहीं सकता कि प्रभु यीशु मसीह की समीपी में हमें आनन्द न मिले, शान्ति न मिले, सामर्थ्य न मिले; ऐसा होना असम्भव है। क्योंकि प्रभु यीशु मसीह एकमात्र ऐसा व्यक्तित्व है जो इस संसार से कहीं बढ़कर हमारे जीवन में कार्य करता है।

3. यदि अपने जीवन में प्रोत्साहित रहना है तो अच्छी पुस्तकें पढ़ने, अच्छे लोगों के सन्देश सुनने में समय बिताएं:- किसी ने कहा है कि अपना समय महत्वपूर्ण लोगों के साथ बिताने में व्यर्थ न गवाएं बल्कि उनके साथ बिताएं जो विशिष्ट रूप से प्रेरित करने वाले लोग हैं (Don't waste your time with VIP'S but spend your time with EIP'S That is, Exceptionally Inspiring People.)

एक बार फिर से मैं कहूंगा कि ज्य़ादा से ज्य़ादा समय प्रभु यीशु मसीह की संगति में बिताने का प्रयास करें क्योंकि उससे हमें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।

यदि हमें प्रोत्साहित रहना है तो अच्छा संगीत सुनें क्योंकि संगीत की धुनें जब कान में जाती हैं और मस्तिष्क तक पहुंचती हैं तो हृदय में कुछ कार्य होता है। मेरे एक मित्र जो कि अच्छे प्रचारक हैं उन्होंने एक सभा में सन्देश देते हुए कहा कि जब भी मैं कभी तनाव में होता हूं तो एक काम करता हूं और वह यह कि मैं एकान्त में चला जाता हूं। एकान्त में जाकर मैं उन गीतों को गुनगुनाना शुरू करता हूं जो मुझे बहुत अच्छे लगते हैं और फिर लगभग पन्द्रह मिनट में ही मेरी मानसिकता बदल जाती है। मेरा सारा तनाव दूर हो जाता है। मेरी सारी समस्या मानो सुलझ जाती है।

यदि हमें प्रोत्साहित रहना है तो अच्छी पुस्तकें पढ़ना चाहिए। जीवन में कई बार अच्छी पुस्तकों को पढ़ते हुए अनेक लेखकों के अनुभवों से भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इसके अतिरिक्त हमें अपने परिवार के साथ ख़ास समय बिताना चाहिए। क्योंकि परिवार के साथ बिताया गया समय हमें नई ऊर्जा प्रदान करता है और हम नए रूप से प्रोत्साहित होकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकते हैं।

4. यदि हमें प्रोत्साहित रहना है तो हमें शारीरिक और आत्मिक अनुशासन में रहना है:- जीवन में कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिनसे हमें समझौता बिल्कुल भी नहीं करना है। हमें नियमित रूप से वचन का अध्ययन करना ही है। हमें नियमित रूप से प्रार्थना में परमेश्वर के साथ समय बिताना ही है क्योंकि प्रार्थना के द्वारा ही परमेश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध बना रहता है। प्रार्थना परमेश्वर के साथ सम्वाद है और यदि सम्वाद न हो तो सम्बन्ध कैसे बना रह सकता है?

मेरी पत्नी इन्दु अक्सर कहती है कि नियमित रूप से व्यायाम करना आवश्यक है चाहे इच्छा हो रही हो अथवा नहीं। उनका कहना है कि अगर अपनी इच्छा से चलने लगेंगे तो सब कुछ गड़बड़ हो जाएगा। यह बहुत प्रमुख है कि यदि हमें प्रोत्साहित रहना है तो फिर हमें अपने जीवन में अनुशासित रहना होगा। जब हम आत्मिक और शारीरिक अनुशासन में रहेंगे तो फिर न सिर्फ हमारा शरीर वरन् हमारी आत्मा भी स्वस्थ रहेगी और हम दूसरों के लिए आशीष का कारण ठहर सकेंगे।

अमेरिकन इंटेलीजेंस ब्यूरो के एक सर्वेक्षण में यह बताया गया कि दस प्रतिशत लोग इतने भ्रष्ट हैं कि उनको किसी भी स्थिति में सुधारा नहीं जा सकता, चाहे आप कुछ भी कर लें। रिपोर्ट में तो यहां तक कहा गया कि यदि परमेश्वर स्वयं धरा पर आ जाए तो उनको बदल नहीं सकता। इसी सर्वेक्षण में यह भी कहा गया कि अस्सी प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो एक आदर्श व्यक्तित्व की ओर देख रहे हैं, जिनसे उनको कुछ प्रोत्साहन मिल सके। वे अस्सी प्रतिशत लोग ऐसे लोगों की तलाश में हैं जिनसे वे प्रेरणा प्राप्त कर सकें।

मेरे प्रियो, हम एक ऐसे संसार में रहते हैं जहां लोगों की निग़ाहें हमारी ओर लगी हैं। जब हम कहते हैं कि हम प्रभु यीशु मसीह के पीछे चल रहे हैं, जब हम कहते हैं कि हम उसका अनुगमन कर रहे हैं, जब हम कहते हैं कि हम मसीही हैं तो फिर हमें स्वयं से प्रश्न करना है कि हमारे जीवन की क्या गवाही है?

हमें प्रभु यीशु से प्रेरणा प्राप्त करके ऐसा बनना है जिससे दूसरों को प्रेरणा मिल सके। जब तक हम खुद प्रेरित नहीं होंगे, तब तक हम दूसरों को प्रेरित नहीं कर सकते। जिस स्थान तक हम स्वयं नहीं पहुंचे हैं, वहां हम दूसरों को नहीं ले जा सकते। जिसका अनुभव हमने स्वयं नहीं किया है उसका अनुभव हम दूसरों को बता सकते।

आज सारा संसार ऐसे लोगों की तलाश में है जिनसे उन्हें प्रोत्साहन प्राप्त हो सके। मसीही होने के कारण प्रभु यीशु मसीह के मार्ग पर चलते हुए हमको ऐसा प्रोत्साहन मिलता है जो न सिर्फ इस संसार की विषमताओं, मृत्यु की छाया, त्रासदियों से गुज़रने की प्रेरणा और सम्बल देता है परन्तु इस संसार के बाद हमें अनन्त जीवन की आशा भी देता है। यही प्रेरणा हमें प्रभु यीशु मसीह से प्राप्त होती है और इसी प्रेरणा को हम दूसरों तक पहुंचा सकते हैं।

परमेश्वर आपको आशीष दे।